Published by – Bk Ganapati
Category - Religion, Ethics , Spirituality & New Age & Subcategory - Murali - Oct - 2018
Summary - Satya Shree Trimurti Shiv Bhagawanubach Shrimad Bhagawat Geeta. Month - Oct-2018 ( Daily Murali - Prajapita Brahmakumaris - Magic Flute )
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Details ( Page:- Murali 29th Oct 2018 )
29-10-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
''मीठे बच्चे - आज्ञाकारी बनो, बाप की पहली आज्ञा है - अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो''
 
प्रश्नः-आत्मा रूपी बर्तन अशुद्ध क्यों हुआ है? उसको शुद्ध बनाने का साधन क्या है?
 
उत्तर:-वाह्यात बातों को सुनते और सुनाते आत्मा रूपी बर्तन अशुद्ध बन गया है। इसको शुद्ध बनाने के लिए बाप का फ़रमान है हियर नो ईविल, सी नो ईविल........ एक बाप से सुनो, बाप को ही याद करो तो आत्मा रूपी बर्तन शुद्ध हो जायेगा। आत्मा और शरीर दोनों पावन बन जायेंगे।
 
गीत:-जो पिया के साथ है......... 
 
ओम् शान्ति।
 
ओम् शान्ति का अर्थ तो बच्चों ने समझा हुआ है। बच्चों को घड़ी-घड़ी प्वाइन्ट्स दी जाती हैं। जैसे घड़ी-घड़ी कहा जाता है बाप और वर्से को याद करो। यहाँ कोई मनुष्य की याद नहीं है। मनुष्य, मनुष्य की वा किसी देवता की याद दिलायेंगे। पारलौकिक बाप की याद कोई दिला सके क्योंकि बाप को कोई जानते नहीं। यहाँ तुमको घड़ी-घड़ी कहा जाता है अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। जैसे बाप को बच्चे होते हैं तो सब समझ सकते हैं यह बाप से वर्सा लेने आया है। फिर उनको बाप और वर्सा याद रहता है। यहाँ भी ऐसे है। जरूर बच्चे बाप को जानते नहीं हैं इसलिए बाप को आना पड़ता है। जो बाप के साथ हैं उन्हों के लिए यह ज्ञान बरसात है। वेद शास्त्रों में जो ज्ञान है वह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। जप, तप, दान, पुण्य, संध्या, गायत्री आदि जो कुछ करते हैं वह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। सन्यासी भी भक्त हुए। पवित्रता बिगर कोई शान्तिधाम में जा नहीं सकते इसलिए वह घरबार छोड़ जाते हैं। परन्तु सारी दुनिया तो ऐसे नहीं करेगी। उन्हों के इस हठयोग की भी ड्रामा में नूँध है। तुम बच्चों को राजयोग सिखलाने कल्प-कल्प एक ही बार आता हूँ। मेरा और कोई अवतार होता नहीं है। रीइनकारनेशन आफ गॉड। वह हुआ ऊंच ते ऊंच। फिर रीइनकारनेशन आफ जगत अम्बा और जगत पिता भी जरूर होने चाहिए। वास्तव में रीइनकारनेशन अक्षर सिर्फ बाप से ही लगता है। सद्गति दाता एक ही बाप है। यूँ तो हर एक चीज़ फिर से रीइनकारनेट होती है। जैसे अभी भ्रष्टाचार है तो कहेंगे भ्रष्टाचार रीइनकारनेट हुआ है। फिर से भ्रष्टाचार हुआ है, फिर से श्रेष्ठाचार आयेगा। रीइनकारनेट तो हर चीज़ का होता है। अभी पुरानी दुनिया है फिर नई दुनिया आयेगी। नई दुनिया के बाद कहेंगे फिर से पुरानी दुनिया आनी है। यह सब बातें बाप बैठ समझाते हैं। जब यहाँ बैठते हो तो हमेशा ऐसे समझो - मैं आत्मा हूँ, मुझे बाप का फ़रमान मिला हुआ है मुझे याद करो। बच्चों के सिवाए तो और कोई को बाप का फ़रमान मिल सके। फिर बच्चों में कोई तो आज्ञाकारी होते हैं, कोई आज्ञा मानने वाले भी होते हैं। बाप कहते हैं - हे आत्मायें, तुम मेरे साथ बुद्धि का योग लगाओ। बाप आत्माओं से बात करते हैं, और कोई विद्धान-पण्डित आदि ऐसे नहीं कहेंगे कि मैं आत्माओं से बात करता हूँ। वह तो आत्मा सो परमात्मा समझ लेते हैं। वह है रांग। तुम बच्चे जानते हो कि शिवबाबा इस शरीर द्वारा हमें समझा रहे हैं। शरीर बिगर तो एक्ट हो सके। पहले-पहले तो यह निश्चय चाहिए। निश्चय बिगर तो कुछ भी बुद्धि में नहीं बैठेगा। पहले निश्चय चाहिए कि हम आत्माओं का बाप वह निराकार परमपिता परमात्मा है और साकार में है प्रजापिता ब्रह्मा, हम हैं ब्रह्माकुमार-कुमारियां। शिव के तो सब आत्मायें बच्चे हैं इसलिए शिवकुमार कहेंगे, कुमारी नहीं। यह सब बातें धारण करनी है। धारणा तब होगी जब निरन्तर याद करते रहेंगे। याद करने से ही बुद्धि रूपी बर्तन शुद्ध होगा। वाह्यात बातें सुनते-सुनते बर्तन अशुद्ध बन गया है, उसको शुद्ध बनाना है। बाप का फ़रमान है मुझे याद करो तो तुम्हारी बुद्धि पवित्र होगी। तुम्हारी आत्मा में खाद पड़ गई है, अब पवित्र बनना है। सन्यासी कहते हैं आत्मा निर्लेप है। बाप कहते हैं आत्मा में ही खाद पड़ी है। श्रीकृष्ण की आत्मा और शरीर दोनों पवित्र हैं। दोनों पवित्र सिर्फ सतयुग में ही होते हैं। यहाँ तो हो नहीं सकते। तुम आत्मायें नम्बरवार पवित्र होती जा रही हो। अभी पवित्र बनी नहीं है। कोई भी पवित्र नहीं है। सब पुरुषार्थ कर रहे हैं। अन्त में नम्बरवार सबकी रिजल्ट निकलेगी।
 
