Published by – Bk Ganapati
Category - Religion, Ethics , Spirituality & New Age & Subcategory - Murali - Oct - 2018
Summary - Satya Shree Trimurti Shiv Bhagawanubach Shrimad Bhagawat Geeta. Month - Oct-2018 ( Daily Murali - Prajapita Brahmakumaris - Magic Flute )
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Details ( Page:- Murali 16th Oct 2018 )
16-10-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
''मीठे बच्चे - अभी तुम बहुत बड़े स्टीमर में बैठे हो, तुम खारी चैनल को पार कर क्षीरसागर में जा रहे हो, तुम्हारा लंगर उठ चुका है''
 
प्रश्नः-बच्चों को विशेष थकावट किस बात में आती है? थकावट आने का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:-
बच्चे चलते-चलते याद की यात्रा में ही थक जाते हैं, इसमें थकावट आने का मुख्य कारण है संगदोष। संग ऐसा मिल जाता है जो बाप का हाथ छोड़ देते हैं। कहा जाता है संग तारे, कुसंग बोरे। संग में आकर स्टीमर से पांव नीचे उतारा तो माया कच्चा खा लेगी इसलिए बाबा बच्चों को सावधान करते हैं - बच्चे, समर्थ बाप का हाथ कभी नहीं छोड़ना।
 
गीत:-माता माता.........  ओम् शान्ति।
 
रूहानी बाप रूहानी बच्चों को कहते हैं - बच्चे, ओम् शान्ति। इसको भी महामंत्र कहा जाता है। आत्मा अपने स्वधर्म का मंत्र जपती है। मुझ आत्मा का स्वधर्म है शान्त। मुझे शान्ति के लिए कोई जंगल आदि में जाने की दरकार नहीं। मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, यह मेरे आरगन्स हैं। आवाज करना, करना, यह तो मेरे हाथ में है। परन्तु यह ज्ञान होने कारण दर-दर भटकते हैं। इस पर एक कहानी भी है - एक रानी का हार गले में था लेकिन वह भूल गई, उसे लगा कि मेरा हार खो गया है, तो वह बाहर ढूंढ रही थी। फिर कोई ने कहा - हार तो गले में पड़ा है। यह दृष्टान्त देते हैं। मनुष्य दर-दर भटकते हैं ना। सन्यासी आदि भी कहते हैं मन की शान्ति कैसे हो, परन्तु आत्मा में ही मन बुद्धि है। आत्मा इन आरगन्स में आने से टॉकी बनती है। बाप कहते हैं तुम आत्मा अपने स्वधर्म में रहो। इस देह के सब धर्म भूल जाओ। बार-बार समझाते हैं तो भी कोई-कोई कहते हैं हमको शान्त में बिठाओ, नेष्ठा कराओ। यह भी कहना रांग है। एक आत्मा दूसरी आत्मा को कहती है कि मुझे शान्त में बिठाओ। अरे, क्या तुम्हारा स्वधर्म शान्त नहीं है? तुम आपेही नहीं बैठ सकते हो? चलते-फिरते तुम स्वधर्म में क्यों नहीं टिकते हो? जब तक रास्ता बताने वाला बाप नहीं मिला तब तक स्वधर्म में कोई टिक नहीं सकते। उन्होंने तो कह दिया है आत्मा सो परमात्मा तो स्वधर्म में टिक नहीं सकते। इस अशान्त देश में तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है। अभी तुमको चलना है शान्त देश में, फिर जाना है सुखधाम में। यहाँ तो घर-घर में अशान्ति है। सतयुग में घर-घर में रोशनी है। तो यहाँ अन्धियारा है, यहाँ हर बात में ठोकर खानी पड़ती है। घर-घर में अन्धियारा है इसलिए दीप जलाते हैं। जब रावण मरता है फिर दीपमाला मनाते हैं। वहाँ तो रावण होता नहीं। तो सदैव दीपमाला ही है। यहाँ रावण राज्य के कारण 12 मास के बाद दीपमाला मनाते हैं। रावण मरा और लक्ष्मी-नारायण का कारोनेशन हुआ। उनकी खुशी मनाते हैं। सतयुग में जब लक्ष्मी-नारायण तख्त पर बैठते हैं तो कारोनेशन मनाते हैं। तुम जानते हो अभी रावण राज्य पूरा होगा। भारत को फिर से राज्य-भाग्य मिलना है। अभी कोई राज्य नहीं है। बाप से राज्य मिलना है। बेहद का बाप बेहद की राजधानी का वर्सा देते हैं। बाप कहते हैं मैं तुमको सदा सुख का वर्सा देने वाला हूँ, बाकी और सभी तुमको दु: देने वाले हैं। करके कोई सुख भी देंगे तो अल्पकाल क्षणभंगुर। वह सुख है काग विष्टा समान। मैं तुमको इतना सुख देता हूँ जो फिर कभी दु: होगा ही नहीं इसलिए इस देह सहित देह के सम्बन्ध रखने वालों को भूलो। यह देह और देह के सम्बन्धी तुमको दु: देने वाले हैं, इनको छोड़ मुझ एक को याद करो। याद करना होता है - सवेरे अमृतवेले। भक्तिमार्ग में भी मनुष्य सवेरे उठते हैं। कोई किसकी मत पर क्या करते, कोई क्या करते हैं? बाप समझाते हैं सवेरे उठकर जितना हो सके अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। यह है बाप का फ़रमान।
 
