Published by – Bk Ganapati
Category - Religion, Ethics , Spirituality & New Age & Subcategory - Murali - Nov - 2018
Summary - Satya Shree Trimurti Shiv Bhagawanubach Shrimad Bhagawat Geeta. Month - Nov-2018 ( Daily Murali - Prajapita Brahmakumaris - Magic Flute )
Who can see this article:- All
Your last visit to this page was @ 2018-12-21 03:04:09
Create/ Participate in Quiz Test
See results
Show/ Hide Table of Content of This Article
See All pages in a SinglePage View
A
Article Rating
Participate in Rating,
See Result
Achieved( Rate%:- NAN%, Grade:- -- )
B Quiz( Create, Edit, Delete )
Participate in Quiz,
See Result
Created/ Edited Time:- 19-12-2018 02:03:55
C Survey( Create, Edit, Delete) Participate in Survey, See Result Created Time:-
D
Page No Photo Page Name Count of Characters Date of Last Creation/Edit
1 Image Murali 1st Nov 2018 107807 2018-12-19 02:03:55
2 Image Murali 02-Nov-2018 132943 2018-12-19 02:03:55
3 Image Murali 03-Nov-2018 128264 2018-12-19 02:03:55
4 Image Murali 04-Nov-2018 144078 2018-12-19 02:03:55
5 Image Murali 05-Nov-2018 130306 2018-12-19 02:03:55
6 Image Murali 06-Nov-2018 127941 2018-12-19 02:03:55
7 Image Murali 07-Nov-2018 126732 2018-12-19 02:03:55
8 Image Murali 08-Nov-2018 119781 2018-12-19 02:03:55
9 Image Murali 09-Nov-2018 119694 2018-12-19 02:03:55
10 Image Murali 10-Nov-2018 132633 2018-12-19 02:03:55
11 Image Murali 11-Nov-2018 135035 2018-12-19 02:03:55
12 Image Murali 12-Nov-2018 125277 2018-12-19 02:03:55
13 Image Murali 13-Nov-2018 126007 2018-12-19 02:03:55
14 Image Murali 14-Nov-2018 105753 2018-12-19 02:03:55
15 Image Murali 15-Nov-2018 114187 2018-12-19 02:03:55
16 Image Murali 16-Nov-2018 118921 2018-12-19 02:03:55
17 Image Murali 17-Nov-2018 129415 2018-12-19 02:03:55
18 Image Murali 18-Nov-2018 138287 2018-12-19 02:03:55
19 Image Murali 19-Nov-2018 127282 2018-12-19 02:03:56
20 Image Murali 20-Nov-2018 132762 2018-12-19 02:03:56
21 Image Murali 21-Nov-2018 126535 2018-12-19 02:03:56
22 Image Murali 22-Nov-2018 124513 2018-12-19 02:03:56
23 Image Murali 23-Nov-2018 114180 2018-12-19 02:03:56
24 Image Murali 24-Nov-2018 127754 2018-12-19 02:03:56
25 Image Murali 25-Nov-2018 119742 2018-12-19 02:03:56
26 Image Murali 26-Nov-2018 128983 2018-12-19 02:03:56
27 Image Murali 27-Nov-2018 118467 2018-12-19 02:03:56
28 Image Murali 28-Nov-2018 132336 2018-12-19 02:03:56
29 Image Murali 29-Nov-2018 119739 2018-12-19 02:03:56
30 Image Murali 30- Nov 2018 133585 2018-12-19 02:03:56
Article Image
Details ( Page:- Murali 24-Nov-2018 )
24-11-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - देह सहित यह सब कुछ ख़त्म होने वाला है, इसलिए तुम्हें पुरानी दुनिया के समाचार सुनने की दरकार नहीं, तुम बाप और वर्से को याद करो''

 

प्रश्नः-

 

श्रीमत के लिए गायन कौन-सा है? श्रीमत पर चलने वालों की निशानी सुनाओ?

