Published by – Bk Ganapati
Category - Religion, Ethics , Spirituality & New Age & Subcategory - BK Murali Aug 2018
Summary - Satya Shree Trimurti Shiv Bhagawanubach Shrimad Bhagawat Geeta. Month - AUG-2018 ( Daily Murali - Prajapita Brahmakumaris - Magic Flute )
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Details ( Page:- Murali 25-Aug- 2018 )
25-08-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
"मीठे बच्चे - पवित्र रहने की कसम लेना ही सच्चा रक्षाबंधन है, बाप कल्प में एक ही बार यह राखी तुम बच्चों को बांधते हैं"
 
प्रश्नः-पवित्रता की प्रतिज्ञा करने वालों को भी योग में रहने का इशारा क्यों मिलता है?
 
उत्तर:-
 
क्योंकि योग की शक्ति से ही वायुमण्डल को शान्त बना सकते हो। सारी दुनिया को शान्ति का वर्सा देने का उपाय ही योग है। तुम बाप को याद करते हो - विश्व में शान्ति फैलाने के लिए। जितना बाप को याद करेंगे उतना माया का असर नहीं होगा। बाप का यही फ़रमान है - बच्चे, अशरीरी भव।
 
गीत:-
 
भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना........ 
 
ओम् शान्ति।
 
बेहद के बाप का बच्चों प्रति फ़रमान है कि अशरीरी होकर रहो अर्थात् अपने को आत्मा निश्चय कर इन कर्मेन्द्रियों से अपने को अलग समझो। यह शरीर डिपेन्ड करता ही है आत्मा के ऊपर। आत्मा अलग हो जाती है तो शरीर कोई काम की चीज़ नहीं रहता, जिसको फिर जलाया जाता है। जब आत्मा निकल जाती है तो जैसे मुर्दा, किचड़ा हो जाता। किचड़ा होता है तो कहते हैं कि इस किचड़े को जला दो। आत्मा बिगर यह शरीर काम का नहीं है। तो अहम् आत्मा इमार्टल है। यह शरीर जो पार्ट बजाने लिए मिलता है, यह विनाशी है। आत्मा निकल जाती है तो यह शरीर कोई काम का नहीं रहता। बदबू हो जाती है। शरीर के बिगर आत्मा साइलेन्स रहती है। बाप समझाते हैं तुम्हारी आत्मा का स्वधर्म है साइलेन्स। तुम जानते हो हम आत्मा वास्तव में परमधाम की रहने वाली हैं। परमपिता परमात्मा भी वहाँ रहते हैं। जब कोई दु: होता है तो बाप को याद करते हैं - मुझे इस दु: से छुड़ाओ। आत्मा ही सुख-दु: में आती है। बहुत सन्यासी आदि हैं जो कहते हैं आत्मा निर्लेप है परन्तु नहीं, आत्मा में ही खाद पड़ती है। सच्चे सोने में सिलवर पड़ती है तो सोना 24 कैरेट से 22 कैरेट बन जाता है। सच्चे सोने में खाद डाल देते हैं तो जेवर मुलम्मे का हो जाता है। आत्मा ही मुख्य है। आत्माओं का बाप है परमपिता परमात्मा। वही आकर इस समय बच्चों को कहते हैं अब शरीर का भान छोड़ दो। मैं आत्मा हूँ, बाप के पास जाता हूँ। हम हैं पाण्डव। पाण्डवों का प्लैन यह है। पहले यादव यूरोपवासी फिर कौरव और यह हैं पाण्डव। बरोबर महाभारी लड़ाई लगी और फिर जयजयकार हो गया। यह राजयोग है ही नई दुनिया स्वर्ग के लिए। पाण्डवों की जयजयकार हुई और सब ख़लास हो गये। जयजयकार होती ही है सतयुग में।
 