भक्त भगवान् को याद भी करते हैं और फिर कह देते सब भगवान् हैं। अभी वह समझते नहीं हैं। एक दिन वह सब तुम्हारे मित्र बनेंगे। कहेंगे यह बात तो ठीक है। ईश्वर सर्वव्यापी कहना गोया अपना और भारत का बेड़ा गर्क करना है। दूसरी बात - भारत को स्वराज्य का मक्खन दिलाने वाला है बाप, उनके बदले फिर नाम रख दिया है बच्चे का, जिस श्रीकृष्ण को मक्खन मिलता है। तो मनुष्य समझते हैं भारत को मक्खन दिलाने वाला कृष्ण है। बाप के बदले बच्चे का नाम डाल अनर्थ कर दिया है। अब सारी दुनिया का भगवान् कोई कृष्ण तो हो नहीं सकता। मनुष्यों ने रावण की मत पर अपने आपको श्रापित किया है। बाप है खिवैया, तुम सब हो नईया (नांव) गाते हैं ना - नईया मेरी पार करो। अभी तुम बैठे हो - बड़े स्टीमर में। चन्द्रकांत वेदान्त में स्टीमर की बात है। वह भी अभी का बनाया हुआ है। तुम स्टीमर में उस पार जा रहे हो। विषय सागर से अमृत अथवा क्षीरसागर में जाते हो। जैसे लण्डन से खारी चैनल से जो स्टीमर पार करते हैं, उनको इनाम मिलता है। यह फिर नर्क से स्वर्ग जाना है। विषय सागर खारी है। तुम बड़े स्टीमर पर बैठे हो। तुम चल पड़े हो, लंगर उठ गया है। तुम जा रहे हो, उस पार जाना है। स्टीमर चलते-चलते पोर्ट आते हैं। वहाँ पर कोई उतरते हैं, कोई चढ़ते हैं। कोई खान-पान के पीछे जाते हैं तो रह जाते हैं। इस पर एक कहानी बनाई हुई है। कृष्ण को बटुक महाराज लिख दिया है। वह स्टीमर का कैप्टन है। फिर स्टीमर से चलते-चलते कई उतर जाते हैं तो वहाँ माया अजगर बैठी है। महारथियों को भी हप कर खा जाती है। पढ़ाई को छोड़ देते हैं गोया निश्चयबुद्धि रहे। फिर बीच सागर में गिर पड़ते हैं।
 