बाप आकर सभी आत्माओं को फ़रमान करते हैं कि मुझे याद करो, अपने को अशरीरी समझो, देही-अभिमानी बनो। मूल यह बात बाप बिगर कोई समझा नहीं सकते। पहले यह पूरा निश्चय होगा तो विजय पायेंगे, निश्चय नहीं होगा तो विजय नहीं पायेंगे। निश्चय बुद्धि विजयन्ती, संशय बुद्धि विनशयन्ती। गीता में कोई-कोई अक्षर बहुत अच्छे हैं। इसको कहा जाता है आटे में नमक। बाप कहते हैं मैं तुमको सभी वेदों शास्त्रों का सार समझाता हूँ कि इनमें क्या-क्या है? यह सब हैं भक्तिमार्ग के रास्ते। इनकी भी ड्रामा में नूँध है। यह प्रश्न नहीं उठ सकता कि यह भक्तिमार्ग क्यों बनाया हुआ है? यह तो अनादि बना बनाया ड्रामा है। तुमने भी इस ड्रामा में बाप से स्वर्ग के मालिक बनने का वर्सा अनेक बार लिया है और लेते रहेंगे। कभी अन्त नहीं हो सकता। यह चक्र अनादि फिरता ही रहता है। तुम बच्चे अभी दु:खधाम में हो फिर शान्तिधाम में जायेंगे, शान्तिधाम से सुखधाम में जायेंगे फिर दु:खधाम में आयेंगे - यह अनादि चक्र चलता ही रहता है। सुखधाम से दु:खधाम आने में तुम बच्चों को 5 हजार वर्ष लगते हैं। जिसमें तुम 84 जन्म लेते हो। सिर्फ तुम बच्चे ही 84 जन्म लेते हो, सब नहीं ले सकते। यह बेहद का बाप तुमको डायरेक्ट समझा रहे हैं, और बच्चे फिर मुरली सुनेंगे वा पढ़ेंगे या टेप सुनेंगे। टेप भी सब नहीं सुन सकते। तो पहले-पहले तुम बच्चों को उठते-बैठते इस याद में रहना है। मनुष्य तो माला फेरते राम-राम जपते हैं। रुद्राक्ष की माला कहते हैं ना। अब रुद्र तो है भगवान्। फिर इस माला में मेरु दाना इकट्ठा है। वह तो विष्णु के युगल स्वरूप हैं। वह कौन हैं? यह मात-पिता जो फिर विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण बनते हैं इसलिए इनको मेरु कहा जाता है। फूल है शिवबाबा फिर मेरु यह मम्मा-बाबा जिनको मात-पिता कहते हो। विष्णु को मात-पिता नहीं कह सकेंगे। लक्ष्मी-नारायण को मात-पिता तो उनके बच्चे ही कहेंगे। आजकल तो सबके आगे जाकर कहते हैं त्वमेव माताश्च पिता..... बस, कोई एक ने महिमा की तो उनके पीछे फालो करने लग पड़ते। यह है ही अनराइटियस दुनिया। कलियुग को कहा जाता है अनराइटियस, सतयुग को कहा जाता है राइटियस। वहाँ आत्मा और शरीर दोनों पवित्र होते हैं। सतयुग में कृष्ण गोरा है, फिर अन्तिम जन्म में उनकी आत्मा सांवरी बनी है। यह ब्रह्मा-सरस्वती इस समय सांवरे हैं ना। आत्मा काली बन गई है तो उनका जेवर भी काला बन गया है। सोने में ही खाद पड़ती है, उससे जेवर भी जो बनता है वह खाद वाला। सतयुग में जब देवी-देवताओं की गवर्मेन्ट है तो यह झूठ (खाद) होती नहीं। वहाँ तो सोने के महल बनते है। भारत सोने की चिड़िया था, अभी तो मुलम्मा है। ऐसे भारत को फिर से स्वर्ग बाप ही बना सकते हैं।
 