राखी का त्योहार भारतवासी मनाते हैं। राखी बांधते हैं। अभी यह बच्चे जानते हैं राखी एक ही बार बांधते हैं, जो फिर हम 21 जन्म पवित्र रहें। तो जरूर कलियुग अन्त में राखी बांधने वाला चाहिए। राखी कौन आकर बांधते हैं? कौन प्रतिज्ञा कराते हैं? स्वयं बाप और जो उनके वंशावली ब्राह्मण हैं। सच्चे-सच्चे ब्राह्मण तुम हो। ब्राह्मण ही राखी बांधते हैं। बहन भाई को बांधे - यह भी झूठी बनावट है। बुजुर्ग लोग जानते हैं - आगे ब्राह्मण ही आकर धागे की राखी बांधते थे। वह कोई ऐसे नहीं कहते कि तुमको पवित्र रहना है। पवित्रता को वह जानते ही नहीं। तो यह राखी उत्सव जरूर संगम पर हुआ है। कितना वर्ष हुआ? 5 हजार वर्ष। संगम पर बाप ने राखी बांधी फिर हम सतयुग-त्रेता अन्त तक पवित्र रहे फिर भक्ति मार्ग से यह राखी त्योहार शुरू हो गया। कहते हैं - यह उत्सव परम्परा से मनाते आये हैं। परन्तु ऐसे तो है नहीं। 5 हजार वर्ष में हम एक ही बार राखी बांधते हैं। जब द्वापर से पतित बनते हैं तो वर्ष-वर्ष राखी बांधते हैं क्योंकि अपवित्र बनते हैं। जैसे वर्ष-वर्ष रावण को भी जलाते हैं, वैसे वर्ष-वर्ष राखी भी बांधते हैं। वास्तव में इनका अर्थ तुम समझते हो। बाप आकर कहते हैं - बच्चे, प्रतिज्ञा करो। राखी बांधने से कुछ नहीं होता है। यह तो कसम उठाया जाता है कि - बाबा, हम अभी पवित्र रहेंगे। तो ड्रामा में इन उत्सवों की नूँध है। सतयुग-त्रेता में राखी बांधने की दरकार नहीं रहती। वह है ही वाइसलेस वर्ल्ड। इस समय अपनी है चढ़ती कला। फिर तो उतरना होता है। हम फिर सो सतोप्रधान देवता बनेंगे। ब्राह्मण कहते हैं हम अभी ईश्वर की सन्तान है फिर सो देवता बनते हैं। बनाने वाला है परमपिता परमात्मा। मनुष्य से देवता निराकार परमपिता परमात्मा बनाते हैं। मनुष्य नहीं बना सकते। उन्होंने मनुष्य का नाम डाल दिया है। कृष्ण को भी द्वापर में ले गये हैं। तुम पतित से पावन कलियुग अन्त में बनते हो। फिर सतयुग आना है। अगर द्वापर में आये तो फिर कलियुग का नाम गुम हो जाना चाहिए। यह रांग बात है, जब रांग हो तब तो बाप आकर राइट बनाये ना। अभी सब झूठे हैं। झूठी माया, झूठी काया........ बाप आकर बच्चों को सच्चा बनाते हैं। सतयुग-त्रेता में कभी झूठ बोलते ही नहीं। यहाँ तो पाप करते झूठ बोलते रहते हैं। पाप आत्माओं को पुण्य आत्मा तो बाप ही बनायेंगे। जैसे दीपमाला पर सारे वर्ष का हिसाब-किताब चुक्तू करते हैं ना। तुम्हारा फिर आधाकल्प का जो पापों का खाता है वह भस्म होता है और पुण्य का खाता तुम जमा करते जाते हो। यहाँ ही जमा करेंगे तब 21 जन्म लिए फल मिलेगा। बाप को याद करने से ही विकर्म विनाश होंगे। नया कोई पाप नहीं करना चाहिए। पुराना खाता ख़लास करना है। बाप को बतलाते हैं कि बाबा हमसे यह पाप