तुमने देखा है - पंछी मरते हैं तो फिर चीटिंयों का झुण्ड आकर उनको उठाते हैं। तो यह 5 विकारों रूपी भूत एकदम कच्चा खाकर हप कर लेते हैं। इस पर बड़ी कहानी लिखी हुई है। समझो कोई स्टीमर में बैठे हैं - गैरन्टी भी लिखते हैं, फोटो भी अपना भेज देते हैं। फिर अगर किसके संग में बिगड़ गये तो पढ़ाई छोड़ देंगे, फिर वह चित्र उनको वापस भेज देंगे। इस समय माया है तमोप्रधान। ईश्वर का हाथ छोड़ा और असुर पकड़ लेंगे। ऐसे बहुत चलते-चलते हाथ छोड़ उतर जाते हैं। समाचार आते हैं - इनको क्रोध के भूत ने, मोह के भूत ने पकड़ लिया है। पहले तो नष्टोमोहा बनना पड़े। मोह एक से रखना चाहिए। यह है मेहनत। मोह की जंजीरें बहुत लगी हुई हैं। अब एक से बुद्धियोग लगाना है। जैसे मनुष्य भक्ति बैठ करते हैं तो बुद्धि धन्धे तरफ, घर तरफ चली जाती है। यहाँ भी तुम्हारा ऐसे होगा। चलते-चलते तुमको बच्चा याद जायेगा। पति याद जायेगा। बाप कहते हैं इन जंजीरों से बुद्धियोग हटाकर एक को याद करो। अगर अन्त समय और कोई स्मृति आई तो अन्तकाल जो पति सिमरे........ पिछाड़ी में सिवाए शिवबाबा के और कोई याद आये, ऐसा अभ्यास डालना है। सवेरे उठ बाप को याद करो। बाबा हम आपके पास आये हैं - जरूर हम स्वर्ग के मालिक बनेंगे। बाप और वर्से को अर्थात् अल्फ और बे को याद करना है। अल्फ अल्लाह, बे बादशाही। आत्मा बिन्दी है। यहाँ मनुष्य टीका लगाते हैं तो कोई बिन्दी लगाते हैं, कोई लम्बा तिलक लगाते हैं, कोई क्राउन मुआफिक करते हैं, कोई छोटा स्टॉर लगा देते हैं, कोई हीरा लगाते हैं। बाप कहते हैं तुम आत्मा हो। जानते हो आत्मा स्टार मिसल है। उस आत्मा में सारे ड्रामा का रिकार्ड भरा हुआ है। अब बाप फ़रमान करते हैं निरन्तर मुझ बाप को याद करो और सबसे बुद्धियोग तोड़ो। यह लक्ष्य और कोई भी दे सके। बाप कहते हैं तुम्हारे सिर पर जन्म-जन्मान्तर के पाप हैं। वह याद के सिवाए भस्म नहीं होंगे। एवरहेल्दी बनने लिए बाप को याद करना है। बाप से ही वर्सा मिलता है। एवरहेल्दी और एवरवेल्दी-पने का। हेल्थ-वेल्थ है तो बाकी और क्या चाहिए! हेल्थ है, वेल्थ नहीं तो भी मजा नहीं। वेल्थ है, हेल्थ नहीं तो भी मजा नहीं। आत्मा को पहले बाप को याद करना है तो विकर्म विनाश होंगे और 21 जन्मों के लिए हेल्थ मिलेगी और स्वदर्शन चक्रधारी बनेंगे तो फिर 21 जन्मों लिए वेल्थ मिलेगी। कितनी सहज बात है। हमने 84 जन्म ऐसे चक्र लगाया है। अभी सब खाक हो जाने वाले हैं, उनसे दिल क्यों लगायें? दिल उनसे लगानी है जो नई दुनिया की बादशाही दे। आत्माओं से बात करते हैं - बच्चे, अब इस शरीर को भूल अपने को अशरीरी समझ मुझे याद करो। यह शरीर तुमको पार्ट बजाने के लिए मिला है। सवेरे उठकर यह सिमरण करना चाहिए। साजन जो खाड़ी से पार ले जाते हैं, उनको याद करना है, बाकी और सब विषय सागर में डूबने वाले हैं। बाप है पार करने वाला, उनको खिवैया, बागवान भी कहा जाता है। तुमको कांटे से फूल बनाकर स्वर्ग में भेज देते हैं। फिर स्वर्ग में तुम कभी दु: नहीं देखेंगे इसलिए उनको कहते हैं दु: हर्ता, सुख कर्ता। हर-हर महादेव कहते हैं ना। शिव को ही कहेंगे। यह है ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी बाप। वही बाप 21 जन्म के लिए सुख का वर्सा देते हैं