बाप समझाते हैं, श्रीमत भगवानुवाच है ना। कृष्ण तो दैवीगुणों वाला है, दो भुजा, दो टांग वाला है। चित्रों में तो कहाँ नारायण को, कहाँ लक्ष्मी को 4 भुजायें दी हैं। समझते कुछ भी नहीं।ओम्' अक्षर भी कहते हैं, ओम् का अर्थ बताते हैं - ओम् माना मैं गॉड, जिधर देखता हूँ गॉड ही गॉड है। परन्तु यह तो रांग है। ओम् माना अहम् आत्मा। बाप भी कहते हैं अहम् आत्मा परन्तु मैं सुप्रीम हूँ इसलिए मुझे परमात्मा कहा जाता है। मैं परमधाम में रहता हूँ। ऊंचे ते ऊंच भगवान् फिर सूक्ष्मवतन में ब्रह्मा-विष्णु-शंकर की आत्मा है। फिर नीचे आओ तो यह मनुष्य लोक है। वह दैवी लोक, वह आत्माओं का लोक जिसको मूलवतन कहा जाता है। यह बातें समझने की हैं। तुम बच्चों को यह अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान मिलता है जिससे तुम भविष्य में मालामाल डबल सिरताज बनते हो। देखो, श्रीकृष्ण को दोनों ताज है ना। फिर वही बच्चा चन्द्रवंशी में आता है तो दो कला कम हो जाती हैं। फिर वैश्य वंशी में आयेंगे तो और 4 कला कम हो जायेगी। फिर लाइट का ताज उड़ जायेगा। बाकी रत्न जड़ित ताज रहेगा। फिर जो अच्छा दान-पुण्य करते हैं, उनको एक जन्म के लिये अच्छी राजाई मिलती है। फिर दूसरे जन्म में भी अच्छा दान-पुण्य किया तो फिर भी राजाई मिल सकती है। यहाँ तो तुम 21 जन्मों के लिए राजाई पा सकते हो, मेहनत करनी पड़ती है। तो बाप अपना परिचय देते हैं, कहते हैं - आई एम सुप्रीम सोल इसलिए उनको परमपिता परम आत्मा अर्थात् परमात्मा कहा जाता है। तुम बच्चे उस सुप्रीम को याद करते हो। तुम हो सालिग्राम, वह है शिव। शिव का बड़ा लिंग और सालिग्राम मिट्टी के बनाते हैं। यह कौन सी आत्माओं का यादगार बनाते हैं, यह भी कोई नहीं जानते। तुम शिवबाबा के बच्चे भारत को स्वर्ग बनाते हो इसलिए तुम्हारी पूजा होती है। फिर तुम देवता बनते हो तब भी तुम्हारी पूजा होती है। शिवबाबा के साथ तुम इतनी सर्विस करते हो इसलिए सालिग्रामों की भी पूजा होती है। जो उत्तम से उत्तम कर्तव्य करते हैं, उन्हों की पूजा होती है और कलियुग में जो अच्छा काम करते है उन्हों का यादगार बनाते हैं। कल्प-कल्प बाप तुम बच्चों को सारे सृष्टि चक्र का राज़ समझाते है अर्थात् तुमको स्वदर्शन चक्रधारी बनाते हैं। स्वदर्शन चक्र विष्णु को नहीं हो सकता, वह तो देवता बन गया। यह ज्ञान सारा तुमको है। फिर लक्ष्मी-नारायण बनेंगे तो यह ज्ञान नहीं रहेगा। वहाँ तो सब सद्गति में हैं। तुम बच्चे यह ज्ञान अभी ही सुनते हो फिर राजाई पा लेते हो। स्वर्ग की स्थापना हो गई फिर ज्ञान की दरकार नहीं रहती।
 
