Published by – Bk Ganapati
Category - Religion, Ethics , Spirituality & New Age & Subcategory - BK-Murali
Summary - Satya Shree Trimurti Shiv Bhagawanubach Shrimad Bhagawat Geeta. Month - JANUARY 2018 ( Daily Murali - Brahmakumaris - Magic Flute )
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Details ( Page:- Murali 01-Jan-2018 )
HINGLISH SUMMARY 

- 01.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban

Mithe bacche -Marjiva bane ho to sab kuch bhool jao,ek Baap jo soonate hain,wohi suno aur Baap ko yaad akro,tumhi sang baithun.
Q-Sadgati data Baap baccho ki sadgati ke liye kaun si shikasha dete hain?
A- Baba kehte-bacche sadgati me jane ke liye asariri ban Baap aur chakra ko yaad akro.Yog se tum ever healthy,nirogi ban jayenge.Fir tumhe koi bhi karm kutne nahi padenge.
Q- Jinki takdeer me Swarg ke sukh nahi hai,unki nishaani kya hogi?
A-Woh gyan soonne ke liye kahenge humare paas furshat he nahi hai.Wo kabhi Brahman kul ke bhati nahi banenge.Unhe pata he nahi padega ki Bhagwan bhi kisi roop me kabhi aate hain.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1)Tibra purusharth ke liye yaad ka chart zaroor rakhna hai.Roz aaine me apna munh dekhna hai.Check karna hai-hum most beloved Baap ko kitna samay yaad karte hain.
2)Jo kuch padha hai woh bhi bhool chup rehna hai.Mukh se kuch bhi kehna nahi hai.Baap ki yaad se bikarm binash karne hain.
Vardan:-Brahma Baap ke kadam par kadam rakh had ko behad me samaane wale Behad ke Badshahi bhava.
Slogan:- Apne khyalat aalishaan bana lo to chhoti-chhoti baaton me time waste nahi jayega.
English Summary -01-01-2018-

Sweet children, since you have died a living death, you have to forget everything. Only listen to what the one Father explains and remember the Father: “I sit with You alone…”
Q- What teachings are given by the Father, the Bestower of Salvation, for the salvation of you children?
A- Baba says: Children, in order to attain salvation, become bodiless and remember the Father and the cycle. Through this yoga you will become ever healthy and free from disease and you will not have to repent for any of your actions.
 
Q- What is the sign of those who do not receive the fortune of the happiness of heaven?
A- When it comes to listening to knowledge, they say that they don’t have time. They will never become members of the Brahmin clan. They will also never even know that God comes in a certain form.
Essense of dharna
 1. In order to make your efforts fast, it is essential to keep a chart of remembrance. Everyday look at your face in the mirror and check: How long do I remember the most beloved Father?
2.Forget everything you have studied and remain silent. There is no need to say anything. Have your sins absolved by having remembrance of the Father.
Blessing- May you be an emperor of the unlimited and merge anything limited into the unlimited by placing your steps in Father Brahma’s footsteps.
--To follow the father means to merge “mine” into “Yours”, to merge anything limited into the unlimited. There is now a need to take these steps. Everyone’s thoughts, words and methods of service have to be experienced to be unlimited. For self-transformation, finish all trace of anything limited. Whomever you see and whoever sees you, let there be the intoxication of being an emperor of the unlimited. There may be centres, there may be service but let there not be any name or trace of anything limited for only then will you claim the throne of the kingdom of the world.
Slogan- Make your thoughts royal and beautiful and your time will not be wasted in trivial matters.
HINDI DETAIL MURALI

01/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे - मरजीवा बने हो तो सब कुछ भूल जाओ, एक बाप जो सुनाते हैं, वही सुनो और बाप को याद करो, तुम्हीं संग बैठूँ
 प्रश्न:सद्गति दाता बाप बच्चों की सद्गति के लिए कौन सी शिक्षा देते हैं?
उत्तर:
बाबा कहते - बच्चे सद्गति में जाने के लिए अशरीरी बन बाप और चक्र को याद करो। योग से तुम एवरहेल्दी, निरोगी बन जायेंगे। फिर तुम्हें कोई भी कर्म कूटने नहीं पड़ेंगे।
प्रश्न:जिनकी तकदीर में स्वर्ग के सुख नहीं हैं, उनकी निशानी क्या होगी?
उत्तर:
वह ज्ञान सुनने के लिए कहेंगे हमारे पास फुर्सत ही नहीं है। वो कभी ब्राह्मण कुल के भाती नहीं बनेंगे। उन्हें पता ही नहीं पड़ेगा कि भगवान भी किसी रूप में कभी आते हैं।
 
गीत:-तुम्हारे बुलाने को जी चाहता है...  ओम् शान्ति। 
भगवान बैठ भक्तों को समझाते हैं। भक्त हैं भगवान के बच्चे। सभी हैं भक्त, बाप है एक। तो बच्चे चाहते हैं एक जन्म तो बाप के साथ भी रहकर देखें। देवताओं से भी बहुत जन्म बीते। आसुरी सम्प्रमदाय के साथ भी बहुत जन्म बीते। अब भक्तों की दिल होती है - एक जन्म तो भगवान के बनकर भगवान के साथ रहकर देखें। अभी तुम भगवान के बने हो, मरजीवा बने हो तो भगवान के साथ रहते हो। यह जो अमूल्य अन्तिम जीवन है इसमें तुम परमपिता परमात्मा के साथ रहते हो। गायन भी है - तुम्हीं से खाऊं, तुम्हीं से बैठूँ, तुम्हीं से सुनूँ...। जो मरजीवा बनते हैं उनके लिए यह जन्म साथ रहना होता है। यह एक ही है ऊंचे ते ऊंचा जन्म। बाप भी एक ही बार आते हैं, फिर तो कभी आ नहीं सकेंगे। एक ही बार आकर बच्चों की सर्व कामनायें पूर्ण कर लेते हैं। भक्तिमार्ग में मांगते बहुत हैं। साधू-सन्त, महात्माओं, देवी-देवताओं आदि से आधाकल्प से माँगते रहते हैं और दूसरा जप, तप, दान, पुण्य आदि भी जन्म बाई जन्म करते ही आये हैं। कितने शास्त्र पढ़ते हैं। अनेकानेक शास्त्र मैगजीन आदि बनाते थकते ही नहीं। समझते हैं इनसे ही भगवान मिलेगा, परन्तु अब बाप खुद कहते हैं - तुम जन्म-जन्मान्तर जो कुछ पढ़े हो और अब यह जो कुछ शास्त्र आदि पढ़ते हो, इनसे कोई मेरी प्राप्ति नहीं होगी। बहुत किताब आदि हैं। क्रिश्चियन लोग भी कितना सीखते हैं। अनेक भाषाओं में बहुत कुछ लिखते ही रहते हैं। मनुष्य पढ़ते ही रहते हैं। अब बाप कहते हैं जो कुछ पढ़े हो वह सब भूल जाओ अथवा बुद्धि से मार दो। बहुत किताब पढ़ते हैं। किताबों में है फलाना भगवान है, फलाना अवतार है। अब बाप कहते हैं मैं खुद आता हूँ, तो जो मेरे बनते हैं उनको मैं कहता हूँ इन सबको भूल जाओ। सारे दुनिया की और तुम्हारी बुद्धि में जो बात नहीं थी, वह अब मैं तुमको सुनाता हूँ। अब तुम बच्चे समझते हो बरोबर बाबा जो समझाते हैं वह कोई शास्त्र आदि में है नहीं। बाप बहुत गुह्य और रमणीक बातें समझाते हैं। ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त, रचता और रचना का सारा समाचार तुमको सुनाते हैं। फिर भी कहते हैं अच्छा जास्ती नहीं तो दो अक्षर ही याद करो - मनमनाभव, मध्याजी भव। यह अक्षर तो भक्तिमार्ग की गीता के हैं, परन्तु बाप इसका अर्थ अच्छी रीति समझाते हैं। भगवान ने तो सहज राजयोग सिखाया है, कहते हैं सिर्फ मुझ बाप को याद करो। भक्ति में भी बहुत याद करते थे। गाते भी हैं दु:ख में सुमिरण सब करें.. फिर भी कुछ समझते नहीं। जरूर सतयुग त्रेता में सुख की दुनिया है तो याद क्यों करेंगे? अब माया के राज्य में दु:ख होता है तब बाप को याद करना होता है और फिर सतयुग में अथाह सुख भी याद आता है। उस सुख की दुनिया में वही थे, जिन्होंने बाप से संगमयुग पर राजयोग और ज्ञान सीखा था। बच्चों में देखो - हैं कैसे अनपढ़। उन्हों के लिए तो और ही अच्छा है, क्योंकि कहाँ भी बुद्धि जाती नहीं है। यहाँ तो सिर्फ चुप रहना है। मुख से भी कुछ नहीं कहना है। सिर्फ बाबा को याद करते रहो तो विकर्म विनाश होंगे। फिर साथ ले जाऊंगा। यह बातें कुछ न कुछ गीता में हैं। प्राचीन भारत का धर्म शास्त्र है ही एक। यही भारत नया था, अब पुराना हुआ है। शास्त्र तो एक ही होगा ना। जैसे बाइबिल एक है, जब से क्रिश्चियन धर्म स्थापन हुआ है तो अन्त तक उनका शास्त्र एक ही है। क्राइस्ट की भी बहुत महिमा करते हैं। कहते हैं उसने पीस स्थापन की। अब उसने तो आकर क्रिश्चियन धर्म की स्थापना की, उसमें पीस की तो बात ही नहीं। जो आते हैं उनकी महिमा करते रहते हैं क्योंकि अपनी महिमा को भूले हुए हैं। बौद्ध, क्रिश्चियन आदि अपने धर्म को छोड़ औरों की महिमा नहीं करेंगे। भारतवासियों का अपना धर्म तो है ही नहीं। यह भी ड्रामा में नूँधा हुआ है। जब बिल्कुल ही नास्तिक बन जाते हैं तब ही फिर बाप आते हैं।
बाप समझाते हैं बच्चे स्कूलों आदि में जो किताबें पढ़ाई जाती हैं उनमें फिर भी एम-आबजेक्ट है। फायदा है, कमाई होती है। मर्तबा मिलता है। बाकी शास्त्र आदि जो पढ़ते हैं, उसको अन्धश्रद्धा कहा जाता है। पढ़ाई को कभी भी अन्धश्रद्धा नहीं कहेंगे। ऐसे नहीं कि अन्धश्रद्धा से पढ़ते हैं। पढ़ाई से बैरिस्टर, इन्जीनियर आदि बनते हैं, उसको अन्धश्रद्धा कैसे कहेंगे। यह भी पाठशाला है। यह कोई सतसंग नहीं। लिखा है ईश्वरीय विश्व विद्यालय। तो समझना चाहिए जरूर ईश्वर का बहुत भारी विद्यालय होगा। सो भी विश्व के लिए है। सभी को पैगाम भी देना है कि देह सहित सभी धर्मो को छोड़ अपने स्वधर्म में टिको, फिर अपने बाप को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। अपना चार्ट लिखना है, कितना समय हम योग में रहते हैं। ऐसे नहीं हर एक रेगुलर चार्ट लिखेंगे। नहीं, थक जाते हैं। वास्तव में क्या करना है? रोज़ अपना मुँह आइने में देखना है, तो पता पड़ेगा कि हम लक्ष्मी को वा सीता को वरने लायक हैं वा प्रजा में चले जायेंगे? पुरुषार्थ तीव्र कराने के लिए चार्ट लिखने को कहा जाता है और देख भी सकते हैं कि हमने कितना समय शिवबाबा को याद किया? सारी दिनचर्या सामने आ जाती है। जैसे छोटेपन से लेकर सारे आयु की जीवन याद रहती है ना! तो क्या एक दिन का याद नहीं पड़ेगा। देखना है हम बाबा को और चक्र को कितना समय याद करते हैं? ऐसी प्रैक्टिस करने से रूद्र माला में पिरोने के लिए दौड़ी जल्द पहनेंगे। यह है योग की यात्रा, जिसको और कोई जानते नहीं तो सिखा कैसे सकते। तुम जानते हो अब बाबा के पास लौटना है। बाबा का वर्सा है ही राजाई इसलिए इस पर नाम पड़ा है राजयोग।
तुम सब राजऋषि हो। वह हैं हठयोग ऋषि। वह भी पवित्र रहते हैं। राजाई में तो राजा रानी प्रजा सब चाहिए। सन्यासियों में तो राजा रानी हैं नहीं। उन्हों का है हद का वैराग्य, तुम्हारा है बेहद का वैराग्य। वह घरबार छोड़ फिर भी इस विकारी दुनिया में ही रहते हैं। तुम्हारे लिए तो इस दुनिया के बाद फिर है स्वर्ग, दैवी बगीचा। तो वही याद पड़ेगा। यह बात तुम बच्चे ही बुद्धि में रख सकते हो। बहुत हैं जो चार्ट लिख भी नहीं सकते। चलते-चलते थक पड़ते हैं। बाबा कहते हैं - बच्चे अपने पास नोट करो कि कितना समय मोस्ट बिलवेड बाबा को याद किया? जिस बाप की याद से ही वर्सा लेना है। जब राजाई का वर्सा लेना है तो प्रजा भी बनानी है। बाबा स्वर्ग का रचयिता है तो उनसे क्यों नहीं स्वर्ग का वर्सा मिलना चाहिए। बहुत हैं जिनको स्वर्ग का वर्सा मिलता है। बाकी को शान्ति मिलती है। बाप सभी को कहते हैं बच्चे देह सहित देह के सभी सम्बन्धों को भूलो। तुम अशरीरी आये थे, 84 जन्म भोगे अब फिर अशरीरी बनो। क्रिश्चियन धर्म वालों को भी कहेंगे तुम क्राइस्ट के पिछाड़ी आये हो। तुम भी बिगर शरीर आये थे, यहाँ शरीर लेकर पार्ट बजाया, अब तुम्हारा भी पार्ट पूरा होता है। कलियुग का अन्त आ गया है। अब तुम बाप को याद करो, मुक्तिधाम वाले सुनकर बहुत खुश होंगे। वह चाहते ही मुक्ति हैं। समझते हैं जीवनमुक्ति (सुख) पाकर फिर भी तो दु:ख में आयेंगे, इससे तो मुक्ति अच्छी। यह नहीं जानते कि सुख तो बहुत है। हम आत्मायें परमधाम में बाप के साथ रहने वाली हैं। परन्तु परमधाम को अब भूल गये हैं। कहते हैं बाप आकर सभी मैसेन्जर्स को भेजते हैं। वास्तव में कोई भेजता नहीं है। यह सब ड्रामा बना हुआ है। हम तो सारे ड्रामा को जान गये हैं। तुम बच्चों की बुद्धि में बाप और चक्र याद है, तो तुम चक्रवर्ती राजा अवश्य बनेंगे। मनुष्य तो समझते हैं यहाँ दु:ख बहुत है इसलिए मुक्ति चाहते हैं। यह दो अक्षर गति और सद्गति चले आते हैं। परन्तु इनका अर्थ कोई भी नहीं जानते। तुम बच्चे जानते हो सबका सद्गति दाता एक बाप ही है, बाकी सब पतित हैं। दुनिया ही सारी पतित है। इन अक्षरों पर भी कोई-कोई बिगड़ते हैं। बाप कहते हैं इस शरीर को भूल जाओ। तुमको अशरीरी भेजा था। अब भी अशरीरी होकर मेरे साथ चलना है। इसको नॉलेज अथवा शिक्षा कहा जाता है। इस शिक्षा से ही सद्गति होती है। योग से तुम एवरहेल्दी बनते हो। तुम सतयुग में बहुत सुखी थे। कोई चीज़ की कमी नहीं थी। दु:ख देने वाला कोई विकार नहीं था। मोहजीत राजा की कथा सुनाते हैं। बाबा कहते हैं मैं तुमको ऐसे कर्म सिखाता हूँ, जो तुमको कभी कर्म कूटने नहीं पड़ेंगे। वहाँ ऐसी ठण्डी भी नहीं होगी। अभी तो 5 तत्व भी तमोप्रधान हैं। कभी बहुत गर्मी, कभी बहुत ठण्डी। वहाँ ऐसी आपदायें होती नहीं। सदैव बसन्त ऋतु रहती है। नेचर सतोप्रधान है। अभी नेचर तमोप्रधान है। तो अच्छे आदमी कैसे हो सकते। इतने बड़े-बड़े भारत के मालिक सन्यासियों के पीछे फिरते रहते हैं। उनके पास बच्चियां जाती हैं तो कहते हैं फुर्सत नहीं। इससे समझ जाते हैं कि इनकी तकदीर में स्वर्ग के सुख नहीं हैं। ब्राह्मण कुल के भाती बनते ही नहीं, इनको पता ही नहीं कि भगवान कैसे और कब यहाँ आते हैं! शिव जयन्ती मनाते हैं परन्तु शिव को सभी भगवान नहीं समझते हैं। अगर उनको परमपिता परमात्मा समझते तो शिव जयन्ती के दिन हालीडे मनाते। बाप कहते हैं मेरा जन्म भी भारत में होता है। मन्दिर भी यहाँ हैं। जरूर किसी शरीर में प्रवेश किया होगा। दिखाते हैं दक्ष प्रजापति ने यज्ञ रचा। तो क्या उसमें आया होगा! ऐसे भी नहीं कहते। कृष्ण तो होता ही है सतयुग में। बाप खुद कहते हैं मुझे ब्रह्मा मुख द्वारा ब्राह्मण वंशावली रचनी है। कोई को यह भी तुम समझा सकते हो, बाबा कितना सहज समझाते हैं सिर्फ याद करो। परन्तु माया इतनी प्रबल है जो याद करने नहीं देती। आधाकल्प की दुश्मन है। इस दुश्मन पर ही जीत पानी है। भक्ति मार्ग में मनुष्य ठण्डी में स्नान करने जाते हैं। कितने धक्के खाते हैं। दु:ख सहन करते हैं। यहाँ तो पाठशाला है, पढ़ना है, इसमें धक्के खाने की तो कोई बात ही नहीं। पाठशाला में ब्लाइन्ड फेथ की तो बात नहीं। मनुष्य तो बहुत ब्लाइन्ड फेथ में फंसे हुए हैं। कितने गुरू आदि करते हैं। परन्तु मनुष्य तो कभी मनुष्य की सद्गति कर नहीं सकते। जो भी मनुष्यों को गुरू बनाते हैं, वह ब्लाइन्डफेथ हुआ ना। आजकल छोटे बच्चों को भी गुरू कराते हैं। नहीं तो कायदा है वानप्रस्थ में गुरू करने का। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) तीव्र पुरुषार्थ के लिए याद का चार्ट जरूर रखना है। रोज़ आइने में अपना मुँह देखना है। चेक करना है - हम मोस्ट बिलवेड बाप को कितना समय याद करते हैं!
2) जो कुछ पढ़ा है वह भी भूल चुप रहना है। मुख से कुछ भी कहना नहीं है। बाप की याद से विकर्म विनाश करने हैं।
 वरदान:ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रख हद को बेहद में समाने वाले बेहद के बादशाह भव
फालो फादर करना अर्थात् मेरे को तेरे में समाना, हद को बेहद में समाना, अभी इस कदम पर कदम रखने की आवश्यकता है। सबके संकल्प, बोल, सेवा की विधि बेहद की अनुभव हो। स्व-परिवर्तन के लिए हद को सर्व वंश सहित समाप्त करो, जिसको भी देखो वा जो भी आपको देखे - बेहद के बादशाह का नशा अनुभव हो। सेवा भी हो, सेन्टर्स भी हों लेकिन हद का नाम निशान न हो तब विश्व के राज्य का तख्त प्राप्त होगा।
 स्लोगन:अपने ख्यालात आलीशान बना लो तो छोटी-छोटी बातों में टाइम वेस्ट नहीं जायेगा।

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Details ( Page:- Murali 02-Jan-2018 )
HINGLISH SUMMARY 
- 02.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche -Tumhara yah marjiva janm hai,tum Ishwar Baap se varsha le rahe ho,tumhe bahut badi lottery mili hai,isiliye apaar khushi me rehna hai.
Q-Apne aapko kaun si samjhani do to chinta samapt ho jayegi?Ghussa chala jayega?
A- Hum ishwar ki santan hai,hume to Baap samaan mitha banna hai.Jaise Baba mithe roop se samjhani dete,ghussa nahi karte.Aise hume bhi aapas me mitha rehna hai.Loonpani nahi hona hai kyunki jaante hain jo second pass hua,woh drama me part tha.Chinta kis baat ki kare.Aise-aise apne aapko samjhao to chinta khatm ho jayegi.Ghussa bhaag jayega.
 Dharana ke liye mukhya saar:-
1)Apni chalan wa Devi goono se Baap ka naam bala karna hai.Aashuri avgoon nikaal dene hain.
2)Is purani jadjadibhoot sarir me mamatwa nahi rakhna hai.Naye Satyugi sarir ko yaad karna hai.Pavitrata ki gupt madad karni hai.
Vardan:-Baap ke har direction wa kayde se fayda lene wale Maryada Purushottam bhava.
Slogan:-Jinke paas santoostta ka bishesh goon hai unke paas sarv goon swatah aate jayenge. 
ENGLISH SUMMARY – 02/01/18

 Sweet children, this is the birth in which you have died alive. You are claiming your inheritance from God, the Father. You have won a huge lottery. Therefore, remain in limitless happiness.
Question:What should you explain to yourself in order to end all your worrying and finish your anger?
Answer:
I am a child of God. I have to become as sweet as the Father.Just as Baba explains in a sweet way and doesn't get angry, in the same way, I must be very sweet with others and not become like salt water, because I understand that every second that passes is part of the drama. Therefore, what is there to worry about?" Talk to yourself in this way and your worrying will end and your anger will disappear.
Song:This time of spring is the time to enjoy and forget the world.Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1) Glorify the Father's name with your behaviour and divine virtues. Remove devilish defects.
2) Don't have attachment to your old, decayed body. Remember your new body of the golden age and give incognito help by remaining pure.
 
Blessing:May you be a most elevated being who follows the highest code of conduct and who takes benefit from every direction and law of the Father.
It is said: To the extent that you follow the law, accordingly, you benefit. Therefore, do not step away from any of the laws from amrit vela onwards that have been created. The study, amrit vela, service "“ whatever timetable has been created, even if your mind cannot focus on it, do not miss anything of the timetable. Devotees definitely follow the disciplines and definitely go to a temple even if they don't feel like it. You, yourselves, are lawmakers. Therefore, continue to follow every discipline and from this experience you will become the highest beings who follow the highest code of conduct.
Slogan:All virtues will automatically keep coming to those who have the special virtue of contentment.
 
HINDI DETAIL MURALI

02/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - तुम्हारा यह मरजीवा जन्म है, तुम ईश्वर बाप से वर्सा ले रहे हो, तुम्हें बहुत बड़ी लाटरी मिली है, इसलिए अपार खुशी में रहना है"
प्रश्न:अपने आपको कौन सी समझानी दो तो चिन्ता समाप्त हो जायेगी? गुस्सा चला जायेगा?
उत्तर:
हम ईश्वर की सन्तान हैं, हमें तो बाप समान मीठा बनना है। जैसे बाबा मीठे रूप से समझानी देते, गुस्सा नहीं करते। ऐसे हमें भी आपस में मीठा रहना है। लूनपानी नहीं होना है क्योंकि जानते हैं जो सेकेण्ड पास हुआ, वह ड्रामा में पार्ट था। चिन्ता किस बात की करें। ऐसे-ऐसे अपने आपको समझाओ तो चिन्ता खत्म हो जायेगी। गुस्सा भाग जायेगा।
 
गीत:-यही बहार है...  ओम् शान्ति।
यह है ईश्वरीय सन्तान की खुशियों का गायन। तुम इतना खुशी का गायन सतयुग में नहीं कर सकेंगे। अभी तुमको खजाना मिल रहा है। यह है बड़े से बड़ी लाटरी। जब लाटरी मिलती है तो खुशी होती है। तुम फिर इस लाटरी से जन्म-जन्मान्तर स्वर्ग में सुख भोगते रहते हो। यह है तुम्हारा मरजीवा जन्म। जो जीते जी मरते नहीं, उनका मरजीवा जन्म नहीं कहेंगे। उन्हों को तो खुशी का पारा भी चढ़ नहीं सकता। जब तक मरजीवा नहीं बने हैं अर्थात् बाप को अपना नहीं बनाया है, तब तक पूरा वर्सा भी मिल नहीं सकता। जो बाप के बनते हैं, जो बाप को याद करते हैं उनको बाप भी याद करते हैं। तुम हो ईश्वरीय सन्तान। तुम्हें नशा है कि हम ईश्वर बाप से वर्सा अथवा वर ले रहे हैं, जिसके लिए भक्त लोग भक्ति मार्ग में धक्का खाते रहते हैं। बाप से मिलने के लिए अनेकानेक उपाय करते हैं। कितने वेद, शास्त्र, मैगज़ीन आदि अथाह पढ़ते रहते हैं। परन्तु दुनिया तो दिन प्रतिदिन दु:खी ही होती जाती है, इनको तमोप्रधान होना ही है। यह बबुल ट्री है ना। बबुलनाथ फिर आकर काँटों से फूल बनाते हैं। कॉटे बहुत बड़े-बड़े हो गये हैं। बड़े जोर से लगते हैं। उसको अनेक प्रकार के नाम दिये हुए हैं। सतयुग में तो होते नहीं। बाप समझाते हैं - यह है कॉटों की दुनिया। एक दो को दु:ख देते रहते हैं। घर में बच्चे भी ऐसे कपूत निकल पड़ते हैं जो बात मत पूछो। माँ-बाप को बहुत दु:खी करते हैं। सभी कोई एक समान भी नहीं होते। सबसे जास्ती दु:ख देने वाला कौन है? मनुष्य यह नहीं जानते। बाप कहते हैं इन गुरूओं ने परमात्मा की महिमा गुम कर दी है। हम तो उनकी बहुत महिमा करते हैं। वह परम पूज्य परमपिता परमात्मा है। शिव का चित्र भी बहुत अच्छा है। परन्तु बहुत लोग ऐसे हैं जो मानेंगे नहीं कि शिव कोई ऐसा ज्योर्तिबिन्दु है क्योंकि वह तो आत्मा सो परमात्मा कह देते हैं। आत्मा अति सूक्ष्म है जो भ्रकुटी के बीच में बैठी है, फिर परमात्मा इतना बड़ा आकार वाला कैसे हो सकता है? बहुत विद्वान, आचार्य लोग बी.के. पर हँसी उड़ाते हैं कि परमात्मा का ऐसा रूप तो हो नहीं सकता। वह तो अखण्ड ज्योतिर्मय तत्व हजारों सूर्यों से भी तेजोमय है। वास्तव में यह रॉग है। इनकी राइट महिमा तो बाप खुद ही बताते हैं। वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। यह सृष्टि एक उल्टा झाड़ है। सतयुग, त्रेता में उनको कोई याद नहीं करते। मनुष्य को जब दु:ख होता है तब उनको याद करते हैं - हे भगवान, हे परमपिता परमात्मा रहम करो। सतयुग, त्रेता में तो कोई रहम माँगने वाला होता नहीं। वह है बाप रचयिता की नई रचना। इस बाप की महिमा ही अपरमअपार है। ज्ञान का सागर, पतित-पावन है। ज्ञान का सागर है तो जरूर ज्ञान दिया होगा। वह सत, चित्, आनन्द स्वरूप है। चैतन्य है। ज्ञान तो चैतन्य आत्मा ही धारण करती है। समझो हम शरीर छोड़ जाते हैं तो आत्मा में ज्ञान के संस्कार तो हैं ही हैं। बच्चा बनेंगे तो भी वह संस्कार होंगे, परन्तु आरगन्स छोटे हैं तो बोल नहीं सकते। आरगन्स बड़े होते हैं तो याद कराया जाता है, तो स्मृति में आ जाता है। छोटे बच्चे भी शास्त्र आदि कण्ठ कर लेते हैं। यह सभी अगले जन्म के संस्कार हैं। अब बाप हमको अपना ज्ञान का वर्सा देते हैं। सारे सृष्टि का ज्ञान इनके पास है क्योंकि बीजरूप है। हम अपने को बीजरूप नहीं कहेंगे। बीज में जरूर झाड़ के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान होगा ना। तो बाप खुद कहते हैं मैं हूँ सृष्टि का बीजरूप। इस झाड़ का बीज ऊपर है। वह बाप सत् चित आनन्द स्वरूप, ज्ञान का सागर है। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ही उसमें ज्ञान होगा। नहीं तो क्या होगा! क्या शास्त्रों का ज्ञान होगा? वह तो बहुतों में है। परमात्मा की तो जरूर कोई नई बात होगी ना। जो कोई भी विद्वान आदि नहीं जानते। कोई से भी पूछो - इस सृष्टि रूपी झाड़ की उत्पत्ति, पालना, संघार कैसे होता है, इनकी आयु कितनी है, यह कैसे वृद्धि को पाता है... बिल्कुल कोई नहीं समझा सकता है।
 
एक गीता ही है सर्व शास्त्रमई शिरोमणी, बाकी तो सब हैं उनके बाल बच्चे। जबकि गीता पढ़ने से भी कुछ नहीं समझते तो बाकी शास्त्र पढ़ने से फ़ायदा ही क्या? वर्सा तो फिर भी गीता से मिलना है। अब बाप सारे ड्रामा का राज़ समझाते हैं। बाप पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बनाए पारसनाथ बनाते हैं। अब तो सब पत्थरबुद्धि, पत्थरनाथ हैं। परन्तु वह अपने को बड़े-बड़े टाइटिल्स देकर अपने को पारसबुद्धि समझ बैठे हैं। बाप समझाते हैं मेरी महिमा सबसे न्यारी है। मैं ज्ञान का सागर, आनंद का सागर, सुख का सागर हूँ। ऐसी महिमा तुम देवताओं की नहीं कर सकते। भक्त लोग देवताओं के आगे जाकर कहेंगे आप सर्वगुण सम्पन्न... हैं। बाप की तो एक ही महिमा है। वह भी हम जानते हैं। अभी हम मन्दिर में जायेंगे तो बुद्धि में पूरा ज्ञान है कि इन्होंने तो पूरे 84 जन्म लिये होंगे। अभी अपने को कितनी खुशी है। आगे थोड़ेही यह ख्याल आता था। अभी समझते हैं हमको ऐसा बनना है। बुद्धि में बहुत परिवर्तन आ जाता है।
 