तो उसको याद करना चाहिए ना, इसमें चाहिए हिम्मत। याद करते-करते थक जाते हैं तो चलना ही बन्द कर देते हैं। संग ऐसा मिल जाता जो छोड़ देते हैं इसलिए कहा जाता है संग तारे, कुसंग बोरे। बाहर जाने से कुसंग मिलेगा, तो नशा उड़ जायेगा। कोई कहेंगे ब्रह्माकुमारियों के पास तो जादू है, लग जायेगा। इनके पास नहीं जाना। परीक्षायें तो आयेंगी। ऐसे बहुत होते हैं - 10 वर्ष रहकर भी फिर संगदोष में जाते हैं। पांव नीचे उतारा और माया कच्चा खा लेती। यह भी निश्चय करते हैं कि बाप से स्वर्ग का वर्सा जरूर मिलता है। फिर भी माया के बड़े तूफान आते हैं, यह युद्ध का मैदान है। आधाकल्प माया का राज्य चला है। अब उन पर विजय पानी है। रावण को जलाते हैं फिर एक दिन खुशी मनाते हैं। यह सब आर्टीफिशल सुख है। रीयल सुख मिलता है सुखधाम में। बाकी नर्क का सुख है काग विष्टा के समान। स्वर्ग में तो सुख ही सुख है। तुम सुखधाम के लिए पुरुषार्थ कर रहे हो। बॉक्सिंग में कभी माया की जीत, कभी बच्चों की जीत होती है। यह युद्ध रात दिन चलती है। उस्ताद का हाथ पूरा पकड़ना है। उस्ताद सर्वशक्तिमान, समर्थ है। हाथ छोड़ देंगे तो फिर सर्वशक्तिमान भी क्या करे? हाथ छोड़ा यह गया। स्टीमर की बात शास्त्रों में भी है। अब स्टीमर जा रहा है। बाकी थोड़े दिन है। वैकुण्ठ तो सामने देखने में आता है। पिछाड़ी के टाइम तो घड़ी-घड़ी वैकुण्ठ के दृश्य देखते रहेंगे। जैसे शुरूआत में बहुत देखते थे। पिछाड़ी में भी तुमको बहुत साक्षात्कार होगा। जो यहाँ होंगे, जो हिम्मत से हाथ पकड़ कर रखते हैं, वही अन्त समय यह सब देखेंगे। बच्चियां बतलाने लग पड़ेंगी - बाबा, यह दासी बनने वाली है, यह फलानी बनने वाली है। फिर अ़फसोस करेंगे - हम दासी बन गये। मेहनत नहीं की तो और क्या हाल होगा? फिर बहुत पछताना होगा। शुरूआत में तुमने बहुत खेलपाल देखे हैं। गीत है ना जो हमने देखा...... तो जैसे समय नजदीक आता जायेगा, सब बतलाते रहेंगे फिर पढ़ाई तो हो सके। बाप कहेंगे तुमको कितना समझाया, तुम श्रीमत पर चले तो यह हाल हुआ, अब कल्प-कल्प यह पद मिलता रहेगा इसलिए बाबा कहते हैं अपना पुरुषार्थ करते रहो, मात-पिता को फालो करो। कई कपूत बच्चे भी होते हैं ना। माया के वश हो तंग करते हैं फिर बहुत भारी सजा खायेंगे, पद भी भ्रष्ट हो जायेगा। सजाओं का भी बच्चियों ने साक्षात्कार किया है। दुनिया में है आसुरी संग और यहाँ है ईश्वरीय संग। बाबा सब बातें समझाते हैं फिर ऐसे कोई कहे कि हमको क्या पता? विनाश के समय मनुष्य बहुत त्राहि-त्राहि करने लग पड़ेंगे। तुम बहुत साक्षात्कार करते रहेंगे। मिरूआ मौत मलूका शिकार...... इसी प्रकार से तुम डांस करते रहेंगे। तुम देखते रहेंगे कि विनाश के बाद फिर हमारे महल कैसे बनते हैं। जो जीते रहेंगे वह सब देखेंगे। बाप का बनकर फिर अगर फ़ारकती दे दी तो देख थोड़ेही सकेंगे। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे 5 हजार वर्ष बाद फिर से आकर मिले हुए बच्चों प्रति नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) समर्थ बाप का हाथ पकड़कर रखना है, एक बाप से ही दिल लगानी है, सवेरे उठकर याद में बैठना है।
2) संगदोष से अपनी सम्भाल करनी है। कुसंग में आकर कभी पढ़ाई नहीं छोड़नी है।
 