बाप ही आकर अपना और रचना का पूरा परिचय देते हैं। सन्यासियों ने माताओं की निंदा की है, परन्तु बाप आकर माताओं को उठाते हैं। बाप यह भी समझाते हैं कि यह सन्यासी होते तो भारत काम चिता पर बैठ एकदम ख़ाक हो जाता। जब देवी-देवता वाम मार्ग में गिरते हैं तो उस समय अर्थक्वेक बड़ी जोर की होती है फिर सब नीचे चला जाता है। और खण्ड आदि तो होते नहीं, भारत ही होता है। इस्लामी आदि तो पीछे आते हैं तो फिर वह सतयुग की चीजें यहाँ रहती नहीं। तुम जो सोमनाथ का मन्दिर देखते हो वह कोई वैकुण्ठ का नहीं है। यह तो भक्ति मार्ग में बना है, जिसको मुहम्मद गज़नवी आदि ने लूटा। बाकी देवताओं के महल आदि सब अर्थक्वेक में गायब हो जाते हैं। ऐसे नहीं कि महल के महल नीचे गये हैं वही फिर ऊपर जायेंगे। नहीं, वह तो अन्दर ही टूट फूट सड़ जाते हैं। फिर उसी समय खोदते हैं तो कुछ कुछ मिलता है। अभी तो कुछ भी नहीं मिलता है। शास्त्रों में कोई यह बातें नहीं हैं। सद्गति दाता है ही एक बाप। पहले-पहले तो यह निश्चय चाहिए। निश्चय में ही माया विघ्न डालती है। कहते हैं भगवान् कैसे आयेगा? अरे, शिव जयन्ती है तो जरूर आये होंगे। बाप ने समझाया है मैं बेहद के दिन और बेहद की रात के संगम पर आता हूँ। यह कोई नहीं जानते कि किस समय आता हूँ? तुम बच्चे जानते हो। बाप ने ही यह नॉलेज दी है और दिव्य दृष्टि से यह चित्र आदि बनवाये हैं। गीता में भी कल्प वृक्ष का कुछ वर्णन है। बच्चों को कहते हैं हम तुम अभी हैं, कल्प पहले भी थे और फिर कल्प-कल्प मिलते रहेंगे। मैं कल्प-कल्प तुमको यह ज्ञान दूँगा। तो चक्र भी सिद्ध होता है। परन्तु तुम्हारे सिवाए कोई समझ सके। यह सारे सृष्टि चक्र का चित्र है, जरूर कोई ने बनवाया है। बाप भी इस पर, बच्चे भी इस पर समझाते है। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) हर बात में विजय का आधार निश्चय है इसलिए निश्चयबुद्धि जरूर बनना है। सद्गति दाता बाप में कभी संशय नहीं उठाना है।
 