हुआ। अच्छा, आधा माफ है। इस जीवन में भी छोटेपन में पाप किया है तो वह बतलाने से आधा दण्ड कट जायेगा। बाकी आधा के लिए फिर भी मेहनत करनी पड़ेगी। इस जन्म की जीवन कहानी से आगे का भी पता पड़ जाता है क्योंकि संस्कार ले आते हैं ना। फिर उनकी अवस्था का पता पड़ जाता। यह तो समझते हैं दिन-प्रतिदिन नीचे ही गिरते आये हैं। दुनिया तमोप्रधान बनती जाती। पाप बढ़ते जाते हैं। फिर पतित-पावन बाप आकर राखी बांधते हैं अर्थात् प्रतिज्ञा कराते हैं तो तुम पवित्र बन जाते हो। परम्परा अर्थात् हर पांच हजार वर्ष बाद यह सच्ची-सच्ची राखी बाप से बंधवाते फिर उसकी रस्म-रिवाज आधा कल्प चलती है। उसका महत्व बहुत है। पहले-पहले महत्व है जो राखी बांधते हैं। उनका उत्सव है मुख्य। ऊंच ते ऊंच उत्सव है शिव जयन्ती, जिसका कोई को पता नहीं है कि वह कब आये, क्या आकर किया? इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट आदि कब आये यह तो सब जानते हैं ना। उनसे आगे सतयुग-त्रेता में क्या था - वह हिस्ट्री-जॉग्राफी कोई जानते नहीं। देवी-देवताओं की राजधानी कैसे स्थापन हुई, कितना समय चली - यह कोई जानते नहीं। मुख से कहते हैं - सतयुग के लक्ष्मी-नारायण सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी थे। लक्ष्मी-नारायण तो हुए महाराजा-महारानी। उन्हों का बचपन भी चाहिए। बच्चों का किसको पता नहीं हैं। राधे-कृष्ण को फिर उल्टा द्वापर में ले जाते हैं। यह मनुष्यों की अपनी कल्पना है। सतयुग की आयु भी लाखों वर्ष लिख दी है, इतनी तो होनी नहीं चाहिए। खुद भी कहते हैं - 3 हजार वर्ष बिफोर क्राइस्ट बरोबर देवी-देवताओं का राज्य था। तो फिर सतयुग को इतने वर्ष क्यों देते हैं? सहज बात है ना। परन्तु माया पत्थरबुद्धि बना देती है जो बिल्कुल ही भूल जाते हैं कि हम देवी-देवता थे। नम्बरवन ही जब नारायण बनता तो उनको यह ज्ञान नहीं होता। ज्ञान प्राय:लोप हो जाता है। बाप कहते हैं अभी तुमको ज्ञान देता हूँ - मनुष्य से देवता बनाने का। देवता बन गये फिर क्या सिखलायेंगे? दरकार ही नहीं। तो राखी का उत्सव भी तुम जानते हो। यह सब उत्सव वर्ष-वर्ष होते हैं। कुम्भ का मेला, सागर-नदी का मेला भी बड़ा भारी लगता है। सागर और ब्रह्म पुत्रा नदी का मेला मशहूर है। सागर तो बाप है। उनसे पहले यह ब्रह्म पुत्रा निकली फिर वृद्धि होती जाती है। सागर और ब्रह्म पुत्रा का मेला देखने में आता है। वहाँ फिर है नदियों का मेला, उसमें भी साफ पानी और मैला पानी दिखाई पड़ता है। वहाँ भी हर वर्ष मेला लगता है। वर्ष-वर्ष जाकर पतित से पावन बनने स्नान करते हैं। अभी तुम संगमयुग पर हो। बरोबर इस समय तुम ज्ञान सागर से आकर मिले हो। यह है संगम का सुहावना समय जबकि आत्माओं का परमपिता परमात्मा से मिलन होता है।
 