वरदान:-सेवाओं में सदा सहयोगी बन सहजयोग का वरदान प्राप्त करने वाले विशेषता सम्पन्न भव
 
ब्राह्मण जीवन विशेषता सम्पन्न जीवन है, ब्राह्मण बनना अर्थात् सहजयोगी भव का वरदान प्राप्त करना। यही सबसे पहला जन्म का वरदान है। इस वरदान को बुद्धि में सदा याद रखना-यह है वरदान को जीवन में लाना। वरदान को कायम रखने की सहज विधि है-सर्व आत्माओं के प्रति वरदान को सेवा में लगाना। सेवा में सहयोगी बनना ही सहजयोगी बनना है। तो इस वरदान को स्मृति में रख विशेषता सम्पन्न बनो।
 
स्लोगन:-अपने मस्तक की मणी द्वारा स्वयं का स्वरूप और श्रेष्ठ मंजिल का साक्षात्कार कराना ही लाइट हाउस बनना है।
 
 
16/10/18              Morning Murli  Om Shanti           BapDada              Madhuban
Sweet children, you are now sitting in a very big steamer. Your anchor has been raised and you are going across the salty channel to the ocean of milk.
 
Question:In what do children especially feel tired? What is the main reason for becoming tired?
Answer:While moving along, children become tired of the pilgrimage of remembrance. The main reason for becoming tired is the influence of bad company. You go into such company that you even let go of the Father's hand. It is said that good company takes you across and bad company drowns you. If you become influenced by the company you keep and step off the steamer, Maya eats you raw. This is why Baba cautions you children: Children, never let go of the Almighty Father's hand.
 