 

उत्तर:-

 

श्रीमत के लिए गायन है - जो खिलायेंगे, जो पहनायेंगे, जहाँ बिठायेंगे........ वही करेंगे। श्रीमत पर चलने वाले बच्चे बाप की हर आज्ञा का पालन करते हैं। उनसे सदा श्रेष्ठ कर्म होते हैं। वे कभी श्रीमत में अपनी मनमत मिक्स नहीं करते। उनमें राइट और रांग की समझ होती है।

 

गीत:-बनवारी रे. ....... 

 

ओम् शान्ति।

 

यह गीत किसका है? बच्चों का। कोई गीत ऐसे भी होते हैं जिसमें बाप बच्चों को समझाते हैं लेकिन इस गीत में बच्चे कहते हैं कि बाबा, अब तो हम समझ गये, दुनिया को तो पता नहीं कि कैसी यह झूठी दुनिया है, झूठे बंधन हैं। यहाँ सब दु:खी हैं तब तो ईश्वर को याद करते हैं। सतयुग में तो ईश्वर से मिलने की बात ही नहीं है। यहाँ दु: है तब आत्माओं को याद पड़ता है परन्तु ड्रामा अनुसार बाप मिलते ही तब हैं जब स्वयं आते हैं। बाकी और जो भी पुरुषार्थ करते हैं सब व्यर्थ है क्योंकि ईश्वर को सर्वव्यापी मानते हैं, ईश्वर का रास्ता ग़लत बताते हैं। अगर कहें कि ईश्वर और उनकी रचना के आदि, मध्य, अन्त को हम नहीं जानते हैं तो यह बोलना सच है। आगे ऋषि-मुनि आदि सच बोलते थे, उस समय रजोगुणी थे। उस समय झूठी दुनिया नहीं कहेंगे। झूठी दुनिया नर्क, कलियुग अन्त को कहते हैं। संगम पर कहेंगे - यह नर्क है, वह स्वर्ग है। ऐसे नहीं द्वापर को नर्क कहेंगे। उस समय फिर भी रजोप्रधान बुद्धि है। अभी है तमोप्रधान। तो हेल और हेविन संगम पर लिखेंगे। आज हेल है, कल हेविन होगा। यह भी बाप आकर समझाते हैं, दुनिया नहीं जानती कि इस समय कलियुग का अन्त है। सब अपना-अपना हिसाब-किताब चुक्तू कर अन्त में सतोप्रधान बनते हैं फिर सतो, रजो, तमो में आना ही है। जिनका एक-दो जन्म का पार्ट है, वह भी सतो, रजो, तमो में आते हैं। उन्हों का पार्ट ही थोड़ा है। इसमें बड़ी समझ चाहिए। दुनिया में तो अनेक मत वाले मनुष्य हैं। सबकी एक मत तो नहीं होती। हरेक का अपना-अपना धर्म है। मत अपनी-अपनी है। बाप का आक्यूपेशन अलग है। हरेक आत्मा का अलग है। धर्म भी अलग है। तो उनके लिए समझानी भी अलग चाहिए। नाम, रूप, देश, काल सबका अलग है। देखने में आता है यह फलाने का धर्म है। हिन्दू धर्म में तो सब कहते हैं परन्तु उनमें भी सब भिन्न-भिन्न हैं। कोई आर्य समाजी, कोई सन्यासी, कोई ब्रह्म समाजी। सन्यासी आदि जो भी हैं सबको हिन्दू धर्म में मानते हैं। हम लिखें कि हम ब्राह्मण धर्म के हैं अथवा देवता धर्म के हैं तो भी वे हिन्दू में लगा देते हैं क्योंकि और कोई सेक्शन तो उन्हों के पास है ही नहीं। तो हरेक का फार्म अलग-अलग होने से मालूम पड़ जायेगा। और कोई धर्म वाला होगा तो इन बातों को मानेगा नहीं। फिर उनको इकट्ठा समझाना मुश्किल है। वे तो समझेंगे कि यह तो अपने धर्म की महिमा करते हैं। इनमें द्वैत है। समझाने वाले बच्चे भी नम्बरवार हैं। सब एक समान तो हैं नहीं इसलिए महारथियों को बुलाते हैं।