तुम बच्चे जानते हो - जो भी पर्व मनाते हैं वह सब अभी के हैं। आज है रक्षाबन्धन। बाबा थोड़ी राखी भी ले आये हैं। अब बाबा पूछते हैं - किसको शिवबाबा से राखी बंधवानी है वह हाथ उठावें (पहले दो चार ने हाथ उठाया) फिर बाबा ने कहा - शिवबाबा से जिनको राखी बंधवानी हो वह हाथ उठावे। (मैजारिटी ने हाथ उठाया) बापदादा बोले - क्या तुम सब पावन नहीं बने हो जो राखी बंधवाते हो? फिर मम्मा से बापदादा ने पूछा तो मम्मा बोली राखी तो बांधी ही हुई है। देखो, बाबा ने बच्चों की परीक्षा ली तो सब फेल हो गये। मम्मा ने ठीक कहा। तुम तो पवित्र हो ही। बाकी ज्ञान की धारणा पर मदार है। खजाना तो मिलता ही रहेगा। जब तक जीते हो तब तक खजाना इकट्ठा करते रहो। पवित्र तो तुम हो परन्तु याद में रहने से तुम वायुमण्डल को शान्त बनाते हो। सारी दुनिया को शान्ति का वर्सा दे रहे हो। पवित्रता की ही प्रतिज्ञा की जाती है। बाप को याद करते हो - शान्ति फैलाने लिए। यह भी तुम जानते हो जितना बाप को याद करेंगे, माया का असर नहीं होगा। माया के तूफान भी आते हैं ना। बाप तुम बच्चों को पढ़ाकर त्रिकालदर्शी बना रहे हैं। ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को तुम जानते हो। तुम्हारा यह भूलना भी ड्रामा में है इसलिए फिर से मुझे आना पड़ता है - तुम बच्चों को राजयोग सिखलाने। शिव जयन्ती मनाते हैं परन्तु अर्थ नहीं समझते। बाबा ने राखी लाई थी क्योंकि एक बच्चा नया आया था। यह पान का बीड़ा उठाना होता है। बाबा हम राखी बंधवाते हैं। हम पवित्र बन क्यों नहीं बेहद के बाप से वर्सा लेंगे क्योंकि इसमें पवित्रता है फर्स्ट। बेहद का बाप कहते हैं आधा कल्प तुमने विषय गटर में बहुत गोते खाये हैं। यह है ही कुम्भी पाक नर्क। 63 जन्म गोते खाये हैं अब प्रतिज्ञा करो - बाबा, हम भी पवित्र दुनिया में चल सुख का वर्सा लूँगा। परन्तु हिम्मत नहीं देखते हैं। यह है ज्ञान मान सरोवर। इसमें ज्ञान स्नान करने से मनुष्य स्वर्ग की परी बन जाते हैं। भारतवासी लक्ष्मी-नारायण आदि के मन्दिर बनाते हैं परन्तु उनको पता थोड़ेही है कि वह कब आये थे, तो यह हुई अन्धश्रद्धा।
 