बाप बच्चों को समझाते हैं - आपस में बहुत मीठे बनो। लूनपानी मत बनो। बाबा कभी भी किससे गुस्सा करता है क्या? बड़े मीठे रूप से समझानी देते हैं। एक सेकण्ड पास हुआ कहेंगे यह भी ड्रामा में पार्ट था। इसकी चिंता क्या करनी है। ऐसे-ऐसे अपने को समझाना है। तुम ईश्वरीय सन्तान कम थोड़ेही हो। यह तो समझ सकते हो कि ईश्वरीय सन्तान जरूर ईश्वर के पास रहते होंगे। ईश्वर निराकार है तो उसकी सन्तान भी निराकार हैं। वही सन्तान यहाँ चोला लेकर पार्ट बजाती है। स्वर्ग में मनुष्य हैं देवी-देवता धर्म के। अगर सबका बैठ हिसाब निकालें तो कितना माथा मारना पड़े। परन्तु समझ सकते हैं कि नम्बरवार समय अनुसार थोड़े-थोड़े जन्म मिलते होंगे। आगे तो समझते थे मनुष्य कुत्ता बिल्ली बनते हैं। अभी तो बुद्धि में रात दिन का फ़र्क आ गया है। यह सब हैं धारणा करने की बातें। नटशेल में समझाते हैं कि अब 84 जन्म का चक्र पूरा हुआ। अभी इस छी-छी शरीर को छोड़ना है। यह सबका पुराना जड़जड़ीभूत, तमोप्रधान शरीर है, इससे ममत्व मिटा देना है। पुराने शरीर को याद क्या करें। अब तो अपने नये शरीर को याद करेंगे, जो मिलना है सतयुग में। वाया मुक्तिधाम होकर सतयुग में आयेंगे। हम जीवनमुक्ति में जाते हैं और सब मुक्तिधाम में चले जाते हैं। इसको जयजयकार कहा जाता है, हाहाकार के बाद जयजयकार होना है। इतने सब मरेंगे कोई तो निमित्त कारण बनेगा। नैचुरल कैलेमिटीज़ होंगी। सिर्फ सागर ही थोड़ेही सभी खण्डों को खलास करेगा। सब कुछ खलास तो होना ही है। बाकी भारत अविनाशी खण्ड रह जाता है क्योंकि यह है शिवबाबा का बर्थ प्लेस। तो यह हो गया सबसे बड़ा तीर्थ स्थान। बाप सबकी सद्गति करते हैं, यह कोई मनुष्य नहीं जानते हैं। उन्हों को न जानना ही ड्रामा में नूँध है। तब तो बाप कहते हैं कि हे बच्चे तुम कुछ नहीं जानते थे, मैं ही तुमको रचता और रचना अथवा मनुष्य सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का सारा भेद समझाता हूँ। जिसको ऋषि मुनि भी बेअन्त, बेअन्त कहकर गये हैं। यह थोड़ेही समझते हैं कि सारी दुनिया के 5 विकार बड़े भारी दुश्मन हैं। जिस रावण को भारतवासी वर्ष-वर्ष जलाते ही आते हैं। उसको जानते कोई नहीं क्योंकि वह न जिस्मानी है, न रूहानी है। विकारों का तो कोई रूप ही नहीं है। मनुष्य एक्ट में आता है तब पता पड़ता है कि इनमें काम का, क्रोध का भूत आया है। इस विकार की स्टेज में भी उत्तम, मध्यम, कनिष्ट होते हैं। कोई में काम का नशा एकदम तमोप्रधान हो जाता है, कोई को रजो नशा, कोई को सतो नशा रहता है। कोई तो बाल ब्रह्मचारी भी रहते हैं। समझते हैं यह भी एक झंझट है सम्भालना। सबसे अच्छा उनको कहेंगे। सन्यासियों में भी बाल ब्रह्मचारी अच्छे गिने जाते हैं। गवर्मेन्ट के लिए भी अच्छा है, बच्चों की वृद्धि नहीं होगी। पवित्रता की ताकत मिलती है। यह हुई गुप्त। सन्यासी भी पवित्र रहते हैं, छोटे बच्चे भी पवित्र रहते हैं, वानप्रस्थी भी पवित्र रहते हैं। तो पवित्रता का बल मिलता ही आता है। उन्हों का भी कायदा चला आता है कि बच्चे को इतनी आयु तक पवित्र रहना है। तो वह भी बल मिलता है। तुम हो सतोप्रधान पवित्र। यह अन्तिम जन्म तुम बाप से प्रतिज्ञा करते हो। तुम सतयुग की स्थापना करने वाले हो। जो करेगा सो पवित्र दुनिया का मालिक बनेगा, नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार।
 
यह है ईश्वरीय कुटुम्ब। ईश्वर के साथ हम रहते हैं कल्प में एक बार। बस फिर दैवी घराने में तो बहुत जन्म रहेंगे। यह एक जन्म ही दुर्लभ है। यह ईश्वरीय कुल है उत्तम से उत्तम। ब्राह्मण कुल सबसे ऊंची चोटी है। नीच ते नीच कुल से हम ऊंच ब्राह्मण कुल के हो गये। शिवबाबा जब ब्रह्मा को रचे तब तो ब्राह्मण रचे। कितनी खुशी रहती है, जो बाबा की सर्विस में रहते हैं। हम ईश्वर की औलाद बने हैं और ईश्वर की श्रीमत पर चलते हैं। अपनी चलन से उनका नाम बाला करते हैं। बाबा कहते हैं वह तो हैं आसुरी गुणों वाले, तुम दैवीगुणों वाले बन रहे हो। जब तुम सम्पूर्ण बन जायेंगे तो तुम्हारी चलन बहुत अच्छी हो जायेगी। बाबा कहेंगे यह हैं दैवी गुणों वाले, नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। आसुरी गुण वाले भी नम्बरवार हैं। बाल ब्रह्मचारी भी हैं। सन्यासी पवित्र रहते हैं सो तो बहुत अच्छा है। बाकी वह किसकी सद्गति तो कर नहीं सकते। अगर कोई गुरू लोग सद्गति करने वाले होते तो साथ ले जाते, परन्तु खुद ही छोड़कर चले जाते हैं। यहाँ यह बाप कहते हैं मैं तुमको साथ ले जाऊंगा। मैं आया ही हूँ तुमको साथ ले जाने के लिए। वह तो ले नहीं जाते। खुद ही गृहस्थियों के पास जन्म लेते रहते हैं। संस्कारों के कारण फिर सन्यासियों के झुण्ड में चले जाते हैं। नाम रूप तो हर जन्म में बदलता रहता है। यह अभी तुम बच्चे जानते हो कि सतयुग में यहाँ के पुरुषार्थ अनुसार पद होगा। वहाँ यह मालूम नहीं होगा कि हमने यह पद कैसे पाया। यह तो अभी पता है जिसने जैसे कल्प पहले पुरुषार्थ किया था, वैसा ही अब करेंगे। बच्चों को साक्षात्कार भी कराया हुआ है कि वहाँ शादी आदि कैसे होती है। बड़े-बड़े मैदान, बगीचे आदि होंगे। अब तो भारत में ही करोड़ों की आबादी है। वहाँ तो कुछ लाख ही रहते हैं। वहाँ थोड़ेही इतनी मंजिलों वाले मकान होंगे। यह अभी हैं क्योंकि जगह नहीं है। वहाँ इतनी सर्दी नहीं होगी। वहाँ दु:ख की निशानी भी नहीं है। न बहुत गर्मी होती, जो पहाड़ों पर जाना पड़े। नाम ही है स्वर्ग। इस समय मनुष्य कॉटों के जंगल में पड़े हैं। जितना सुख की चाहना करते हैं उतना दु:ख बढ़ता ही जाता है। अब बहुत दु:ख होगा। लड़ाई होगी तो खून की नदियाँ बहेंगी। अच्छा।
 
यह मुरली सब बच्चों के आगे सुनाई। सम्मुख सुनना नम्बरवन, टेप से सुनना नम्बर टू, मुरली से पढ़ना नम्बर थ्री। सतोप्रधान, सतो और रजो। तमो तो कहेंगे नहीं। टेप में हूबहू आती है। अच्छा!
 
बापदादा और मीठी माँ का सिकीलधे बच्चों को यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 धारणा के लिए मुख्य सार:
1) अपनी चलन वा दैवीगुणों से बाप का नाम बाला करना है। आसुरी अवगुण निकाल देने हैं।
2) इस पुराने जड़जड़ीभूत शरीर में ममत्व नहीं रखना है। नये सतयुगी शरीर को याद करना है। पवित्रता की गुप्त मदद करनी है।
 रदान:बाप के हर डायरेक्शन वा कायदे से फ़ायदा लेने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भव!
कहा जाता - जितना कायदा उतना फायदा, इसलिए अमृतवेले से जो भी कायदे बने हैं उनसे कभी किनारा नहीं करो। पढ़ाई, अमृतवेला, सेवा जो भी दिनचर्या बनी हुई है, उसमें मन नहीं भी लगे तो भी दिनचर्या में कुछ मिस नहीं करो। जैसे भक्त लोग नियम का पालन जरूर करते हैं, मन्दिर में मन नहीं भी लगे तो भी जायेंगे जरूर। आप तो स्वयं ला-मेकर्स हो, इसी अनुभव से हर नियम का पालन करते चलो तो मर्यादा पुरुषोत्तम बन जायेंगे।
 स्लोगन:जिनके पास सन्तुष्टता का विशेष गुण है उनके पास सर्व गुण स्वत: आते जायेंगे।

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Details ( Page:- Murali 03-JAN - 2018 )
HINGLISH SUMMARY - 03.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche -Buddhi ka yog Baap se lagate raho to lambi mushafiri ko sahaj he paar kar lenge.
Q-Baap par kurbaan jane ke liye kis baat ka tyag zaroori hai?
A-Deha-abhimaan ka.Deha-abhimaan aaya to mara,byavichari hua isiliye kurbaan hone me baccho ka hriday bidiran hota hai.Jab kurbaan ho gaye to us ek ki he yaad rahe.Un par he balihaar jana hai,unki he shrimat par chalna hai.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Yaad ki yatra me thakna nahi hai.Aise sachchi yaad ka abhyas karna hai jo ant samay me Baap ke sivaye koi bhi yaad na aaye.
2)Sachche Baap ki mat par chal sachchi kamayi karni hai.Apni manmat par nahi chalna hai.Satguru ki ninda kabhi bhi nahi karani hai.Kaam,krodh ke bas koi oolta kaam nahi karna hai.
 Vardan:-Swayang ko avtarit huye avtaar samajh sada oonchi sthiti me rehne wale Arsh Nivasi Farishta bhava.
Slogan-Swa-parivartan ke tibra purusharthi baccho ko he Baap ke duwaon ki mubarak milti hai.

ENGLISH SUMMARY - 03.01.18

Sweet children, continue to connect your intellects in yoga with the Father and you will complete the long journey with ease.
 
Question:What one thing do you have to renounce in order to sacrifice yourself to the Father?
Answer: Body consciousness. As soon as you become body conscious, you die and become adulterated. This is why some children's hearts shrink at the thought of surrendering themselves to Baba. Since you have sacrificed yourself, there should only be remembrance of that One. You have to sacrifice yourself to Him and only follow His shrimat.
 Song:O traveller of the night, do not become weary! The destination of dawn is not far off.  Om Shanti

 
Essence for Dharna:
1) Do not become weary of the pilgrimage of remembrance. Practise having true remembrance so that, at the end, you remember no one but the Father.
2) Follow the directions of the true Father and earn a true income. Don't follow the dictates of your own mind. Do not cause defamation of the Satguru. Do not perform wrong actions under the influence of lust or anger.
 Blessing:May you be an angel who resides in the subtle region and who remains in an constantly elevated stage by considering yourself to be an incarnation that has incarnated.
Just as the Father has incarnated, in the same way, you elevated souls have come down here from up above and incarnate in order to give the message. You are residents of the subtle region and the incorporeal world; the feet of your intellects cannot set foot on the earth, that is, on the mud of body consciousness. This is why the feet of angels are always shown in the sky. So, all of you are incarnations, who reside in the sky (subtle region), who remain in a constantly elevated stage. Continue to fly in the flying stage with this awareness.
 Slogan:Only the children who make intense effort for self-transformation can receive congratulations of the blessings from the Father.
HINDI DETAIL MURALI

03/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - बुद्धि का योग बाप से लगाते रहो तो लम्बी मुसाफिरी को सहज ही पार कर लेंगे"
प्रश्न:बाप पर कुर्बान जाने के लिए किस बात का त्याग जरूरी है?
उत्तर:देह-अभिमान का। देह-अभिमान आया तो मरा, व्यभिचारी हुआ इसलिए कुर्बान होने में बच्चों का हृदय विदीरण होता है। जब कुर्बान हो गये तो उस एक की ही याद रहे। उन पर ही बलिहार जाना है, उनकी ही श्रीमत पर चलना है।
 गीत:-रात के राही....  ओम् शान्ति।
भगवानुवाच - भगवान अपने बच्चों को राजयोग और ज्ञान सिखला रहे हैं। यह कोई मनुष्य नहीं। गीता में लिखा हुआ है कृष्ण भगवानुवाच। अब श्रीकृष्ण सारी दुनिया को माया से लिबरेट करे, यह तो सम्भव नहीं है। बाप ही आकर बच्चों प्रति समझाते हैं। जिन्होने बाप को अपना बनाया है और बाप के सम्मुख बैठे हैं। कृष्ण को बाप नहीं कहा जा सकता। बाप को कहा जाता है परमपिता, परमधाम में रहने वाला। आत्मा इस शरीर द्वारा भगवान को याद करती है। बाप बैठ समझाते हैं कि मैं तुम्हारा बाप परमधाम में रहने वाला हूँ। मैं सभी आत्माओं का बाप हूँ। मैंने ही कल्प पहले भी बच्चों को आकर सिखाया था कि बुद्धि का योग मुझ परमपिता से लगाओ। आत्माओं से बात की जाती है। आत्मा जब तक शरीर में न आये तो आंखों द्वारा देख न सके। कानों द्वारा सुन न सके। आत्मा बिगर शरीर जड़ हो जाता है। आत्मा चैतन्य है। गर्भ में बच्चा है, परन्तु जब तक उसमें आत्मा ने प्रवेश नहीं किया है तब तक चुरपुर नहीं होती। तो ऐसी चैतन्य आत्माओं से बाप बात करते हैं। कहते हैं मैंने यह शरीर लोन पर लिया है। मैं आकर सभी आत्माओं को वापिस ले जाता हूँ। फिर जो आत्मायें सम्मुख होती हैं उन्हों को राजयोग सिखाता हूँ। राजयोग सारी दुनिया नहीं सीखेगी। कल्प पहले वाले ही राजयोग सीख रहे हैं।
 
अब बाबा समझाते हैं बुद्धि का योग बाप के साथ अन्त तक लगाते रहना है, इसमें अटकना नहीं है। स्त्री पुरुष होते हैं तो पहले एक दो को जानते भी नहीं हैं। फिर जब दोनों की सगाई होती है फिर कोई 60-70 वर्ष भी इकट्ठे रहते हैं, तो सारी जीवन जिस्म, जिस्म को याद करते रहते हैं। वह कहेगी यह मेरा पति है, वह कहेगा यह मेरी पत्नि है। अब तुम्हारी सगाई हुई है निराकार से। निराकार बाप ने ही आकर सगाई कराई है। कहते हैं कल्प पहले मुआफिक तुम बच्चों की अपने साथ सगाई कराता हूँ। मैं निराकार इस मनुष्य सृष्टि का बीजरूप हूँ। सभी कहेंगे यह मनुष्य सृष्टि गॉड फादर ने रची है। तो तुम्हारा बाप सदैव परमधाम में रहते हैं। अभी कहते हैं मुझे याद करो। मुसाफिरी लम्बी होने कारण बहुत बच्चे थक पड़ते हैं। बुद्धि का योग पूरा लगा नहीं सकते। माया की बहुत ठोकरें खाने से थक पड़ते हैं, मर भी पड़ते हैं। फिर हाथ छोड़ देते हैं। कल्प पहले भी ऐसे ही हुआ था। यहाँ तो जब तक जीना है, तब तक याद करना है। स्त्री का पति मर जाता है तो भी याद करती रहती है। यह बाप वा पति ऐसे छोड़कर जाने वाला तो नहीं है। कहते हैं मैं तुम सजनियों को साथ ले जाऊंगा। परन्तु इसमें समय लगता है, थकना नहीं है। पापों का बोझा सिर पर बहुत है, वो योग में रहने से ही उतरेगा। योग ऐसा हो जो अन्त में बाप वा साजन के सिवाए और कोई याद न पड़े। अगर और कुछ याद पड़ा तो व्यभिचारी हो गया, फिर पापों का दण्ड भोगना पड़े इसलिए बाप कहते हैं परमधाम के राही थक मत जाना।
 
तुम जानते हो मैं ब्रह्मा द्वारा आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना कर रहा हूँ और शंकर द्वारा सभी धर्मों का विनाश कराता हूँ। अभी कान्फ्रेन्स करते रहते हैं तो सभी धर्म मिलकर एक कैसे हो जाएं, सभी शान्त में कैसे रहें, उसका रास्ता निकालें। अब अनेक धर्मों की एक मत तो हो नहीं सकती। एक मत से तो एक धर्म की स्थापना होती है। वह सभी धर्म सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी हो तब आपस में क्षीरखण्ड हो सकते हैं। रामराज्य में सभी क्षीरखण्ड थे। जानवर भी लड़ते नहीं थे। यहाँ तो घर-घर में झगड़ा है। लड़ते तब हैं जब उनका कोई धनी-धोणी नहीं है। अपने मात-पिता को नहीं जानते हैं। गाते भी हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे.. तुम्हारी कृपा से सुख घनेरे.. सुख घनेरे तो अभी हैं नहीं। तो कहेंगे मात-पिता की कृपा नहीं है। बाप को जानते ही नहीं, तो बाप कृपा कैसे करे? फिर टीचर के डायरेक्शन पर चलें तब कृपा हो। वह तो कह देते सर्वव्यापी है, तो कौन कृपा करे और किस पर करे? कृपा लेने वाला और करने वाला दोनों चाहिए। स्टूडेण्ट पहले तो आकर टीचर के पास पढ़े। यह कृपा अपने ऊपर करे। फिर टीचर के डायरेक्शन पर चले। पुरुषार्थ कराने वाला भी चाहिए। यह बाप भी है, टीचर भी है तो सतगुरू भी है, उनको परमपिता, परमशिक्षक, परम सतगुरू भी कहा जाता है। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प यह स्थापना का कार्य कराता हूँ। पतित दुनिया को पावन दुनिया बनाता हूँ। वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी है ना। तो वर्ल्ड अथॉरिटी का राज्य कायम करते हैं। सारी सृष्टि पर एक ही लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। उन्हों की आलमाइटी अथॉरिटी थी। वहाँ कोई लड़ाई झगड़ा कर न सके। वहाँ माया है ही नहीं। है ही गोल्डन एज, सिलवर एज। सतयुग त्रेता दोनों को स्वर्ग अथवा वैकुण्ठ कहेंगे। सभी गाते भी हैं चलो बिन्द्रावन भजो राधे गोबिन्द.. जाते तो कोई हैं नहीं। सिर्फ याद जरूर करते हैं। अब तो माया का राज्य है। सभी रावण की मत पर हैं। देखने में तो बड़े-बड़े मनुष्य अच्छे आते हैं। बड़े-बड़े टाइटिल मिलते हैं। थोड़ी जिस्मानी हिम्मत दिखाते हैं वा अच्छा कर्म करते हैं तो टाइटिल मिलते हैं। कोई को डाक्टर ऑफ फिलासाफी, कोई को क्या.. ऐसे-ऐसे टाइटिल देते रहते हैं। अभी तुम तो हो ब्राह्मण। बरोबर भारत की सर्विस में हो। तुम दैवी राजधानी स्थापन कर रहे हो। जब स्थापना हो जायेगी तब तुमको टाइटिल्स मिलेंगे। सूर्यवंशी राजा रानी, चन्द्रवंशी राजा रानी... फिर तुम्हारा राज्य चलेगा। वहाँ कोई को टाइटिल नहीं मिलता। वहाँ दु:ख की कोई बात ही नहीं, जो कोई का दु:ख दूर करे वा बहादुरी दिखाये.. जो टाइटिल मिले। जो रसम-रिवाज यहाँ होती है वह वहाँ नहीं होती। न लक्ष्मी-नारायण इस पतित दुनिया में आ सकते हैं, इस समय कोई भी पावन देवता नहीं है। यह है ही पतित आसुरी दुनिया। अनेक मत-मतान्तर में मूँझ गये हैं। यहाँ तो एक ही श्रीमत है, जिससे राजधानी स्थापन हो रही है। हाँ चलते-चलते कोई को माया का कांटा लग जाता है तो लंगड़ाते रहते हैं इसलिए बाप कहते हैं सदैव श्रीमत पर चलो। अपनी मनमत पर चलने से धोखा खायेंगे। सच्ची कमाई होती है सच्चे बाप की मत पर चलने से। अपनी मत से बेड़ा गर्क हो जायेगा। कितने महावीर श्रीमत पर न चलने कारण अधोगति को पहुँच गये।
 
अभी तुम बच्चों को सद्गति को पाना है। श्रीमत पर न चला और दुर्गति को पाया तो फिर बहुत पश्चाताप करना पड़ेगा। फिर धर्मराजपुरी में शिवबाबा इस तन में बैठ समझायेंगे कि मैंने तुमको इस ब्रह्मा तन द्वारा इतना समझाया, पढ़ाया, कितनी मेहनत की। निश्चय पत्र लिखे कि श्रीमत पर चलेंगे। परन्तु नहीं चले। श्रीमत को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। कुछ भी हो, बाप को बताने से सावधानी मिलती रहेगी। कांटा लगता ही तब है जब बाप को भूलते हैं। बच्चे सद्गति करने वाले बाप से भी 3 कोस दूर भागते हैं। गाते भी हैं वारी जाऊं, कुर्बान जाऊं। परन्तु किस पर? ऐसे तो नहीं लिखा है - सन्यासी पर वारी जाऊं! वा ब्रह्मा विष्णु शंकर पर वारी जाऊं! वा कृष्ण पर वारी जाऊं! कुर्बान जाना है परमपिता परमात्मा पर। कोई मनुष्य पर नहीं। वर्सा मिलता है बाप से। बाप बच्चों पर कुर्बान होता है। यह बेहद का बाप भी कहते हैं, मैं कुर्बान होने आया हूँ। परन्तु बाप पर कुर्बान होने में बच्चों का हृदय कितना विदीरण होता है। देह-अभिमान में आया तो मरा, व्यभिचारी हुआ। याद उस एक की रहनी चाहिए। उन पर बलिहार जाना चाहिए। अब नाटक पूरा होता है। अब हमको वापिस जाना है। बाकी मित्र-सम्बन्धी आदि तो सब कब्रदाखिल होने हैं। उनको क्या याद करेंगे, इसमें अभ्यास बहुत चाहिए। गाया भी हुआ है चढ़े तो चाखे अमृतरस,... जोर से गिरते हैं तो पद गँवा देते हैं। ऐसे नहीं स्वर्ग में नहीं आयेंगे। परन्तु राजा रानी बनने और प्रजा बनने में फ़र्क तो है ना। यहाँ का भील भी देखो, मिनिस्टर भी देखो। फ़र्क है ना इसलिए पुरुषार्थ पूरा करना है। कोई गिरते हैं तो एकदम पतित बन जाते हैं। श्रीमत पर चल नहीं पाते तो माया नाक से पकड़ एकदम गटर में डाल देती है। बापदादा का बनकर फिर ट्रेटर बनना, गोया उनका सामना करना है इसलिए बाप कहते हैं कदम-कदम सम्भाल कर चलो। अब माया का अन्त होने वाला है, तो माया बहुतों को गिराती है, इसलिए बच्चों को खबरदार रहना है। रास्ता जरा लम्बा है, पद भी बहुत भारी है। अगर ट्रेटर बना तो सजा भी भारी है। जब धर्मराज बाबा सजा देते हैं तो बहुत रड़ियां मारते हैं। जो कल्प-कल्प के लिए कायम हो जाती हैं। माया बड़ी प्रबल है। थोड़ा सा भी बाप का डिसरिगार्ड किया तो मरा। गाया हुआ है सतगुरू का निंदक ठौर न पाये। काम वश, क्रोध वश उल्टे काम करते हैं। गोया बाप की निंदा कराते हैं और दण्ड के निमित्त बन जाते हैं। अगर कदम-कदम पर पदमों की कमाई है तो पदमों का घाटा भी है। अगर सर्विस से जमा होता है तो उल्टे विकर्म से ना भी होती है। बाबा के पास सारा हिसाब रहता है। अब सम्मुख पढ़ा रहे हैं तो सारा हिसाब जैसे उनकी हथेली पर है। बाप तो कहेंगे शल कोई बच्चा शिवबाबा का डिसरिगार्ड न करे, बहुत विकर्म बनते हैं। यज्ञ सेवा में हड्डी-हड्डी देनी पड़ती है। दधीचि ऋषि का मिसाल है ना! उसका भी पद बनता है। नहीं तो प्रजा में भी भिन्न-भिन्न पद हैं। प्रजा में भी नौकर चाकर सभी चाहिए। भल वहाँ दु:ख नहीं होगा परन्तु नम्बरवार पद तो हैं ही। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) याद की यात्रा में थकना नहीं है। ऐसी सच्ची याद का अभ्यास करना है जो अन्त समय में बाप के सिवाए कोई भी याद न आये।
2) सच्चे बाप की मत पर चल सच्ची कमाई करनी है। अपनी मनमत पर नहीं चलना है। सद्गुरू की निंदा कभी भी नहीं करानी है। काम, क्रोध के वश कोई उल्टा काम नहीं करना है।
 वरदान:स्वयं को अवतरित हुए अवतार समझ सदा ऊंची स्थिति में रहने वाले अर्श निवासी फरिश्ता भव!
जैसे बाप अवतरित हुए हैं ऐसे आप श्रेष्ठ आत्मायें भी ऊपर से नीचे मैसेज देने के लिए अवतरित हुए हो, रहने वाले सूक्ष्मवतन वा मूलवतन के हो। देह-भान रूपी मिट्टी अथवा पृथ्वी पर आपके बुद्धि रूपी पांव नहीं पड़ सकते इसलिए फरिश्तों के पांव सदा फर्श से ऊपर दिखाते हैं। तो आप सब ऊंची स्थिति में स्थित रहने वाले अर्श निवासी अवतरित हुए अवतार हो, इसी स्मृति से उड़ती कला में उड़ते रहो।

स्लोगन:स्व-परिवर्तन के तीव्र पुरुषार्थी बच्चों को ही बाप के दुआओं की मुबारक मिलती है।

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Details ( Page:- Murali 04-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 04.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche -Baap ustaad ne tumhe manushya se Devta banne ka hoonar shikhlaya hai,tum fir shrimat par auro ko bhi Devta banane ki seva karo.
Q-Abhi tum bacche kaun sa shrest karm karte ho jiska riwaaz bhakti me bhi chala aata hai?
A-Tum abhi shrimat par apna tan-mann-dhan Bharat to kya Biswa ke kalyan arth arpan karte ho isi ka riwaaz bhakti me manushya Ishwar arth daan karte hain.Unhe fir uske badle dusre janm me rajai ghar me janm milta hai.Aur tum bacche sangam par Baap ke madadgar bante ho to manushya se Devta ban jate ho.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1)     Gyan-yog ki sanjeevni booti se swayang ko maya ki behosi se bachate rehna hai.Manmat par kabhi nahi chalna hai._
2)     Roop-basant ban service karni hai.Mata-pita ko follow kar takhtnashin banna hai.
Vardan:-Divya buddhi aur roohani dhristi ke vardan dwara number one lene wale Shrest Purusharthi bhava.
Slogan:-Features me roohaniyat ki jhalak tab aayegi jab sankalp,bol aur karm me pavitrata ki dharana hogi.
HINGLISH SUMMARY - 04.01.18

Sweet children, the Father, the Master, has taught you the art of changing yourselves from human beings into deities. So then, on the basis of shrimat, serve others so that they too can change into deities.
Question:What elevated act do you children perform now, an act that becomes a custom and system on the path of devotion?
Answer:
On the basis of shrimat, you surrender your minds, bodies and wealth, not just to benefit Bharat, but the whole world. Human beings on the path of devotion have the custom and system of donating in the name of God. In return, they take their next birth in a royal family. However, you children become the Father's helpers at the confluence age and change from humans into deities. 
Song:You spent the night in sleeping and the day in eating.  Om Shanti
 Essence for Dharna:
1) Save yourself from the unconsciousness of Maya with the life-giving herb of knowledge and yoga. Don't follow the dictates of your own mind.
2) Become rup-basant and do service. Follow the mother and father and become worthy of sitting on the throne.
Blessing:May you be an elevated effort-maker who claims number one with the blessing of a divine intellect and spiritual drishti.
 Each and every Brahmin child receives at birth the blessing of a divine intellect and spiritual drishti. This blessing is the foundation of Brahmin life. It is on the basis of these two things that number s are created for the confluence-aged effort-makers. To the extent that they use these in their thoughts, words and deeds, they claim a number accordingly. One's attitude and acts automatically change through spiritual drishti. By taking accurate decisions with a divine intellect, oneself, service and relations and connections truly become powerful. 
Slogan:There will be spirituality in your features when there is the inculcation of purity in your thoughts, words and deeds.
 
HINDI DETAIL MURALI

04/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - बाप उस्ताद ने तुम्हें मनुष्य से देवता बनने का हुनर सिखलाया है, तुम फिर श्रीमत पर औरों को भी देवता बनाने की सेवा करो"
प्रश्न:अभी तुम बच्चे कौन सा श्रेष्ठ कर्म करते हो जिसका रिवाज भक्ति में भी चला आता है?
उत्तर:तुम अभी श्रीमत पर अपना तन-मन-धन भारत तो क्या विश्व के कल्याण अर्थ अर्पण करते हो इसी का रिवाज़ भक्ति में मनुष्य ईश्वर अर्थ दान करते हैं। उन्हें फिर उसके बदले दूसरे जन्म में राजाई घर में जन्म मिलता है। और तुम बच्चे संगम पर बाप के मददगार बनते हो तो मनुष्य से देवता बन जाते हो।
 
गीत:-तूने रात गंवाई...  ओम् शान्ति।
बाप बच्चों को समझाते हैं, जब बच्चे समझते हैं तब फिर औरों को समझाते हैं। नहीं समझते तो औरों को समझा नहीं सकते। अगर खुद समझते औरों को समझा नहीं सकते तो गोया कुछ भी नहीं समझते। कोई हुनर सीखता है तो उसको फैलाता है। यह हुनर तो बाप उस्ताद से सीखा जाता है कि मनुष्य से देवता कैसे बनाया जाए। देवतायें जिनके चित्र भी हैं, मनुष्य को देवता बनाते हैं तो गोया वह देवता अभी नहीं हैं। देवताओं के गुण गाये जाते हैं। सर्वगुण सम्पन्न.... यहाँ कोई मनुष्य के तो ऐसे गुण नहीं गाये जाते। मनुष्य मन्दिरों में जाकर देवताओं के गुण गाते हैं। भल पवित्र तो सन्यासी भी हैं परन्तु मनुष्य उन्हों के ऐसे गुण नहीं गाते। वह सन्यासी तो शास्त्र आदि भी सुनाते हैं। देवताओं ने तो कुछ नहीं सुनाया है। वह तो प्रालब्ध भोगते हैं। अगले जन्म में पुरुषार्थ कर मनुष्य से देवता बने थे। तो सन्यासियों आदि कोई में भी देवताओं जैसे गुण नहीं हैं। जहाँ गुण नहीं वहाँ जरूर अवगुण हैं। सतयुग में इसी भारत में यथा राजा रानी तथा प्रजा सर्वगुण सम्पन्न थे। उनमें सभी गुण थे। उन देवताओं के ही गुण गाये जाते हैं। उस समय और धर्म थे नहीं। गुण वाले देवतायें थे सतयुग में, और अवगुण वाले मनुष्य हैं कलियुग में। अब ऐसे अवगुण वाले मनुष्य को देवता कौन बनावे। गाया भी हुआ है मनुष्य से देवता... यह महिमा तो है परमपिता परमात्मा की। हैं तो देवतायें भी मनुष्य, परन्तु उनमें गुण हैं, उनमें अवगुण हैं। गुण प्राप्त होते हैं बाप से, जिसको सतगुरू भी कहते हैं। अवगुण प्राप्त होते हैं माया रावण से। इतने गुणवान फिर अवगुणी कैसे बनते हैं। सर्वगुण सम्पन्न और फिर सर्व अवगुण सम्पन्न कौन बनाते हैं! यह तुम बच्चे जानते हो। गाते भी हैं मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। देवताओं के कितने गुण गाते हैं। इस समय तो वह गुण किसी में नहीं हैं। खान-पान आदि कितना गंदा है। देवतायें हैं वैष्णव सम्‍प्रदाय और इस समय के मनुष्य हैं रावण सम्‍प्रदाय। खान-पान कितना बदल गया है। सिर्फ ड्रेस को नहीं देखना है। देखा जाता है खान-पान और विकारीपन को। बाप खुद कहते हैं मुझे भारत में ही आना पड़ता है। ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ब्राह्मणियों द्वारा स्थापना कराता हूँ। यह ब्राह्मणों का यज्ञ है ना। वह विकारी ब्राह्मण कुख वंशावली, यह हैं मुख वंशावली। बहुत फ़र्क है। वो साहूकार लोग जो यज्ञ रचते हैं उसमें जिस्मानी ब्राह्मण होते हैं। यह है बेहद का बाप साहूकारों से साहूकार, राजाओं का राजा। साहूकारों का साहूकार क्यों कहा जाता है? क्योंकि साहूकार भी कहते हैं हमको ईश्वर ने धन दिया है, ईश्वर अर्थ दान करते हैं तो दूसरे जन्म में धनवान बनते हैं। इस समय तुम शिवबाबा को सब कुछ तन-मन-धन अर्पण करते हो। तो कितना ऊंच पद पाते हो।
 