 

बाबा ने समझाया है - मुझे याद करो, मेरी श्रीमत पर चलो। इसमें प्रेरणा आदि की कोई बात नहीं। अगर प्रेरणा से काम हो तो फिर बाप के आने की दरकार ही नहीं। शिवबाबा तो यहाँ है। तो उनको प्रेरणा की क्या दरकार है। यह तो बाप की मत पर चलना होता है। प्ररेणा की बात नहीं। कोई-कोई सन्देशियां सन्देश ले आती हैं, उसमें भी बहुत मिक्स हो जाता है। सन्देशी तो सब एक जैसी हैं नहीं। माया का बहुत इन्टरफियर होता है। दूसरी सन्देशी से वेरीफाय कराना होता है। कई तो कह देते हैं हमारे में बाबा आते हैं, मम्मा आती है फिर अपना अलग सेन्टर खोल बैठते हैं। माया की प्रवेशता हो जाती है। यह बड़ी समझने की बात है। बच्चों को बहुत सेन्सीबुल बनना चाहिए। जो सर्विसएबुल बच्चे हैं, वही इन बातों को समझ सकते हैं। जो श्रीमत पर नहीं चलते, वह इन बातों को नहीं समझेंगे। श्रीमत के लिए गायन है कि आप जो खिलायेंगे, जो पहनायेंगे, जहाँ बिठायेंगे, वह करेंगे। ऐसे कोई तो बाप की मत पर चलते हैं, कोई फिर दूसरों की मत के प्रभाव में जाते हैं। कोई वस्तु नहीं मिली, कोई बात पसन्द नहीं आई तो झट बिगड़ पड़ते हैं। सब थोड़ेही एक जैसे सपूत बच्चे हो सकते हैं। दुनिया में तो ढेर की ढेर मत वाले हैं। अजामिल जैसी पाप आत्माएं, गणिकायें बहुत हैं।

 

यह भी समझाना पड़ता है कि ईश्वर सर्वव्यापी कहना रांग है। सर्वव्यापी तो पांच विकार हैं इसलिए बाप कहते हैं यह आसुरी दुनिया है। सतयुग में पांच विकार होते नहीं। कहते हैं शास्त्रों में यह बात ऐसे है। परन्तु शास्त्र तो सब मनुष्यों ने बनाए हैं। तो मनुष्य ऊंच हुए या शास्त्र? जरूर सुनाने वाले ऊंच ठहरे ना। लिखने वाले तो हैं मनुष्य। व्यास ने लिखा वह भी मनुष्य था ना। यह तो निराकार बाप बैठ समझाते हैं। धर्म स्थापकों ने जो आकर के सुनाया उसका फिर बाद में शास्त्र बनता है। जैसे गुरुनानक ने सुनाया, बाद में ग्रंथ बनता है। तो जिसने सुनाया उसका नाम हो गया। गुरुनानक ने भी उनकी महिमा गाई है - सबका बाप वह एक है। बाप कहते हैं जाकर धर्म स्थापन करो। यह बेहद का बाप कहते हैं मुझे तो कोई भेजने वाला नहीं। शिवबाबा खुद बैठ समझाते हैं वह हैं मैसेज ले आने वाले, मुझे कोई भेजने वाला नहीं। मुझे मेसेन्जर वा पैगम्बर नहीं कहेंगे। मैं तो आता हूँ बच्चों को सुख-शान्ति देने। मुझे कोई ने कहा नहीं, मैं तो खुद मालिक हूँ। मालिक को भी मानने वाले होते हैं, परन्तु उनसे पूछना चाहिए कि तुमने मालिक का अर्थ समझा है। वह मालिक है, हम उनके बच्चे हैं तो जरूर वर्सा मिलना चाहिए। बच्चे कहते हैं - हमारा बाबा। तो बाप के धन के तुम मालिक हो। "मेरा बाबा'' बच्चे ही कहेंगे। मेरा बाबा तो फिर बाबा का धन भी मेरा। अभी हम क्या कहते हैं? हमारा शिवबाबा। बाप भी कहेंगे यह हमारे बच्चे हैं। बाप से बच्चों को वर्सा मिलता है। बाप के पास प्रापर्टी होती है। बेहद का बाप है ही स्वर्ग का रचयिता। भारतवासियों को भी प्रापर्टी किससे मिलती है? शिवबाबा से। शिव जयन्ती भी मनाते हैं। शिव जयन्ती के बाद फिर होगी कृष्ण जयन्ती, फिर रामजयन्ती। बस, मम्मा-बाबा की जयन्ती वा जगदम्बा की जयन्ती तो कोई गाते नहीं। शिव-जयन्ती फिर राधे-कृष्ण की जयन्ती फिर राम-सीता जयन्ती।