2) बुद्धि को पवित्र वा शुद्ध बनाने के लिए अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। वाह्यात (व्यर्थ) बातें सुननी है, सुनानी है।
 
वरदान:-अपने शक्ति स्वरूप द्वारा अलौकिकता का अनुभव कराने वाले ज्वाला रूप भव
 
अभी तक बाप शमा की आकर्षण है, बाप का कर्तव्य चल रहा है, बच्चों का कर्तव्य गुप्त है। लेकिन जब आप अपने शक्ति स्वरूप में स्थित होंगे तो सम्पर्क में आने वाली आत्मायें अलौकिकता का अनुभव करेंगी। अच्छा-अच्छा कहने वालों को अच्छा बनने की प्रेरणा तब मिलेगी जब संगठित रूप में आप ज्वाला स्वरूप, लाइट हाउस बनेंगे। मास्टर सर्वशक्तिमान् की स्टेज, स्टेज पर जाए तो सभी आपके आगे परवाने समान चक्र लगाने लग जायें।
 
स्लोगन:-अपनी कर्मेन्द्रियों को योग अग्नि में तपाने वाले ही सम्पूर्ण पावन बनते हैं।
 
 
29/10/18              Morning Murli  Om Shanti           BapDada              Madhuban
Essence:
Sweet children, become obedient. The Father’s first order is: Consider yourself to be a soul and remember the Father.
 
Question:
Why have the vessels of souls become unclean? What is the way to clean them?
 
Answer:
The vessels of souls have become unclean by listening to and speaking of wasteful matters. In order to clean them, the Father’s orders are: Hear no evil! See no evil! Listen to the one Father. Only remember the one Father and vessels of souls will become clean. Souls and bodies will both become pure.
 
Song:
There are showers of rain on those who are with the Beloved.
 