तुम श्रीमत पर इतने ऊंच कर्म सीखते हो तो तुमको जरूर फल मिलना चाहिए। तन-मन-धन अर्पण करते हो। वह भी ईश्वर अर्थ करते हैं, कोई के थ्रू। यह रिवाज़ भारत में ही है। तो बाप तुमको बहुत अच्छे कर्म सिखलाते हैं। तुम यह कर्तव्य सिर्फ भारत तो क्या, परन्तु सारी दुनिया के कल्याण अर्थ करते हो तो उसका एवजा मिलता है - मनुष्य से देवता बनने का। जो श्रीमत पर जैसा कर्म करते हैं, ऐसा फल मिलता है। हम साक्षी हो देखते रहते हैं। कौन श्रीमत पर चल मनुष्य को देवता बनाने की सेवा करते हैं। कितना जीवन परिवर्तन हो जाता है। श्रीमत पर चलने वाले ब्राह्मण ठहरे। बाप कहते हैं ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों को बैठ राजयोग सिखलाता हूँ - 5 हजार वर्ष की बात है। भारत में ही देवी-देवताओं का राज्य था। चित्र दिखाने चाहिए। चित्रों बिगर समझेंगे पता नहीं यह कौनसा नया धर्म है, जो शायद विलायत से आता है। चित्र दिखाने से समझेंगे यह देवताओं को मानते हैं। तो समझाना है कि श्रीनारायण के अन्तिम 84 वें जन्म में परमपिता परमात्मा ने प्रवेश किया है और राजयोग सिखला रहे हैं। तो कृष्ण की बात उड़ जाती है। यह उनके 84 वें जन्म का भी अन्त है। जो सूर्यवंशी देवता थे उन सभी को आकर फिर से राजयोग सीखना है। ड्रामा अनुसार पुरुषार्थ भी जरूर करेंगे। तुम बच्चे अभी सम्मुख सुन रहे हो और बच्चे फिर इस टेप द्वारा सुनेंगे तो समझेंगे हम भी मात-पिता के साथ फिर सो देवता बन रहे हैं। इस समय 84 वें जन्म में पूरे बेगर जरूर बनना है। आत्मा बाप को सब कुछ सरेन्डर करती है। यह शरीर ही अश्व है, जो स्वाहा होता है। आत्मा खुद बोलती है हम बाप के बने हैं। दूसरा न कोई। मैं आत्मा इस जीव द्वारा परमपिता परमात्मा के डायरेक्शन अनुसार सेवा कर रहा हूँ।
 
बाप कहते हैं योग भी सिखाओ और सृष्टि चक्र कैसे फिरता है वह भी समझाओ। जिसने सारा चक्र पास किया होगा - वह इन बातों को झट समझेंगे। जो इस चक्र में आने वाला नहीं होगा वह ठहरेगा नहीं। ऐसे नहीं सारी सृष्टि आयेगी! इसमें भी प्रजा ढेर आयेगी। राजा रानी तो एक होता है ना। जैसे लक्ष्मी-नारायण एक गाया जाता है, राम सीता एक गाया जाता है। प्रिन्स प्रिन्सेज तो और भी होंगे। मुख्य तो एक होगा ना। तो ऐसा राजा रानी बनने के लिए बहुत मेहनत करनी है। साक्षी हो देखने से पता पड़ता है - यह साहूकार राजाई कुल का है या गरीब कुल का है। कोई माया से कैसे हारते हैं, जो भागन्ती भी हो जाते हैं। माया एकदम कच्चा खा जाती है इसलिए बाबा पूछते हैं राजी-खुशी हो? माया के थप्पड़ से बेहोश वा बीमार तो नहीं पड़ते हो! ऐसे कोई बीमार हो पड़ते हैं फिर बच्चे उनके पास जाते हैं ज्ञान-योग की संजीवनी बूटी देकर सुरजीत कर देते हैं। ज्ञान और योग में न रहने कारण माया एकदम कला-काया चट कर देती है। श्रीमत छोड़ मनमत पर चल पड़ते हैं। माया एकदम बेहोश कर देती है। वास्तव में संजीवनी बूटी यह ज्ञान की है, इससे माया की बेहोशी उतर जाती है। यह बातें सभी इस समय की हैं। सीतायें भी तुम हो। राम आकर माया रावण से तुमको छुड़ाते हैं। जैसे बच्चों को सिन्ध में छुड़ाया। रावण लोग फिर चुरा ले जाते थे। अभी तुमको फिर माया के चम्बे से सबको छुड़ाना है। बाबा को तो तरस पड़ता है, देखते हैं कैसे माया थप्पड़ लगाए बच्चों की बुद्धि ही एकदम फिरा देती है। राम से बुद्धि फेर रावण की तरफ कर देती है। जैसे एक खिलौना होता है। एक तरफ राम, एक तरफ रावण। इसको कहा जाता है आश्चर्यवत बाप का बनन्ती, फिर रावण का बनन्ती। माया बड़ी दुस्तर है। चूहे मुआफिक काट कर खाना खराब कर देती है, इसलिए श्रीमत कभी छोड़नी नहीं है। कठिन चढ़ाई है ना। अपनी मत माना रावण की मत। उस पर चले तो बहुत घुटका खायेंगे। बहुत बदनामी कराते हैं। ऐसे सभी सेन्टर्स पर हैं। नुकसान फिर भी अपना करते हैं। सर्विस करने वाले रूप-बसन्त छिपे नहीं रहते। दैवी राजधानी स्थापन हो रही है, इसमें सभी अपना-अपना पार्ट जरूर बजायेंगे। दौड़ी लगायेंगे तो अपना कल्याण करेंगे। कल्याण भी एकदम स्वर्ग का मालिक। जैसे माँ बाप तख्तनशीन होते हैं तो बच्चों को भी होना है। बाप को फालो करना है। नहीं तो अपना पद कम कर देंगे। बाबा ने यह चित्र कोई रखने लिए नहीं बनाये हैं। इनसे बहुत सर्विस करनी है। बड़े-बड़े साहूकार लोग लक्ष्मी-नारायण का मन्दिर बनवाते हैं परन्तु यह किसको पता नहीं है कि यह कब आये, इन्हों ने भारत को कैसे सुखी बनाया, जो सभी उन्हों को याद करते हैं।
 
तुम जानते हो कि मन्दिर होना चाहिए एक दिलवाला का। यह एक ही काफी है। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर से भी क्या होगा! वह कोई कल्याणकारी नहीं हैं। शिव का मन्दिर बनाते हैं, वह भी अर्थ रहित। उनका आक्यूपेशन तो जानते ही नहीं। मन्दिर बनावे, आक्यूपेशन को न जानें तो क्या कहेंगे? जब स्वर्ग में देवतायें हैं तो मन्दिर होते नहीं। जो मन्दिर बनाते हैं, उन्हों से पूछना चाहिए लक्ष्मी-नारायण कब आये थे? उन्हों ने क्या सुख दिया था? कुछ समझा नहीं सकते। इससे सिद्ध है कि जिनमें अवगुण हैं वह गुणवान के मन्दिर बनाते हैं। तो बच्चों को बहुत सर्विस का शौक होना चाहिए। बाबा को सर्विस का बहुत शौक है तब तो ऐसे-ऐसे चित्र बनवाते हैं। भल चित्र शिवबाबा बनवाते हैं परन्तु बुद्धि दोनों की चलती है। अच्छा!
 मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। 
रात्रि क्लास - 28-6-68

 यहाँ सभी बैठे हैं समझते हैं कि हम आत्मायें हैं, बाप बैठा है। आत्म अभिमानी हो बैठना इसको कहा जाता है। सभी ऐसे नहीं बैठे हैं कि हम आत्मा हैं बाबा के सामने बैठे हैं। अब बाबा ने याद दिलाया है तो स्मृति आयेंगी अटेन्शन देंगे। ऐसे बहुत हैं जिनकी बुद्धि बाहर भागती है। यहाँ बैठे भी जैसे कि कान बन्द हैं। बुद्धि बाहर में कहाँ न कहाँ दौड़ती रहती है। बच्चे जो बाप की याद में बैठे हैं वे कमाई कर रहे हैं। बहुतों का बुद्धि योग बाहर में रहता है, वह जैसे कि यात्रा में नहीं हैं। टाइम वेस्ट होता है। बाप को देखने से भी बाबा याद पड़ेगा। नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार तो है ही। कोई कोई को पक्की आदत पड़ जाती है। हम आत्मा हैं, शरीर नहीं हैं। बाप नॉलेजफुल है तो बच्चों को भी नॉलेज आ जाती है। अभी वापिस जाना है। चक्र पूरा होता है अभी पुरुषार्थ करना है। बहुत गई थोड़ी रही......इम्तिहान के दिनों में फिर बहुत पुरुषार्थ करने लग पड़ेंगे। समझेंगे अगर हम पुरुषार्थ नहीं करेंगे तो नापास हो जायेंगे। पद भी बहुत कम हो जायेगा। बच्चों का पुरुषार्थ तो चलता ही रहता है। देह अभिमान कारण विकर्म होंगे। इसका सौ गुणा दण्ड हो जायेगा क्योंकि हमारी निन्दा कराते हैं। ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए जो बाप का नाम बदनाम हो इसलिए गाते हैं सद्गुरु के निन्दक ठौर न पावें। ठौर माना बादशाही। पढ़ाने वाला भी बाप है। और कहाँ भी सत्संग में एम आब्जेक्ट नहीं है। यह है हमारा राजयोग। और कोई ऐसे मुख से कुछ कह न सके कि हम राजयोग सिखलाते हैं। वह तो समझते हैं शान्ति में ही सुख है? वहाँ तो न दु:ख, न सुख की बात है। शान्ति ही शान्ति है। फिर समझा जाता है इनकी तकदीर में कम है। सभी से तकदीर ऊंची उनकी है जो पहले से पार्ट बजाते हैं। वहाँ उनको यह ज्ञान नहीं रहता। वहाँ संकल्प ही नहीं चलेगा। बच्चे जानते हैं हम सभी अवतार लेते हैं। भिन्न भिन्न नाम रूप में आते हैं। यह ड्रामा है ना। हम आत्मायें शरीर धारण कर इसमें पार्ट बजाती हैं। वह सारा राज़ बाप बैठ समझाते हैं। तुम बच्चों को अन्दर में अतीन्द्रिय सुख रहता है। अन्दर में खुशी रहती है। कहेंगे यह देही-अभिमानी है। बाप समझाते भी हैं तुम स्टूडेन्ट हो। जानते हो हम देवता स्वर्ग के मालिक बनने वाले हैं। सिर्फ देवता भी नहीं। हम विश्व के मालिक बनने वाले हैं। यह अवस्था स्थाई तब रहेगी जब कर्मातीत अवस्था होगी। ड्रामा प्लैन अनुसार होनी है ज़रूर। तुम समझते हो हम ईश्वरीय परिवार में हैं। स्वर्ग की बादशाही मिलनी है ज़रूर। जो जास्ती सर्विस करते हैं, बहुतों का कल्याण करते हैं तो ज़रूर ऊंच पद मिलेगा। बाबा ने समझाया है यह योग की बैठक यहाँ हो सकती है। बाहर सेन्टर पर ऐसे नहीं हो सकती है। चार बजे आना, नेष्टा में बैठना, वहाँ कैसे हो सकता है। नहीं। सेन्टर में रहने वाले भल बैठे। बाहर वाले को भूले चुके भी कहना नहीं है। समय ऐसा नहीं है। यह यहाँ ठीक है। घर में ही बैठे हैं। वहाँ तो बाहर से आना पड़ता है। यह सिर्फ यहाँ के लिये है। बुद्धि में ज्ञान धारण होना चाहिए। हम आत्मा हैं। उनका यह अकाल तख्त है। टेव पड़ जानी चाहिए। हम भाई-भाई हैं, भाई से हम बात करते हैं। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो विकर्म विनाश हो जायें। अच्छा!
 मीठे मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी बापदादा का यादप्यार, गुडनाईट और नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) ज्ञान-योग की संजीवनी बूटी से स्वयं को माया की बेहोशी से बचाते रहना है। मनमत पर कभी नहीं चलना है।
2) रूप-बसन्त बन सर्विस करनी है। मात-पिता को फालो कर तख्तनशीन बनना है।
 वरदान:दिव्य बुद्धि और रूहानी दृष्टि के वरदान द्वारा नम्बर वन लेने वाले श्रेष्ठ पुरुषार्थी भव!
हर एक ब्राह्मण बच्चे को दिव्य बुद्धि और रूहानी दृष्टि का वरदान जन्म से ही प्राप्त होता है। यह वरदान ही ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन है। इन्हीं दोनों बातों के आधार पर संगमयुगी पुरुषार्थियों का नम्बर बनता है। इन्हें हर संकल्प, बोल और कर्म में जो जितना यूज़ करता है उतना ही नम्बर आगे लेता है। रूहानी दृष्टि से वृत्ति और कृति स्वत: बदल जाती है। दिव्य बुद्धि द्वारा यथार्थ निर्णय करने से स्वयं, सेवा, संबंध सम्पर्क यथार्थ शक्तिशाली बन जाता है।

स्लोगन:फीचर्स में रूहानियत की झलक तब आयेगी जब संकल्प, बोल और कर्म में पवित्रता की धारणा होगी।

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Details ( Page:- Murali 05-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY -
05.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban

Mithe Mithe bacche -Yahan tumhe sukh-dukh,maan-apmaan..sab sahan karna hai,purani duniya ke sukho se buddhi hata deni hai,apni mat par nahi chalna hai.

Q-Devtayein janm se bhi yah janm bahut achcha hai,kaise?

A-Is janm me tum bacche Shiv Baba ke bhandare se khaate ho.Yahan tum athah kamayi karte ho,tumne Baap ki sharan li hai.Is janm me he tum apna lok-parlok suhela(sukhi) karte ho.Sudama mishal do mutthi de 21 janm ki badshahi lete ho.

Dharana ke liye mukhya saar:-

1)Yah naatak ab poora ho raha hai isiliye is purani duniya se upraam rehna hai.Shrimat par pani takdeer oonch banani hai.Kabhi koi oolta karm nahi karna hai.

2)Abinashi gyan ratno ki kamai karni aur karani hai.Ek Baap ki yaad me rah sapoot baccha ban aneko ko rashta batana hai.

Vardan:-Divya buddhi ke wahan dwara tino loko ki sair karne wale Gyan Swaroop Bidyapati bhava

Slogan:-Apni sarvshaktiyon ko anya aatmaon ke prati will karna he sarv shrest seva hai.

 

ENGLISH SUMMARY - 05.01.18


Sweet children, here, you have to tolerate happiness and sorrow, respect and disrespect. Remove the happiness of the old world from your intellects. Don't follow the dictates of your own minds.

Q- How is this birth even better than a deity birth?

A- At this time you children are eating from Shiv Baba's bhandara. You earn a lot of income here. You have taken refuge with the Father. It is in this birth that you make yourself happy in this world (lok) and in (parlok) the world beyond. You give two handfuls of rice like Sudama did and claim the sovereignty for 21 births.

Essence of Dharna

- 1. This play is now coming to an end. Therefore, remain beyond this old world. Make your fortune elevated by following shrimat. Never perform wrong actions.-

-2. Earn and inspire others to earn an income of the imperishable jewels of knowledge. Stay in remembrance of the one Father, become a worthy child and show the path to many others.

Blessing- May you be a lord of knowledge, an embodiment of knowledge, who travels to the three worlds with the vehicle of a divine intellect.

--A divine intellect means a holy swan intellect. A swan means one who is able to distinguish between milk and water, pearls and stones and to take the pearls. This is why a holy swan is the vehicle of the confluence-aged goddess of knowledge, the embodiment of knowledge, Saraswati. All of you are embodiments of knowledge and this is why you are lords of knowledge or goddesses of knowledge. That vehicle is the sign of a divine intellect. With the vehicle of that divine intellect, you can travel to the three worlds. That vehicle is the fastest of all vehicles.

Slogan- To will all your powers to all souls is the most elevated service.

 

HINDI DETAIL MURALI


05/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


मीठे बच्चे "मीठे बच्चे - यहाँ तुम्हें सुख-दु:ख, मान-अपमान.. सब सहन करना है, पुरानी दुनिया के सुखों से बुद्धि हटा देनी है, अपनी मत पर नहीं चलना है"

प्रश्न:देवताई जन्म से भी यह जन्म बहुत अच्छा है, कैसे?

उत्तर:   इस जन्म में तुम बच्चे शिवबाबा के भण्डारे से खाते हो। यहाँ तुम अथाह कमाई करते हो, तुमने बाप की शरण ली है। इस जन्म में ही तुम अपना लोक-परलोक सुहेला (सुखी) करते हो। सुदामा मिसल दो मुट्ठी दे 21 जन्म की बादशाही लेते हो।

गीत:-चाहे पास हो चाहे दूर हो….ओम् शान्ति।

गीत का कितना अच्छा अर्थ है। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं - चाहे हम इस तन से नजदीक हैं वा दूर हैं क्योंकि सम्मुख योग की शिक्षा दे रहे हैं। प्रेरणा से तो नहीं देंगे ना। चाहे मैं नजदीक हूँ, चाहे दूर हूँ - याद तो मुझे ही करना है। भगवान के पास जाने के लिए ही तो भक्ति करते हैं। बाप बैठ समझाते हैं कि हे जीव की आत्मायें, इस शरीर में निवास करने वाली आत्मायें, आत्माओं से परमपिता परमात्मा बैठ बात करते हैं। परमात्मा को आत्माओं से मिलना है जरूर, इसलिए जीव आत्मायें भगवान को याद करती हैं क्योंकि दु:खी हैं। सतयुग में तो कोई याद नहीं करते। अभी तुम बच्चे जानते हो हम बहुत पुराने भक्त हैं। जबसे हमको माया ने पकड़ा है, तब से भगवान की, शिव की याद शुरू हुई है क्योंकि शिवबाबा ने हमको स्वर्ग का मालिक बनाया था, तो उनका यादगार बनाकर भक्ति करते हैं। अब तुम जानते हो बाप सम्मुख आये हैं लेने के लिए, क्योंकि अब बाप के पास जाना है। जब तक यहाँ हैं तब तक पुराने शरीर को, पुरानी दुनिया को बुद्धि से भूलना है और योग में रहना है। तो इस योग अग्नि से पाप भस्म होंगे। इसमें मेहनत लगती है। पद भी तो जबरदस्त है। विश्व का मालिक बनना है। मनुष्य कहते हैं कि विश्व का मालिक तो शिवबाबा है। परन्तु नहीं, विश्व का मालिक मनुष्य ही बनते हैं। बाप बैठ बच्चों को विश्व का मालिक बनाते हैं। कहते हैं तुम ही विश्व के मालिक थे, फिर 84 जन्म लेते-लेते अब कौड़ी के भी मालिक नहीं रहे हो। पहला नम्बर जन्म और अभी का अन्तिम जन्म देखो कितना रात दिन का फ़र्क है। कोई को भी याद नहीं आ सकता, जब तक बाप आकर साक्षात्कार न कराये। ज्ञान बुद्धि से भी साक्षात्कार होता है। जो सयाने बच्चे हैं, नित्य बाप को याद करते हैं, उन्हों को बहुत मजा आयेगा। यहाँ तुम सुनते हो सब नई बातें हैं। मनुष्य तो कुछ नहीं जानते हैं। वह तो गपोड़े लगाते रहते और दर-दर धक्के खाते रहते हैं। तुमको तो भटकने से छुड़ाया जाता है। बाप कहते हैं तुम आत्मा हो, मुझ बाप को याद करते रहो। बुद्धि में यही विचार रहे कि हम आत्माओं को बाबा के पास जाना है, यह सृष्टि जैसे हमारे लिए है नहीं। यह पुरानी सृष्टि तो खत्म हो जायेगी। फिर हम स्वर्ग में आकर नये महल बनायेंगे। दिन-रात बुद्धि में यह चलना चाहिए। बाप अपना अनुभव सुनाते हैं। रात को सोता हूँ, तो यही ख्यालात चलते हैं। यह नाटक अब पूरा होता है, यह पुराना चोला छोड़ना है। हाँ विकर्मों का बोझा बहुत है, इसलिए निरन्तर बाबा को याद करना है। अपनी अवस्था को दर्पण में देखना है - हमारी बुद्धि सबसे हटी हुई है? धन्धे आदि में रहते हुए भी बुद्धि से काम ले सकते हो। बाबा के ऊपर कितना ओना है। कितने ढेर बच्चे हैं। उन्हों का ख्याल रखना पड़ता है। बच्चों को पनाह (शरण) देनी है। दु:खी तो बहुत हैं ना! हंगामें में कितने दु:खी हो मरते हैं। यह समय बहुत खराब है। तो बच्चों को शरण देने के लिए यह मकान बन रहे हैं। यहाँ तो सब अपने बच्चे ही रहते हैं। कोई डर नहीं और फिर योगबल भी रहता है। बच्चों ने साक्षात्कार भी किया है, जो बाप को अच्छी रीति याद करते हैं तो बाप उन्हों की रक्षा भी करता है। दुश्मन को भयंकर रूप दिखाकर भगा देते हैं। तुमको जब तक शरीर है, तब तक योग में रहना है। नहीं तो सजायें खानी पड़ेंगी। बड़े आदमी का बच्चा सजा खाता है तो उनका काँध नीचे हो जाता है। तुमको भी काँध नीचे करना पड़ेगा। बच्चों के लिए तो और कड़ी सजायें हैं। कोई ऐसे भी हैं जो कहते अभी तो माया का सुख ले लेवें, जो होगा सो देखा जायेगा। बहुतों को इस पुरानी दुनिया के सुख मीठे लगते हैं। यहाँ तो सुख-दु:ख, मान-अपमान... सब सहन करना पड़ता है। ऊंच प्राप्ति अगर चाहते हो तो फालो करना चाहिए, माँ बाप के फरमान पर चलना चाहिए। अपनी मत माना रावण की मत। सो तो तकदीर को लकीर लगाने की ही निकलेगी। बाप से पूछेंगे तो बाबा झट कहेंगे - यह आसुरी मत है। श्रीमत नहीं है। कदम-कदम पर श्रीमत चाहिए। देखना है कहाँ उल्टा काम कर बाप की निंदा तो नहीं कराते? देवी-देवता तब बनेंगे जब ऐसे लक्षण होंगे। ऐसे नहीं वहाँ ऑटोमेटिकली लक्षण आ जायेंगे। यहाँ बहुत मीठी चलन चाहिए। अगर समझो शिवबाबा ने नहीं, ब्रह्मा बाबा ने कहा तो भी रेसपान्सिबुल यह रहेगा ना! अगर कुछ नुकसान भी हुआ तो हर्जा नहीं। यह ड्रामा में था तो तुम्हारे पर कोई दोष नहीं। अवस्था बहुत अच्छी चाहिए। भल तुम यहाँ बैठे हो, बुद्धि में यही रहे कि हम ब्रह्माण्ड के मालिक वहाँ के रहने वाले हैं। इस रीति घर में रहते, धन्धा करते, उपराम होते जायेंगे। जैसे सन्यासी गृहस्थ से उपराम हो जाते हैं। तुम तो सारी पुरानी दुनिया से उपराम होते हो। उस हठयोग सन्यास और इस सन्यास में रात दिन का फ़र्क है। यह राजयोग बाप सिखलाते हैं। सन्यासी सिखला न सकें क्योंकि मुक्ति-जीवनमुक्ति दाता है ही एक। सभी की मुक्ति अब होनी है क्योंकि सब वापिस जाने हैं। साधू लोग साधना करते हैं कि हम वापिस जायें। यहाँ दु:खी हैं। कोई फिर कहते हैं हम ज्योति-ज्योत में समायें। अनेक मत हैं।

बाबा ने समझाया है कि कोई-कोई बच्चे हैं जिन्हों को पुराने सम्बन्धी भी याद आते हैं। उस दुनिया के सुखों की आश हुई और यह मरा। फिर उसका पैर यहाँ ठहर न सके। माया बहुत लालच देती है। एक कहावत है ''भगवान को याद करो नहीं तो बाज आ जायेगा'' यह माया भी बाज मिसल वार करती है। अब जबकि बाप आये हैं तो अभी भी पुरुषार्थ कर ऊंच पद नहीं पाया तो कल्प-कल्पान्तर भी नहीं पायेंगे। यहाँ बाप के पास तो तुमको कोई दु:ख नहीं है, तो पुरानी दु:ख की दुनिया को भूलना चाहिए ना। सारे दिन का पोतामेल देखना चाहिए। कितना समय बाप को याद किया? किसको जीयदान दिया? बाप ने तुमको भी जीयदान दिया है ना। सतयुग त्रेता तक तुम अमर रहते हो। यहाँ कोई मरता है तो कितना रोते पीटते हैं। स्वर्ग में दु:ख का नाम नहीं। समझेंगे पुरानी खाल छोड़ नई लेते हैं। यह मिसाल भी तुमसे लगता है और कोई यह मिसाल दे नहीं सकते। वह थोड़ेही पुरानी खाल को भूलते हैं। वह तो पैसे इकट्ठे करते रहते। यहाँ तुम जो बाप को देते हो तो बाप खुद थोड़ेही खाते वा अपने पास रखते हैं। उनसे बच्चों की ही परवरिश करते हैं इसलिए यह सच्चा-सच्चा शिवबाबा का भण्डारा है, इस भण्डारे से खाने वाले यहाँ भी सुखी तो जन्म-जन्मान्तर सुखी रहते हैं।

तुम्हारा यह जन्म बहुत दुर्लभ है। देवताई जन्म से भी तुम यहाँ सुखी हो क्योंकि बाप की शरण में हो। यहाँ से ही तुम अथाह कमाई करते हो जो फिर जन्म-जन्मान्तर भोगेंगे। सुदामें को भी दो मुट्ठी के बदले 21 जन्मों के लिए महल मिल गये। यह लोक भी सुहैला (सुखी) तो परलोक भी सुहैला, जन्म-जन्मान्तर के लिए इसलिए यह जन्म बहुत अच्छा है। कोई कहते जल्दी विनाश हो तो हम स्वर्ग में चलें। परन्तु अभी तो बहुत खजाना बाप से लेना है। अभी राजधानी कहाँ बनी है। फिर जल्दी विनाश कैसे करायेंगे! बच्चे अभी लायक कहाँ बने हैं! अभी तो बाप पढ़ाने के लिए आते रहते हैं। बाबा की सर्विस तो अपरमअपार है। बाप की महिमा भी अपरमअपार है। जितना ऊंच हूँ, सर्विस भी उतनी ऊंच करता हूँ, तब तो मेरी यादगार है। ऊंच ते ऊंच बाबा की गद्दी है जो जितना पुरुषार्थ करते हैं, वह अपना भाग्य बनाते हैं। यह है अविनाशी ज्ञान रत्नों की कमाई, जो वहाँ अथाह धन बन जाता है। तो बच्चों को पुरुषार्थ बहुत अच्छा करना है। बाप को यहाँ भी याद करो तो वहाँ भी याद करो। सीढ़ी तो है ना। दिल दर्पण में देखना है मैं कितना बाप का सपूत बच्चा हूँ। अन्धों को रास्ता बताता हूँ। अपने से बातें करने में खुशी होती है। जैसे बाबा अनुभव बताते हैं - सोता हूँ तो भी बातें करता हूँ। बाबा आपकी तो कमाल है। भक्ति मार्ग में फिर हम आपको भूल ही जायेंगे। इतना वर्सा आपसे पाते हैं फिर सतयुग में यह भूल जायेंगे। फिर भक्ति मार्ग में आपका यादगार बनायेंगे। परन्तु आपका आक्यूपेशन बिल्कुल भूल जाते हैं। जैसे बुद्धू, अज्ञानी बन जाते हैं। अब बाप ने कितना ज्ञानी बनाया है। रात दिन का फ़र्क है। ईश्वर सर्वव्यापी है, यह कोई ज्ञान थोड़ेही है। ज्ञान तो सृष्टि चक्र का चाहिए। अब हम 84 का चक्र पूरा कर वापिस जाते हैं फिर हमको जीवनमुक्ति में आना है। ड्रामा से बाहर थोड़ेही निकल सकते हैं। हम हैं ही जीवनमुक्ति के राही। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

रात्रि क्लास - 16-12-68


किसको बाबा बच्ची कहते हैं, किसको माइयाँ कहते हैं; ज़रूर कुछ फ़र्क होगा। कोई की सर्विस से खुशबू आती है, कोई तो जैसे अक के फूल हैं। यह तो बाप ने समझाया है तुम जैसे हमारे साथ आये हो। ऊपर से बाप भी आये हैं विश्व को पावन बनाने। तुम्हारा भी यह कर्तव्य है। वहाँ से जो पहले आते हैं वह है पवित्र। नये आते वह ज़रूर खुशबू देते होंगे। बगीचे से भी भेंट करते हैं। जैसी सर्विस वैसा खुशबूदार फूल। विवेक कहता है शिव बाबा का बच्चा कहलाया और हकदार बना। तो वह खुशबू आनी चाहिए। हकदार है तब तो सभी को नमस्ते करते हैं। तुम विश्व के मालिक बेशक रहते हो, परन्तु पढ़ाई में फर्क तो बहुत रहता है। यह होना भी है ज़रूर। बच्चों को निश्चय हो जाता है यह बाबा है, और चक्र भी बुद्धि में है। तो बाप कहते हैं और जास्ती क्यों बतायें। बाप बिगर स्वदर्शन चक्रधारी कोई बना न सके। बनते हैं इशारे से। जो कल्प पहले बने हैं वही बनते हैं। ढेर के ढेर बच्चे आते हैं। पवित्रता के ऊपर कितने अत्याचार होते हैं! जिस द्वारा बाप गीता सुनाते हैं उनको कितनी गालियाँ देते हैं। शिवबाबा को भी गाली देते हैं। कच्छ, मच्छ अवतार कहना भी तो गाली है ना! न जानने के कारण बाप पर, तुम्हारे पर कितने कलंक लगाते हैं! बच्चे कितना माथा मारते हैं। पढ़ाई से कोई तो बहुत साहूकार हो जाते हैं, कितना कमाते हैं! एक-एक आपरेशन के दो हज़ार, 4 हज़ार मिल जाते हैं। कोई तो कुटुम्ब की पालना भी नहीं कर सकते। फिक्र है ना। कोई जन्म-जन्मान्तर बादशाही लेते हैं। कोई जन्म-जन्मान्तर के लिये ग़रीब बनते हैं। बाप कहते हैं तुमको समझदार बनाते हैं। अभी तुम सभी बात में कहेंगे ड्रामा है। सभी का पार्ट है। जो पास्ट हुआ सो ड्रामा। होता वही है जो ड्रामा में है। ड्रामा अनुसार जो कुछ होता है ठीक है। तुम कितना भी समझाओ, समझते ही नहीं हैं, इसमें मैनर्स भी अच्छे चाहिए। हरेक अपने अन्दर में देखे कोई खामी तो नहीं है? माया बहुत कड़ी है। उनको कैसे भी निकालना है। सभी खामियाँ निकालनी है। बाप कहते हैं बाँधेलियाँ सभी से जास्ती याद में रहती हैं। वही अच्छा पद पाती हैं। जितना जास्ती मार खाती हैं उतना जास्ती याद में रहती हैं। हाय शिवबाबा निकलेगा। ज्ञान से शिवबाबा को याद करते हैं। उन्हों का चार्ट अच्छा रहता है। ऐसे जो मार खाकर आते हैं वह सर्विस में भी अच्छे लग जाते हैं। अपना जीवन ऊंच बनाने लिये अच्छी सर्विस करते हैं। सर्विस न करें तो दिल खाती है। दिल टपकती है हम जावें सर्विस पर। भल समझते हैं सेन्टर छोड़कर जाना पड़ता है, परन्तु प्रदर्शनी में सर्विस बहुत है तो सेन्टर की भी परवाह न कर यह भागना चाहिए। जितना हम दान करेंगे उतना बल भी भरता रहेगा। दान भी ज़रूर करना है ना। यह हैं अविनाशी ज्ञान रत्न, जिनके पास होंगे वही दान करेंगे। बच्चों को अब सारी सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त का ज्ञान याद आ जाना चाहिए। सारा चक्र फिरना चाहिए। बाप भी इस सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त को जानने वाला है। ज़रूर ज्ञान का सागर है। सृष्टि के चक्र को जानने वाला है। यह दुनिया के लिए बिल्कुल नया ज्ञान है, जो कब पुराना बनता ही नहीं है। वण्डरफुल नॉलेज है ना जो बाप ही बताते हैं। कोई कितना भी साधू-महात्मा हो सीढ़ी चढ़कर ऊपर तो जाता ही नहीं। सिवाय बाप के मनुष्य गति-सद्गति दे न सके। न मनुष्य, न देवता दे सकते हैं। स़िर्फ एक बाप ही दे सकते हैं। दिन-प्रतिदिन वृद्धि होनी ही है। बाबा ने कहा था प्रभात-फेरी में यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र, सीढ़ी ट्रान्सलाइट का भी होना चाहिए। बिजली की ऐसी कोई चीज़ हो जिससे चमक आती रहे। स्लोगन भी बोलते जाओ। सन्यासी कब राजयोग सिखा नहीं सकते। राजयोग परमपिता परमात्मा ही सिखा रहे हैं भागीरथ द्वारा। ऐसे-ऐसे आवाज़ बहुत सुनेंगे। अच्छा! मीठे-मीठे बच्चों को गुडनाईट।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) यह नाटक अब पूरा हो रहा है इसलिए इस पुरानी दुनिया से उपराम रहना है। श्रीमत पर अपनी तकदीर ऊंच बनानी है। कभी कोई उल्टा कर्म नहीं करना है।

2) अविनाशी ज्ञान रत्नों की कमाई करनी और करानी है। एक बाप की याद में रह सपूत बच्चा बन अनेकों को रास्ता बताना है।

वरदान:दिव्य बुद्धि के वाहन द्वारा तीनों लोकों की सैर करने वाले ज्ञान स्वरूप विद्यापति भव!