 

जब शिवबाबा आये तब शूद्र राज्य विनाश हो। यह राज़ भी कोई समझते नहीं। बाप बैठ समझाते हैं। वह आते हैं जरूर। बाप को क्यों बुलाते हैं? श्री कृष्णपुरी स्थापन करने। तुम जानते हो शिवजयन्ती बरोबर होती है। शिवबाबा नॉलेज दे रहे हैं। आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना हो रही है। शिवजयन्ती है बड़े ते बड़ी जयन्ती। फिर है ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। अब प्रजापिता ब्रह्मा तो मनुष्य सृष्टि में है। फिर रचना में मुख्य है लक्ष्मी-नारायण। तो शिव है मात-पिता, फिर मात-पिता ब्रह्मा और जगत अम्बा भी जाते हैं। यह समझने और धारण करने की बातें हैं। पहले-पहले समझाना है - बाप परमपिता परमात्मा आते हैं पतितों को पावन करने। वह नाम-रूप से न्यारा हो तो उनकी जयन्ती कैसे हो सकती। गॉड को फादर कहा जाता। फादर को तो सब मानते हैं। निराकार है ही आत्मा और परमात्मा। आत्माओं को साकार शरीर मिलता है, यह बड़ी समझने की बातें हैं। जो कुछ भी शास्त्र आदि नहीं पढ़ा हुआ हो तो उसके लिए और ही सहज है। आत्माओं का बाप वह परमपिता परमात्मा स्वर्ग की स्थापना करने वाला है। स्वर्ग में होती है राजाई, तो जरूर उनको संगम पर आना पड़े। सतयुग में तो सके। वह प्रालब्ध, 21 जन्मों का वर्सा संगम पर ही मिलता है। यह संगमयुग है ब्राह्मणों का। ब्राह्मण हैं चोटी, फिर है देवताओं का युग। हरेक युग 1250 वर्ष का है। अभी 3 धर्म स्थापन होते हैं - ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय क्योंकि फिर आधा कल्प कोई धर्म नहीं होता। सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी पूज्य थे फिर पुजारी बन जाते हैं। वह ब्राह्मण तो किस्म-किस्म के होते हैं।

 