Om shanti.
You children have understood the meaning of ‘Om shanti’. Points of knowledge are given to you children again and again, just as you are repeatedly told to remember the Father and the inheritance. Here, you do not remember human beings. Human beings only remind you of human beings or deities. Because no human being knows the parlokik Father, none of them can inspire you to remember Him. Here, you are told again and again: Consider yourself to be a soul and remember the Father. When a father has a son, everyone understands that his son has come to claim his inheritance from his father. The child would remember his father and his inheritance. It is the same here. Certainly the children don’t know the Father, which is why He has to come. This knowledge is showered on the children who are with the Father. The knowledge in the Vedas and scriptures is just the paraphernalia of the path of devotion. Chanting, donating, performing charity, evening prayers, mantras etc. – whatever people do is the paraphernalia of the path of devotion. Sannyasis are also devotees. No one can go to the land of peace without having purity. This is why they leave home and go off somewhere. However, not everyone in the whole world would do that. Their hatha yoga is fixed in the drama. I only come once every cycle to teach you children Raja Yoga. I do not incarnate in any other way. It is said: “Reincarnation of God”. He is the Highest on High. Then, there definitely has to be the reincarnation of the world mother and the world father. In fact, the word ‘reincarnation’ is only applied to the Father. Only the one Father is the Bestower of Salvation but, in fact, everything reincarnates again. Because there is now corruption, it would be said: Corruption has reincarnated; they became corrupt once again. Later, there will be righteousness. Everything reincarnates. It is now the old world, and then the new world will come again. It would be said that after the new world, the old world will come again. The Father sits here and explains all of these things. When you sit in remembrance, always think: I am a soul and I have received instructions from the Father to remember Him. No one, apart from you children, can receive instructions from the Father. Among you children too, some are obedient and others are disobedient. The Father says: O souls, connect your intellects in yoga to Me. The Father speaks to you souls. None of the scholars or pundits would say that they are speaking to souls. They consider each soul to be the Supreme Soul. That is wrong. You children know that Shiv Baba is explaining to you through this body. One cannot act without a body. First of all, you need faith. Unless you have faith, nothing will sit in your intellect. First of all, you need the faith that the Father of souls is the incorporeal Supreme Father, the Supreme Soul, and that Prajapita Brahma, the Father of People is in the corporeal form. You are Brahma Kumars and Kumaris. All souls are sons of Shiva and so they are called Shiv Kumars, not Shiv Kumaris. You have to imbibe all of these things. It is only when you continue to stay in constant remembrance that you are able to imbibe them. It is only by staying in remembrance that your intellects’ vessels can be cleansed. Because you have been listening to wasteful things, your vessels have become unclean. You have to make them clean. The Father's instructions are: Remember Me and your intellect will be purified. Alloy has been mixed into souls. Therefore, you now have to become pure. Sannyasis say that souls are immune to the effect of action, whereas the Father says that alloy has been mixed into souls. Both the soul and the body of Shri Krishna are pure, but it is only in the golden age that both are pure; they cannot be pure here. You souls are becoming pure, numberwise. You have not become pure yet. No one has become pure yet. All of you are making effort for this. Everyone’s result will be given, numberwise, at the end. The Father comes and issues this order to all souls: Consider yourselves to be bodiless and remember Me. Become soul conscious. No one but the Father can explain this main thing. If you first of all have full faith in this, you can gain victory. If you do not have faith, you cannot gain victory. “A faithful intellect will be victorious, whereas a doubtful intellect will be led to destruction.” Some words in the Gita are very good. They are called a pinch of salt in a sackful of flour. The Father says: I explain to you the essence of all the Vedas and scriptures. All of those things are from the path of devotion. That too is fixed in the drama. The question of why the path of devotion was created doesn’t arise. This drama is eternally predestined. You have received your inheritance of becoming the masters of heaven from the Father many times in the drama, and you will continue to receive it; it can never end. This cycle rotates eternally. You children are now in the land of sorrow. You are soon to go to the land of peace, and you will go from there to the land of happiness. Then you will go to the land of sorrow. This cycle continues to rotate eternally. It takes you children 5000 years to go from the land of happiness to the land of sorrow and, while doing that, you take 84 births. Only you children take 84 births. Not everyone can take 84 births. The unlimited Father explains this to you children directly. Other children will simply listen to the murli being read, or will read the murli themselves or listen to the tape. Not everyone can listen to the tape. So, first of all, you children have to stay in remembrance as you sit and as you walk etc. People simply turn the beads of a rosary and chant the name of Rama. They speak of the rosary of Rudra. Rudra is God. Then there is the combined bead which represents the dual-form of Vishnu. Who is that? It is the mother and father who become the dual-form of Vishnu, Lakshmi and Narayan. This is why they are called the dual-bead. Shiv Baba is the Tassel, and then the dual-bead is Mama and Baba, who are called the mother and father. Vishnu wouldn’t be called mother and father. Only Lakshmi and Narayan’s children would call them mother and father. People nowadays go in front of anyone and say: You are the Mother and You are the Father. Once someone said this praise, everyone else started to follow it. This is an unrighteous world. The iron age is called the unrighteous world, whereas the golden age is called the righteous world. There, souls and bodies are both pure. In the golden age, Krishna is beautiful and