तुम बच्चों को अब बाप ने आप समान मास्टर ज्ञान सागर बनाया है। जैसे बैरिस्टर पढ़कर आप समान बनाते हैं, फिर नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार पास होते हैं। यह भी पढ़ाई है। एम ऑब्जेक्ट क्लीयर लिखा हुआ है। शिवबाबा का भी चित्र है। परन्तु समझते कुछ नहीं हैं। गाते हैं पतित-पावन सीताराम। यह है ही रावण सम्प्र दाय इसलिए बाप कहते हैं अपनी शक्ल देखो - 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी हो? अपने को आत्मा निश्चय करते हो? तुम्हारी आत्मा का बाप कौन है? उनको नहीं जानते तो तुम नास्तिक ठहरे। फिर नास्तिक लक्ष्मी को कैसे वरेंगे? तुम जानते हो बरोबर हम बन्दर सम्प्रनदाय थे। अब हम श्री नारायण को वरने लायक बनते हैं। बाप कहते हैं मैं तुमको माया रावण के राज्य से लिबरेट करने आया हूँ। फिर रावण का बुत कभी जलायेंगे ही नहीं। यह समझने की बातें हैं। जितना पुरुषार्थ करेंगे उतना अच्छा वर्सा पायेंगे। बाबा बता सकते हैं - तुम इस समय के पुरुषार्थ अनुसार क्या बनेंगे? आजकल मनुष्यों की मौत तो बड़ी चीप (सस्ती) है। वहाँ तो समय पर आयु पूरी हुई झट मालूम पड़ेगा हमको यह चोला छोड़ दूसरा नया लेना है। नई-नई आत्मायें आती हैं तो पहले-पहले उन्हों की महिमा होती है, फिर कम हो जाती है। सतो, रजो, तमो से हरेक को पास करना पड़ता है। बाबा आकर सतोप्रधान बनाते हैं। यह भी वन्डर है। इतनी करोड़ आत्माओं को अपना अविनाशी पार्ट मिला हुआ है जो कभी विनाश नहीं हो सकता। आत्मा इतनी छोटी-सी बिन्दी है, उनमें सारा अविनाशी पार्ट भरा हुआ है, इसको कुदरत कहा जाता है। नया कोई इन बातों को समझ सके। बड़ी गुह्य बातें हैं। शिव का रूप तो यही दिखाते हैं ना। अगर हम इनका रूप बदला दें तो कहें इनकी तो दुनिया से न्यारी बातें हैं। नई दुनिया के लिए नई बातें अभी तुम सुनते हो। फिर कल्प बाद भी तुम ही आकर सुनेंगे। तो पतित-पावन बाप ने प्रतिज्ञा कराई थी, जिन्हों ने यह प्रतिज्ञा की वही स्वर्ग के मालिक बनें इसलिए यह त्योहार मनाया जाता है। सच्चे-सच्चे ब्राह्मण तुम हो। सरस्वती ब्राह्मणी ऊंची गाई जाती है। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:-
 