अभी तुम अच्छे कर्म कर रहे हो जो फिर सतयुग में प्रालब्ध पाओगे। बाप अच्छे कर्म सिखलाते हैं। तुम जानते हो हम श्रीमत पर जैसे कर्म करेंगे, औरों को आप समान बनायेंगे तो उसकी प्रालब्ध मिलेगी। अभी सारी राजधानी स्थापन होती है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म की राजधानी होती है। यह है प्रजा का प्रजा पर राज्य। पंचायती राज्य है, अनेक पंच हैं। नहीं तो 5 पंच होते हैं। यहाँ तो सब पंच ही पंच हैं। सो भी आज हैं, कल नहीं। आज मिनिस्टर हैं, कल उनको उतार देते हैं। एग्रीमेंट कर फिर कैन्सिल कर देते हैं। यह है अल्पकाल का क्षण भंगुर राज्य। किसको भी उतारने में देरी नहीं करते हैं। कितनी बड़ी दुनिया है। अखबारों से कुछ ना कुछ पता पड़ता है। इतने सब अखबार तो कोई पढ़ नहीं सकता। हमको इस दुनिया के समाचार की दरकार ही नहीं। यह तो जानते हैं देह सहित सब कुछ इस दुनिया का ख़त्म हो जाने वाला है। बाबा कहते हैं सिर्फ मुझे याद करो तो तुम मेरे पास जायेंगे। मरने के बाद सारा साक्षात्कार होगा। शरीर छोड़कर फिर आत्मा भटकती भी है। उस समय भी हिसाब-किताब भोग सकते हैं। साक्षात्कार सब होता है। अन्दर ही साक्षात्कार करते हैं, भोगना भोगते हैं, बहुत पछताते हैं कि हमने नाहेक ऐसा किया। पश्चाताप होता है ना। कोई जेल बर्ड होते हैं, वह कहते हैं जेल में खाना तो मिलेगा। मतलब खाना खाने से काम है, इज्जत की परवाह नहीं करते। तुमको तो कोई तकल़ीफ नहीं। बाप है तो बाप की श्रीमत पर चलना है। ऐसे भी नहीं, किसको दु: देंगे। वह तो है ही सुखदाता। आज्ञाकारी बच्चे तो कहेंगे बाबा जो आप डायरेक्शन देंगे। तुम्हीं से बैठूं........ यह शिवबाबा के लिए गाया हुआ है। भागीरथ अथवा नंदीगण भी मशहूर है। लिखा हुआ है ना माताओं के सिर पर कलष रखा। तो वह फिर गऊ दिखाते हैं। क्या-क्या बातें बना दी हैं।

 

इस दुनिया में कोई एवरहेल्दी हो नहीं सकता। अनेक प्रकार के रोग हैं। वहाँ कोई रोग नहीं है। कभी अकाले मृत्यु होती है। समय पर साक्षात्कार होता है। बुढ़ों को तो खुशी होती है। बुढ़े जब होते हैं तो खुशी से शरीर छोड़ते हैं। साक्षात्कार होता है कि हम जाकर बच्चा बनूँगा। अभी तुम जवानों को भी इतनी खुशी है कि हम शरीर छोड़ जाकर प्रिन्स बनेंगे। बच्चे हो वा जवान हो, मरना तो सबको है ना। तो सबको यह नशा रहना चाहिए कि हम जाकर प्रिन्स बनेंगे। जरूर जब सर्विस करो तब तो बनो। खुशी होनी चाहिए - अभी हम पुराना शरीर छोड़ बाबा के पास जायेंगे, बाबा फिर हमको स्वर्ग में भेज देंगे। सर्विस करनी चाहिए। बच्चों ने गीत सुना। बन्सी वाला कृष्ण तो है नहीं। मुरली तो बहुतों के पास होती है। बहुत अच्छी-अच्छी बजाते हैं। इसमें मुरली की बात नहीं। तुम तो कहते हो श्रीमत एक बाप ही देते हैं। श्रीकृष्ण में तो यह नॉलेज थी ही नहीं। यह सहज राजयोग और ज्ञान उसमें था ही नहीं। उसने राजयोग सिखलाया नहीं है। वह तो राजयोग सीखा है बाप के द्वारा। कितनी बड़ी बात है। जब तक कोई बच्चा नहीं बनता तब तक समझ भी नहीं सकता और इसमें फिर श्रीमत पर चलने की बात है। अपनी मत पर चलने से थोड़ेही ऊंच पद पा सकेंगे। बाप को जो जानते हैं वह बाप का परिचय औरों को भी देंगे। बाप और रचना का परिचय देना है। किसको बाप का परिचय नहीं देते तो गोया खुद जानते नहीं। अपने को नशा चढ़ा हुआ है तो औरों को भी चढ़ाना है। अच्छा!