Song:Mother, o mother, you are the Bestower of Fortune for All. 
Om Shanti
 
The spiritual Father says to the spiritual children: Children, om shanti. This is also called the great mantra. The soul chants the mantra of his original religion. The original religion of myself, the soul, is peace. I don't need to go to the jungles etc. for peace. I, the soul, am peaceful. These are my organs. It is in my own hands to make a sound or not make a sound. However, because people don't have this knowledge, they continue to wander from door to door. There is a story about this: A queen had her necklace around her neck, but she had forgotten this and thought that her necklace was lost and so she searched for it outside. Then someone told her that her necklace was around her neck. This example is given. People wander from door to door. Even sannyasis etc. say: How can there be peace of mind? However, the mind and intellect are in the soul. When a soul receives these organs, he comes into ‘talkie’. The Father says: You souls should remain stable in your original religion. Forget all the religions of the body. Even though Baba repeatedly explains, some of you say: Help me sit in silence. Let us have specially conducted meditation. It is wrong to say this. One soul says to another: Help me sit in silence. Oh! but is your original religion not that of peace? Can you not sit in silence by yourself? While walking and moving around, why are you not able to stabilise in your original religion? Until the Father who can show the path is found, no one is able to remain stable in the original religion. They have said that each soul is the Supreme Soul, and so they are unable to remain stable in their religion. This is your final birth in this peaceless world. You now have to go to the land of peace, and then you have to go to the land of happiness. Here, there is peacelessness in every home. In the golden age, there is light in every home. Here, there is darkness. Here, you have to stumble in every situation. There is darkness in every home and this is why they light a lamp. After Ravan dies, they celebrate Deepmala. Ravan doesn't exist there. There is constant Deepmala there. Here, because this is the kingdom of Ravan, they celebrate Deepmala every 12 months. Soon after Ravan dies, there is the coronation of Lakshmi and Narayan. They celebrate that in happiness. In the golden age, when Lakshmi and Narayan sit on the throne, they celebrate the coronation day. You know that the kingdom of Ravan is now coming to an end. Bharat is to receive the fortune of the kingdom once again. There is no kingdom now. You are to receive the kingdom from the Father. The unlimited Father gives you the inheritance of the unlimited kingdom. The Father says: I am the One who gives you the inheritance of constant happiness. All the rest are those who give you sorrow. Perhaps they do give you some temporary happiness; that happiness is like the droppings of a crow. I give you so much happiness that there will never be any sorrow again. This is why you have to forget your body and everyone who has a bodily relationship with you. That body and all its bodily relations are going to cause you sorrow. Renounce them and remember Me alone. You have to remember Me in the morning at amrit vela. On the path of devotion too, people wake up early in the morning. Some do something by following the directions of others, and others do something else. The Father explains: Wake up early in the morning and, as much as possible, consider yourself to be a soul and remember Me, your Father. This is the Father's order. Devotees remember God and then say that all are God! They don't understand anything now. One day, all of them will become your friends. They will say: This is fine. To say that God is omnipresent means to sink your own boat and the boat of Bharat. Secondly, it is the Father who gives Bharat the butter of self-sovereignty. Instead of His name, they have given the name of the child, Shri Krishna, who receives the butter. This is why people think that Bharat received the butter from Krishna. They have inserted the child’s name instead of the Father’s and made everything meaningless. Krishna cannot be the God of the whole world. People have cursed themselves by following the directions of Ravan. The Father is the Boatman. All of you are the boats. You sing: Take my boat across. You are now sitting in a big steamer. The story of the steamer is mentioned in the Chandrakanta Vedanta. That story too is created referring to this time. You are going across to the other side in the steamer. You are going from the ocean of poison to the ocean of nectar or milk. A steamer that crosses the salty channel from London receives a prize. Here, it is a matter of going from hell to heaven. The ocean of poison is salty. You are sitting in a big steamer. The anchor has been raised and you have now started moving. You are now leaving and you have to go to the other side. While moving along, steamers come to the ports. Some get off the steamer there and others get on. Some go to find food and drink and get left behind. A story based on this has been created. They have also written of Krishna as Batuk Maharaj. He was the steamer’s captain. If someone gets off the steamer while it’s moving along, Maya, the alligator, is waiting. She even swallows maharathis whole. They stop studying, that is, their intellects no longer have faith. They then fall into the middle of the ocean. You have seen that when a bird dies, a whole army of ants carries it away. So the evil spirits of the five vices totally eat you alive and swallow you. A long story has been written about this. Some would be sitting in the steamer and they even write a guarantee and send their photographs. They then get spoilt by someone's company and stop studying. Their photographs would then be sent back to them. At this time, Maya is tamopradhan. As soon as you let go of God's hand, devils catch hold of you. So many let go of His hand while moving along and get off the steamer. Baba receives such news: This one was caught by the evil spirit of anger or the evil spirit of attachment. First of all, you have to become destroyers of attachment. You have to have attachment to only One. This requires effort. There are many chains of attachment. You now have to connect your intellects in yoga to One. When people sit to do devotion their intellects wander to their businesses and homes etc. The same happens here to you. While moving along, you remember your child or husband. The Father says: Remove your intellect's yoga from those chains and only remember the One. If you remember anyone else at the end, if you remember your husband etc., then… At the end, no one except one Shiv Baba should be remembered. Such has to be your practice. Wake up early in the morning and remember the Father: Baba, I have come to You. I will definitely become a master of heaven. You have to remember the Father and the inheritance, that is, Alpha and beta. Allah or