दिव्य बुद्धि अर्थात् होलीहंस बुद्धि। हंस अर्थात् क्षीर और नीर को, मोती और पत्थर को पहचान मोती ग्रहण करने वाले। इसलिए होलीहंस संगमयुगी ज्ञान स्वरूप विद्या देवी, सरस्वती का वाहन है। आप सभी ज्ञान स्वरूप हो इसलिए विद्यापति या विद्या देवी हो। यह वाहन दिव्य बुद्धि की निशानी है। इस दिव्य बुद्धि के वाहन द्वारा आप तीनों लोकों का सैर करते हो। यह वाहन सभी वाहन से तीव्रगति वाला है।

स्लोगन:अपनी सर्वशक्तियों को अन्य आत्माओं के प्रति विल करना ही सर्व श्रेष्ठ सेवा है।

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Details ( Page:- Murali 06-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY -
06.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban

Mithe Mithe bacche -Abhi tumhari kaya bilkul purani ho gayi hai,Baap aaye hain tumhari kaya kalp briksh samaan banane,tum aadhakalp ke liye amar bante ho.

Q-Is wonderful naatak me kaun si baat bahut he samajhne ki hai?

A-Is naatak me jo bhi actors(Partdhari)hain unka chitra kebal ek baar he dekh sakte fir wohi chitra 5 hazaar varsh ke baad dekhenge.84 janmo ke 84 chitra banenge aur sabhi bhinn-bhinn honge.Karm bhi kiske saath mil nahi sakte.Jisne jo karm kiye woh fir 5 hazaar varsh baad wohi karm karenge,yah bahut he samajhne ki baatein hain.Tum baccho ki buddhi ka tala abhi khula hai.Tum yah raaz sabko samjha sakte ho.

Dharana ke liye mukhya saar:-

1) Hum nirakari aur sakari dono Baap ke sikiladhe noore ratna hain,hum Shiv Baba ke jeete ji waris bane hain,isi nashe me rehna hai.

2)Yog bal se biswa ki rajai leni hai,pavitrata ki rakhi baandhi hai to sahan bhi karna hai.Patit kabhi nahi banna hai.

Vardan:-Ek he sankalp me sthit ho mahathirt ki pratyaksta karne wale Jimmevar Aatma bhava

Slogan:-Antarmukhta ki bisheshta ko dharan kar lo to sarv ki duwayein milti rahegi.

 

ENGLISH SUMMARY - 06.01.18

Sweet children, your bodies have now become completely old. The Father has come to make your bodies as immortal as the kalpa tree. You will become immortal for half a cycle.

Q- Which aspect of this wonderful play is well worth understanding?

A- Only once, at this time, can you see the faces of all the actors of this play. You will see those same faces after 5000 years. There will be the 84 faces of 84 births and each one of them will be different. Even the performance of one cannot be the same as another’s. Whatever actions are performed, those actions will be repeated after 5000 years. These aspects are really worth understanding. Now that the locks on the intellects of you children have opened, you can explain these secrets to everyone.

Essence of Dharna

- 1. We are the lights of the eyes, the long-lost and now-found children of both the incorporeal and corporeal fathers. Maintain the intoxication of having become Shiv Baba’s heirs while alive.

-2. Claim the kingdom of the world with the power of yoga. Since you have had a rakhi tied for purity, you must tolerate a little. Don't ever become impure.

Blessing- May you be a responsible soul who reveals the great pilgrimage place by stabilizing in one thought.

--This Abu is a lighthouse for the world. In order to reveal this great pilgrimage place, every Brahmin soul has to have the one thought that all souls find their true destination here and that everyone is benefitted. When the lamp of this pure hope is ignited in each one and there is everyone’s co-operation, there will then be success is the task. Let the sound emerge in each one’s mind. This is my responsibility. When each one considers the self to be responsible in this way, the rays of revelation will then spread everywhere from Abba’s (Father’s) home.

Slogan -  Imbibe the speciality of introspection and you will continue to receive everyone’s blessings.

HINDI DETAIL MURALI


06/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - अभी तुम्हारी काया बिल्कुल पुरानी हो गई है, बाप आये हैं तुम्हारी काया कल्प वृक्ष समान बनाने, तुम आधाकल्प के लिए अमर बनते हो"

प्रश्न:इस वन्डरफुल नाटक में कौन सी बात बहुत ही समझने की है?

उत्तर:

इस नाटक में जो भी एक्टर्स (पार्टधारी) हैं उनका चित्र केवल एक बार ही देख सकते फिर वही चित्र 5 हजार वर्ष के बाद देखेंगे। 84 जन्मों के 84 चित्र बनेंगे और सभी भिन्न-भिन्न होंगे। कर्म भी किसके साथ मिल नहीं सकते। जिसने जो कर्म किये वह फिर 5 हजार वर्ष बाद वही कर्म करेंगे, यह बहुत ही समझने की बातें हैं। तुम बच्चों की बुद्धि का ताला अभी खुला है। तुम यह राज़ सबको समझा सकते हो।

गीत:-भोलेनाथ से निराला    …….ओम् शान्ति।

भोलानाथ सदैव शिवबाबा को कहा जाता है। शंकर को नहीं कहा जाता। वह तो विनाश करता है और शिवबाबा स्थापना करते हैं। यह तो जरूर है स्थापना स्वर्ग की और विनाश नर्क का करेंगे। तो ज्ञान सागर भोलानाथ शिव को ही कहेंगे। अब तुम बच्चे तो अनुभवी हो। जरूर कल्प पहले भी शिवबाबा आया होगा और अब आया है जरूर। उनको आना जरूर है क्योंकि नई मनुष्य सृष्टि को रचना है। इस ड्रामा के आदि मध्य अन्त का राज़ बताना है इसलिए जरूर यहाँ आना है। सूक्ष्मवतन में तो नहीं बतायेंगे। सूक्ष्मवतन की भाषा अलग है, मूलवतन में तो भाषा है नहीं। यहाँ है टाकी। शिवबाबा ही बिगड़ी को बनाने वाला है। जब सृष्टि तमोप्रधान हो जाती है तो सबको सद्गति देने वाला भगवान कहते हैं कि मुझे आना पड़ता है। यादगार भी यहाँ हैं। इस नाटक में जो-जो मनुष्य के चित्र हैं वह एक ही बार देख सकते हैं। ऐसे नहीं कि लक्ष्मी-नारायण के चित्र (चेहरे) सतयुग के सिवाए कभी भी कहाँ देख सकते हैं। वह पुनर्जन्म लेंगे तो नाम रूप भिन्न हो जायेगा। वही लक्ष्मी-नारायण का रूप एक बार देखा फिर 5 हजार वर्ष के बाद ही देखेंगे। जैसे गांधी का हूबहू चित्र फिर 5 हजार वर्ष के बाद देखेंगे। अथाह मनुष्य हैं जो भी मनुष्यों के चित्र अब देखे हैं वह फिर 5 हजार वर्ष के बाद देखेंगे। 84 जन्मों के लिए 84 चित्र बनेंगे। और सभी भिन्न-भिन्न होंगे। कर्म भी किसके साथ नहीं मिल सकते। जिसने जो कर्म किया, वही कर्म 5 हजार वर्ष के बाद फिर करेंगे। यह बहुत समझने की बातें हैं। बाबा का भी चित्र है। हम समझते हैं जरूर पहले-पहले सृष्टि रचने वह आया होगा। तुम्हारी बुद्धि का ताला अब खुला है तब तुम समझते हो। अब फिर औरों का भी ऐसे ताला खोलना है। निराकार बाप जरूर परमधाम में रहते होंगे। जैसे तुम भी सब मेरे साथ रहते हो। पहले जब मैं आता हूँ तो मेरे साथ ब्रह्मा, विष्णु, शंकर होते हैं। मनुष्य सृष्टि तो पहले से ही है फिर वह कैसे पलटा खाती है, रिपीट कैसे होती है। पहले-पहले जरूर सूक्ष्मवतन रचना पड़े फिर स्थूलवतन में आना पड़े क्योंकि मनुष्य जो देवता थे, वह अब शूद्र बने हैं। उन्हों को फिर ब्राह्मण से देवता बनाना पड़े। तो जो कल्प पहले मैंने ज्ञान दिया था फिर वही रिपीट करूंगा। इस समय बैठ राजयोग सिखाता हूँ। फिर आधाकल्प के बाद भक्ति आरम्भ होती है। बाप खुद बैठ समझाते हैं कि पुरानी सृष्टि फिर नई कैसे बनती है। अन्त से फिर आदि कैसे होती है। मनुष्य समझते हैं परमात्मा आया था परन्तु कब, कैसे आया। आदि-मध्य-अन्त का राज़ कैसे खोला, यह नहीं जानते।

बाप कहते हैं फिर मैं सम्मुख आया हूँ - सभी को सद्गति देने। माया रावण ने सभी की किस्मत बिगाड़ दी है तो बिगड़ी को बनाने वाला जरूर कोई चाहिए। बाप कहते हैं 5 हजार वर्ष पहले भी ब्रह्मा तन में आया था। मनुष्य सृष्टि जरूर यहाँ ही रची है। यहाँ आकर सृष्टि को पलटाए काया कल्प वृक्ष समान बनाते हैं। अब तुम्हारी काया बिल्कुल पुरानी हो गयी है, इसको फिर ऐसा बनाते हैं जो आधाकल्प के लिए तुम अमर बन जाते हो। भल शरीर बदलते हो परन्तु खुशी से। जैसे पुराना चोला छोड़ नया लेते हैं। वहाँ ऐसे नहीं कहेंगे कि फलाना मर गया, उनको मरना नहीं कहा जाता है। जैसे तुम्हारा यह जीते जी मरना है तो तुम मरे थोड़ेही हो। तुम तो शिवबाबा के बने हो। बाबा कहते हैं तुम मेरे नूरे रत्न, सिकीलधे बच्चे हो। शिवबाबा भी कहते तो ब्रह्मा बाबा भी कहते हैं। वह निराकारी बाप, यह साकारी बाप। अभी तुम कहते हो बाबा आप भी वही हो ना। हम भी वही हैं, जो फिर आकर मिले हैं। बाप कहते हैं मैं आकर स्वर्ग स्थापन करता हूँ। राजाई तो जरूर चाहिए इसलिए राजयोग सिखाता हूँ। पीछे तो तुमको राजाई मिल जायेगी फिर इस ज्ञान की वहाँ दरकार नहीं रहती। फिर यह शास्त्र आदि सब भक्ति में काम आते हैं, पढ़ते रहते हैं। जैसे कोई बड़े आदमी हिस्ट्री-जॉग्राफी लिख जाते हैं, वह पीछे पढ़ते रहते हैं। अथाह किताब हैं। मनुष्य पढ़ते ही रहते हैं। स्वर्ग में तो कुछ भी नहीं होगा। वहाँ तो भाषा ही एक होगी। तो बाबा कहते हैं अब मैं आया हूँ सृष्टि को नया बनाने। पहले नई थी, अब पुरानी हो गई है। मेरे सब पुत्रों को (बच्चों को) माया ने जलाए राख कर दिया था। वह दिखाते हैं सगर के बच्चे... ज्ञान सागर तो बरोबर है, उनके तुम बच्चे हो। भल बच्चे तो वास्तव में सभी हैं परन्तु तुम बच्चे अब प्रैक्टिकल में गाये जाते हो। तुम्हारे कारण ही बाप आते हैं। कहते हैं मैं आया हूँ फिर से तुम बच्चों को सुरजीत करने। जो बिल्कुल काले, पत्थरबुद्धि हो गये हैं उनको फिर से आकर पारसबुद्धि बनाता हूँ। तुम जानते हो इस ज्ञान से हम पारसबुद्धि कैसे बनते हैं। जब तुम पारसबुद्धि बन जायेंगे तब यह दुनिया भी पत्थरपुरी से बदल पारसपुरी बन जायेगी, जिसके लिए बाबा पुरुषार्थ कराते रहते हैं। तो बाबा को जरूर मनुष्य सृष्टि रचने के लिए यहाँ ही आना पड़ेगा ना। जिसके तन में आते हैं, उन द्वारा मुख वंशावली बनाते हैं। तो यह हो गई माता। कितनी गुह्य बात है। है तो यह मेल, इनमें बाबा आते हैं तो यह माता कैसे हुई, इसमें मूंझेंगे जरूर।

तुम सिद्ध कर बताते हो कि यह मात-पिता, ब्रह्मा सरस्वती दोनों कल्प वृक्ष के नीचे बैठे हैं, राजयोग सीख रहे हैं तो जरूर उन्हों का गुरू चाहिए। ब्रह्मा सरस्वती और बच्चे सभी को राजऋषि कहते हैं। राजाई के लिए योग लगाते हैं। बाप आकर राजयोग और ज्ञान सिखाते हैं जो और कोई भी सिखा सके। कोई का राजयोग है। वह तो सिर्फ कहेंगे योग सीखो। हठयोग तो अनेक प्रकार के होते हैं। राजयोग कोई सन्यासी, उदासी सिखला सके। भगवान ने आकर राजयोग सिखाया था। कहते हैं हमको कल्प-कल्प फिर आना पड़ता है जबकि मनुष्य सृष्टि नई रचनी है। प्रलय तो होती नहीं। अगर प्रलय हो जाए तो फिर हम आवें किसमें? निराकार क्या आकर करेंगे? बाप समझाते हैं सृष्टि तो पहले से ही है। भक्त भी हैं, भगवान को बुलाते भी हैं, इससे सिद्ध है कि भक्त हैं। भगवान को आना ही तब है जब भक्त बहुत दु:खी हैं, कलियुग का अन्त है। रावण राज्य खत्म होना है, तब ही मुझे आना पड़ता है। बरोबर इस समय सभी दु:खी हैं। महाभारी लड़ाई सामने खड़ी है।

यह पाठशाला है। यहाँ एम आबजेक्ट है। तुम जानते हो सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था फिर सिंगल ताज वालों का राज्य हुआ फिर और-और धर्म वृद्धि को पाये हैं फिर राजाई आदि बढ़ाने के लिए युद्ध आदि हुए। तुम जानते हो जो पास्ट हो गया, वह फिर रिपीट होगा। फिर लक्ष्मी-नारायण का राज्य आरम्भ होगा। बाबा वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी का राज़ पूरा समझाते हैं। डिटेल में जाने की दरकार नहीं। जानते हैं कि हम सूर्यवंशी हैं तो जरूर पुनर्जन्म भी सूर्यवंशी में ही लेते होंगे। नाम रूप तो बदलते होंगे। माँ बाप भी दूसरे मिलेंगे, यह सारा ड्रामा बुद्धि में रखना है। बाप कैसे आता है वह भी समझ लिया। मनुष्यों की बुद्धि में वही गीता का ज्ञान है। आगे हमारी बुद्धि में भी वही पुराना गीता का ज्ञान था। अभी बाप गुह्य बातें सुनाते हैं जो सुनते-सुनते सारे राज़ समझ गये हैं। मनुष्य भी कहते हैं आगे आपका ज्ञान और था, अब बहुत अच्छा है। अब समझ गये हैं कि कैसे गृहस्थ व्यवहार में रह कमल फूल समान बनना है। यह सबका अन्तिम जन्म है। मरना भी सबको है। खुद बेहद का बाप कहते हैं तुम पवित्र बनने की प्रतिज्ञा करो तो 21 जन्म के लिए स्वर्ग के मालिक बनेंगे। यहाँ तो कोई पदमपति हैं तो भी दु:खी हैं। काया कल्पतरू होती नहीं। तुम्हारी काया कल्पतरू होती है। तुम 21 जन्म मरते नहीं। बाप कहते हैं यहाँ आयेंगे भी वही जो सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी काम चिता पर बैठ सांवरे हो गये हैं इसलिए राधे कृष्ण, नारायण सबको सांवरा दिखाते हैं। अभी तो सभी सांवरे हैं। काम चिता पर बैठने से सांवरे हो गये हैं। अब तुमको काम चिता से उतरकर ज्ञान चिता पर बैठना है। विष का हथियाला कैन्सिल कर ज्ञान अमृत का हथियाला बांधना है। समझाना ऐसे है जो वह कहे कि तुम तो शुभ कार्य कर रहे हो। जब तक कुमार कुमारी है तो उनको मूतपलीती नहीं कहेंगे। बाप कहते हैं तुमको गन्दा कभी नहीं बनना है। आगे चलकर ढेर आयेंगे, कहेंगे यह बहुत अच्छा है - ज्ञान चिता पर बैठने से तो हम स्वर्ग के मालिक बनेंगे। अक्सर ब्राह्मण ही सगाई कराते हैं। राजाओं के पास भी ब्राह्मण रहते हैं, उन्हों को राजगुरू कहते हैं। आजकल तो सन्यासी भी हथियाला बांधते हैं। तुम जब यह ज्ञान की बातें सुनाते हो तो लोग बहुत खुश होते हैं। झट राखी भी बंधवा लेते हैं। फिर घर में झगड़ा भी होता है। कुछ सहन तो जरूर करना पड़े।

तुम हो गुप्त शिव शक्ति सेना। तुम्हारे पास कोई हथियार नहीं, देवियों को बहुत हथियार दिखाते हैं। यह सब हैं ज्ञान की बातें। यहाँ है ही योगबल की बातें। तुम योगबल से विश्व की बादशाही लेते हो। बाहुबल से हद की राजाई मिलती है। बेहद की राजाई तो बेहद का मालिक ही देंगे। लड़ाई की कोई बात नहीं। बाप कहते हैं मैं कैसे लड़ाऊंगा। मैं तो लड़ाई झगड़ा मिटाने के लिए आया हूँ फिर इनका नाम-निशान भी नहीं रहता, तब तो परमात्मा को सब याद करते हैं। कहते हैं मेरी लाज़ रखो फिर भी एक में निश्चय नहीं तो और-और को पकड़ते रहते हैं। कहते हैं हमारे में भी ईश्वर है फिर अपने में भी विश्वास नहीं रखते, गुरू करते हैं। जब तुम्हारे में भगवान है तो गुरू क्यों करते हो। यहाँ तो बात ही न्यारी है। बाप कहते हैं कल्प पहले भी मैं ऐसे ही आया था जैसे अब आया हूँ। अब तुम जानते हो कि रचता बाप कैसे बैठ रचना करते हैं, यह भी ड्रामा है। जब तक इस चक्र को नहीं जाना तब तक कैसे जानें कि आगे क्या होना है। कहते हैं यह कर्मक्षेत्र है। हम निराकारी दुनिया से पार्ट बजाने आये हैं। तो तुमको सारे ड्रामा के क्रियेटर, डायरेक्टर का मालूम होना चाहिए। हम सब एक्टर्स तो जान गये हैं कि यह ड्रामा कैसे बना हुआ है, यह सृष्टि कैसे वृद्धि को पाती है, जबकि अब कलियुग का अन्त है तो जरूर सतयुग स्थापन होना चाहिए। इस चक्र की समझानी बिल्कुल ठीक है जो ब्राह्मण कुल के होंगे वह समझ जायेंगे। फिर भी यह प्रजापिता है तो अपना कुल बढ़ता ही जायेगा। बढ़ना तो है ही। कल्प पहले मुआफिक सब पुरूषार्थ करते ही रहते हैं। हम साक्षी होकर देखते हैं। हर एक को अपना मुखड़ा आइने में देखते रहना है - कहाँ तक हम लायक बने हैं - सतयुग में राजधानी लेने के? यह कल्प-कल्प की बाज़ी है, जो जितनी सर्विस करेंगे, तुम हो बेहद के रूहानी सोशल वर्कर्स। तुम सुप्रीम रूह की मत पर चलते हो। ऐसे अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स धारण करनी हैं। बाप आकर काल के पंजे से छुड़ाते हैं। वहाँ मृत्यु का नाम नहीं, यह है मृत्युलोक, वह है अमरलोक। यहाँ आदि-मध्य-अन्त दु: है, वहाँ दु: का नाम-निशान नहीं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) हम निराकारी और साकारी दोनों बाप के सिकीलधे नूरे रत्न हैं, हम शिवबाबा के जीते जी वारिस बने हैं, इसी नशे में रहना है।

2) योगबल से विश्व की राजाई लेनी है, पवित्रता की राखी बांधी है तो सहन भी करना है। पतित कभी नहीं बनना है।

वरदान:एक ही संकल्प में स्थित हो महातीर्थ की प्रत्यक्षता करने वाले जिम्मेवार आत्मा भव!

यह आबू विश्व के लिए लाइट हाउस है। इस महातीर्थ की प्रत्यक्षता करने के लिए सर्व ब्राह्मण बच्चों का एक ही संकल्प हो कि हर आत्मा को यहाँ से ठिकाना मिले। सबका कल्याण हो। जब यह शुभ आशाओं का दीपक हर एक के अन्दर जगे, सबका सहयोग हो तब कार्य में सफलता हो। सबके मन से यह आवाज निकले कि यह मेरी जिम्मेवारी है। जब हर एक स्वयं को ऐसा जिम्मेवार समझेंगे तब प्रत्यक्षता की किरण अब्बा के घर से चारों ओर फैलेगी।

स्लोगन:अन्तर्मुखता की विशेषता को धारण कर लो तो सर्व की दुआयें मिलती रहेंगी।

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Details ( Page:- Murali 07-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 07.01.18     
Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban( 17/04/83 )
 Karmatit sthiti ke lie sametne aur samane ki shaktiyan ki aabsyakta
Vardan – Pavitrata ki vishesh dharna dwara atindriya sukh ka anubhav karnewale brahmachari bhav.
Slogan – Sewa mei trikaldarshi ka sense aur ruhaniyat ka essense bharnewale hi serviceable hai.
 
ENGLISH SUMMARY - 07.01.18     
"The need for the powers to pack up and to accommodate, in order to attain the karmateet stage."
Blessing:May you be celibate and with the special inculcation of purity, experience supersensuous joy.
The special inculcation of Brahmin life is purity. This is the special basis of constant supersensuous joy and sweet silence. Purity is not just celibacy, but to be constantly celibate means to follow the footsteps of the teachings of Father Brahma at every step. Let the steps of your every thought, word and deed be in the footsteps of Father Brahma. The faces and activities of those who are Brahma-achari (following the footsteps of Father Brahma) will give the experience of them being constantly introspective and having supersensuous joy.
Slogan:Those who have the sense of being trikaldarshi and the essence of spirituality in their attitude to service are serviceable.
 
HINDI DETAIL MURALI

07/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन ( 14-03-83 )

 
"कर्मातीत स्थिति के लिए समेटने और समाने की शक्तियों की आवश्यकता"
 
आवाज से परे अपनी श्रेष्ठ स्थिति को अनुभव करते हो? वह श्रेष्ठ स्थिति सर्व व्यक्त आकर्षण से परे शक्तिशाली न्यारी और प्यारी स्थिति है। एक सेकण्ड भी इस श्रेष्ठ स्थिति में स्थित हो जाओ तो उसका प्रभाव सारा दिन कर्म करते हुए भी स्वयं में विशेष शान्ति की शक्ति अनुभव करेंगे। इसी स्थिति को कर्मातीत स्थिति, बाप समान सम्पूर्ण स्थिति कहा जाता है। इसी स्थिति द्वारा हर कार्य में सफलता का अनुभव कर सकते हो। ऐसी शक्तिशाली स्थिति का अनुभव किया है? ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है कर्मातीत स्थिति को पाना। तो लक्ष्य को प्राप्त करने के पहले अभी से इसी अभ्यास में रहेंगे तब ही लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। इसी लक्ष्य को पाने के लिए विशेष स्वयं में समेटने की शक्ति, समाने की शक्ति आवश्यक है क्योंकि विकारी जीवन वा भक्ति की जीवन दोनों में जन्म-जन्मान्तर से बुद्धि को विस्तार में भटकने का संस्कार बहुत पक्का हो गया है इसलिए ऐसे विस्तार में भटकने वाली बुद्धि को सार रूप में स्थित करने के लिए इन दोनों शक्तियों की आवश्यकता है। शुरू से देखो - अपने देह के भान के कितने वैरायटी प्रकार के विस्तार हैं। उसको तो जानते हो ना! मैं बच्चा हूँ, मैं जवान हूँ, मैं बुजुर्ग हूँ। मैं फलाने-फलाने आक्यूपेशन वाला हूँ। इसी प्रकार के देह की स्मृति के विस्तार कितने हैं! फिर सम्बन्ध में आओ कितना विस्तार है। किसका बच्चा है तो किसका बाप है, कितने विस्तार के सम्बन्ध हैं। उसको वर्णन करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जानते हो। इसी प्रकार देह के पदार्थो का भी कितना विस्तार है! भक्ति में अनेक देवताओं को सन्तुष्ट करने का कितना विस्तार है। लक्ष्य एक को पाने का है लेकिन भटकने के साधन अनेक हैं। इतने सभी प्रकार के विस्तार को सार रूप में लाने के लिए समाने की वा समेटने की शक्ति चाहिए। सर्व विस्तार को एक शब्द से समा देते। वह क्या? बिन्दू। मैं भी बिन्दू, बाप भी बिन्दू। एक बाप बिन्दू में सारा संसार समाया हुआ है। यह तो अच्छी तरह से अनुभवी हो ना। संसार में एक है सम्बन्ध, दूसरी है सम्पत्ति। दोनों विशेषतायें बिन्दू बाप में समाई हुई हैं। सर्व सम्बन्ध एक द्वारा अनुभव किया है? सर्व सम्पत्ति की प्राप्ति सुख-शान्ति, खुशी यह भी अनुभव किया है या अभी करना है? तो क्या हुआ? विस्तार सार में समा गया ना! अपने आप से पूछो अनेक तरफ विस्तार में भटकने वाली बुद्धि समेटने की शक्ति के आधार पर एक में एकाग्र हो गई है? वा अभी भी कहाँ विस्तार में भटकती है! समेटने की शक्ति और समाने की शक्ति का प्रयोग किया है? या सिर्फ नॉलेज है! अगर इन दोनों शक्तियों को प्रयोग करना आता है तो उसकी निशानी सेकण्ड में जहाँ चाहे जब चाहे बुद्धि उसी स्थिति में स्थित हो जायेगी। जैसे स्थूल सवारी में पॉवरफुल ब्रेक होती है तो उसी सेकण्ड में जहाँ चाहें वहाँ रोक सकते हैं। जहाँ चाहें वहाँ गाड़ी को या सवारी को उसी दिशा में ले जा सकते हैं। ऐसे स्वयं यह शक्ति अनुभव करते हो वा एकाग्र होने में समय लगता है? वा व्यर्थ से समर्थ की ओर मेहनत लगती है तो समझो इन दोनों शक्तियों की कमी है। संगमयुग के ब्राह्मण जीवन की विशेषता है ही सार रूप में स्थित हो - सदा सुख-शान्ति के, खुशी के, ज्ञान के, आनन्द के झूले में झूलना। सर्व प्राप्तियों के सम्पन्न स्वरूप के अविनाशी नशे में स्थित रहो। सदा चेहरे पर प्राप्ति ही प्राप्ति है, उस सम्पन्न स्थिति की झलक और फलक दिखाई दे। जब सिर्फ स्थूल धन से सम्पन्न विनाशी राजाई प्राप्त करने वाले राजाओं के चेहरे पर भी द्वापर के आदि में वह चमक थी। यहाँ तो अविनाशी प्राप्ति है। तो कितनी रूहानी झलक और फलक चेहरे से दिखाई देगी! ऐसे अनुभव करते हो? वा सिर्फ अनुभव सुन करके खुश होते हो! पाण्डव सेना विशेष है ना! पाण्डव सेना को देख हर्षित जरूर होते हैं। लेकिन पाण्डवों की विशेषता - सदा बहादुर दिखाते हैं, कमज़ोर नहीं। अपने यादगार चित्र देखे हैं ना। चित्रों में भी महावीर दिखाते हैं ना। तो बापदादा भी सभी पाण्डवों को विशेष रूप से, सदा विजयी, सदा बाप के साथी अर्थात् पाण्डवपति के साथी, बाप समान मास्टर सर्वशक्तिवान स्थिति में सदा रहें, यही विशेष स्मृति का वरदान दे रहे हैं। भले नये भी आये हो लेकिन हो तो कल्प पहले के अधिकारी आत्मायें इसलिए सदा अपने सम्पूर्ण अधिकार को पाना ही है - इस नशे और निश्चय में सदा रहना। समझा। अच्छा!
 