1) पुराने विकर्मों का खाता ख़लास कर पुण्य का खाता जमा करना है। याद में रह शान्ति का वायुमण्डल बनाना है।
 
2) पवित्रता की प्रतिज्ञा कर पवित्र रहने की सच्ची राखी हरेक को बांधनी है।
 
वरदान:-एक बाप के लव में लवलीन रह सर्व बातों से सेफ रहने वाले मायाप्रूफ भव
 
जो बच्चे एक बाप के लव में लवलीन रहते हैं वे सहज ही चारों ओर के वायब्रेशन से, वायुमण्डल से दूर रहते हैं क्योंकि लीन रहना अर्थात् बाप समान शक्तिशाली सर्व बातों से सेफ रहना। लीन रहना अर्थात् समाया हुआ रहना, जो समाये हुए हैं वही मायाप्रूफ हैं। यही है सहज पुरुषार्थ, लेकिन सहज पुरुषार्थ के नाम पर अलबेले नहीं बनना। अलबेले पुरुषार्थी का मन अन्दर से खाता है और बाहर से वह अपनी महिमा के गीत गाता है।
 
स्लोगन:-पूर्वज पन की पोजीशन पर स्थित रहो तो माया और प्रकृति के बन्धनों से मुक्त हो जायेंगे।
 
 
 
25/08/18 -Morning Murli   Om Shanti           BapDada              Madhuban ( Eng)
Sweet children, to take an oath for purity is true Raksha Bandhan. Only once in a cycle does the Father tie this rakhi on you children.
 
Question:
 
Why do those who make a promise to remain pure receive a signal to stay in yoga?
 
Answer:
 
Because it is with the power of yoga that you can make the atmosphere peaceful. Yoga is the only method for you to give everyone in the whole world the inheritance of peace. You remember the Father in order to spread peace in the world. You will remain uninfluenced by Maya to the extent that you remember the Father. The Father’s order is: Children, be bodiless.
 