then, by his last birth, that soul has become ugly. Brahma and Saraswati are impure at this time. The soul has become impure and so its jewellery (body) has also become impure (mixed). When gold has alloy mixed with it, the jewellery that is made from it also has alloy mixed with it. When the golden age is governed by the deities, there is nothing that is false or has alloy mixed with it. There, there will be palaces of real gold. Bharat was once the ‘Golden Sparrow’, but it has now become gilded (coated). Only the Father can make this Bharat into such a heaven once again. The Father explains: “Shrimat” means the versions of God. Krishna is a human being with divine virtues; he has two arms and two legs. Lakshmi is shown in those images with four arms and Narayan is also shown with four arms. People don’t understand anything. When they speak of the word "Om", they say that it means “I am God. Wherever I look, I only see God.” However, that is wrong. "Om" means “I am a soul.” The Father says: I too am a soul, but, because I am the Supreme, I am called the Supreme Soul. I reside in the supreme abode. The Highest on High is God. Then, in the subtle region, there are the souls of Brahma, Vishnu and Shankar. Then, down here, there is this human world. That is the deity world and the other world is the world of souls which is also called the incorporeal world. These matters have to be understood. You children are receiving the donation of the imperishable jewels of knowledge through which you become prosperous and double-crowned in the future. Look at the picture of Shri Krishna: he has both crowns. Then, when that child goes into the moon dynasty, he has two degrees fewer. Then, when he goes into the merchant dynasty, he loses four more degrees and his crown of light no longer remains; only the crown of jewels remains. At that time, whoever gives a lot of donations or performs a lot of charity receives a very good kingdom for one birth. Then, in their next birth, if they donate a lot again, they can receive a kingdom once again. Here, you can claim a kingdom for 21 births, but you do have to make effort. So the Father gives His own introduction. He says: I am the Supreme Soul. This is why He is called the Supreme Father, the Supreme Soul, that is, God. You children remember that Supreme. You are saligrams and He is Shiva. People create a huge lingam of Shiva and saligrams out of clay. No one even knows which souls those memorials represent. Because you children of Shiv Baba make Bharat into heaven, you are worshipped in that form. Then, after you have become deities, you are also worshipped in that form. You do so much service with Shiv Baba that even you saligrams (of clay) are worshipped. It is those who perform the most elevated tasks who are worshipped. Those who perform good tasks in the iron age have memorials built to them. The Father comes every cycle and explains to you the secrets of the world cycle, that is, He makes you swadarshanchakradhari. Vishnu cannot have the swadarshanchakra. He would have become a deity. You are given all of this knowledge now, but when you become Lakshmi and Narayan, you will no longer have this knowledge. Everyone there will have received salvation. You children listen to this knowledge at this time and then claim your kingdom. Once heaven has been established, there is no longer any need for this knowledge. Only when the Father comes does He give the full introduction of the Creator and His creation. Sannyasis defame the mothers, but the Father comes and uplifts the mothers. The Father explains: If it were not for the sannyasis, Bharat would have turned to ashes because everyone is sitting on the pyre of lust. When the deities fall onto the path of sin, there are big earthquakes and everything is swallowed up. No other lands exist at that time. Only Bharat exists at that time. Those of Islam etc. come later on. The things of the golden age do not remain here. The Somnath Temple that you see was not built in heaven. It was built on the path of devotion and was looted by Mahmud Guznavi. However, the palaces of the deities etc. all vanish in the earthquakes. It is not that all the palaces go down below and that the things that have gone down below then come up again. No; they stay underground or disintegrate. If excavations were made at that time, something might be found, but nothing would be found now. These things are not mentioned in the scriptures. Only the one Father is the Bestower of Salvation. First of all, you need this faith. It is in faith that Maya creates obstacles. Some say: How can God come here? Since Shiv Jayanti is celebrated (festival of the birth of Shiva) He must surely have come. The Father has explained: I come at the confluence of the unlimited day and the unlimited night. No one except you children knows at what time I come. The Father has given you this knowledge and has had these pictures made by giving you divine visions. There is some mention of the kalpa tree in the Gita. He says to the children: You and I exist now. We also existed a cycle ago and we will continue to meet cycle after cycle. I will give you this knowledge every cycle. This too proves the cycle. However, only you, and no one else, can understand this. Look at this picture of the whole cycle. Someone must definitely have had it created. The Father explains this, but you children also have to use this picture and explain it. Achcha.
 
To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.
 
Essence for dharna:
1. In every aspect, the basis of victory is faith. Therefore, become those whose intellects have faith. Never doubt the Father, the Bestower of Salvation.
2. In order to purify and cleanse your intellect, practise becoming bodiless. Do not speak of or listen to wasteful things.
 
Blessing: May you become volcanic in your Shakti form and give the experience of your spirituality.
 
Until now there has been the attraction of the Father, the Flame. His task and the children’s task is being carried out in an incognito way. However, when you stabilize yourselves in your Shakti form, the souls who come into contact with you will experience your spirituality. Those who say, “This is good, this is good”, will be inspired to become good when you all collectively become the volcanic form and lighthouse s. When you master almighty authorities come onto this stage, everyone will circle around you like moths.
 

Slogan: Those who heat their physical senses in the fire of yoga become completely pure.

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