सदा सेकण्ड में बुद्धि को एकाग्र कर सर्व प्राप्ति को अनुभव कर, सदा सर्व शक्तियों को समय प्रमाण प्रयोग में लाते सदा एक बाप में सारा संसार अनुभव करने वाले, ऐसे सम्पन्न और समान श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
 
पार्टियों के साथ

1- अधरकुमारों के साथ:- ऐसा श्रेष्ठ भाग्य कभी अपने लिए सोचा था? कभी उम्मीद भी नहीं थी कि इतना श्रेष्ठ भाग्य हमें प्राप्त हो सकता है लेकिन नाउम्मीद आत्माओं को बाप ने उम्मीदवार बना दिया। नाउम्मीदी का समय अब समाप्त हो गया। अभी हर कदम में उम्मीद रहती है कि हमारी सफलता है ही। यह संकल्प तो नहीं आता कि पता नहीं होगी या नहीं होगी? किसी भी कार्य में चाहे स्वयं के पुरूषार्थ में, चाहे सेवा में, दोनों में नाउम्मीदी का संस्कार समाप्त हो जाए। कोई भी संस्कार चाहे काम का, चाहे लोभ का, चाहे अहंकार का, बदलने में नाउम्मीदी न आए। ऐसे नहीं मैं तो बदल ही नहीं सकता, यह तो बदलना बड़ा मुश्किल है। ऐसा संकल्प भी न आये क्योंकि अगर अभी नहीं खत्म करेंगे तो कब करेंगे? अभी दशहरा है ना। सतयुग में तो दीपमाला हो जायेगी। रावण को खत्म करने का दशहरा अभी है। इसमें सदा विजय का उमंग-उत्साह रहे। नाउम्मीदी के संस्कार नहीं। कोई भी मुश्किल कार्य इतना सहज अनुभव हो जैसे कोई बड़ी बात ही नहीं है क्योंकि अनेक बार कार्य कर चुके हैं। कोई नई बात नहीं कर रहे हैं। कई बार की हुई को रिपीट कर रहे हैं। तो सदा उम्मीदवार। नाउम्मीद का नामनिशान भी न रहे। कभी कोई स्वभाव-संस्कार में संकल्प न आये कि पता नहीं यह परिवर्तन होगा या नहीं होगा। सदा के विजयी, कभी-कभी के नहीं। अगर कोई स्वप्न में भी कमी हो तो उसको सदा के लिए समाप्त कर देना। नाउम्मीद को सदा के लिए उम्मीद में बदल देना। निश्चय अटूट है तो विजय भी सदा है। निश्चय में जब क्यों, क्या आता तो विजय अर्थात् प्राप्ति में भी कुछ न कुछ कमी पड़ जाती है तो सदा उम्मीदवार, सदा विजयी। नाउम्मीदों को सदाकाल के लिए उम्मीदों में बदलने वाले।
 
2- सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें, पुरूषोत्तम आत्मायें वा ब्राह्मण चोटी महान आत्मायें समझते हो? अभी से पुरूषोत्तम बन गये ना। दुनिया में और भी पुरूष हैं लेकिन उन्हों से न्यारे और बाप के प्यारे बन गये इसलिए पुरूषोत्तम बन गये। औरों के बीच में अपने को अलौकिक समझते हो ना! चाहे सम्पर्क में लौकिक आत्माओं के आते लेकिन उनके बीच में रहते हुए भी मैं अलौकिक न्यारी हूँ यह तो कभी नहीं भूलना है ना! क्योंकि आप बन गये हो हंस, ज्ञान के मोती चुगने वाले होलीहंस हो। वह हैं गन्द खाने वाले बगुले। वे गन्द ही खाते, गन्द ही बोलते... तो बगुलों के बीच में रहते हुए अपना होलीहंस जीवन कभी भूल तो नहीं जाते! कभी उसका प्रभाव तो नहीं पड़ जाता? वैसे तो उसका प्रभाव उन पर पड़ना चाहिए, उनका आप पर नहीं। तो सदा अपने को होलीहंस समझते हो? होलीहंस कभी भी बुद्धि द्वारा सिवाए ज्ञान के मोती के और कुछ स्वीकार नहीं कर सकते। ब्राह्मण आत्मायें जो ऊंच हैं, चोटी हैं वह कभी भी नीचे की बातें स्वीकार नहीं कर सकते। बगुले से होलीहंस बन गये। तो होलीहंस सदा स्वच्छ, सदा पवित्र। पवित्रता ही स्वच्छता है। हंस सदा स्वच्छ हैं सदा सफेद-सफेद। सफेद भी स्वच्छता वा पवित्रता की निशानी है। आपकी ड्रेस भी सफेद है। यह प्युरिटी की निशानी है। किसी भी प्रकार की अपवित्रता है तो होलीहंस नहीं। होलीहंस संकल्प भी अशुद्ध नहीं कर सकते। संकल्प भी बुद्धि का भोजन है। अगर अशुद्ध वा व्यर्थ भोजन खाया तो सदा तन्दरूस्त नहीं रह सकते। व्यर्थ चीज को फेंका जाता, इकट्ठा नहीं किया जाता इसलिए व्यर्थ संकल्प को भी समाप्त करो, इसी को ही होलीहंस कहा जाता है। अच्छा।
 
पाण्डवों से - पाण्डव अर्थात् संकल्प और स्वप्न में भी हार न खाने वाले। विशेष यह स्लोगन याद रखना कि पाण्डव अर्थात् सदा विजयी। स्वप्न भी विजय का आये। इतना परिवर्तन करना। सभी जो बैठे हो विजयी पाण्डव हो। वहाँ जाकर हार खा ली, यह पत्र तो नहीं लिखेंगे। माया आ नहीं जाती लेकिन आप उसे खुद बुलाते हो। कमजोर बनना अर्थात् माया को बुलाना। तो किसी भी प्रकार की कमजोरी माया को बुलाती है। तो पाण्डवों ने क्या प्रतिज्ञा की? सदा विजयी रहेंगे। हार खाकरके छिपना नहीं, लेकिन सदा विजयी रहना। ऐसे प्रतिज्ञा करने वालों को सदा बापदादा की बधाई मिलती रहती है। सदा वाह-वाह के गीत बाप ऐसे बच्चों के लिए गाते रहते हैं। तो वाह-वाह के गीत सुनेंगे ना सभी। हार होगी तो हाय-हाय करेंगे, विजयी होंगे तो वाह-वाह करेंगे। सब विजयी, सारे ग्रुप में एक भी हार खाने वाला नहीं। अच्छा - ओम् शान्ति।
 
मास्टर दाता बनो (अव्यक्त महावाक्य)

बापदादा अब बच्चों से यही चाहते हैं कि हर एक बच्चा मास्टर दाता बनें। जो बाप से लिया है, वह औरों को दो। आत्माओं से लेने की भावना नहीं रखो। रहमदिल बन अपने गुणों का, शक्तियों का सबको सहयोग दो, फ्राकदिल बनो। जितना दूसरों को देते जायेंगे उतना बढ़ता जायेगा। विनाशी खजाना देने से कम होता है और अविनाशी खजाना देने से बढ़ता है-एक दो, हजार पाओ।
 
मास्टर दाता अर्थात् सदा भरपूर, सम्पन्न। जिसके पास अनुभूतियों का खजाना सम्पन्न होगा, वह सम्पन्न मूर्तियां स्वत: ही मास्टर दाता बन जाती हैं। दाता अर्थात् सेवाधारी। दाता देने के बिना रह नहीं सकते। वे अपने रहमदिल के गुण से किसी को हिम्मत देंगे तो किसी निर्बल आत्मा को बल देंगे। वह मास्टर सुखदाता होंगे। सदा यह स्मृति रहे कि हम सुखदाता के बच्चे मास्टर सुखदाता हैं। जो दाता हैं, उसके पास है तभी तो देंगे। यदि किसके पास अपने खाने के लिए ही नहीं हो, तो वह दाता कैसे बनेंगे इसलिए जैसा बाप वैसे बच्चे। बाप को सागर कहते हैं। सागर अर्थात् बेहद, खुटता नहीं। ऐसे आप भी मास्टर सागर हो, नदी-नाले नहीं। तो बाप समान नि:स्वार्थ भावना से देते जाओ। अशान्ति के समय पर मास्टर शान्ति-दाता बन औरों को भी शान्ति दो, घबराओ नहीं, क्योंकि जानते हो कि जो हो रहा है वो भी अच्छा और जो होना है वह और अच्छा। विकारों के वशीभूत मनुष्य तो लड़ते ही रहेंगे। उनका काम ही यह है। लेकिन आपका काम है-ऐसी आत्माओं को शान्ति देना क्योंकि विश्व कल्याणकारी हो। विश्व-कल्याणकारी आत्मायें सदा मास्टर दाता बन देती रहती हैं। हर एक को सहयोग, स्नेह, सहानुभूति देना ही लेना है।
 
वर्तमान समय में सभी को अविनाशी खुशी की आवश्यकता है, सब खुशी के भिखारी हैं और आप दाता के बच्चे हो। दाता के बच्चों का काम है-देना। जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आये-खुशी बांटते जाओ, देते जाओ। कोई खाली नहीं जाये, इतना भरपूर बनो। अब सारे विश्व की आत्मायें सुख-शान्ति की भीख मांगने के लिये आपके सामने आने वाली हैं। आप दाता के बच्चे मास्टर दाता बन सबको मालामाल करेंगे। तो पहले से स्वयं के भण्डारे सर्व खजानों से भरपूर करते जाओ। आप श्रेष्ठ आत्मायें संगम पर अखुट और अखण्ड महादानी बनो। निरन्तर स्मृति में रखो कि मैं दाता का बच्चा अखण्ड महादानी आत्मा हूँ। कोई भी आत्मा आपके सामने आये चाहे अज्ञानी हो, चाहे ब्राह्मण हो लेकिन कुछ न कुछ सबको देना है। राजा का अर्थ ही है दाता। तो एक सेकण्ड भी दान देने के बिना रह नहीं सकते। ब्राह्मण आत्माओं के पास ज्ञान तो पहले ही है लेकिन उनके प्रति दो प्रकार से दाता बनो:- 1- जिस आत्मा को, जिस शक्ति की आवश्यकता हो, उस आत्मा को मन्सा द्वारा अर्थात् शुद्ध वृत्ति, वायब्रेशन्स द्वारा शक्तियों का दान अर्थात् सहयोग दो। 2- कर्म द्वारा सदा स्वयं जीवन में गुण मूर्त बन, प्रत्यक्ष सैम्पल बन औरों को सहज गुण धारण करने का सहयोग दो। दान का अर्थ है सहयोग देना।
 
वर्तमान समय आपस में विशेष कर्म द्वारा गुणदाता बनने की आवश्यकता है। तो संकल्प करो कि मुझे सदा गुण मूर्त बन सबको गुण मूर्त बनाने का विशेष कर्तव्य करना ही है। ज्ञान तो बहुत है, अभी गुणों को इमर्ज करो, सर्वगुण सम्पन्न बनने और बनाने का एग्जाम्पल बनो। दाता के बच्चे हो तो जिसे जो चाहिए वह देते चलो। कोई भी खाली नहीं जाये। अथाह ख़ज़ाना है। किसी को खुशी चाहिये, स्नेह चाहिये, शक्ति चाहिए, तो देते जाओ। अब आप बच्चों में यह शुभ संकल्प इमर्ज हो कि दाता के बच्चे बन सभी आत्माओं को वर्सा दिलाने के निमित्त बनें, कोई वंचित नहीं रहे। चाहे कोई कैसा भी है लेकिन बाप का तो है। आप दाता के बच्चे हो तो फ्राकदिली से बांटो। जो अशान्ति, दु:ख में भटक रहे हैं वो आपका परिवार हैं। परिवार को सहयोग दिया जाता है। तो वर्तमान समय महादानी बनने के लिये विशेष रहमदिल के गुण को इमर्ज करो। किसी से भी लेने की इच्छा नहीं रखो कि वो अच्छा बोले, अच्छा माने तो दें। नहीं। मास्टर दाता बन वृत्ति द्वारा, वायब्रेशन्स द्वारा, वाणी द्वारा देते जाओ। बेहद के दाता बन वर्ल्ड के गोले पर खड़े हो, बेहद की सेवा में वायब्रेशन फैलाओ। महान दाता बनो। बेहद में जाओ तो हदों की बातें स्वत: समाप्त हो जायेंगी। अच्छा।
 
वरदान:पवित्रता की विशेष धारणा द्वारा अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने वाले ब्रह्माचारी भव!
ब्राह्मण जीवन की विशेष धारणा पवित्रता है, यही निरन्तर अतीन्द्रिय सुख और स्वीट साइलेन्स का विशेष आधार है। पवित्रता सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं लेकिन ब्रह्मचारी और सदा ब्रह्माचारी अर्थात् ब्रह्मा बाप के आचरण पर हर कदम चलने वाले। संकल्प, बोल और कर्म रूपी कदम ब्रह्मा बाप के कदम ऊपर कदम हो, ऐसे जो ब्रह्माचारी हैं उनका चेहरा और चलन सदा ही अन्तर्मुखी और अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति करायेगा।

स्लोगन:सेवा में त्रिकालदर्शी का सेन्स और रुहानियत का इसेन्स भरने वाले ही सर्विसएबुल हैं।

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Details ( Page:- Murali 08-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 08.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche -Jitna-jitna dusro ko gyan soonayenge utna tumhari buddhi me gyan refine hota jayega,isiliye service zaroor karni hai.
Q-Baap ke paas do prakar ke bacche kaun se hain,un dono me antar kya hai?
A- Baap ke paas ek hai lagey(soutele) bacche,dusre hain sagey(matele) bacche.Lagey bacche-mukh se sirf Baba mamma kehte lekin Shrimat par poora nahi chal sakte.Pora-poora balihaar nahi jate.Sagey bacche to tan-mann dhan se poorn samarpan arthat trusty hote hain.Kadam-kadam shrimat par chalte hain.Lagey bacche seva na karne ke kaaran chalte-chalte gir padte hain.Sansay aa jata hai.Sagey bacche poora nischay buddhi hote hain.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1)Abinashi gyan ratno ka mahadani banna hai.Tan-mann-dhan se Bharat ko swarg banane ki seva karni hai.
2)Koi bhi destructive(binashkari) karya nahi karna hai.Nirantar yaad ke abhyas me rehna hai.
Vardan:-Dil ke sachche sambandh dwara yathart sadhana karne wale Nirantar Yogi bhava.
Slogan:-"Karawanhar Baap hai"-is smriti se bifakra badshah ban udti kala ka anubhav karte chalo.
 
ENGLISH SUMMARY - 08.01.18     
Sweet children, the more you relate knowledge to others, the more knowledge will become refined in your intellects. Therefore, definitely do service.
 
Question:What two types of children does the Father have? What is the difference between the two?
Answer:
The Father has stepchildren and real children. Stepchildren simply say, "Baba, Mama", through their mouths, but they are unable to follow shrimat fully; they don’t surrender themselves fully. Real children completely surrender themselves with their bodies, minds and wealth, that is, they become trustees. They continue to follow shrimat at every step. Because of not doing service, stepchildren fall while moving along; they develop doubts. Real children have full faith in their intellects.
Song: Do not forget the days of your childhood.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. Become a great donor of the imperishable jewels of knowledge. Serve Bharat with your body, mind and wealth to make it into heaven.
2. Don't perform any destructive actions. Practise having constant remembrance.
Blessing:May you be a constant yogi with a true relationship of the heart who makes accurate, spiritual endeavour.
Spiritual endeavour means having powerful remembrance and a true relationship of the heart with the Father. Just as when you sit in yoga, you sit very still physically, similarly, let your heart, mind and intellect all sit down with the Father and be focused on the Father: this is accurate, spiritual endeavour. If there isn’t such spiritual endeavour, then there are prayers. Sometimes, you have remembrance and sometimes you make complaints. In fact, there is no need for complaints in remembrance. Those whose hearts have a relationship with the Father become constant yogis.
Slogan:Become a carefree emperor with the awareness that the Father is Karavanhar (One who inspires everyone) and continue to experience the flying stage.
 
HINDI DETAIL MURALI

08/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - जितना-जितना दूसरों को ज्ञान सुनायेंगे उतना तुम्हारी बुद्धि में ज्ञान रिफाइन होता जायेगा, इसलिए सर्विस जरूर करनी है"
 
प्रश्न:बाप के पास दो प्रकार के बच्चे कौन से हैं, उन दोनों में अन्तर क्या है?
उत्तर: बाप के पास एक हैं लगे (सौतेले) बच्चे, दूसरे हैं सगे (मातेले) बच्चे। लगे बच्चे - मुख से सिर्फ बाबा मम्मा कहते लेकिन श्रीमत पर पूरा नहीं चल सकते। पूरा-पूरा बलिहार नहीं जाते। सगे बच्चे तो तन-मन धन से पूर्ण समर्पण अर्थात् ट्रस्टी होते हैं। कदम-कदम श्रीमत पर चलते हैं। लगे बच्चे सेवा न करने के कारण चलते-चलते गिर पड़ते हैं। संशय आ जाता है। सगे बच्चे पूरा निश्चयबुद्धि होते हैं।
 
गीत:-बचपन के दिन भुला न देना...  ओम् शान्ति।
 
बाप बच्चों को समझाते हैं। कौन सा बाप? वास्तव में दोनों बाप हैं। एक रूहानी, जिसको बाबा कहा जाता, दूसरा जिस्मानी जिसको दादा कहा जाता। यह तो सभी सेन्टर्स के बच्चे जानते हैं कि हम बापदादा के बच्चे हैं। रूहानी बाप शिव है। वह है सभी आत्माओं का बाप और ब्रह्मा दादा है सारे मनुष्य सिजरे का हेड। उनके तुम आकर बच्चे बने हो। उनमें भी कोई तो पक्के सगे हैं, कोई फिर लगे भी हैं। मम्मा बाबा तो दोनों ही कहते हैं परन्तु लगे बलि नहीं चढ़ सकते। बलि न चढ़ने वालों को इतनी ताकत नहीं मिल सकती अर्थात् अपने बाप को तन-मन-धन का ट्रस्टी नहीं बना सकते। श्रेष्ठ बनने के लिए उनकी श्रीमत पर नहीं चल सकते। सगे बच्चों को सूक्ष्म मदद मिलती है। परन्तु वह भी बहुत थोड़े हैं। भल सगे भी हैं परन्तु उनको भी अभी पक्के नहीं कहेंगे, जब तक रिजल्ट नहीं निकली है। भल यहाँ रहते भी हैं, बहुत अच्छे हैं, सर्विस भी करते हैं फिर गिर भी पड़ते हैं। यह है सारी बुद्धियोग की बात। बाबा को भूलना नहीं है। बाबा इस भारत को बच्चों की मदद से स्वर्ग बनाते हैं। गाया हुआ भी है शिव शक्ति सेना। हरेक को अपने से बात करनी है - बरोबर हम शिवबाबा के एडाप्टेड चिल्ड्रेन हैं। बाप से हम स्वर्ग का वर्सा चक्र रहे हैं। द्वापर से लेकर हमने जो लौकिक बाप का वर्सा पाया है वह नर्क का ही पाया है। दु:खी होते आये हैं। भक्तिमार्ग में तो है ही अन्धश्रद्धा। जब से भक्ति शुरू हुई है तब से जो-जो वर्ष बीता हम नीचे उतरते आये। भक्ति भी पहले अव्यभिचारी थी। एक की पूजा करते थे। उसके बदले अब अनेकों की पूजा करते आये हैं। अब यह सब बातें ऋषि, मुनि, साधु, सन्त आदि नहीं जानते कि भक्ति कब शुरू होती है। शास्त्रों में भी है ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात। भल ब्रह्मा सरस्वती ही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं परन्तु नाम ब्रह्मा का दिया है। ब्रह्मा के साथ बच्चे भी बहुत हैं। लक्ष्मी-नारायण के बच्चे तो बहुत नहीं होंगे। प्रजापिता भी उनको नहीं कहेंगे। अब नई प्रजा बन रही है। नई प्रजा होती ही है ब्राह्मणों की। ब्राह्मण ही अपने को ईश्वरीय सन्तान समझते हैं। देवता तो नहीं समझेंगे। उनको चक्र का ही पता नहीं।
 
अभी तुम जानते हो हम शिवबाबा के बच्चे बने हैं। उसने ही हमको 84 का चक्र समझाया है। उनकी मदद से हम भारत को फिर से दैवी पावन राजस्थान बना रहे हैं। यह बड़ी समझ की बात है। किसको समझाने की भी हिम्मत चाहिए। तुम हो शिव शक्ति पाण्डव सेना। पण्डे भी हो, सबको रास्ता बताते हो। तुम्हारे बिगर रूहानी स्वीट होम का रास्ता कोई बता न सके। वह पण्डे लोग तो करके अमरनाथ पर, कोई तीर्थ पर ले जाते हैं। तुम बी.के. तो एकदम सभी से दूर परमधाम ले जाते हो। वह जिस्मानी गाइड हैं - धक्के खिलाने वाले। तुम सभी को बाप के पास शान्तिधाम ले जाते हो। तो सदैव यह याद करना पड़े - हम भारत को फिर से दैवी राजस्थान बना रहे हैं। यह तो कोई भी मानेंगे। भारत का आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। भारत सतयुग में बेहद का दैवी पावन राजस्थान था, फिर पावन क्षत्रिय राजस्थान बना, फिर माया की प्रवेशता होने से आसुरी राजस्थान बन जाता है। यहाँ भी पहले राजा रानी राज्य करते थे, परन्तु बिगर लाइट के ताज वाली राजाई चलती आई है। दैवी राजस्थान के बाद हुआ आसुरी पतित राजस्थान, अभी तो पतित प्रजा का स्थान है, पंचायती राजस्थान। वास्तव में इनको राजस्थान कह नहीं सकते, परन्तु नाम लगा दिया है। राजाई तो है नहीं। यह भी ड्रामा बना हुआ है। यह लक्ष्मी-नारायण के चित्र तुमको बहुत काम आयेंगे। इन पर समझाना है, भारत ऐसा डबल सिरताज था। इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, छोटेपन में राधे कृष्ण थे, फिर त्रेता में रामराज्य हुआ, फिर द्वापर में माया आ गई। यह तो बिल्कुल सहज है ना। भारत की हिस्ट्री-जॉग्राफी नटशेल में समझाते हैं। द्वापर में ही फिर पावन राजा-रानी लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर बने। देवतायें स्वयं तो वाममार्ग में चले गये। पतित होने लग पड़े। फिर जो पावन देवतायें होकर गये हैं, उनके मन्दिर बनाकर पूजा शुरू की। पतित ही पावन को माथा टेकते हैं। जब तक ब्रिटिश गवर्मेन्ट का राज्य था तो राजा-रानी थे। जमींदार भी राजा रानी का लकब (टाइटल) ले लेते थे, इससे उनका दरबार में मान होता था। अभी तो कोई राजा नहीं है। पीछे जब आपस में लड़े हैं तब मुसलमान आदि आये हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो फिर से कलियुग का अन्त आ गया है। विनाश सामने खड़ा है। बाप फिर से राजयोग सिखला रहे हैं। कैसे स्थापना होती है, सो तो तुम जानते हो, फिर यह हिस्ट्री-जॉग्राफी मिट जाती है। फिर भक्ति में वो लोग अपनी गीता बना देते हैं, उसमें बहुत फ़र्क पड़ जाता है। भक्ति के लिए उन्हों को देवी-देवता धर्म का पुस्तक जरूर चाहिए। सो ड्रामा अनुसार गीता बना दी है। ऐसे नहीं भक्ति मार्ग की उस गीता से कोई राजाई स्थापन करेंगे वा नर से नारायण बनेंगे। बिल्कुल नहीं।
 
अब बाप समझाते हैं तुम हो गुप्त सेना। बाबा भी गुप्त है। तुमको भी गुप्त योगबल से राजाई प्राप्त करा रहे हैं। बाहुबल से हद की राजाई मिलती है। योगबल से बेहद की राजाई मिलती है। तुम बच्चों को दिल अन्दर यह निश्चय है कि हम अभी भारत को वही दैवी राजस्थान बना रहे हैं। जो मेहनत करता है, उसकी मेहनत छिपी नहीं रह सकती। विनाश तो होना ही है। गीता में भी यह बात है। पूछते हैं, इस समय की मेहनत अनुसार हमको भविष्य में क्या पद मिलेगा? यहाँ भी कोई शरीर छोड़ता है तो संकल्प चलेगा कि यह किस पद को प्राप्त करेगा। सो तो बाप ही जाने कि इसने किस प्रकार से तन-मन-धन की सेवा की है! यह बच्चे नहीं जान सकते, बापदादा जाने। बताया भी जा सकता है, इस प्रकार की सेवा तुमने की है। ज्ञान उठाया या नहीं, परन्तु मदद तो बहुत की है। जैसे मनुष्य दान करते हैं तो समझते हैं संस्था बहुत अच्छी है। अच्छा कार्य कर रही है। परन्तु मेरे में पावन रहने की ताकत नहीं है। मैं यज्ञ को मदद करता हूँ। तो उसका भी रिटर्न उनको मिल जाता है। जैसे मनुष्य कालेज बनाते हैं, हॉस्पिटल बनाते हैं औरों के लिए। ऐसे नहीं कहेंगे कि मैं बीमार पडूँ तो हॉस्पिटल में जाऊं। जो कुछ बनाते हैं दूसरों के लिए। तो उसका फल भी मिलता है, उसको दान कहा जाता है। यहाँ फिर क्या होता है। आशीर्वाद देते हैं तुम्हारा लोक परलोक सुहेला हो। सुखी हो। लोक और परलोक, सो तो इस संगमयुग की बात है। यह है मृत्युलोक का जन्म और अमरलोक का जन्म, दोनों सफल हों। बरोबर तुम्हारा अभी यह जन्म सफल हो रहा है, फिर कोई तन से कोई मन से कोई धन से सेवा करते हैं। बहुत हैं जो ज्ञान नहीं उठा सकते हैं, कहते हैं बाबा हमारे में हिम्मत नहीं है। बाकी मदद कर सकते हैं। तो बाप बतायेंगे कि तुम इतना धनवान बन सकते हो। कोई भी बात हो तो पूछ सकते हो। फालो फादर करना है तो पूछना भी उनसे है, इस हालत में हम क्या करें? श्रीमत देने वाला बाप बैठा है। उनसे पूछना है, छिपाना नहीं है। नहीं तो बीमारी बढ़ जायेगी। कदम-कदम श्रीमत पर न चले तो रोला पड़ जायेगा। बाबा कोई दूर थोड़ेही है। सम्मुख आकर पूछना चाहिए। ऐसे बापदादा के पास घड़ी-घड़ी आना चाहिए। वास्तव में ऐसे मोस्ट बिलवेड बाप के साथ तो इकट्ठा रहना चाहिए। साजन को चटक जाना चाहिए, वह है जिस्मानी, यह है रूहानी। इसमें चटकने की बात नहीं, यहाँ सबको बिठा नहीं देंगे। यह ऐसी चीज़ है, बस सामने बैठे ही रहें, सुनते ही रहें। उनकी मत पर चलते ही रहें। परतु बाबा कहेंगे यहाँ बैठ नहीं जाना है। गंगा नदी बनो, जाओ सर्विस पर। बच्चों का लव ऐसा होना चाहिए - जैसे मस्ताना होता है। परन्तु फिर सर्विस भी तो करनी है। निश्चयबुद्धि तो एकदम लटक पड़ते हैं। बच्चे लिखते हैं फलाना बहुत अच्छा निश्चयबुद्धि है। मैं लिखता हूँ कुछ भी नहीं समझा है। अगर निश्चयबुद्धि है कि स्वर्ग का मालिक बनाने वाला बाप आ गया है तो एक सेकेण्ड भी मिलने बिगर रह न सके। बहुत ही बच्चियाँ हैं जो तड़पती हैं। फिर घर बैठे उनको साक्षात्कार होते हैं ब्रह्मा और कृष्ण का। निश्चय हो कि बाप परमधाम से हमें राजधानी देने आये हैं तो फिर आकर बाबा से मिलें। ऐसे भी आते हैं फिर समझाया जाता है कि ज्ञान गंगा बनो। प्रजा तो बहुत चाहिए। राजधानी स्थापन हो रही है। यह चित्र समझाने लिए बहुत अच्छा है। तुम किसको भी कह सकते हो कि हम फिर से राजधानी स्थापन कर रहे हैं। विनाश भी सामने खड़ा है। मरने से पहले बाप से वर्सा लेना है। सभी चाहते हैं वन आलमाइटी गवर्मेन्ट हो। अब सब मिलकर एक थोड़ेही बन सकते हैं। एक राज्य था जरूर, जिसका गायन भी है। सतयुग का नाम बहुत बाला है। फिर से उसकी स्थापना हो रही है। कोई इन बातों को झट मानेंगे, कोई नहीं मानेंगे। पाँच हजार वर्ष पहले लक्ष्मी-नारायण का राज्य था फिर इन राजाओं का राज्य हो गया। राजायें भी अब पतित हो गये हैं। अब फिर पावन लक्ष्मी-नारायण का राज्य होगा। तुम्हारे लिए तो समझाना बहुत ही सहज है। हम दैवी राजधानी स्थापन कर रहे हैं, शिवबाबा की श्रीमत से और उनकी मदद से। शिवबाबा से शक्ति भी मिलती है। यह नशा रहना चाहिए। तुम वारियर्स हो। मन्दिरों में भी तुम जाकर समझा सकते हो तो स्वर्ग की स्थापना जरूर रचयिता द्वारा ही होगी ना। तुम जानते हो बेहद का बाप एक है। तुम्हारे सम्मुख तुमको ज्ञान श्रृंगार कर रहे हैं। राजयोग सिखला रहे हैं। वो गीता सुनाने वाले कभी राजयोग सिखला न सकें। यह अभी तुम बच्चों की बुद्धि में नशा चढ़ाया जाता है। बाबा आया है स्वर्ग की स्थापना करने। स्वर्ग में है ही पावन राजस्थान। मनुष्य तो लक्ष्मी-नारायण के राज्य को ही भूल गये हैं। अब बाप सम्मुख बैठ समझाते हैं, तुम कोई भी गीता पाठशाला आदि में चले जाओ। सारी हिस्ट्री-जॉग्राफी अथवा 84 जन्मों का समाचार कोई सुना न सके। लक्ष्मी-नारायण के चित्र साथ राधे कृष्ण का भी हो तो समझाने में सहज होगा। यह है करेक्ट चित्र। लिखत भी उनकी अच्छी हो। तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र याद है। साथ में चक्र को समझाने वाला भी याद है। बाकी निरन्तर याद के अभ्यास में मेहनत बहुत है। निरन्तर याद ऐसी पक्की हो जो अन्त में कोई किचड़पट्टी याद न आये। बाप को कभी भूलना नहीं है। छोटे बच्चे बाप को बहुत याद करते हैं फिर बच्चा बड़ा होता है तो धन को याद करते हैं। तुमको भी धन मिलता है। जो अच्छी रीति धारण कर फिर दान करना चाहिए। पूरा फ्लेन्थ्रोफिस्ट बनना है। मैं सम्मुख आकर राजयोग सिखाता हूँ। वह गीता तो जन्म जन्मान्तर पढ़ी, कुछ भी प्राप्ति नहीं हुई। यहाँ तो तुमको नर से नारायण बनाने लिए यह शिक्षा दे रहा हूँ। वह है भक्ति मार्ग। यहाँ भी कोटों में कोई निकलेगा जो तुम्हारे दैवी घराने का होगा। फिर ब्राह्मण बनने जरूर आयेंगे, फिर चाहे राजा रानी बनें, चाहे प्रजा। उसमें भी कई तो सुनन्ती, कथन्ती, भागन्ती हो जाते हैं। जो बच्चा बन फिर फारकती देते हैं, उन पर बहुत बड़ा दण्ड है। कड़ी सजा है। इस समय ऐसा कोई कह नहीं सकता कि हम निरन्तर याद करते हैं। अगर कोई कहे तो चार्ट लिखकर भेजे तो बाबा सब समझ जायेंगे। भारत की सेवा में ही तन-मन-धन लगा रहे हैं। लक्ष्मी-नारायण का चित्र हमेशा पाकेट में पड़ा हो। बच्चों को बहुत नशा होना चाहिए।
 
सोशल वर्कर्स तुम्हारे से पूछते हैं तुम भारत की क्या सेवा कर रहे हो? बोलो, हम अपने तन-मन-धन से भारत को दैवी राजस्थान बना रहे हैं। ऐसी सेवा और कोई कर नहीं सकता। तुम जितनी सर्विस करेंगे उतनी बुद्धि रिफाइन होती जायेगी। ऐसे भी बहुत बच्चे हैं जो ठीक रीति नहीं समझा सकते हैं तो नाम बदनाम होता है। कोई-कोई में क्रोध का भूत भी है तो यह भी डिस्ट्रेक्टिव काम किया ना। उनको कहेंगे तुम अपना मुँह तो देखो। तुम लक्ष्मी या नारायण को वरने लायक बने हो? ऐसे जो आबरू (इज्जत) गँवाने वाले बच्चे हैं, वह क्या पद पायेंगे। वह प्यादों की लाइन में आ जाते हैं। तुम भी सेना हो ना। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) अविनाशी ज्ञान रत्नों का महादानी बनना है। तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है।
2) कोई भी डिस्ट्रेक्टिव (विनाशकारी) कार्य नहीं करना है। निरन्तर याद के अभ्यास में रहना है।
 
वरदान:दिल के सच्चे सम्बन्ध द्वारा यथार्थ साधना करने वाले निरन्तर योगी भव!
साधना अर्थात् शक्तिशाली याद। बाप के साथ दिल का सच्चा संबंध। जैसे योग में शरीर से एकाग्र होकर बैठते हो ऐसे दिल, मन-बुद्धि सब एक बाप की तरफ बाप के साथ-साथ बैठ जाए-यही है यथार्थ साधना। अगर ऐसी साधना नहीं तो फिर आराधना चलती है। कभी याद करते कभी फरियाद करते। वास्तव में याद में फरियाद की आवश्यकता नहीं, जिसका दिल से बाप के साथ संबंध है वह निरन्तर योगी बन जाता है।
 

स्लोगन:"करावनहार बाप है" - इस स्मृति से बेफिक्र बादशाह बन उड़ती कला का अनुभव करते चलो।

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Details ( Page:- Murali 09-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 09.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche -Tum is paathshala me aaye ho apni oonchi takdeer banane,tumhe nirakar Baap se padhkar Rajaon ka Raja banna hai.
Q- Kayi bacche hain bhagyashali lekin ban jate hain durbhagyashali kaise?
A-Wo bacche bhagyashali hain-jinhe koi bhi karmbandhan nahi hai arthat karm bandhanmukt hain.Paratu fir bhi yadi padhai me attention nahi dete,buddhi idhar udhar bhatakti rehti hai,ek Baap jisse itna bhari varsha milta,usey yaad nahi karte hain to bhagyashali hote bhi durbhagyashali he kahenge.
Q-Shrimat ke kaun-kaun se ras bhare huye hain?
A-Shrimat he hai-jisme mata-pita,teacher,guru sabki mat ikkathi hai.Shrimat jaise secrin hai,jisme yah sab ras bhare huye hain.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Buddhi me swadarshan chakra ka gyan rakh,raaho ke grahan se mukt hona hai.Shrest karm aur yog bal se bikarmo ka khata chuktu kar bikarmajeet banna hai.
2)Apni oonchi takdeer banane ke liye padhai par poora-poora dhyan dena hai.
Vardan:-Sadhana aur sadhan ke balance dwara apni unnati karne wale Blessing ke Adhikari bhava.
Slogan:-"Agar magar" ke chakkar se nyare banna hai to Baap samaan shaktishali bano.
 