Alpha and then beta is the sovereignty. A soul is a point. Here, when people apply a tilak, some put a dot and some make a long line. Some make it crown-shaped, some make it like a small star. Some put a diamond. The Father says: Each of you is a soul. You know that a soul is a like a star. This soul is filled with the record of the whole drama. The Father now orders you: Constantly remember Me, the Father, and break your intellect's yoga away from everyone else. No one else can give you this aim. The Father says: You have the sins of many births on your heads. They cannot be burnt except by having remembrance. You have to remember the Father in order to become ever healthy. Only from the Father do you receive the inheritance of becoming ever healthy and ever wealthy. What else do you need when you have health and wealth? There isn't any pleasure if you have good health, but no wealth. If you have wealth but no health, that too is no good. You souls first have to remember the Father so that your sins are absolved and you receive health for 21 births. If you become spinners of the discus of self-realisation, you will receive wealth for 21 births. This is such an easy matter. I have been around the cycle of 84 births. Now, everything is going to turn to dust. Why should we attach our hearts to it? Your hearts have to be attached to the One who can give you the sovereignty of the new world. He speaks to souls: Children, now forget your bodies, consider yourselves to be bodiless and remember Me. You have received these bodies in order to play your parts. You have to wake up early in the morning and remember this. You have to remember the Bridegroom who takes you across the channel. All the rest will drown in the ocean of poison. The Father is the One who takes you across. He is called the Boatman and also the Master of the Garden. He makes you into flowers from thorns and sends you to heaven. Then you will never see any sorrow in heaven. This is why He is called the Remover of Sorrow and the Bestower of Happiness. They say: Har Har Mahadev (Mahadev (Shankar), the one who removes everyone's sorrow.) This should be said to Shiva alone. He is the Father of Brahma, Vishnu and Shankar. That Father gives you the inheritance of happiness for 21 births and so you should remember Him. This requires courage. Some become tired while remembering Him and so they stop coming here. They take such company that they leave this company. This is why it is said that good company takes you across and bad company drowns you. When you go outside, you receive bad company and so the intoxication flies away. Some people say: “The Brahma Kumaris have magic and will cast a spell on you. You shouldn't go to them.” Many tests will come. There are many who have been here almost ten years and are then influenced by bad company. As soon as you step off the steamer, Maya eats you alive. They even have the faith that they will definitely receive the inheritance of heaven from the Father but, nevertheless, many storms of Maya come. This is a battlefield. The kingdom of Maya has continued for half the cycle. You have to conquer her. They burn Ravan’s effigy and then celebrate in happiness for a day. All of that is artificial happiness. Real happiness is received in the land of happiness. The happiness of hell is like the droppings of a crow. In heaven, there is nothing but happiness. You are now making effort for the land of happiness. In this boxing, sometimes Maya wins and sometimes the children win. This battle continues day and night. You have to catch hold of the Master's hand fully. The Master is the Almighty Authority, the powerful One. If you let go of His hand, what can the Almighty Authority do? As soon as you let go of His hand, you fall. The aspect of the steamer is also mentioned in the scriptures. The steamer is now about to depart. There are only a few more days left. You can see Paradise in front of you. In the final moments, you will repeatedly see scenes of Paradise. Just as many of you used to see them in the beginning, so, at the end, too, you will have many visions. Those who are here and who hold on to the Father's hand with courage will see these at the end. Some daughters will begin to say: Baba, this one will become a maid, this one will become so-and-so. Then there will be regret: I have become a maid. What else would your condition be if you haven't made effort? There will then have to be a lot of repentance. In the beginning, you saw a lot of fun and games. There is a song: You haven't seen what we have seen. When the time comes close, everything will be revealed; you won't be able to study at that time. The Father will say: I explained so much to you. You still didn’t follow shrimat and so this is what your condition has become. You will receive the same status every cycle. This is why Baba says: Continue to make effort. Follow the Mother and Father. There are also some unworthy children; they are influenced by Maya and cause distress. They then receive very severe punishment and their status is also destroyed. Children have had visions of punishment too. In the world, there is devilish company whereas here, you have God's company. Baba explains everything to you, so no one can say at that time: I didn't know this. At the time of destruction, people will cry out in distress. You will have many visions. There will be death for the prey and victory for the hunter. In this way, you will continue to dance. You will see how your palaces are built after destruction. Those who remain alive will see everything. If, after belonging to the Father, you divorce Him, you won't be able to see anything. Achcha.
 
To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, who have come and met Baba once again after 5000 years, love, remembrance and good morning, numberwise, according to their efforts, the spiritual Father says namaste to the spiritual children.
 
Essence for Dharna:
 
1. Continue to hold on to the Almighty Father's hand. Attach your heart to the one Father alone. Wake up early in the morning and sit in remembrance.
 
2. Remain cautious about the influence of bad company. Never stop studying due to the influence of bad company.
 
Blessing:May you be filled with specialities and attain the blessing of having easy yoga by being constantly co-operative in service.
 
Brahmin life is a life filled with specialities. To be a Brahmin means to receive the blessing of being an easy yogi. This is the first blessing of this birth. Always keep this blessing in your intellect; this is what it means to put your blessing into your practical life. The easy way to keep a blessing permanently is to use your blessing to serve all souls. To be co-operative in service is to be an easy yogi. So, keep this blessing in your awareness and become full of specialities.
 

Slogan:To grant a vision of your form and your elevated destination through the jewel on your forehead is to be a lighthouse.

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