 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-

 

1) श्रीमत पर सदा श्रेष्ठ कर्म करने हैं। दूसरों की मत के प्रभाव में नहीं आना है। सपूत बन हर आज्ञा का पालन करना है। जो बात समझ में नहीं आती है, उसे वेरीफाय जरूर कराना है।

 

2) सदा इसी नशे वा खुशी में रहना है कि हम यह पुराना शरीर छोड़ प्रिन्स बनेंगे। नशे में रह ईश्वरीय सेवा करनी है।

 

वरदान:-सदा अपनी श्रेष्ठ शान में रह परेशानियों को मिटाने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान भव

 

सदा यह वरदान स्मृति में रहे कि हम अपनी श्रेष्ठ शान में रहने वाले औरों की भी परेशानी को मिटाने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान हैं। कमजोर नहीं। श्रेष्ठ शान के तख्तनशीन हैं। जो अकालतख्तनशीन, बाप के दिल तख्तनशीन श्रेष्ठ शान में रहने वाले हैं, वे स्वप्न में भी कभी परेशान नहीं हो सकते। कोई कितना भी परेशान करे लेकिन अपनी श्रेष्ठ शान में ही रहते हैं।

 

स्लोगन:-सदा अपने स्वमान में रहो तो सर्व का मान मिलता रहेगा।

 

 

24/11/18              Morning Murli  Om Shanti           BapDada              Madhuban

Sweet children, everything, including your bodies, is going to be destroyed. Therefore, you don’t need to listen to the news of the old world. Just remember the Father and the inheritance.

 

Question:

 

What is remembered of shrimat? What are the signs of those who follow shrimat?

 

Answer:

 

It is remembered of shrimat: Whatever you feed me, whatever you give me to wear, wherever you make me sit, I will just do that. The children who follow shrimat follow every one of the Father’s orders. They always perform elevated actions. They never mix the dictates of their own minds with shrimat. They understand what is right and what is wrong.

 

Song:O Dweller of the forest, Your name is the support of my life! 

 

Om Shanti

 