Song:
 
O brother, fulfil the responsibility of the bond of this rakhi. 
 
Om Shanti
 
The unlimited Father’s order to the children is: Remain bodiless, that is, have the faith that you are souls and consider yourselves to be separate from your sense organs. The body depends on the soul. When the soul leaves, the body is of no use and is therefore cremated. When the soul leaves, the body becomes a corpse, rubbish. When there is rubbish, it is said: Burn this rubbish. This body is useless without a soul. Therefore, I, the soul, am immortal. The body you each receive to play your part is mortal. When the soul leaves, the body is of no use; it begins to smell. A soul without a body remains in silence. The Father explains: The original religion of you souls is silence. You know that you souls in fact reside in the supreme abode. The Supreme Father, the Supreme Soul, also resides there. When there is sorrow, everyone remembers the Father and says: Free us from this sorrow. It is the soul that experiences happiness and sorrow. There are many sannyasis etc. who say that the soul is immune to action. However, this is not so. Alloy is mixed in souls. When pure gold has silver mixed into it, it changes from 24 carat gold to 22 carat gold. When impurities are mixed into real gold, the jewellery is said to be gold-plated. The soul is the important thing. The Supreme Father, the Supreme Soul, is the Father of souls. He comes at this time and says to His children: Now renounce the consciousness of your body. I am a soul and I am going to the Father. We are the Pandavas. This is the plan of the Pandavas. First, there are the Yadavas, the people of Europe, then the Kauravas and then there are these Pandavas. The Mahabharat War definitely took place after which there were cries of victory. This Raja Yoga is for the new world of heaven. There were cries of victory for the Pandavas and everyone else was destroyed. There are cries of victory in the golden age. The people of Bharat celebrate the Festival of Rakhi; they tie a rakhi. You children now know that rakhi is only tied once, through which you remain pure for 21 births. Therefore, the One who ties the rakhi is definitely needed at the end of the iron age. Who comes and ties this rakhi? Who inspires you to make this promise? The Father Himself and His children who are Brahmins. You are true Brahmins. It is brahmins who tie a rakhi. The system of a sister tying a rakhi on her brother is a false system. Elderly people remember that, earlier, a brahmin priest would come to tie a rakhi of thread. They never said that you have to remain pure. They don’t know what is meant by purity. Therefore, this festival of Rakhi must surely have its origins in the confluence age. How many years has it been? Five thousand years: the Father came at the confluence age and tied this rakhi and we remained pure from the beginning of the golden age to the end of the silver age. Then, this festival of Rakhi began on the path of devotion. People say that this festival has been celebrated from time immemorial, but that is not so. We only tie rakhi once in every 5000 years. Since you become impure from the copper age onwards, you tie a rakhi every year. Just as people burn Ravan every year, in the same way, they tie a rakhi every year. In fact, you are the ones who understand the meaning of this. The Father comes and says: Children, make a promise. Nothing happens simply by tying a rakhi. You have to take the oath: Baba, I will now remain pure. So, these festivals are fixed in the drama. There is no need to tie a rakhi in the golden and silver ages. That is the viceless world. Now it is your stage of ascent. Later you have to descend, and we will then become satopradhan deities again. You Brahmins say: We are now the children of God and we will then become deities. It is the Supreme Father, the Supreme Soul, who makes you into those. The incorporeal Supreme Father, the Supreme Soul, changes you from humans into deities. Human beings cannot make you into those. People have inserted the name of a human being. They have also depicted Krishna in the copper age. At the end of the iron age you become pure from impure. Then the golden age comes. If he were to come in the copper age, then his name should have disappeared in the iron age. However, that is wrong. Only when it is wrong does the Father come to put it right. Everyone is now false. Maya is false and the body is also false. The Father comes and makes the children true. No one tells lies in the golden and silver ages. Here, people commit sin and tell lies. Only the Father can transform sinful souls into pure, charitable souls. At the time of Deepmala, people settle their accounts for the whole year. Your account of sin of half the cycle is burnt away and you begin to accumulate an account of charity. It is only when you accumulate here that you will receive the fruit of it for 21 births. Only by remembering the Father will your sins be absolved. You must not commit any new sin. You each have to end your old account. Some tell the Father: Baba, I have committed such-and-such a sin. Achcha, half is forgiven. Even if you have committed sins in your childhood of this birth, by telling Baba, half the punishment will be cut away. However, you still have to make effort for the other half. From your life story of this birth, one can also know about your previous birth, because a soul carries the sanskars with him and the stage of the soul can be understood. You understand that, day by day, your stage has been falling. The world continues to become tamopradhan and sins continue to increase. The Purifier Father now comes and ties a rakhi on you, that is, He makes you make a promise so that you become pure. ‘Time immemorial’ means that every 5000 years you have this true rakhi tied by the Father. Then this custom and system continues for half a cycle. There is great importance given to it. The foremost importance is given to the tying of rakhi. This festival is the main one. The highest festival of all is Shiv Jayanti. No one knows Him or when He comes or what he does when He comes. Everyone knows when Abraham, Buddha and Christ came. No one knows the history and geography of what existed before them in the golden and silver ages - how the kingdom of deities was established and how long it lasted. No one knows this. They say that Lakshmi and Narayan of the golden age were all-virtuous, 16 celestial degrees full and completely viceless. Lakshmi and Narayan were the empress and emperor. There has to be their childhood too. However, no one knows their childhood. Radhe and Krishna have been falsely shown in the copper age. All of that is the imagination of human beings. They have even elongated the duration of the golden age to hundreds of thousands of years; it cannot be that long. They themselves say that 3000 years before Christ there was definitely the kingdom of deities. In that case, how can they estimate the golden age to be so many years long? This is a simple thing, but Maya has turned everyone’s intellect