ENGLISH SUMMARY - 09.01.18     
Sweet children, you have come to this study place to make your fortune elevated. You have to study with the incorporeal Father and become kings of kings.
Question:How do some fortunate children become unfortunate?
Answer:The children who have no karmic bondages are fortunate, that is, they are free from karmic bondages. However, if they then don't pay attention to studying and their intellects wander here and there, if they don't remember the one Father from whom they receive such a big inheritance, then, even though they are fortunate, they would be called unfortunate.
 Question:Shrimat is filled with which sweetness?
Answer:It is only shrimat that includes the directions of the Mother, the Father, the Teacher and the Guru. Shrimat is like a saccharine which contains all the sweetness of these.
Song:I have come having awakened my fortune.                Om Shanti
 Essence for Dharna:
1. Become free from the omens of Rahu by keeping the knowledge of the discus of self-realisation in your intellect. Settle the accounts of sin with elevated actions and the power of yoga and become a conqueror of sinful actions.
2. In order to make your fortune elevated, pay full attention to studying.
 Blessing:May you have a right to blessings and making progress by keeping a balance of making spiritual endeavour (sadhana) and using the facilities (sadhan).
Instead of making the facilities your support, use the facilities on the basis of your spiritual endeavour. Do not make any of the facilities the basis for your progress. Otherwise, when the facilities fluctuate, your zeal and enthusiasm will also fluctuate. Because of your making the facilities your support, the Father is removed from being in-between and this is why there is fluctuation. Together with the facilities, let there also be spiritual endeavour and you will experience the Father’s blessings in every task and your zeal and enthusiasm will not decrease.
Slogan:In order to become free from the spinning of “ifs” and “buts”, become powerful like the Father.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

09/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - तुम इस पाठशाला में आये हो अपनी ऊंची तकदीर बनाने, तुम्हें निराकार बाप से पढ़कर राजाओं का राजा बनना है"
 प्रश्न:कई बच्चे हैं भाग्यशाली लेकिन बन जाते हैं दुर्भाग्यशाली कैसे?
उत्तर:वह बच्चे भाग्यशाली हैं - जिन्हें कोई भी कर्मबन्धन नहीं है अर्थात् कर्म बन्धनमुक्त हैं। परन्तु फिर भी यदि पढ़ाई में अटेन्शन नहीं देते, बुद्धि इधर उधर भटकती रहती है, एक बाप जिससे इतना भारी वर्सा मिलता, उसे याद नहीं करते हैं तो भाग्यशाली होते भी दुर्भाग्यशाली ही कहेंगे।
 प्रश्न:श्रीमत में कौन-कौन से रस भरे हुए हैं?
उत्तर:श्रीमत ही है - जिसमें मात-पिता, टीचर, गुरू सबकी मत इकट्ठी है। श्रीमत जैसे सैक्रीन है, जिसमें यह सब रस भरे हुए हैं।

गीत:-तकदीर जगाकर आई हूँ..  ओम् शान्ति।
शिव भगवानुवाच, मनुष्य जब गीता सुनाते हैं तो कृष्ण का नाम लेकर सुनाते हैं। यहाँ तो जो सुनाते हैं कहते हैं शिव भगवानुवाच। खुद भी कह सकते हैं शिव भगवानुवाच, क्योंकि शिवबाबा स्वयं ही बोलते हैं। दोनों इक्ट्ठे भी बोल सकते हैं। बच्चे तो दोनों के हैं। बच्चे और बच्चियां दोनों बैठे हुए हैं। तो कहते हैं बच्चे समझते हो कि कौन पढ़ाते हैं? कहेंगे बापदादा पढ़ाते हैं। बाप बड़े को, दादा छोटे को अर्थात् भाई को कहा जाता है। तो बापदादा इक्ट्ठा कहा जाता है। अब बच्चे भी जानते हैं कि हम स्टूडेन्ट हैं, स्कूल में स्टूडेन्ट बैठे ही हैं तकदीर बनाने के लिए कि हम पढ़कर फलाना इम्तहान पास करेंगे। वह जिस्मानी इम्तहान तो बहुत होते हैं। यहाँ तुम बच्चों की दिल में है कि हमको बेहद का बाप परमपिता परमात्मा पढ़ाते हैं। बाप इस (ब्रह्मा) को नहीं कहते हो। निराकार बाप समझाते हैं, तुम जानते हो हम बाप से राजयोग सीख राजाओं का राजा बनते हैं। राजायें भी होते हैं और फिर राजाओं के राजायें भी होते हैं। जो राजाओं के राजायें हैं, उन्हों को राजायें भी पूजते हैं। यह रिवाज भारत खण्ड में ही है। पतित राजायें पावन राजाओं को पूजते हैं। बाप ने समझाया है महाराजा बड़ी प्रापर्टी वाले को कहा जाता है। राजे लोग छोटे होते हैं। आजकल तो कोई-कोई राजाओं की महाराजाओं से भी जास्ती प्रापर्टी होती है। कोई-कोई साहूकारों को राजाओं से भी जास्ती प्रापर्टी होती है। वहाँ ऐसे अनलाफुल नहीं होता। वहाँ तो सब कुछ कायदे अनुसार होगा। बड़े महाराजा पास बड़ी प्रापर्टी होगी। तो तुम बच्चे जानते हो हमको बेहद का बाप बैठ पढ़ाते हैं। परमात्मा बिगर राजाओं का राजा, स्वर्ग का मालिक कोई बना नहीं सकता। स्वर्ग का रचयिता है ही निराकार बाप। उनका नाम भी गाते हैं हेविनली गॉड फादर। बाप साफ समझाते हैं मैं तुम बच्चों को फिर से स्वराज्य देकर राजाओं का राजा बनाता हूँ। अब तुम जानते हो हम तकदीर बनाकर आये हैं, बेहद के बाप से राजाओं का राजा बनने। कितनी खुशी की बात है। बड़ा भारी इम्तहान है। बाबा कहते हैं श्रीमत पर चलो, इसमें मात-पिता, टीचर, गुरू आदि सबकी मत इकट्ठी है। सबकी सैक्रीन बनी हुई है। सभी का रस एक में भरा हुआ है। सबका साजन एक है। पतित से पावन बनाने वाला वह बाप ठहरा। गुरूनानक ने भी उनकी महिमा की है तो जरूर उनको याद करना पड़े। पहले वह अपने पास ले जायेगा फिर पावन दुनिया में भेज देगा। कोई भी आये तो उनको समझाना है - यह गॉडली कालेज है। भगवानुवाच, और स्कूलों में तो कभी भगवानुवाच नहीं कहेंगे। भगवान है ही निराकार ज्ञान का सागर, मनुष्य सृष्टि का बीजरूप.. तुम बच्चों को बैठ पढ़ाता हूँ। यह गॉडली नॉलेज है। सरस्वती को गॉडेज़ आफ नॉलेज कहते हैं। तो जरूर गाडली नॉलेज से गॉड-गाडेज ही बनते होंगे। बैरिस्टरी नॉलेज से बैरिस्टर ही बनेंगे। यह है गाडली नॉलेज। सरस्वती को गाड ने नॉलेज दी है। तो जैसे सरस्वती गॉडेज आफ नॉलेज है, वैसे तुम बच्चे हो। सरस्वती को बहुत बच्चे हैं ना। परन्तु हर एक गॉडेज आफ नॉलेज कहलाये जायें, यह नहीं हो सकता। इस समय अपने को गॉडेज नहीं कह सकते। वहाँ भी तो देवी-देवतायें ही कहेंगे। गॉड नॉलेज बरोबर देते हैं। लेसन ऐसे धारण कराते हैं। यह मर्तबा देते हैं बड़ा। बाकी देवतायें गॉड गाडेज तो हो नहीं सकते। यह मात-पिता तो जैसे कि गॉड गाडेज हो जाते। परन्तु हैं तो नहीं ना। निराकार बाप को गाड फादर कहेंगे। इन (साकार) को गॉड थोड़ेही कहेंगे। यह बड़ी गुह्य बातें हैं। आत्मा और परमात्मा का रूप और फिर सम्बन्ध कितनी गुह्य बातें हैं। वह जिस्मानी सम्बन्ध काका, चाचा, मामा आदि तो कामन हैं। यह तो है रूहानी सम्बन्ध। समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। मात-पिता अक्षर गाते हैं तो जरूर कोई अर्थ है ना। वह अक्षर अविनाशी बन जाता है। भक्तिमार्ग में भी चला आता है।
 
तुम बच्चे जानते हो हम स्कूल में बैठे हैं। पढ़ाने वाला ज्ञान सागर है। इनकी आत्मा भी पढ़ती है। इस आत्मा का बाप वह परमात्मा है, जो सभी का बाप है, वह पढ़ाते हैं। उनको गर्भ में तो आना नहीं है, तो नॉलेज कैसे पढ़ायें। वह आते हैं ब्रह्मा के तन में। उन्होंने फिर ब्रह्मा के बदले कृष्ण का नाम डाल दिया है। यह भी ड्रामा में हैं। कुछ भूल हो तब तो बाप आकर इस भूल को करेक्ट कर अभुल बनाये। निराकार को जानने कारण ही मूँझ गये हैं। बाप समझाते हैं मैं तुम्हारा बेहद का बाप बेहद का वर्सा देने वाला हूँ। लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक कैसे बने, यह कोई भी नहीं जानते। जरूर कोई ने तो कर्म सिखाये होंगे ना और वह भी जरूर बड़ा होगा, जो इतना ऊंच पद प्राप्त कराया। मनुष्य कुछ भी नहीं जानते। बाप कितना प्यार से समझाते हैं, कितनी बड़ी अथॉरिटी है। सारी दुनिया को पतित से पावन बनाने वाला मालिक है। समझाते हैं यह बना-बनाया ड्रामा है। तुमको चक्र लगाना होता है। इस बनावट को कोई भी जानते नहीं। ड्रामा में कैसे हम एक्टर्स हैं, यह चक्र कैसे फिरता है, दु:खधाम से सुखधाम कौन बनाते हैं, यह तुम जानते हो। तुमको सुखधाम के लिए पढ़ाता हूँ। तुम ही 21 जन्मों के लिए सदा सुखी बनते हो और कोई वहाँ जा सके। सुखधाम में जरूर थोड़े मनुष्य होंगे। समझाने लिए प्वाइंटस बहुत अच्छी चाहिए। कहते तो हैं बाबा हम आपके हैं, परन्तु पूरा बनने में टाइम लगता है। कोई का कर्मबन्धन झट छूट जाता है, कोई को टाइम लगता है। कई तो ऐसे भाग्यशाली भी हैं जिनका कर्मबन्धन टूटा हुआ है, परन्तु पढ़ाई में अटेन्शन नहीं देते हैं तो उनको कहा जाता है दुर्भाग्यशाली। पुत्र, पोत्रे, धोत्रे आदि में बुद्धि चली जाती है। यहाँ तो एक को ही याद करना है। बहुत भारी वर्सा मिलता है। तुम जानते हो हम राजाओं के राजा बनते हैं। पतित राजायें कैसे बनते हैं और पावन राजाओं के राजा कैसे बनते हैं, वह भी बाप तुमको समझाते हैं। मैं स्वयं आकर राजाओं का राजा स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ - इस राजयोग से। वह पतित राजायें तो दान करने से बनते हैं। उन्हों को मैं थोड़ेही आकर बनाता हूँ। वह बहुत दानी होते हैं। दान करने से राजाई कुल में जन्म लेते हैं। मैं तो 21 जन्मों के लिए तुमको सुख देता हूँ। वह तो एक जन्म के लिए बनते सो भी पतित दु:खी रहते हैं। मैं तो आकर बच्चों को पावन बनाता हूँ। मनुष्य समझते हैं सिर्फ गंगा स्नान करने से पावन बनते हैं, कितने धक्के खाते हैं। गंगा जमुना आदि की कितनी महिमा करते हैं। अब इसमें महिमा की तो बात ही नहीं। पानी सागर से आता है। ऐसे तो बहुत नदियां हैं। विलायत में भी बड़ी-बड़ी नदियां खोदकर बनाते हैं, इसमें क्या बड़ी बात है। ज्ञान सागर और ज्ञान गंगायें कौन हैं, यह तो जानते ही नहीं। शक्तियों ने क्या किया, कुछ भी जानते नहीं। वास्तव में ज्ञान गंगा अथवा ज्ञान सरस्वती यह जगदम्बा है। मनुष्य तो जानते ही नहीं, जैसे भील हैं। बिल्कुल ही बुद्धू, बेसमझ हैं। बाप आकर बेसमझ को कितना समझदार बनाते हैं। तुम बता सकते हो इन्हों को राजाओं का राजा किसने बनाया। गीता में भी है मैं राजाओं का राजा बनाता हूँ। मनुष्य तो यह जानते नहीं। हम खुद भी नहीं जानते थे। यह जो खुद बना था, अब नहीं है, वही नहीं जानता तो और फिर कैसे जान सकते। सर्वव्यापी के ज्ञान में कुछ भी है नहीं, योग किसके साथ लगायें, पुकारे किसको? खुद ही खुदा हैं फिर प्रार्थना किसकी करेंगे! बड़ा वन्डर है। बहुत भक्ति जो करते हैं उनका मान होता है। भक्त माला भी है ना। ज्ञान माला है रूद्र माला। यह फिर भक्त माला। वह है निराकारी माला। सभी आत्मायें वहाँ रहती हैं। उनमें भी पहला नम्बर आत्मा किसकी है? जो नम्बरवन में जाते हैं, सरस्वती की आत्मा वा ब्रह्मा की आत्मा नम्बरवन पढ़ती है। यह आत्मा की बात है। भक्ति मार्ग में तो सब जिस्मानी बातें हैं - फलाना भक्त ऐसा था, उनके शरीर का नाम लेंगे। तुम मनुष्य को नहीं कहेंगे। तुम जानते हो ब्रह्मा की आत्मा क्या बनती है। वह जाकर शरीर धारण कर राजाओं का राजा बनते हैं। आत्मा शरीर में प्रवेश कर राज्य करती है। अभी तो राजा नहीं है। राज्य करती तो आत्मा है ना। मैं राजा हूँ, मैं आत्मा हूँ, इस शरीर का मालिक हूँ। अहम् आत्मा शरीर का नाम श्री नारायण धराए फिर राज्य करेंगे। आत्मा ही सुनती और धारण करती है। आत्मा में संस्कार रहते हैं। अब तुम जानते हो हम बाप से राजाई लेते हैं श्रीमत पर चलने से। बापदादा दोनों मिलकर कहते हैं बच्चे, दोनों को बच्चे कहने का हक है। आत्मा को कहते हैं निराकारी बच्चे, मुझ बाप को याद करो। और कोई कह सके कि हे निराकारी बच्चे, हे आत्मायें मुझ बाप को याद करो। बाप ही आत्माओं से बात करते हैं। ऐसे तो नहीं कहते हे परमात्मा मुझ परमात्मा को याद करो। कहते हैं, हे आत्मायें मुझ बाप को याद करो तो इस योग अग्नि से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। बाकी गंगा स्नान से कभी कोई पाप आत्मा से पुण्य आत्मा नहीं बन सकते। गंगा स्नान कर फिर घर में आकर पाप करते हैं। इन विकारों के कारण ही पाप आत्मा बनते हैं। यह कोई समझते नहीं। बाप समझाते हैं कि अब तुमको राहू का कड़ा ग्रहण लगा हुआ है। पहले हल्का ग्रहण होता है। अब दे दान तो छूटे ग्रहण। प्राप्ति बहुत भारी है। तो पुरुषार्थ भी ऐसे करना चाहिए ना। बाप कहते हैं मैं तुमको राजाओं का राजा बनाऊंगा इसलिए मुझे और वर्से को याद करो। अपने 84 जन्मों को याद करो इसलिए बाबा ने नाम ही रखा है ''स्वदर्शन चक्रधारी बच्चे।'' तो स्वदर्शन का ज्ञान भी चाहिए ना।
 
बाप समझाते हैं - यह पुरानी दुनिया खत्म होनी है। तुमको मैं नई दुनिया में ले चलता हूँ। सन्यासी सिर्फ घरबार को भूलते हैं, तुम सारी दुनिया को भूलते हो। यह बाप ही कहते हैं कि अशरीरी बनो। मैं तुमको नई दुनिया में ले चलता हूँ इसलिए पुरानी दुनिया से, पुराने शरीर से ममत्व तोड़ो। फिर नई दुनिया में तुमको नया शरीर मिलेगा। देखो, कृष्ण को श्याम-सुन्दर कहते हैं। सतयुग में वह गोरा था अब अन्तिम जन्म में काला हो गया है। तो कहेंगे ना श्याम ही सुन्दर बनता है, फिर सुन्दर से श्याम बनता है। तो नाम रख दिया है श्याम सुन्दर। काला बनाते हैं 5 विकार रावण और फिर गोरा बनाते हैं परमपिता परमात्मा। चित्र में भी दिखाया है कि मैं पुरानी दुनिया को लात मार गोरा बन रहा हूँ। गोरी आत्मा स्वर्ग की मालिक बनती है। काली आत्मा नर्क की मालिक बनती है। आत्मा ही गोरी और काली बनती है। अब बाप कहते हैं तुमको पवित्र बनना है। वह हठयोगी पवित्र बनने के लिए बहुत हठ करते हैं। परन्तु योग बिगर तो पवित्र बन सके, या तो सजायें खाकर पवित्र बनना पड़े इसलिए बाप को क्यों याद करें और 5 विकारों को भी जीतना है। बाप कहते हैं यह काम विकार ही आदि-मध्य-अन्त दु: देने वाला है। जो विकारों को नहीं जीत सकते वह वैकुण्ठ के राजा थोड़ेही बन सकते हैं इसलिए बाप कहते हैं देखो मैं तुमको कितने अच्छे कर्म सिखाता हूँ - बाप, टीचर, सतगुरू रूप में। योगबल से विकर्म विनाश कराए विकर्माजीत राजा बनाता हूँ। वास्तव में सतयुग के देवी-देवताओं को ही विकर्माजीत कहा जाता है। वहाँ विकर्म तो होते नहीं। विकर्माजीत संवत और विक्रम संवत अलग-अलग है। एक राजा विक्रम भी होकर गया है और विकर्माजीत राजा भी हो गया है। हम अभी विकर्मों को जीत रहे हैं। फिर द्वापर से नयेसिर विकर्म शुरू होते हैं। तो नाम रख दिया है राजा विक्रम। देवतायें हैं विकर्माजीत। अभी हम वह बनते हैं फिर जब वाम मार्ग में आते हैं तो विकर्मों का खाता शुरू हो जाता है। यहाँ विकर्मो का खाता चुक्तू कर फिर हम विकर्माजीत बनते हैं। वहाँ कोई विकर्म होते नहीं। तो बच्चों को यह नशा होना चाहिए कि हम यहाँ ऊंच तकदीर बनाते हैं। यह है बड़े ते बड़ी तकदीर बनाने की पाठशाला। सतसंग में तकदीर बनने की बात नहीं रहती। पाठशाला में हमेशा तकदीर बनती है। तुम जानते हो हम नर से नारायण अथवा राजाओं का राजा बनेंगे। बरोबर पतित राजायें, पावन राजाओं को पूजते हैं। मैं तुमको पावन बनाता हूँ। पतित दुनिया में तो राज्य नहीं करेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बुद्धि में स्वदर्शन चक्र का ज्ञान रख, राहू के ग्रहण से मुक्त होना है। श्रेष्ठ कर्म और योगबल से विकर्मों का खाता चुक्तू कर विकर्माजीत बनना है।
2) अपनी ऊंची तकदीर बनाने के लिए पढ़ाई पर पूरा-पूरा ध्यान देना है।
वरदान:साधना और साधन के बैलेन्स द्वारा अपनी उन्नति करने वाले ब्लैसिंग के अधिकारी भव!
साधनों को आधार बनाने के बजाए अपनी साधना के आधार से साधनों को कार्य में लगाओ। किसी भी साधन को उन्नति का आधार नहीं बनाओ, नहीं तो आधार हिलने के साथ उमंग-उत्साह भी हिल जाता है क्योंकि साधन को आधार बनाने से बाप बीच से निकल जाता इसलिए हलचल होती है। साधनों के साथ साधना हो तो हर कार्य में बाप की ब्लैसिंग का अनुभव करेंगे, उमंग-उत्साह भी कम नहीं होगा।
 स्लोगन:''अगर मगर'' के चक्कर से न्यारे बनना है तो बाप समान शक्तिशाली बनो।

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Details ( Page:- Murali 10-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 10.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche -Sakar sarir ko yaad karna bhi bhoot abhimani banna hai,kyunki sarir 5 bhooto ka hai,tumhe to dehi-abhimani ban ek bidehi Baap ko yaad karna hai.
 
Q-Sabse sarvottam karya kaun sa hai jo Baap he karte hain?
A- Sari tamopradhan shristi ko satopradhan sada sukhi bana dena yah hai sabse sarvottam karya,jo Baap he karte hain.Is oonche karya ke kaaran unke yaadgar bhi bahut oonche-oonche banaye hain.
 
Q-Kin do sabdo me sare drama ka raaz aa jata hai?
A-Pujya aur pujari,jab tum pujya ho tab purushottam ho,fir madhyam,kanist bante.Maya pujya se pujari bana deti hai.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1)Apne ko nirakar aatma samajh nirakar Baap ko yaad karna hai.Kisi bhi dehadhari ko nahi.Marjiva ban purani baaton ko buddhi se bhool jana hai.
2)Baap ke rache huye is rudra yagyan me sampoorn swaha hona hai.Sudro ko Brahman dharm me convert karne ki seva karni hai.
Vardan:-Apni will power dwara har ek ko will karne wale Shrest Sevadhari bhava.
Slogan:-Jahan ekta aur ekagrata ki shakti hai wahan safalta sahaj prapt hoti hai.
 
ENGLISH SUMMARY - 10.01.18     
Sweet children, to remember a corporeal body is to be element (evil spirit) conscious, because bodies are made of the five elements. You have to become soul conscious and remember the one bodiless Father.
 
Question:What is the most elevated task which only the Father carries out?
Answer:  To make the whole tamopradhan world satopradhan and constantly happy is the most elevated task which only the Father carries out. Because of this elevated task, His memorials have been made very great.
 
Question: Which two terms hold the secrets of the whole drama?
Answer: Worthy of worship and worshipper.      When you are worthy of worship, you are the most elevated. Then you become the middle quality and then the lowest. Maya changes you from being worthy of worship into worshippers.
Song:The Flame has ignited in the gathering of the moths  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. Consider yourself to be an incorporeal soul and remember the incorporeal Father, not any bodily beings. Die alive and remove the old things of the past from your intellect.
2. You have to surrender yourself completely in this sacrificial fire of the knowledge of Rudra that the Father has created. Do the service of converting shudras to the Brahmin religion.
 
Blessing:May you be an elevated server who “wills” power to everyone with your own will power.
At present, some souls are thirsty for your co-operation, for they don’t have any power of their own. You especially have to give them help with your own powers and this is why you servers who have become instruments need to have the power of all powers. Just as Father Brahma in his final moments willed his powers to the children so that this task is being carried out with that will, so, follow the father in the same way. Will your powers to souls and service will be completed according to the time.
Slogan:Where there is the power of unity and concentration, success is easily achieved.
 
HINDI DETAIL MURALI

10/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे ''मीठे बच्चे - साकार शरीर को याद करना भी भूत अभिमानी बनना है, क्योंकि शरीर 5 भूतों का है, तुम्हें तो देही-अभिमानी बन एक विदेही बाप को याद करना है''
 
प्रश्न:सबसे सर्वोत्तम कार्य कौन सा है जो बाप ही करते हैं?
उत्तर:सारी तमोप्रधान सृष्टि को सतोप्रधान सदा सुखी बना देना यह है सबसे सर्वोत्तम कार्य, जो बाप ही करते हैं। इस ऊंचे कार्य के कारण उनके यादगार भी बहुत ऊंचे-ऊंचे बनाये हैं।
 
प्रश्न:किन दो शब्दों में सारे ड्रामा का राज़ आ जाता है?
उत्तर:पूज्य और पुजारी, जब तुम पूज्य हो तब पुरुषोत्तम हो, फिर मध्यम, कनिष्ट बनते। माया पूज्य से पुजारी बना देती है।
 
गीत:-महफिल में जल उठी शमा...  ओम् शान्ति।
 
भगवान बैठ बच्चों को समझाते हैं कि मनुष्य को भगवान नहीं कहा जा सकता। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी चित्र है उनको भगवान नहीं कह सकते। परमपिता परमात्मा का निवास उनसे भी ऊंच है। उनको ही प्रभू, ईश्वर, भगवान आदि कहते हैं। मनुष्य जब पुकारते हैं तो उन्हों को कोई भी आकार वा साकार मूर्ति दिखाई नहीं पड़ती, इसलिए किस भी मनुष्य आकार को भगवान कह देते हैं। सन्यासियों को भी देखते हैं तो कहते हैं भगवान, परन्तु भगवान खुद समझाते हैं कि मनुष्य को भगवान नहीं कहा जा सकता। निराकार भगवान को तो बहुत याद करते हैं। जिन्होंने गुरू नहीं किया है, छोटे बच्चे हैं उनको भी सिखाया जाता है परमात्मा को याद करो, परन्तु किस परमात्मा को याद करो - यह नहीं बताया जाता। कोई भी चित्र बुद्वि में नहीं रहता। दु:ख के समय कह देते हैं हे प्रभु। कोई गुरू वा देवता आदि का चित्र उनके सामने नहीं आता है। भल बहुत गुरू किये हों तो भी जब हे भगवान कहते हैं तो कभी उनको गुरू याद नहीं आयेगा। अगर गुरू को याद कर और ही भगवान कहें तो वह मनुष्य तो जन्म-मरण में आने वाला हो गया। तो यह गोया 5 तत्वों के बने हुए शरीर को याद करते हैं, जिसको 5 भूत कहा जाता है। आत्मा को भूत नहीं कहा जाता। तो वह जैसे भूत पूजा हो गई। बुद्धियोग शरीर तरफ चला गया। अगर किसी मनुष्य को भगवान समझते तो ऐसे नहीं कि उनमें जो आत्मा है उसको याद करते हैं। नहीं। आत्मा तो दोनों में है। याद करने वाले में भी है तो जिसको याद करते हैं उनमें भी है। परमात्मा को तो सर्वव्यापी कह देते। परन्तु परमात्मा को पाप आत्मा नहीं कहा जा सकता। वास्तव में परमात्मा नाम जब निकलता है तो बुद्धि निराकार तरफ चली जाती है। निराकार बाप को निराकार आत्मा याद करती है। उसको देही-अभिमानी कहेंगे। साकार शरीर को जो याद करते हैं वह जैसे भूत अभिमानी हैं। भूत, भूत को याद करते हैं क्योंकि अपने को आत्मा समझने बदले 5 भूतों का शरीर समझते हैं। नाम भी शरीर पर पड़ता है। अपने को भी 5 तत्वों का भूत समझते हैं और उनको भी शरीर से याद करते हैं। देही-अभिमानी तो हैं नहीं। अपने को निराकार आत्मा समझें तो निराकार परमात्मा को याद करें। सभी आत्माओं का सम्बन्ध पहले-पहले परमात्मा से है। आत्मा दु:ख में परमात्मा को ही याद करती है, उनके साथ सम्बन्ध है। वह आत्माओं को सभी दु:खों से छुड़ाते हैं। उनको शमा भी कहते हैं। कोई बत्ती आदि की तो बात नहीं। वह तो परमपिता परम आत्मा है। शमा कहने से मनुष्य फिर ज्योति समझ लेते हैं। यह तो बाप ने खुद समझाया है मैं परम आत्मा हूँ, जिसका नाम शिव है। शिव को रूद्र भी कहते हैं। उस निराकार के ही अनेक नाम हैं और कोई के इतने नाम नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का एक ही नाम है। जो भी देहधारी हैं उन्हों का एक ही नाम है। एक ईश्वर को ही अनेक नाम दिये जाते हैं। उनकी महिमा अपरमअपार है। मनुष्य का एक नाम फिक्स है। अब तुम मरजीवा बने हो तो तुम्हारे पर दूसरा नाम रखा गया है, जिससे पुराना सब भूल जाये। तुम परमपिता परमात्मा के आगे जीते जी मरते हो। तो यह है मरजीवा जन्म। तो जरूर मात पिता पास जन्म लिया जाता है। यह गुह्य बातें बाप बैठ तुमको समझाते हैं। दुनिया तो शिव को जानती नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को जानती है। ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात भी कहते हैं। यह भी सिर्फ सुना है। ब्रह्मा द्वारा स्थापना... परन्तु कैसे, यह नहीं जानते। अब क्रियेटर तो जरूर नया धर्म, नई दुनिया रचेगा। ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण कुल ही रचेगा। तुम ब्राह्मण ब्रह्मा को नहीं परमपिता परमात्मा को याद करते हो क्योंकि ब्रह्मा द्वारा तुम उनके बने हो। बाहर वाले देह-अभिमानी ब्राह्मण ऐसे अपने को ब्रह्मा के बच्चे शिव के पोत्रे नहीं कहेंगे। शिवबाबा जिसकी जयन्ती भी मनाते हैं, परन्तु उनको न जानने कारण उनका कदर नहीं है। उनके मन्दिर में जाते हैं, समझते हैं यह ब्रह्मा, विष्णु शंकर वा लक्ष्मी-नारायण तो नहीं हैं। वह जरूर निराकार परमात्मा है। और सभी एक्टर्स का अपना-अपना पार्ट है, पुनर्जन्म लेते हैं, तो भी अपना नाम धरते हैं। यह परमपिता परमात्मा एक ही है, जिसका व्यक्त नाम रूप नहीं है, परन्तु मूढ़मति मनुष्य समझते नहीं हैं। परमात्मा का यादगार है तो जरूर वह आया होगा, स्वर्ग रचा होगा। नहीं तो स्वर्ग कौन रचेगा। अब फिर आकर यह रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा है। इसको यज्ञ कहा जाता है क्योंकि इसमें स्वाहा होना होता है। यज्ञ तो बहुत मनुष्य रचते हैं। वह तो सब हैं भक्ति मार्ग के स्थूल यज्ञ। यह परमपिता परमात्मा स्वयं आकर यज्ञ रचते हैं। बच्चों को पढ़ाते हैं। यज्ञ जब रचते हैं तो उसमें भी ब्राह्मण लोग शास्त्र कथायें आदि सुनाते हैं। यह बाप तो नॉलेजफुल है। कहते हैं यह गीता भागवत आदि शास्त्र सभी भक्ति मार्ग के हैं। यह मैटेरियल यज्ञ भी भक्ति मार्ग के हैं। यह है ही भक्ति मार्ग का समय। जब कलियुग का अन्त आये तब भक्ति का भी अन्त आये, तब ही भगवान आकर मिले क्योंकि वही भक्ति का फल देने वाला है। उनको ज्ञान सूर्य कहा जाता है। ज्ञान चन्द्रमा, ज्ञान सूर्य और ज्ञान लकी सितारे। अच्छा ज्ञान सूर्य तो है बाप। फिर माता चाहिए ज्ञान चन्द्रमा। तो जिस तन में प्रवेश किया है वह हो गई ज्ञान चन्द्रमा माता और बाकी सब हैं बच्चे लकी सितारे। इस हिसाब से जगदम्बा भी लकी स्टार हो गई क्योंकि बच्चे ठहरे ना। स्टार्स में कोई सबमें तीखा भी होता है। वैसे यहाँ भी नम्बरवार हैं। वह हैं स्थूल आकाश के सूर्य चाँद और सितारे और यह है ज्ञान की बात। जैसे वह पानी की नदियां और यह है ज्ञान की नदियां, जो ज्ञान सागर से निकली हैं।
 