Whose song is this? The children’s. There are some songs in which the Father explains to the children, but, the children say in this song: Baba, we now understand. The world doesn’t know how false this world is and how false the bondages are. Here, everyone is unhappy and this is why they remember God. There is no question of meeting God in the golden age. Here, there is sorrow and this is why souls remember God. However, according to the drama, you only find the Father when He Himself comes. All the effort that everyone makes is wasted because they believe God to be omnipresent. They show wrong paths to finding God. If they were to say that they don’t know God or the beginning, middle and end of His creation, that would be telling the truth. Earlier, rishis and munis etc. used to tell the truth. At that time, they were rajoguni. At that time, you wouldn’t have said that the world was false. Hell, the end of the iron age, is said to be the false world. At the confluence age, you would say: This is hell and that is heaven. You wouldn’t call the copper age hell. At that time, you still have rajopradhan intellects. They are now tamopradhan. So you would write “heaven” and “hell” at the confluence age. Today it is hell, and tomorrow it will be heaven. The Father comes and explains this. The world doesn’t know that this time is the end of the iron age. Everyone settles their karmic accounts and becomes satopradhan at the end. Then they have to go through the stages of sato, rajo and tamo. Even those who have parts of just one or two births go through the stages of sato, rajo and tamo. They only have small parts. Great understanding is required for this. People in the world have many opinions. Not everyone can have the same opinion. Each one has his own religion and his own opinion. The occupation of the Father is separate from that of every soul. The religion of each one is different, and so different explanations are needed for each one. The name, form, land and time period of each one is separate. You can see that so and so belongs to such and such a religion. Everyone says that they belong to the Hindu religion, but there are many varieties in that too. Some are Arya Samajis, some are sannyasis and some are Brahm Samajis. They consider all the sannyasis etc. as belonging to the Hindu religion. Even if we write that we belong to the Brahmin religion or the deity religion, they still put us in the column of the Hindu religion because they don’t have any other sections. When you have each one fill in an individual form, you can tell about their backgrounds. Those of other religions would not believe in these things and it would then be difficult to explain to them all at the same time. They would think that we are simply praising our own religion. There is duality here. The children who explain are also numberwise. Not everyone is the same and this is why they invite the maharathis to come. Baba has explained: Remember Me and follow My shrimat. There is no question of inspiration in this. If everything were to happen through inspiration, there would be no need for the Father to come. Shiv Baba is here. So, what is the need for Him to give inspiration? Here, you have to follow the Father’s directions. There is no question of inspiration. Some trance messengers bring a message but there are sometimes a lot of things also mixed in that. Not all trance messengers are the same; there is a lot of interference of Maya. Everything has to be verified by another trance messenger. Some say that Baba or Mama come in her and she then goes and opens another centre of her own: there is the influence of Maya. These matters have to be understood. You children have to become very sensible. Only serviceable children will be able to understand these things. Those who don’t follow shrimat will not be able to understand these things. It is remembered of shrimat: Whatever You feed me, whatever You give me to wear, wherever You make me sit, I will do that. Some follow the Father’s directions and some are influenced by the directions of others. If they don’t receive something, if they don’t like something, they quickly get upset. Not all the children can be worthy to the same extent. There are people with so many different opinions in the world. There are many sinful souls like Ajamil and those without virtues. You also have to explain that it is wrong to call God omnipresent. It is the five vices that are omnipresent. This is why the Father says: This is the devilish world. The five vices don’t exist in the golden age. They say: It is written in the scriptures like this. However, all the scriptures are written by human beings. So, are human beings or the scriptures elevated? Surely, the One who speaks them is elevated. It was human beings who wrote them. Vyas wrote them, but he too was a human being. The incorporeal Father sits here and explains: A scripture is created later of what the founder of that religion came and said. For example, the Granth was created later of what Guru Nanak spoke about. Therefore, the name of the person who spoke those things is glorified. Guru Nanak also praised that One. The Father of all is that One. The Father says: Go and establish a religion. The unlimited Father says: There is no one to send Me. Shiv Baba Himself sits here and explains: They are those who bring a message but there is no one to send Me here. I would not be called a messenger. I come to give peace and happiness to the children. No one told Me to come. I Myself am the Master. There are also those who believe in the Master, but you should ask them if they understand the meaning of the word ‘Master’. He is the Master and we are His children, and so we should surely receive the inheritance. You children say: Our Baba. So, you are the masters of the Father’s wealth. Only the children would say “My Baba!” If you say, “My Baba,” then Baba’s wealth is also your wealth. What do we say now? “Our Shiv Baba!” The Father would also say: These are My children. Children receive the inheritance from the Father. The Father has property. The unlimited Father is the Creator of heaven. From whom do the people of Bharat receive their property? From Shiv Baba. They celebrate Shiva Jayanti. After Shiva Jayanti, there is Krishna Jayanti and then Rama Jayanti; that’s all. No one remembers the Jayanti of Mama or Baba or of Jagadamba. There is Shiva Jayanti, then the Jayanti of Radhe and Krishna and then of Rama and Sita. When Shiv Baba comes, the shudra kingdom can be destroyed. No one understands these secrets. The Father sits here and explains. He definitely does come. Why do you