to stone so that they have completely forgotten that they were deities. When the number one becomes Narayan, he doesn’t have this knowledge. Knowledge disappears. The Father says: I am now giving you the knowledge of becoming deities from human beings. What more can be taught once you become deities? There would be no need. You understand the meaning of the festival of Rakhi. All of these festivals also take place every year. A huge kumbh mela takes place where the ocean and the river meet. The meeting of the ocean and the Brahmaputra River is famous. The Father is the Ocean. This Brahmaputra is the first one to emerge from Him, and then there is gradually expansion. The meeting of the ocean and the Brahmaputra River can be clearly seen. There, (Rivers Ganges and Jamuna) they have a meeting of the rivers. There, it is clearly visible that one river has clean water and the other has dirty water. A mela takes place every year. Every year they go there to bathe in order to change from impure to pure. You are now at the confluence age. You have truly come and met the Ocean of Knowledge at this time. This is the beautiful meeting of the confluence age in which the meeting of souls with the Supreme Father, the Supreme Soul, takes place. You children know that all the religious festivals that are celebrated belong to this time. Today, it is the festival of Raksha Bandhan. Baba has brought a few rakhis with him. Now, Baba asks you: Whoever wants to have a rakhi tied by Shiv Baba, raise your hand. (At first only 2 to 4 raised their hands) Then Baba asked again: Raise your hand if you want a rakhi tied by Shiv Baba. (The majority raised their hands). BapDada said: Why? Have you not all become pure that you need to have a rakhi tied? BapDada then asked Mama. Mama replied: The rakhi has already been tied. Just look, Baba was testing you children and you all failed. Mama gave the correct answer. You are pure anyway. However, the rest depends on imbibing knowledge. You will continue to receive treasures. Continue to accumulate these treasures for as long as you live. You are pure, but, by staying in remembrance, you make the atmosphere peaceful. You are giving the inheritance of peace to the whole world. You make a promise of purity. You remember the Father in order to spread peace. You know that to whatever extent you remember the Father, you will accordingly not be influenced by Maya. Storms of Maya also come. The Father teaches you children to become trikaldarshi (seer of the three aspects of time). You understand the beginning, the middle and the end of the drama. Your forgetting is also fixed in the drama and this is why I have to come again and teach you children Raja Yoga. Although people celebrate Shiv Jayanti, they don’t know the meaning of it. Baba has brought a rakhi to class with him because a new child has come. This is taking the initiative: Baba, I am going to have a rakhi tied. Purity is first, and so why should I not become pure and claim my inheritance from the unlimited Father? The unlimited Father says: For half the cycle, you have been floundering in the gutter of poison. This is the depths of hell. You have been floundering for 63 births, so now make a promise: Baba, I too will go to the pure world and claim my inheritance of happiness. However, some do not have the courage. This is the Mansarovar Lake of knowledge. By bathing in this knowledge, human beings become angels of heaven. The people of Bharat create temples to Lakshmi and Narayan etc., but they don’t know when they came, and so that is blind faith. The Father has now come to make you children like Himself, master oceans of knowledge. A barrister teaches his pupils and makes them like himself. Then they all pass, numberwise, according to their efforts. Similarly this, too, is a study. The aim and objective has been clearly written. There is also the image of Shiv Baba. However, people don’t understand anything. They sing: O Purifier, Sita Ram! This is the community of Ravan. This is why the Father says: Examine your face and see if you have become 16 celestial degrees full, completely viceless. Do you have the faith that you are a soul? Who is the Father of you, the soul? If you don’t know Him, you are an atheist. In that case, how can you, an atheist, marry Lakshmi or Narayan? You understand that you definitely belonged to the community of monkeys and that you are now becoming worthy of marrying Shri Narayan. The Father says: I have come to liberate you from the kingdom of Maya, Ravan. Then, you will no longer need to burn an effigy of Ravan. This is something to be understood. The more effort you make, the better the inheritance you will claim. Baba can tell you what you will become according to your present efforts. Nowadays, the death of human beings is very cheap. There, when your lifespan ends, you will know straightaway that you have to shed that body and take a new one. When new souls come down, they are praised a great deal at first. Then the praise gradually decreases. Everyone has to pass through the stages of sato, rajo and tamo. Baba comes and makes you satopradhan. It is a wonder that five and a half billion souls have received their own imperishable parts which can never be destroyed. Souls are such tiny points and yet they have entire, imperishable parts contained within them. This is called the wonder of nature. New ones cannot understand these things. These are very deep matters. Shiva’s form has been shown in this way. If we were to change His form, people would say that our views are different from those of the rest of the world. You are now listening to new things for the new world. Then, after a cycle, it is you who will come to listen again. Therefore, the Father, the Purifier, made you make a promise and those who made this promise became the masters of heaven. This is why this festival is celebrated. You are true Brahmins. Saraswati has been remembered as the highest Brahmin. Achcha.
 
To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.
 
Essence for Dharna:
 
1. End your old account of sin and accumulate a new account of charity. Stay in remembrance and make the atmosphere peaceful.
 
2. Make a promise to remain pure and tie a true rakhi on everyone to become pure.
 
Blessing:
 
May you remain safe in all respects by remaining merged in the one Father’s love and become Maya-proof.
 
The children who remain merged in the one Father’s love easily remain distant from all the vibrations and atmosphere everywhere because to remain merged means to be powerful, the same as the Father, and to be safe in all respects. To remain absorbed means to be merged. Those who remain merged are Maya-proof. This is easy effort, but you must not become careless in the name of easy effort. The consciences of those who are careless effort-makers bite internally and externally, they sing songs of their own praise.
 
Slogan:Remain stable in the position of an ancestor and you will be liberated from the bondages of Maya and matter.

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