अब शिवजयन्ती मनाते हैं, जरूर वह सारे सृष्टि का बाप आते हैं। आकर जरूर स्वर्ग रचते होंगे। बाप आते ही हैं आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करने, जो प्राय: लोप हो गया है। गवर्मेन्ट भी कोई धर्म को नहीं मानती है। कहते हैं हमारा कोई धर्म नहीं। यह ठीक कहते हैं। बाप भी कहते हैं भारत का आदि सनातन देवी-देवता धर्म प्राय: लोप है। धर्म में ताकत रहती है। भारतवासी अपने दैवी धर्म में थे तो बहुत सुखी थे। वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी राज्य था। पुरुषोत्तम राज्य करते थे। श्री लक्ष्मी-नारायण को ही पुरुषोत्तम कहा जाता है। नम्बरवार ऊंच नीच तो होते हैं। सर्वोत्तम पुरुष, उत्तम पुरुष, मध्यम, कनिष्ट पुरुष तो होते ही हैं। पहले-पहले सभी से सर्वोत्तम पुरुष जो बनते हैं वही फिर मध्यम, कनिष्ट बनते हैं। तो लक्ष्मी-नारायण हैं पुरुषोत्तम। सभी पुरुषों में उत्तम। फिर नीचे उतरते हैं तो देवता से क्षत्रिय, क्षत्रिय से फिर वैश्य, शूद्र कनिष्ट बनते हैं। सीता राम को भी पुरुषोत्तम नहीं कहेंगे। सभी राजाओं के राजा, सर्वोत्तम सतोप्रधान पुरुषोत्तम हैं लक्ष्मी-नारायण। यह सब बातें तुम्हारी बुद्वि में बैठी हैं। कैसे यह सृष्टि का चक्र चलता है। पहले-पहले उत्तम फिर मध्यम, कनिष्ट बनते हैं। इस समय तो सारी दुनिया तमोप्रधान है, यह बाप समझाते हैं। जिसकी अब जयन्ती मनायेंगे, तुम बता सकते हो कि आज से 5 हजार वर्ष पहले परमपिता परमात्मा शिव पधारे थे। नहीं तो शिव जयन्ती क्यों मनाते! परमपिता परमात्मा जरूर बच्चों के लिए सौगात ले आयेंगे और जरूर सर्वोत्तम कार्य करेंगे। सारी तमोप्रधान सृष्टि को सतोप्रधान सदा सुखी बनाते हैं। जितना ऊंच है उतना ऊंच यादगार भी था जिस मन्दिर को लूटकर ले गये। मनुष्य चढ़ाई करते ही हैं धन के लिए। फारेन से भी आये धन के लिए, उस समय भी धन बहुत था। परन्तु माया रावण ने भारत को कौड़ी तुल्य बना दिया है। बाप आकर हीरे तुल्य बनाते हैं। ऐसे शिवबाबा को कोई भी नहीं जानते हैं। कह देते सर्वव्यापी है, यह कहना भी भूल है। नईया पार करने वाला सतगुरू एक है। डुबोने वाले अनेक हैं। सभी विषय सागर में डूबे हुए हैं तब तो कहते हैं इस असार संसार, विषय सागर से उस पार ले चलो, जहाँ क्षीरसागर है। गाया भी जाता है कि विष्णु क्षीरसागर में रहते थे। स्वर्ग को क्षीरसागर कहा जाता है। जहाँ लक्ष्मी-नारायण राज्य करते हैं। बाकी ऐसे नहीं विष्णु वहाँ क्षीरसागर में विश्राम करते हैं। वो लोग तो बड़ा तलाब बनाकर उसके बीच में विष्णु को रखते हैं। विष्णु भी लम्बा चौड़ा बनाते हैं। इतने बड़े तो लक्ष्मी-नारायण होते नहीं। बहुत-बहुत 6 फुट होंगे। पाण्डवों के भी बड़े-बड़े बुत बनाते हैं। रावण का कितना बड़ा बुत बनाते हैं। बड़ा नाम है तो बड़ा चित्र बनाते हैं। बाबा का नाम भल बड़ा है परन्तु उनका चित्र छोटा है। यह तो समझाने लिए इतना बड़ा रूप दे दिया है। बाप कहते हैं मेरा इतना बड़ा रूप नहीं है। जैसे आत्मा छोटी है वैसे ही मैं परमात्मा भी स्टार मिसल हूँ। उसको सुप्रीम सोल कहा जाता है, वह है सबसे ऊंच। उसी में सारा ज्ञान भरा हुआ है, उनकी महिमा गाई हुई है कि वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, ज्ञान का सागर है, चैतन्य आत्मा है। परन्तु सुनावे तब जब आरगन्स लेवे। जैसे बच्चा भी छोटे आरगन्स से बात नहीं कर सकता है, बड़ा होता है तो शास्त्र आदि देखने से अगले संस्कारों की स्मृति आ जाती है। तो बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं मैं फिर से 5 हजार वर्ष बाद तुमको वही राजयोग सिखाने आया हूँ। कृष्ण ने कोई राजयोग नहीं सिखाया है। उन्होंने तो प्रालब्ध भोगी है। 8 जन्म सूर्यवंशी, 12 जन्म चन्द्रवंशी फिर 63 जन्म वैश्य, शूद्र वंशी बनें। अभी सबका यह अन्तिम जन्म है। यह कृष्ण की आत्मा भी सुनती है। तुम भी सुनते हो। यह है संगमयुगी ब्राह्मणों का वर्ण। फिर तुम ब्राह्मण से जाकर देवता बनेंगे। ब्राह्मण धर्म, सूर्यवंशी देवता धर्म और चन्द्रवंशी क्षत्रिय धर्म तीनों का स्थापक एक ही परमपिता परमात्मा है। तो तीनों का शास्त्र भी एक होना चाहिए। अलग-अलग कोई शास्त्र हैं नहीं। ब्रह्मा इतना बड़ा सभी का बाप है, प्रजापिता। उनका भी कोई शास्त्र है नहीं। एक गीता में ही भगवानुवाच है। ब्रह्मा भगवानुवाच नहीं है। यह है शिव भगवानुवाच ब्रह्मा द्वारा, जिससे शूद्रों को कनवर्ट कर ब्राह्मण बनाया जाता है। ब्राह्मण ही देवता और जो नापास होते हैं, वह क्षत्रिय बन जाते हैं। दो कला कम हो जाती हैं। कितना अच्छी रीति समझाते हैं। ऊंच ते ऊंच है परमपिता परमात्मा फिर ब्रह्मा, विष्णु, शंकर उनको भी पुरुषोत्तम नहीं कहेंगे। जो पुरुषोत्तम बनते हैं, वही फिर कनिष्ट भी बनते हैं। मनुष्यों में सर्वोत्तम हैं लक्ष्मी-नारायण, जिसके मन्दिर भी हैं। परन्तु उनकी महिमा को कोई जानते नहीं हैं। सिर्फ पूजा करते रहते हैं। अब तुम पुजारी से पूज्य बन रहे हो। माया फिर पुजारी बना देती है। ड्रामा ऐसा बना हुआ है। जब नाटक पूरा होता है तभी मुझे आना पड़ता है। फिर वृद्धि होना भी आटोमेटिकली बन्द हो जाता है। फिर तुम बच्चों को आकर अपना-अपना पार्ट रिपीट करना है। यह परमपिता परमात्मा खुद बैठ समझाते हैं, जिसकी जयन्ती भक्तिमार्ग में मनाते हैं। यह तो मनाते ही रहेंगे। स्वर्ग में तो कोई की भी जयन्ती नहीं मनाते हैं। कृष्ण, राम आदि की भी जयन्ती नहीं मनायेंगे। वह तो खुद प्रैक्टिकल में होंगे। यह तो होकर गये हैं, तब मनाते हैं। वहाँ वर्ष-वर्ष कृष्ण का बर्थ डे नहीं मनायेंगे। वहाँ तो सदैव खुशियां हैं ही, बर्थ डे क्या मनायेंगे। बच्चे का नाम तो मात-पिता ही रखते होंगे। गुरू तो वहाँ होता नहीं। वास्तव में इन बातों का ज्ञान और योग से कोई कनेक्शन नहीं है। बाकी वहाँ की रसम क्या है, सो पूछना होता है, या तो बाबा कह देंगे वहाँ के कायदे जो होंगे वह चल पड़ेंगे, तुमको पूछने की क्या दरकार है। पहले मेहनत कर अपना पद तो प्राप्त कर लो। लायक तो बनो, फिर पूछना। ड्रामा में कोई न कोई कायदा होगा। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) अपने को निराकार आत्मा समझ निराकार बाप को याद करना है। किसी भी देहधारी को नहीं। मरजीवा बन पुरानी बातों को बुद्धि से भूल जाना है।
2) बाप के रचे हुए इस रूद्र यज्ञ में सम्पूर्ण स्वाहा होना है। शूद्रों को ब्राह्मण धर्म में कनवर्ट करने की सेवा करनी है।
 
वरदान:अपनी विल पावर द्वारा हर एक को विल कराने वाले श्रेष्ठ सेवाधारी भव!
 वर्तमान समय कई आत्मायें आपके सहयोग के लिए चात्रक हैं लेकिन अपनी शक्ति नहीं है। उन्हें आपको अपने शक्तियों की मदद विशेष देनी पड़ेगी इसलिए निमित्त बने हुए सेवाधारियों में सर्व शक्तियों की पावर चाहिए। जैसे ब्रह्मा बाप ने लास्ट में बच्चों को शक्तियों की विल की, उस विल से यह कार्य चल रहा है, ऐसे फालो फादर। अपने शक्तियों की विल आत्माओं के प्रति करो तो समय के प्रमाण सेवा सम्पन्न हो जायेगी।
 स्लोगन:जहाँ एकता और एकाग्रता की शक्ति है वहाँ सफलता सहज प्राप्त होती है।

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Details ( Page:- Murali 11-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 11.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Tum peace sthapan karne ke nimitt ho,isiliye bahut-bahut peace me rehna hai,buddhi me rahe ki hum Baap se adopted bacche aapas me bhai-bahen hain.
 
Q-Poora surrender kise kahenge,unki nishaani kya hogi?
A-Poora surrender woh,jinki budhhi me rehta ki hum Ishwariya Maa-Baap se palte hai.Baba yah sab kuch aapka hai,aap humari palana karte ho.Bhal koi naukri adi karte hain lekin buddhi se samajhte hain yah sab Baba ke liye hai.Baap ko madad karte rehte,usse itne bade yagyan ki karobaar chalti,sabki palana hoti...aise bacche bhi arpan buddhi huye.Saath-saath pad ooncha pane ke liye padhna aur padhana bhi hai.Sarir nirvah arth karm karte huye behad ke Mata-Pita ko swansho swansh yaad karna hai.
 
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Buddhi ko saalim banane ke liye deha me rehte,deha ke bandhan se nyara rehna hai.Asariri banne ka abhyas karna hai.Bimari adi ke samay bhi Baap ki yaad me rehna hai.
2)Paarlokik Mata-Pita ke bacche bane hain,isiliye bahut-bahut mitha,royal,peaceful,knowledgeful aur blissful rehna hai.Peace me rah peace sthapan karni hai.
 
Vardan:-Atoot yaad dwara sarv samsyaon ka hal karne wale Udta Panchi bhava.-
Slogan:-Manan shakti ke anubhavi bano to gyan dhan badhta rahega.
 
ENGLISH SUMMARY - 11.01.18     
Sweet children, you are instruments to establish peace. Therefore, you have to remain very, very peaceful. Let it remain in your intellects that you are the Father’s adopted children and are therefore brothers and sisters.
Question:Whom would you call fully surrendered and what would indicate that?
Answer:  “Fully surrendered ones” are those whose intellects are aware that they are being sustained by the Godly Mother and Father. They say: Baba, all of this is Yours. You sustain us. Even though some may have jobs, they understand that everything is for Baba. They continue to help the Father and it is through this that the entire business of such a big sacrificial fire continues and that everyone is sustained from it. Such children are those with surrendered intellects. Together with that, in order to claim a high status, you also have to study and teach others. While doing everything for the livelihood of your body, you have to remember the unlimited Mother and Father in every breath.
Song:Salutations to Shiva.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. In order to make your intellect good and powerful, remain detached from any bondage of the body while in the body. Practise being bodiless. At a time of illness, stay in remembrance of the Father.
2. You have become the children of the Mother and Father from beyond and you must therefore become very, very sweet, royal, peaceful, knowledge-full and blissful. You have to stay in peace and establish peace.
 
Blessing:May you be a flying bird who finds solutions to all problems with unbroken remembrance. You have to experience Baba being yours. Then you automatically remember whatever is yours.
You don’t have to make effort to remember Him. “Mine” means to claim a right. Baba is mine and I am Baba’s. This is called easy yoga. Become such easy yogis who are lost in love in remembrance of the Father and continue to move forward. This unbroken remembrance becomes the solution to all problems; it makes you into a flying bird and takes you into the flying stage.
 
Slogan:Become experienced in the power of churning, and your power and wealth of knowledge will continue to increase.
HINDI DETAIL MURALI

11/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे "मीठे बच्चे - तुम पीस स्थापन करने के निमित्त हो, इसलिए बहुत-बहुत पीस में रहना है, बुद्धि में रहे कि हम बाप के एडाप्टेड बच्चे आपस में भाई-बहन हैं"
 
प्रश्न:पूरा सरेण्डर किसे कहेंगे, उनकी निशानी क्या होगी?
 
उत्तर:पूरा सरेण्डर वह, जिनकी बुद्धि में रहता कि हम ईश्वरीय माँ-बाप से पलते हैं। बाबा यह सब कुछ आपका है, आप हमारी पालना करते हो। भल कोई नौकरी आदि करते हैं लेकिन बुद्धि से समझते हैं यह सब बाबा के लिए है। बाप को मदद करते रहते, उससे इतने बड़े यज्ञ की कारोबार चलती, सबकी पालना होती... ऐसे बच्चे भी अर्पण बुद्धि हुए। साथ-साथ पद ऊंचा पाने के लिए पढ़ना और पढ़ाना भी है। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते हुए बेहद के मात-पिता को श्वाँसों श्वाँस याद करना है।
 
गीत:-ओम् नमो शिवाए...  ओम् शान्ति।
यह गीत तो है गायन। वास्तव में महिमा सारी है ही ऊंचे ते ऊंचे परमात्मा की, जिसको बच्चे जानते हैं और बच्चों द्वारा सारी दुनिया भी जानती है कि मात-पिता हमारा वही है। अब तुम मात-पिता के साथ कुटुम्ब में बैठे हो। श्रीकृष्ण को तो मात-पिता कह नहीं सकते। भल उनके साथ राधे भी हो तो भी उनको माता पिता नहीं कहेंगे क्योंकि वह तो प्रिन्स-प्रिन्सेज हैं। शास्त्रों में यह भूल है। अब यह बेहद का बाप तुमको सभी शास्त्रों का सार बताते हैं। भल इस समय सिर्फ तुम बच्चे सम्मुख बैठे हो। कोई बच्चे भल दूर हैं। परन्तु वह भी सुन रहे हैं। वे जानते हैं कि मात-पिता हमको सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझा रहे हैं और सदा सुखी बनाने का रास्ता वा युक्ति बता रहे हैं। यह हू ब हू जैसा घर है। थोड़े बच्चे यहाँ हैं, बहुत तो बाहर हैं। यह है ब्रह्मा मुख वंशावली, नई रचना है। वह हो गई पुरानी रचना। बच्चे जानते हैं कि बाबा हमको सदा सुखी बनाने आये हैं। लौकिक माँ-बाप भी बच्चे को बड़ा कर स्कूल में ले जाते हैं। यहाँ बेहद का बाप हमको पढ़ा भी रहे हैं, हमारी पालना भी कर रहे हैं। तुम बच्चों को अब एक के बिगर दूसरा कोई रहा ही नहीं है। माँ-बाप भी समझते हैं - यह हमारे बच्चे हैं। लौकिक कुटुम्ब होगा तो 10-15 बच्चे होंगे, 2-3 शादी की होगी। यहाँ तो यह सब बाबा के बच्चे बैठे हैं। जितने भी बच्चे पैदा करने हैं सो अभी ही ब्रह्मा मुख कमल द्वारा करने हैं। पीछे तो बच्चे पैदा करने ही नहीं हैं। सभी को वापिस जाना है। यह एक ही एडाप्टेड माता निमित्त है। यह बड़ी वण्डरफुल बात है। यह तो जरूर है गरीब का बच्चा समझेगा कि हमारा बाप गरीब है। साहूकार का बच्चा समझेगा कि हमारा बाप साहूकार है। वह तो अनेक माँ-बाप हैं। यह तो सारे जगत का एक ही माता-पिता है। तुम सभी जानते हो कि हम उनके मुख से एडाप्ट हुए हैं। यह हमारा पारलौकिक माँ-बाप है। यह आते ही पुरानी सृष्टि में हैं, जब मनुष्य बहुत-बहुत दु:खी होते हैं। बच्चे जानते हैं कि हमने इस पारलौकिक मात-पिता की गोद ली है। हम सब आपस में भाई-बहन हैं। दूसरा कोई हमारा सम्बन्ध नहीं है। तो भाई बहन को आपस में बहुत मीठा, रॉयल, पीसफुल, नॉलेजफुल, ब्लिसफुल बनना चाहिए। जबकि तुम पीस स्थापन कर रहे हो तो तुमको भी बहुत पीस में रहना चाहिए। बच्चों को यह तो बुद्धि में होना चाहिए कि हम पारलौकिक बाप के एडाप्टेड बच्चे हैं। परमधाम से बाप आये हैं। वह है डाडा (ग्रैण्ड फादर) यह दादा (बड़ा भाई) है, जो पूरा सरेण्डर हैं वो समझेंगे हम ईश्वरीय माँ-बाप से पलते हैं। बाबा यह सब कुछ आपका है। आप हमारी पालना करते हो। जो बच्चे अर्पण होते हैं उनसे सभी की पालना हो जाती है। भल कोई नौकरी करते हैं तो भी समझते हैं यह सब कुछ बाबा के लिए है। तो बाप को भी मदद करते रहते हैं। नहीं तो यज्ञ की कारोबार कैसे चले। राजा रानी को भी मात-पिता कहते हैं। परन्तु वह फिर भी जिस्मानी मात-पिता हुए। राज-माता भी कहते हैं तो राज-पिता भी कहते हैं। यह फिर हैं बेहद के। बच्चे जानते हैं कि हम मात-पिता के साथ बैठे हैं। यह भी बच्चे जानते हैं कि हम जितना पढ़ेंगे और पढ़ायेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। साथ-साथ शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी करना है। यह दादा भी बुजुर्ग है। शिवबाबा को कभी बूढ़ा वा जवान नहीं कहेंगे। वह है ही निराकार। यह भी तुम जानते हो कि हम आत्माओं को निराकार बाप ने एडाप्ट किया है। और फिर साकार में है यह ब्रह्मा। अहम् आत्मा कहती हैं हमने बाप को अपना बनाया है। फिर नीचे आओ तो कहेंगे हम भाई बहनों ने ब्रह्मा को अपना बनाया है। शिवबाबा कहते हैं - तुम ब्रह्मा द्वारा हमारे ब्रह्मा मुख वंशावली बने हो। ब्रह्मा भी कहते हैं तुम हमारे बच्चे बने हो। तुम ब्राह्मणों की बुद्धि में श्वाँसों श्वाँस यही चलेगा कि यह हमारा बाप है, वह हमारा दादा है। बाप से जास्ती दादे को याद करते हैं। वह मनुष्य तो बाप से झगड़ा आदि करके भी दादे से प्रापर्टी लेते हैं। तुमको भी कोशिश करके बाप से भी जास्ती दादे से वर्सा लेना है। बाबा जब पूछते हैं तो सभी कहते हैं हम नारायण को वरेंगे। कोई-कोई नये आते थे, पवित्र नहीं रह सकते तो वह हाथ नहीं उठा सकते। कह देते माया बड़ी प्रबल है। वह तो कह भी नहीं सकते कि हम श्री नारायण को वा लक्ष्मी को वरेंगे। देखो, जब बाबा सम्मुख सुनाते हैं तो कितना खुशी का पारा चढ़ता है। बुद्धि को रिफ्रेश किया जाता है तो नशा चढ़ता है। फिर किसी-किसी को वह नशा स्थाई रहता है, किसी-किसी में कम हो जाता है। बेहद के बाप को याद करना है, 84 जन्मों को याद करना है और चक्रवर्ती राजाई को भी याद करना है। जो मानने वाले नहीं होंगे उनको याद नहीं रहेगी। बापदादा समझ जाते हैं कि बाबा-बाबा कहते तो हैं परन्तु सच-सच याद करते नहीं हैं और न लक्ष्मी-नारायण को वरने लायक हैं। चलन ही ऐसी है। अन्तर्यामी बाप हर एक की बुद्धि को समझते हैं। यहाँ शास्त्रों की तो कोई बात ही नहीं। बाप ने आकर राजयोग सिखाया है, जिसका नाम गीता रखा है। बाकी तो छोटे मोटे धर्मों वाले सब अपना-अपना शास्त्र बना लेते हैं फिर वह पढ़ते रहते हैं। बाबा शास्त्र नहीं पढ़े हैं। कहते हैं बच्चे - मैं तुमको स्वर्ग की राह बताने आया हूँ। तुम जैसे अशरीरी आये थे, वैसे ही तुमको जाना है। देह सहित सब इन दु:खों के कर्मबन्धन को छोड़ देना है क्योंकि देह भी दु:ख देती है। बीमारी होगी तो क्लास में आ नहीं सकेंगे। तो यह भी देह का बन्धन हो गया, इसमें बुद्धि बड़ी सालिम चाहिए। पहले तो निश्चय चाहिए कि बरोबर बाबा स्वर्ग रचता है। अभी तो है नर्क। जब कोई मरता है तो कहते हैं स्वर्ग गया, तो जरूर नर्क में था ना। परन्तु यह तुम अभी समझते हो क्योंकि तुम्हारी बुद्धि में स्वर्ग है। बाबा रोज़ नये-नये तरीके से समझाते हैं। तो तुम्हारी बुद्धि में अच्छी रीति बैठे। हमारा बेहद का मात-पिता है। तो पहले बुद्धि एकदम ऊपर चली जायेगी। फिर कहेंगे इस समय बाबा आबू में है। जैसे यात्रा पर जाते हैं तो बद्रीनाथ का मन्दिर ऊपर रहता है। पण्डे ले जाते हैं, बद्रीनाथ खुद तो ले चलने लिए नहीं आता है। मनुष्य पण्डा बनते हैं। यहाँ शिवबाबा खुद आते हैं परमधाम से। कहते हैं हे आत्मायें तुमको यह शरीर छोड़ शिवपुरी चलना है। जहाँ जाना है वह निशाना जरूर याद रहेगा। वह बद्रीनाथ चैतन्य में आकर बच्चों को साथ ले जाये, ऐसे तो हो नहीं सकता। वह तो यहाँ का रहवासी है। यह परमपिता परमात्मा कहते हैं मैं परमधाम का रहवासी हूँ। तुमको लेने लिए आया हूँ। कृष्ण तो ऐसे कह न सके। रुद्र शिवबाबा कहते हैं, यह रुद्र यज्ञ रचा हुआ है। गीता में भी रुद्र की बात लिखी हुई है। वह रूहानी बाप कहते हैं मुझे याद करो। बाप ऐसी युक्ति से यात्रा सिखाते हैं, जो जब विनाश हो तो तुम आत्मा शरीर छोड़ सीधा बाप के पास चले जायेंगे। फिर तो शुद्ध आत्मा को शुद्ध शरीर चाहिए, सो तब होगा जब नई सृष्टि हो। अभी तो सभी आत्मायें मच्छरों सदृश्य वापस जायेंगी, बाबा के साथ, इसलिए उनको खिवैया भी कहा जाता है। इस विषय सागर से उस पार ले जाते हैं। कृष्ण को खिवैया नहीं कह सकते। बाप ही इस दु:ख के संसार से सुख के संसार में ले जाते हैं। यही भारत विष्णुपुरी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। अब रावणपुरी है। रावण का चित्र भी दिखाना चाहिए। चित्रों से बहुत काम लेना है। जैसे हमारी आत्मा है वैसे बाबा की आत्मा है। सिर्फ हम पहले अज्ञानी थे, वह ज्ञान का सागर है। अज्ञानी उसको कहा जाता है जो रचता और रचना को नहीं जानते हैं। रचता द्वारा जो रचता और रचना को जानते हैं उनको ज्ञानी कहा जाता है। यह ज्ञान तुमको यहाँ मिलता है। सतयुग में नहीं मिलता। वो लोग कहते हैं परमात्मा विश्व का मालिक है। मनुष्य उस मालिक को याद करते हैं, परन्तु वास्तव में विश्व का अथवा सृष्टि का मालिक तो लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। निराकार शिवबाबा तो विश्व का मालिक बनता नहीं। तो उन्हों से पूछना पड़े कि वह मालिक निराकार है या साकार? निराकार तो साकार सृष्टि का मालिक हो न सके। वह है ब्रह्माण्ड का मालिक। वही आकर पतित दुनिया को पावन बनाते हैं। खुद पावन दुनिया का मालिक नहीं बनते। उनका मालिक तो लक्ष्मी-नारायण बनते हैं और बनाने वाला है बाप। यह बड़ी गुह्य बातें हैं समझने की। हम आत्मा भी जब ब्रह्म तत्व में रहती हैं तो ब्रह्माण्ड के मालिक हैं। जैसे राजा रानी कहेंगे हम भारत के मालिक हैं तो प्रजा भी कहेगी हम मालिक हैं। वहाँ रहते तो हैं ना। वैसे बाप ब्रह्माण्ड का मालिक है, हम भी मालिक ही ठहरे। फिर बाबा आकर नई मनुष्य सृष्टि रचते हैं। कहते हैं मुझे इस पर राज्य नहीं करना है, मैं मनुष्य नहीं बनता हूँ। मैं तो यह शरीर भी लोन लेता हूँ। तुमको सृष्टि का मालिक बनाने राजयोग सिखाता हूँ। तुम जितना पुरुषार्थ करेंगे उतना पद ऊंचा पायेंगे, इसमें कमी मत करो। टीचर तो सभी को पढ़ाते हैं। अगर इम्तहान में बहुत पास होते हैं तो टीचर का भी शो होता है। फिर उनको गवर्मेन्ट से लिफ्ट मिलती है। यह भी ऐसे है। जितना अच्छा पढ़ेंगे उतना अच्छा पद मिलेगा। माँ-बाप भी खुश होंगे। इम्तहान में पास होते हैं तो मिठाई बाँटते हैं। यहाँ तो तुम रोज़ मिठाई बाँटते हो। फिर जब इम्तहान में पास हो जाते हो तो सोने के फूलों की वर्षा होती है। तुम्हारे ऊपर कोई आकाश से फूल नही गिरेंगे परन्तु तुम एकदम सोने के महलों के मालिक बन जाते हो। यह तो कोई की महिमा करने के लिए सोने के फूल बनाकर उन पर डालते हैं। जैसे दरभंगा का राजा बहुत साहूकार था, उनका बच्चा विलायत गया तो पार्टी दी, बहुत पैसा खर्च किया। उसने सोने के फूल बनाकर वर्षा की थी। उस पर बहुत खर्चा हो गया। बहुत नाम हुआ था। कहते थे देखो भारतवासी कैसे पैसे उड़ाते हैं। तुम तो खुद ही सोने के महलों में जाकर बैठेंगे तो तुमको कितना नशा रहना चाहिए। बाप कहते हैं सिर्फ मेरे को और चक्र को याद करो तो तुम्हारा बेड़ा पार हो जायेगा। कितना सहज है।
 
तुम बच्चे हो चैतन्य परवाने, बाबा है चैतन्य शमा। तुम कहते हो अभी हमारा राज्य स्थापन होना है। अब सच्चा बाबा आया हुआ है भक्ति का फल देने। बाबा ने खुद बतलाया है मैं कैसे आकर नये ब्राह्मणों की सृष्टि रचता हूँ। मुझे जरूर आना पड़े। तुम बच्चे जानते हो हम ब्रह्माकुमार और कुमारियाँ हैं। शिवबाबा के पोत्रे हैं। यह फैमिली है वण्डरफुल। कैसे देवी-देवता धर्म का कलम लग रहा है। झाड़ में क्लीयर है। नीचे तुम बैठे हो। तुम बच्चे कितने सौभाग्यशाली हो। मोस्ट बिलवेड बाप बैठ समझाते हैं कि मैं आया हूँ तुम बच्चों को रावण की जंजीरों से छुड़ाने। रावण ने तुमको रोगी बना दिया है। अब बाप कहते हैं मुझे याद करो अर्थात् शिवबाबा को याद करो इससे तुम्हारी ज्योति जगेगी, फिर तुम उड़ने लायक बन जायेंगे। माया ने सबके पंख तोड़ डाले हैं। अच्छा।
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बुद्धि को सालिम बनाने के लिए देह में रहते, देह के बन्धन से न्यारा रहना है। अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। बीमारी आदि के समय भी बाप की याद में रहना है।
2) पारलौकिक मात-पिता के बच्चे बने हैं, इसलिए बहुत-बहुत मीठा, रॉयल, पीसफुल, नॉलेजफुल और ब्लिसफुल रहना है। पीस में रह पीस स्थापन करनी है।
 
वरदान:अटूट याद द्वारा सर्व समस्याओं का हल करने वाले उड़ता पंछी भव!
जब यह अनुभव हो जाता है कि मेरा बाबा है, तो जो मेरा होता है वह स्वत: याद रहता है। याद किया नहीं जाता है। मेरा अर्थात् अधिकार प्राप्त हो जाना। मेरा बाबा और मैं बाबा का -इसी को कहा जाता है सहजयोग। ऐसे सहजयोगी बन एक बाप की याद के लगन में मगन रहते हुए आगे बढ़ते चलो। यह अटूट याद ही सर्व समस्याओं को हल करके उड़ता पंछी बनाए उड़ती कला में ले जायेगी।
 

स्लोगन:मनन शक्ति के अनुभवी बनो तो ज्ञान धन बढ़ता रहेगा।

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Details ( Page:- Murali 12-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 12.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche -Baap ki duwayein leni hain to har kadam Shrimat par chalo,chaal-chalan achchi rakho.
Q-Shiv Baba ki dil par kaun chadh sakta hai?
A-Jinki guarantee Brahma Baba leta ki yah baccha serviceable hai,yah sabko sukh deta hai.Mansa,vacha,karmana kisi ko dukh nahi deta.Aise jab yah(Brahma Baba) bole,tab Shiv Baba ki dil par chadh sakte hain.
 
Q-Is samay tum roohani servant Baba ke saath kaun si seva karte ho?
A-Sare Biswa ki to kya lekin 5 tatwo ko bhi pawan banane ki seva tum roohani servant karte ho isiliye tum ho sachche-sachche social worker.
 
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Koi ko bhi naraj nahi karna hai.mansa-vacha-karmana sabko sukh de Baap ki aur parivaar ki duwayein leni hain.
2)Sapoot baccha ban Bharat ki roohani seva karni hai.Rahemdil ban roohani social worker banna hai.Tan-mann-dhan se seva karni hai.Sachche saheb ke saath sachcha rehna hai.
 
Vardan:-Dil ek Dilaram me basakar sahajyogi banne wale Sarv Aakarshan Murt bhava.
Slogan:-Baap se aur Ishwariya parivaar se jigri pyaar ho to safalta milti rahegi.
 
ENGLISH SUMMARY - 12.01.18     
Sweet children, in order to claim blessings from the Father, follow shrimat at every step. Keep your activity good.
Question:Who can climb onto Shiv Baba’s heart-throne?
Answer: When Brahma Baba guarantees that a particular child is serviceable and gives everyone happiness, that he doesn’t cause sorrow for anyone through his thoughts, words or deeds, when Brahma Baba says this of him, he can sit on Shiv Baba’s heart-throne.
Question:What service are you spiritual servants doing with Baba at this time?
Answer:You spiritual servants not only purify the whole world, but also the five elements. This is why you are true social workers.
Song:Claim blessings from the Mother and the Father.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. Don't upset anyone. Make everyone happy with your thoughts, words and deeds and claim blessings from the Father and the family.
2. Become worthy children and do spiritual service of Bharat. Have a merciful heart and become a spiritual social worker. Serve with your body, mind and wealth. Remain true to the true Lord.
Blessing:May you become an image that attracts everyone and become an easy yogi by keeping the one Comforter of Hearts in your heart.
To give your heart to the Comforter of Hearts means to keep Him in your heart: this is called easy yoga. Wherever your heart is, your head will work in that direction. When you have given your heart and head, that is, your awareness, thoughts and power to the Father, when you belong to the Father with your thoughts, words and deeds, there is then no margin for any other type of thoughts or attraction to come. Your dreams will then also be based on this. When you have said “Everything is Yours”, there cannot be any other attraction. You will easily become an image that attracts.
Slogan: When you have deep love in your heart for the Father and the Godly family, you will continue to achieve success.
 