call out to the Father? To come and establish the land of Shri Krishna. You know that Shiva Jayanti definitely does take place. Shiva Baba is giving you knowledge. The original eternal deity religion is being established. Shiv Jayanti is the greatest Jayanti of all. Then there are Brahma, Vishnu and Shankar. Now, Prajapita Brahma is in the human world. Then, Lakshmi and Narayan are the main ones of the creation. So Shiva is the Mother and Father, and then Brahma and Jagadamba are also the mother and father. These matters have to be understood and imbibed. You first have to explain: The Father, the Supreme Father, the Supreme Soul, comes to make impure ones pure. If He is beyond name and form, how could there be His jayanti? God is called the Father. Everyone believes in the Father. Souls and the Supreme Soul are incorporeal. Souls receive corporeal bodies. These matters have to be understood. This is even easier for those who haven’t studied any scriptures etc. The Father of souls, the Supreme Father, the Supreme Soul, is the One who establishes heaven. There is the kingdom in heaven and so He definitely has to come at the confluence age. He cannot come in the golden age. Only at the confluence age do you receive the reward of the inheritance for 21 births. This confluence age is of Brahmins. Brahmins are the topknot, and then there is the age of the deities. Each age is 1250 years. Three religions are established at this time: Brahmins, deities and warriors because there are no other religions for half the cycle. Those of the sun and moon dynasties are worthy of worship and then they become worshippers. There are many of those types of brahmin. You are now performing good actions and so you will receive the reward of that in the golden age. The Father teaches you how to perform good actions. You know that you will accordingly receive the reward of whatever actions you perform, according to shrimat, and of making others the same as yourselves. The whole kingdom is being established now. There is to be the kingdom of the original eternal deity religion. This is the rule of people by people. It is the rule by a group of people. There are many different groups. Otherwise, there are just the five representatives of the committees. Here, there are so many communities; they are here today and gone tomorrow. Today, someone is a Minister and tomorrow, he would be thrown out of that position. They make an agreement and then cancel it. That is a temporary kingdom; they don’t take long to dethrone anyone. The world is so large. You get to hear of something or other from the newspapers. No one can read so many newspapers. You don’t need the news of this world. You know that everything of this world, including your bodies, is to be destroyed. Baba says: Simply remember Me and you will come to Me. After death, a soul has visions of everything. Sometimes, after leaving his body, a soul wanders around. He can settle his karmic accounts at that time too. He has visions of everything. The soul has visions internally. He suffers for his actions and repents a great deal: I did that unnecessarily. There is repentance. Some are jailbirds and they say: At least we will receive food in jail. It means their purpose is just to eat; they are not concerned about their honour. You don’t have any difficulty. You belong to the Father and so you have to follow His shrimat. It isn’t that He would cause sorrow for anyone. He is the Bestower of Happiness. Obedient children would say: Baba, whatever directions You give. I sit with You alone. This is remembered of Shiv Baba. Bhagirath, (the Lucky Chariot) and the bull are well known. It is written that the urn of knowledge was placed on the mothers. So, they have then shown cows. They have made up so many stories. No one in this world can be ever healthy. There are so many types of disease. There is no disease or untimely death there. They have visions at the right time. The older ones are happy: when they become old, they shed their bodies in happiness. They have a vision that they will then go and become a baby. Now, even you younger ones have the happiness that you will shed your bodies and go and become princes. Whether you are young or old, everyone has to die. So, all of you should have the intoxication that you will go and become princes. You will definitely become that when you do service. You should have the happiness that you will now shed your old bodies and go to Baba and Baba will then send you to heaven. You should do service. You children heard the song. Krishna wasn’t the one with a flute. Many people have flutes; they play the flute very well. There is no question of a flute in this. You say that only the one Father gives shrimat. Shri Krishna did not have this knowledge. He didn't have this easy yoga or knowledge in him. He didn't teach Raja Yoga; he studied Raja Yoga from the Father. This is such a great thing. Until someone becomes a child, he wouldn't be able to understand and it is a question here of following shrimat. You cannot claim a high status by following your own dictates. Those who know the Father would give the Father’s introduction to others. You have to give the introduction of the Father and His creation. If you don't give others the Father's introduction, it means you don't know Him. If you have that intoxication, you then have to make others intoxicated. Achcha.

 

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

 

Essence for Dharna:

 

1.            Always perform elevated actions according to shrimat. Don't be influenced by the directions of others. Be obedient and follow every order. If you are unable to understand something, definitely have it verified.

 

2.            Always stay in the intoxication and happiness that you will shed your old body and then go and become a prince. Maintain this intoxication and do God’s service.

 [font=Calibri]Blessing:May you be a master almighty authority and constantly maintain your elevated honour and finish all the troubles of others.[/font]
Always keep this blessing in your awareness: I am a master almighty authority who maintains my elevated honour and who finishes all the troubles of others too. I am not weak. I am seated on the seat of my elevated honour. Those who are seated on the immortal throne, on the Father’s heart throne and who maintain their elevated honour can never become distressed even in their dreams. No matter how much someone may try to distress you, you will always maintain your elevated honour.
Slogan:Constantly maintain your self-respect and you will continue to receive respect from everyone.

End of Page