 
 
HINDI DETAIL MURALI

12/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - बाप की दुआयें लेनी हैं तो हर कदम श्रीमत पर चलो, चाल-चलन अच्छी रखो"
प्रश्न:शिवबाबा की दिल पर कौन चढ़ सकता है?
उत्तर: जिनकी गैरन्टी ब्रह्मा बाबा लेता कि यह बच्चा सर्विसएबुल है, यह सबको सुख देता है। मन्सा, वाचा, कर्मणा किसी को दु: नहीं देता। ऐसे जब यह (ब्रह्मा बाबा) बोले, तब शिवबाबा की दिल पर चढ़ सकते हैं।
 
प्रश्न:इस समय तुम रूहानी सर्वेन्ट बाबा के साथ कौन सी सेवा करते हो?
उत्तर:सारे विश्व की तो क्या लेकिन 5 तत्वों को भी पावन बनाने की सेवा तुम रूहानी सर्वेन्ट करते हो इसलिए तुम हो सच्चे-सच्चे सोशल वर्कर।
गीत:-ले लो दुआयें माँ बाप की... ओम् शान्ति।
बच्चों ने गीत सुना। ऐसे तो लौकिक माँ-बाप की दुआयें अनेक लेते हैं। बच्चे पांव पड़ते हैं माँ-बाप आशीर्वाद करते हैं। यह ढिंढोरा लौकिक माँ-बाप के लिए नहीं पिटाया जाता है। ढिंढोरा अर्थात् जिसको बहुत सुनें। यह तो बेहद बाप के लिए ही गाया जाता है तुम मात-पिता हम बालक तेरे... तुम्हारी कृपा वा दुआ से सुख घनेरे। भारत में ही यह महिमा गाई जाती है। जरूर भारत में ही यह हुआ है तब तो गाया जाता है। एकदम बेहद में चला जाना चाहिए। बुद्धि कहती है स्वर्ग का रचयिता बाप एक ही है। स्वर्ग में तो सभी सुख हैं। वहाँ दु: का नाम-निशान हो नहीं सकता इसलिए ही गाते हैं कि दु: में सिमरण सब करें सुख में करे कोई। आधाकल्प दु: है तो सभी सिमरण करते हैं। सतयुग में अथाह सुख हैं, तो वहाँ सिमरण नहीं करते हैं। मनुष्य पत्थरबुद्धि होने कारण कुछ भी समझते नहीं हैं। कलियुग में तो अथाह दु: हैं। कितनी मारामारी है। कितने भी पढ़े लिखे विद्धान हैं, परन्तु इन गीतों का अर्थ बिल्कुल नहीं जानते हैं। गाते हैं तुम मात पिता... परन्तु समझते नहीं हैं कि कौन से माता पिता की महिमा है। यह तो बहुतों की बात है ना। ईश्वर की सन्तान तो सभी हैं, परन्तु इस समय तो सभी दु:खी हैं। सुख घनेरे तो किसको नहीं हैं। कृपा से तो सुख मिलना चाहिए। अकृपा से दु: होता है। बाप तो कृपालु गाया हुआ है। साधू सन्तों को भी कृपालु कहते हैं।
 
अब तुम बच्चे जानते हो भक्ति मार्ग में गाते हैं तुम मात पिता... यह बिल्कुल यथार्थ है, परन्तु कोई बुद्धिवान होगा तो पूछेगा कि परमात्मा को तो गॉड फादर कहा जाता है, उनको फिर मदर कैसे कहते हैं? तो उनकी बुद्धि जगत अम्बा के तरफ जायेगी। जब जगत अम्बा की तरफ बुद्धि जाती है तो फिर जगत पिता के तरफ भी बुद्धि जानी चाहिए। अब ब्रह्मा सरस्वती यह कोई भगवान तो नहीं हैं। यह महिमा उनकी हो नहीं सकती। उनके आगे भी माता-पिता कहना राँग है। मनुष्य गाते तो परमपिता परमात्मा के लिए हैं, परन्तु जानते नहीं हैं कि वह मात-पिता कैसे बनते हैं। अब तुम बच्चों को कहा जाता है ले लो, ले लो दुआयें माँ बाप की... अर्थात् श्रीमत पर चलो। अपनी चाल-चलन अच्छी हो तो अपने पर आपेही दुआयें हो जायेंगी। अगर चलन अच्छी नहीं होगी, किसको दु: देते रहेंगे, मात-पिता को याद नहीं करेंगे अथवा दूसरों को याद नहीं करायेंगे तो दुआयें मिल नहीं सकती। फिर इतना सुख भी नहीं पा सकेंगे। बाप की दिल पर चढ़ नहीं सकेंगे। इस बाप की (ब्रह्मा की) दिल पर चढ़े तो गोया शिवबाबा की दिल पर चढ़े। यह गायन है ही उस मात-पिता का। बुद्धि उस बेहद के मात-पिता के तरफ चली जानी चाहिए। ब्रह्मा की तरफ भी कोई की बुद्धि नहीं जाती है। भल जगत अम्बा की तरफ कोई की जाती है। उनका भी मेला लगता है, परन्तु आक्यूपेशन को कोई जानते ही नहीं। तुम जानते हो हमारी सच्ची-सच्ची माता कायदे अनुसार यह ब्रह्मा है। यह भी समझना है। याद भी ऐसे करेंगे। यह माता भी है तो ब्रह्मा बाबा भी है। लिखते हैं शिवबाबा केयरआफ ब्रह्मा। तो माता भी हो जाती है तो पिता भी हो जाता। अब बच्चों को इस पिता की दिल पर चढ़ना है क्योंकि इनमें ही शिवबाबा प्रवेश होते हैं। यह जब गैरन्टी देते हैं कि हाँ बाबा यह बच्चा बहुत अच्छा सर्विसएबुल है, सभी को सुख देने वाला है। मन्सा-वाचा-कर्मणा किसको दु: नहीं देता है तब ही शिवबाबा की दिल पर चढ़ सकता है। मन्सा-वाचा-कर्मणा से जो करो, जो बोलो उससे सबको सुख मिले। दु: किसको नहीं देना है। दु: देने का विचार पहले मन्सा में आता है फिर कर्मणा में आने से पाप बनता है। मन्सा तूफान तो जरूर आयेंगे परन्तु कर्मणा में कभी नहीं आओ। अगर कोई रन्ज (नाराज) होता है तो बाप से आकर पूछो - बाबा इस बात से हमारे से यह नाराज रहते हैं, तो बाबा समझायेंगे। कोई भी बात पहले मन्सा में आती है। वाचा भी कर्मणा ही हो गया। अगर बच्चों को माँ-बाप की आशीर्वाद लेनी है तो श्रीमत पर चलना है। यह बड़ी गुह्य बात है जो एक को ही माता पिता कहते हैं। यह ब्रह्मा बाप भी है तो बड़ी माँ भी है। अब यह बाबा किसको माँ कहे? यह माता (ब्रह्मा) अब किसको माँ कहे? इस माँ की तो माँ कोई हो नहीं सकती। जैसे शिवबाबा का कोई बाप नहीं, ऐसे इन्हें अपनी कोई माँ नहीं।
 
मुख्य बात बच्चों को यह समझाते हैं कि अगर मन्सा, वाचा, कर्मणा किसको दु: देंगे तो दु: पायेंगे और पद भ्रष्ट हो पड़ेंगे। सच्चे साहेब के आगे सच्चा रहना है, इनसे भी सच्चा रहना है। यह दादा ही सर्टीफिकेट देंगे कि बाबा यह बच्चा बड़ा सपूत है। बाबा महिमा तो करते हैं। जो सर्विसएबुल बच्चे हैं तन-मन-धन से सर्विस करते हैं, कभी भी किसको दु: नहीं देते हैं, वही बापदादा और माँ की दिल पर चढ़ते हैं। इनकी दिल पर चढ़े माना उनके तख्त पर चढ़े। हमेशा सपूत बच्चों को यह विचार रहता है कि हम गद्दी नशीन कैसे बनें। यही तात लगी रहती है। गद्दी तो नम्बरवार 8 हैं। फिर 108 फिर 16108 भी हैं, परन्तु अभी हम ऊंच पद पायें। ऐसे तो शोभता नहीं जो दो कला कम हों तब गद्दी पर बैठें। सपूत बच्चे बहुत पुरुषार्थ करेंगे कि हमने अगर अभी लाडले बाबा से सूर्यवंशी का पूरा-पूरा वर्सा नहीं लिया तो कल्प-कल्प नहीं लेंगे। अभी अगर विजय माला में नहीं पिरोये तो कल्प-कल्प नहीं पिरोयेंगे। यह कल्प-कल्प की रेस है। अभी अगर घाटा पड़ा तो कल्प-कल्प पड़ता ही रहेगा। पक्का व्यापारी वह जो श्रीमत पर माँ बाप को पूरा फालो करे, कभी किसको दु: दे। उसमें भी नम्बरवन दु: है काम कटारी चलाना।
 
बाप कहते हैं अच्छा कृष्ण भगवानुवाच समझो, तो वह भी नम्बरवन है। उनकी बात भी माननी चाहिए तब तो स्वर्ग के मालिक बनेंगे। समझते हैं कृष्ण भगवान ने श्रीमत से शिक्षा दी है। अच्छा उनकी मत पर चलो। उसने भी कहा है कि काम महाशत्रु है, भला उनको जीतो। इन विकारों को जीतेंगे तब ही कृष्णपुरी में सकेंगे। अब कृष्ण की तो बात नहीं। कृष्ण तो बच्चा था। वह कैसे मत देंगे। जब बड़ा होकर गद्दी पर बैठेगा तब वह मत देगा। मत देने के लायक बनेंगे तब तो राज्य चलायेंगे ना। अब शिवबाबा तो कहते हैं मुझे निराकारी दुनिया में याद करो। कृष्ण फिर कहेगा कि मुझे स्वर्ग में याद करो। वह भी कहते हैं काम महाशत्रु है, इन पर जीत पहनो। वहाँ विष नहीं मिलेगा, तो विष को छोड़ पवित्र बनो। यह तो कृष्ण का बाप बैठ समझाते हैं। अच्छा समझो मनुष्यों ने मेरा नाम निकाल बच्चे का नाम डाल दिया है, वह भी तो सर्वगुण सम्पन्न है। वह भी कहते हैं, गीता में लिखा हुआ है कि काम महाशत्रु है। उनको भी मानते थोड़ेही हैं। उन पर भी चलते थोड़ेही हैं। समझते हैं कृष्ण खुद आये तब हम उनकी मत पर चलेंगे तब तक तो गोता ही खाते रहेंगे। सन्यासी आदि कह नहीं सकते कि मैं तुमको राजयोग सिखलाने आया हूँ। यह तो बाप ही समझाते हैं और संगम की ही बात है। कृष्ण है सतयुग में। उनको भी ऐसा लायक बनाने वाला कोई तो होगा ना। तो शिवबाबा खुद कहते हैं कृष्ण और उनके सारे घराने को अब मैं स्वर्ग में जाने लायक बना रहा हूँ। बाबा कितनी मेहनत करते हैं कि बच्चे स्वर्ग में चल ऊंच पद पायें। नहीं तो पढ़े लिखे के आगे जाकर भरी उठायेंगे। बाप से तो पूरा वर्सा लेना है। अपने से पूछो हम इतने सपूत हैं? सपूत भी नम्बरवार होते हैं। उत्तम, मध्यम, कनिष्ट। उत्तम तो कभी छिपे नहीं रहते। उनकी दिल में रहम आयेगा हम भारत की सेवा करें। सोशल वर्कर्स भी नम्बरवार होते हैं - उत्तम, मध्यम, कनिष्ट। कई तो बहुत लूटते हैं, माल बेचकर खा जाते हैं। फिर उनको सपूत सोशल वर्कर कैसे कहेंगे? सोशल वर्कर्स तो अपने को बहुत कहलाते हैं क्योंकि सोसायटी की सेवा करते हैं। सच्ची सेवा तो बाप ही करते हैं।
 
तुम कहते हो कि हम भी बाबा के साथ रूहानी सर्वेन्ट हैं। सारी सृष्टि तो क्या तत्वों को भी पवित्र करते हैं। सन्यासी तो यह नहीं जानते कि तत्व भी इस समय तमोप्रधान हैं, इनको भी सतोप्रधान बनाना है। सतोप्रधान तत्वों से तुम्हारा शरीर भी सतोप्रधान बन जायेगा। सन्यासियों के तो कभी सतोप्रधान शरीर बनते नहीं। वह आते ही रजोप्रधान समय में हैं। बाबा समझाते तो बहुत हैं परन्तु बच्चे फिर भी भूल जाते हैं। याद उनको रहेगा जो औरों को सुनाते रहेंगे। दान नहीं करेंगे तो धारणा भी नहीं होगी। जो अच्छी सर्विस करते हैं, उनका बापदादा भी नाम बाला करते हैं। यह तो बच्चे भी जानते हैं कि सर्विस में कौन-कौन तीखे हैं। जो सर्विस पर हैं वह दिल पर चढ़ते हैं। सदैव फालो माँ-बाप को करना है। उनके ही तख्तनशीन बनना है। जो सर्विस पर होंगे वह दूसरों को सुख देंगे। अपना मुँह दर्पण में देखो कि बाबा का सपूत बच्चा बना हूँ? खुद भी लिख सकते हैं कि हमारी सर्विस का यह चार्ट है। मैं यह-यह सर्विस कर रहा हूँ, आप जज करो। तो बाप को भी मालूम पड़े। खुद भी जज कर सकता है कि मैं उत्तम हूँ, मध्यम हूँ या कनिष्ट हूँ? बच्चे भी जानते हैं कौन महारथी हैं, कौन घोड़ेसवार हैं। कोई भी छिपा नहीं रह सकता है। बाप को पोतामेल भेजे तो बाबा सावधान भी करे। बिगर पोतामेल भी सावधानी तो मिलती रहती है। अब जितना वर्सा लेना हो पूरा-पूरा ले लो। फिर बापदादा से भी सर्टीफिकेट मिलेगा। यह बड़ी माँ बैठी है, इनसे सर्टीफिकेट मिल सकता है। इस वन्डरफुल मम्मी को कोई मम्मी नहीं। जैसे उस बाप को कोई बाप नहीं। फिर मम्मा फीमेल्स में नम्बरवन है। ड्रामा में जगत अम्बा गाई हुई है। सर्विस भी बहुत की है। जैसे बाबा जाते हैं, मम्मा भी जाती थी। छोटे-छोटे गांवों में सर्विस करती थी। सबमें तीखी गई। बाबा के साथ तो बड़ा बाबा है, इसलिए बच्चों को इनकी सम्भाल रखनी पड़ती है। सतयुग में प्रजा बहुत सुखी रहती है। अपने महल, गायें, बैल आदि सब कुछ होते हैं।
 
अच्छा - बच्चे, खुश रहो आबाद रहो, बिसरो याद रहो क्योंकि याद तो शिवबाबा को करना है। अपने शरीर को भी भूल जाना है तो औरों को कैसे याद करें। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) कोई को भी नाराज नहीं करना है। मन्सा-वाचा-कर्मणा सबको सुख दे बाप की और परिवार की दुआयें लेनी हैं।
2) सपूत बच्चा बन भारत की रूहानी सेवा करनी है। रहमदिल बन रूहानी सोशल वर्कर बनना है। तन-मन-धन से सेवा करनी है। सच्चे साहेब के साथ सच्चा रहना है।
 
वरदान:दिल एक दिलाराम में बसाकर सहजयोगी बनने वाले सर्व आकर्षण मूर्त भव!
दिलाराम को दिल देना अर्थात् दिल में बसाना - इसी को ही सहजयोग कहा जाता है। जहाँ दिल होगी वहाँ ही दिमाग भी चलेगा। जब दिल और दिमाग अर्थात् स्मृति, संकल्प, शक्ति सब बाप को दे दी, मन-वाणी और कर्म से बाप के हो गये तो और कोई भी संकल्प वा किसी भी प्रकार की आकर्षण आने की मार्जिन ही नहीं। स्वप्न भी इसी आधार पर आते हैं। जब सब कुछ तेरा कहा तो दूसरी आकर्षण ही नहीं सकती। सहज ही सर्व आकर्षण मूर्त बन जायेंगे।
 
स्लोगन:बाप से और ईश्वरीय परिवार से जिगरी प्यार हो तो सफलता मिलती रहेगी।

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Details ( Page:- Murali 13-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 13.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Pavitra bina Bharat swarg ban nahi sakta,tumhe Shrimat hai ghar grihast me rehte pavitra bano,dono taraf tod nibhao.
Q- Dusre satsango wa ashramo se yahan ki kaun si rsam bilkul nyari hai?
A-Un Ashramo me manushya jaakar rehte hain samajhte hain-sang achcha hai,ghar adi ka hungama nahi hai.Aim-object kuch nahi.Parantu yahan to tum marjiva bante ho.Tumhe gharbaar nahi chudaya jata.Ghar me rah tumhe gyan amrit pina hai,roohani seva karni hai.Yah rasam un satsango me nahi hai.
 
Dharana ke liye mukhya saar:-
1)Ghar me rehte bhi roohani seva karni hai.Pavitra banna aur banana hai.
2)Is jeete jaagte nark me rehte huye bhi behad ke Baap se Swarg ka varsha lena hai.Kisi ko bhi dukh nahi dena hai.
Vardan:-Ek Baba sabd ki smriti dwara kamzori sabd ko samapt karne wale Sada Samarth Aatma bhava.
Slogan:-Jiske paas gambhirta ki bisheshta hai,unhe har karya me swatah siddhi prapt hoti hai.
 
ENGLISH SUMMARY - 13.01.18     
Sweet children, Bharat cannot become heaven without your purity. You have received the shrimat to become pure while living at home with your family. Fulfil your responsibilities to both sides.
Question:What system here is completely different from other spiritual gatherings and ashrams?
Answer:People go and live in those ashrams and believe that they have good company there and that there wouldn’t be the upheaval of the home and family. However, there isn't any aim or objective there whereas, here, you have to die alive. You are not told to leave your home and family. You live at home and you drink the nectar of knowledge and do spiritual service. They don't have this system at other spiritual gatherings.
Om Shanti
To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.
Essence for Dharna:
1. While living at home, do spiritual service. Become pure and make others pure.
2. While living in this living hell, you have to claim your inheritance of heaven from the unlimited Father. Don't cause anyone sorrow.
Blessing:May you be a constantly powerful soul and finish the word “weakness” with the awareness of the one word “Baba”.
When you speak of any weakness, whether it is in your thoughts, words, sanskars or nature, you say, “My idea is this.” Or, “My sanskars are like this”. However, the Father’s sanskars and thoughts are “mine”. The sign of power is being equal to the Father. So, let the word “Baba” be natural in your thoughts, words and in everything and, while doing anything, let there be the awareness of Karavanhar (One who inspires). Then, no Maya, that is, weakness can come in front of Baba.
Slogan:Those who have the speciality of maturity achieve success in every task automatically.
 
HINDI DETAIL MURALI

13/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - पवित्रता बिना भारत स्वर्ग बन नहीं सकता, तुम्हें श्रीमत है घर गृहस्थ में रहते पवित्र बनो, दोनों तरफ तोड़ निभाओ''
प्रश्न:दूसरे सतसंगों वा आश्रमों से यहाँ की कौन सी रसम बिल्कुल न्यारी है?
उत्तर:उन आश्रमों में मनुष्य जाकर रहते हैं समझते हैं - संग अच्छा है, घर आदि का हंगामा नहीं है। एम-आब्जेक्ट कुछ नहीं। परन्तु यहाँ तो तुम मरजीवा बनते हो। तुम्हें घरबार नहीं छुड़ाया जाता। घर में रह तुम्हें ज्ञान अमृत पीना है, रूहानी सेवा करनी है। यह रसम उन सतसंगों में नहीं है।
 
ओम् शान्ति।
बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं क्योंकि बच्चे जानते हैं कि यहाँ बाप ही समझाते हैं इसलिए घड़ी-घड़ी शिव भगवानुवाच कहना भी अच्छा नहीं लगता। वह गीता सुनाने वाले कहेंगे - कृष्ण भगवानुवाच। वह तो होकर गये हैं। कहते हैं कृष्ण ने गीता सुनाई थी, राजयोग सिखाया था। यहाँ तो तुम बच्चे समझते हो शिवबाबा हमको राजयोग सिखला रहे हैं और कोई सतसंग नहीं जहाँ राजयोग सिखाते हो। बाप कहते हैं मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ। वह तो सिर्फ कहेंगे कृष्ण भगवानुवाच मनमनाभव। कब कहा था? तो कहते हैं 5 हजार वर्ष पहले वा कोई कहते क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले। 2 हजार वर्ष नहीं कहते क्योंकि एक हजार वर्ष जो बीच में हैं उसमें इस्लामी, बौद्धी आये। तो क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले सतयुग सिद्ध हो जाता है। हम कहते हैं - आज से 5 हजार वर्ष पहले गीता सुनाने वाला भगवान आया था और आकर देवी-देवता धर्म स्थापन किया था। अब 5 हजार वर्ष बाद फिर से उनको आना पड़े। यह है 5 हजार वर्ष का पा। बच्चे जानते हैं कि यह बाप इस द्वारा समझा रहे हैं। दुनिया में तो अनेक प्रकार के सतसंग हैं जहाँ मनुष्य जाते हैं। कोई आश्रमों में जाकर रहते भी हैं तो उसको ऐसे नहीं कहेंगे कि मात-पिता पास जाए जन्म लिया वा उनसे कोई वर्सा मिलता है, नहीं। सिर्फ वह संग अच्छा समझते हैं। वहाँ घर आदि का कोई भी हंगामा नहीं होता। बाकी एम-आब्जेक्ट तो कुछ भी नहीं है। यहाँ तो तुम कहते हो हम मात-पिता के पास आये हैं। यह है तुम्हारा मरजीवा जन्म। वह लोग बच्चे को एडाप्ट करते हैं। तो वह जाकर उनका घर बसाता है। यहाँ वह रसम नहीं है कि पियरघर, ससुरघर को छोड़ यहाँ आकर बैठें। यह हो नहीं सकता। यहाँ तो गृहस्थ में रहते कमल फूल समान रहना है। कुमारी है वा कोई भी है उनको कहा जाता है घर में रह रोज़ ज्ञान अमृत पीने आओ। नॉलेज समझकर फिर औरों को समझाओ। दोनों तरफ तोड़ निभाओ। गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। अन्त तक दोनों तरफ निभाना है। अन्त में यहाँ रहें या वहाँ रहें, मौत तो सभी का आना है। कहते हैं - राम गयो, रावण गयो..... तो ऐसे नहीं कि सभी को यहाँ आकर रहना है। यह तो निकलते तब हैं जब विष के लिए उन्हों को सताया जाता है। कन्याओं को भी रहना घर में है। मित्र सम्बन्धियों की सर्विस करनी है। सोशल वर्कर तो बहुत हैं। गवर्मेन्ट इतने सबको तो अपने पास रख नहीं सकती। वह अपने गृहस्थ व्यवहार में रहते हैं। फिर कोई न कोई सेवा भी करते हैं। यहाँ तुमको रूहानी सेवा करनी है। गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। हाँ, जब विकार के लिए बहुत तंग करते हैं तो आकर ईश्वरीय शरण लेते हैं। यहाँ विष के कारण बच्चियां मार बहुत खाती हैं और कहाँ भी यह बात नहीं है। यहाँ तो पवित्र रहना पड़ता है। गवर्मेन्ट भी पवित्रता चाहती है। परन्तु गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनाने की ताकत ईश्वर में ही रहती है। समय ऐसा है जो गवर्मेन्ट भी चाहती है कि बच्चे जास्ती पैदा न हो क्योंकि गरीबी बहुत है। तो चाहते हैं भारत में पवित्रता हो, बच्चे कम हों।
बाप कहते हैं - बच्चे पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। यह बात उन्हों की बुद्धि में नहीं है। भारत पवित्र था, अभी अपवित्र है। सभी आत्मायें खुद भी चाहती हैं कि पवित्र बनें। यहाँ दु:ख बहुत है। तुम बच्चे जानते हो कि पवित्रता बिगर भारत स्वर्ग हो नहीं सकता। नर्क में है ही दु:ख। अब नर्क तो और कोई चीज़ नहीं। जैसे गरुड़ पुराण में दिखाते हैं वैतरणी नदी है, जिसमें मनुष्य गोते खाते हैं। ऐसे तो कोई नदी है नहीं जहाँ सजायें खाते हो। सजायें तो गर्भ जेल में मिलती हैं। सतयुग में तो गर्भजेल होता नहीं, जहाँ सजायें मिलें। गर्भ महल होता है। इस समय सारी दुनिया जीती जागती नर्क है। जहाँ मनुष्य दु:खी, रोगी हैं। एक दो को दु:ख देते रहते हैं। स्वर्ग में यह कुछ होता नहीं। अब बाप समझाते हैं मैं तुम्हारा बेहद का बाप हूँ। मैं रचयिता हूँ, तो जरूर स्वर्ग नई दुनिया रचूँगा। स्वर्ग के लिए आदि सनातन देवी-देवता धर्म रचूँगा। कहते हैं - तुम मात-पिता.. कल्प-कल्प यह राजयोग सिखाया था। ब्रह्मा द्वारा बैठ सभी वेद शास्त्रों के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। बिल्कुल अनपढ़ को बैठ पढ़ाते हैं। तुम कहते थे ना - हे भगवान आओ। पतित तो वहाँ जा न सकें। तो पावन बनाने लिए उनको जरूर यहाँ आना पड़े। तुम बच्चों को याद दिलाते हैं कि कल्प पहले भी तुमको राजयोग सिखाया था। पूछा जाता है कि आगे कभी यह नॉलेज ली है? तो कहते हैं - हाँ, 5 हजार वर्ष पहले हमने यह ज्ञान लिया था। यह बातें हैं नई। नया युग, नया धर्म फिर से स्थापन होता है। सिवाए ईश्वर के यह दैवी धर्म कोई स्थापन कर नहीं सकता। ब्रह्मा विष्णु शंकर भी नहीं कर सकते क्योंकि वह देवतायें स्वयं रचना हैं। स्वर्ग का रचयिता, मात-पिता चाहिए। तुमको सुख घनेरे भी यहाँ चाहिए। बाप कहते हैं रचता मैं भी हूँ। तुमको भी ब्रह्मा मुख द्वारा मैंने रचा है। मैं मनुष्य सृष्टि का बीजरूप हूँ। भल कोई कितना भी बड़ा साधू-सन्त आदि हो परन्तु किसके भी मुख से ऐसे नहीं निकलेगा। यह हैं गीता के अक्षर। परन्तु जिसने कहा है वही कह सकता है। दूसरा कोई कह न सके। सिर्फ फ़र्क यह है कि निराकार के बदले कृष्ण को भगवान कह देते हैं। बाप कहते हैं मैं मनुष्य सृष्टि का बीजरूप, परमधाम में रहने वाला निराकार परमात्मा हूँ। तुम भी समझ सकते हो। साकार मनुष्य तो अपने को बीजरूप कह न सकें। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी नहीं कह सकते। यह तो जानते हैं कि सबको रचने वाला शिवबाबा है। मैं दैवी धर्म की स्थापना कर रहा हूँ। ऐसे कहने की भी कोई में ताकत नहीं। भल अपने को कृष्ण कहलायें, ब्रह्मा कहलायें, शंकर कहलायें.. बहुत अपने को अवतार भी कहलाते हैं। परन्तु है सब झूठ। यहाँ आकर जब सुनेंगे तो समझेंगे बरोबर बाप तो एक है, अवतार भी एक है। वह कहते हैं मैं तुमको साथ ले जाऊंगा। ऐसे कहने की भी कोई में ताकत नहीं। 5 हजार वर्ष पहले भी गीता के भगवान शिवबाबा ने कहा था, जिसने ही आदि सनातन धर्म की स्थापना की थी, वही अब कर रहे हैं। गाया हुआ भी है मच्छरों सदृश्य आत्मायें गई। तो बाप गाइड बन सभी को आए लिबरेट करते हैं। अब कलियुग का अन्त है, उसके बाद सतयुग आना है तो जरूर आकर पवित्र बनाए पवित्र दुनिया में ले जायेगा। गीता में कुछ न कुछ अक्षर हैं। समझते हैं इस धर्म के लिए शास्त्र तो चाहिए ना। तो गीता शास्त्र बैठ बनाया है। सर्वशास्त्रमई शिरोमणी नम्बरवन माता, परन्तु नाम बदल दिया है। बाप जो इस समय एक्ट करते हैं वह थोड़ेही द्वापर में लिखेंगे। गीता फिर भी वही निकलेगी। ड्रामा में यही गीता नूँधी हुई है। जैसे बाप फिर से मनुष्य को देवता बनाते हैं वैसे शास्त्र भी बाद में कोई फिर से बैठ लिखेंगे। सतयुग में कोई शास्त्र नहीं होगा। बाप सारे चक्र का राज़ बैठ समझाते हैं। तुम समझते हो हमने यह 84 जन्मों का चक्र पूरा किया। आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले ही मैक्सीमम 84 जन्म लेते हैं। बाकी मनुष्यों की तो बाद में वृद्धि होती है। वह थोड़ेही इतने जन्म लेंगे? बाप इस ब्रह्मा मुख से बैठ समझाते हैं। यह जो दादा है, जिसका हमने तन लोन लिया है वह भी अपने जन्मों को नहीं जानते थे। यह है व्यक्त - प्रजापिता ब्रह्मा। वह है अव्यक्त। हैं तो दोनों एक। तुम भी इस ज्ञान से सूक्ष्मवतनवासी फरिश्ते बन रहे हो। सूक्ष्मवतनवासियों को फरिश्ता कहते हैं क्योंकि हड्डी मास नहीं है। ब्रह्मा विष्णु शंकर को भी हड्डी मास नहीं है, फिर उन्हों के चित्र कैसे बनाते हैं। शिव का भी चित्र बनाते हैं। है तो वह स्टॉर। उनका भी रूप बनाते हैं। ब्रह्मा विष्णु शंकर तो सूक्ष्म हैं। जैसे मनुष्यों का बनाते हैं वैसे शंकर का तो बना न सकें क्योंकि उनका हड्डी मास का शरीर तो है नहीं। हम तो समझाने लिए ऐसे स्थूल बनाते हैं। परन्तु तुम भी देखते हो कि वह सूक्ष्म है। अच्छा-
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
रात्रि क्लास - 13-7-68

मनुष्य दो चीज़ को जरूर चाहते हैं। एक है शान्ति, दूसरा सुख। विश्व में शान्ति वा अपने लिये शान्ति। विश्व पर सुख वा अपने लिये सुख की चाह रहती है मनुष्यों को। तो पूछना होता है अब शान्ति है तो जरूर कब शान्ति हुई होगी। परन्तु वह कब कैसे होती है, अशान्ति क्यों हुई, यह कोई को पता ही नहीं है क्योंकि घोर अंधियारे में हैं। तुम बच्चे जानते हो शान्ति और सुख के लिये तुम रास्ता बहुत अच्छा बताते हो। उन्हों को खुशी होती है। फिर जब सुनते हैं पावन भी बनना है तो ठण्डे पड़ जाते हैं। यह विकार है सभी का दुश्मन और फिर सभी का प्यारा है। इसको छोड़ने में हृदय विदीरण होता है। नाम भी है विष। फिर भी छोड़ते नहीं हैं। तुम कितना माथा मारते हो फिर भी हार खा लेते हैं। सारी पवित्रता की ही बात है। इनमें बहुत फेल होते हैं। कोई कन्या को देखा तो आकर्षण होती है। क्रोध वा लोभ वा मोह की आकर्षण नहीं होती है। काम महाशत्रु है। इन पर जीत पाना महावीर का काम है। देह-अभिमान के बाद पहले काम ही आता है। इन पर जीत पानी है। जो पवित्र हैं उनके आगे अपवित्र कामी मनुष्य नमन करते हैं। कहते हैं हम विकारी, आप निर्विकारी। ऐसे नहीं कहते हम क्रोधी लोभी.....। सारी बात विकार की है। शादी करते ही हैं विकार के लिये, यह फुरना रहता है माँ बाप को। बड़े हों तो पैसा भी देंगे, विकार में भी जायेंगे। विकार में न जाये तो झगड़ा मच जाये। तुम बच्चों को समझाना होता है यह (देवतायें) सम्पूर्ण निर्विकारी थे। तुम्हारे पास एमआब्जेक्ट सामने है। नर से नारायण राजाओं का भी राजा बनना है। चित्र सामने है। इसको सतसंग नहीं कहा जाता। पाठशाला, सत्संग तो वहाँ है नहीं। सच्चा सत्संग सच्चे साथ तब हो जब सम्मुख राजयोग सिखावे। सत का संग चाहिए। वही गीता अर्थात् राजयोग सिखलाते हैं। बाप कोई गीता सुनाते नहीं। मनुष्य समझते हैं नाम है गीता पाठशाला तो जाकर गीता सुने। इतनी कशिश होती है। यह सच्ची गीता पाठशाला है जहाँ एक सेकण्ड में सद्गति, हेल्थ, वेल्थ और हैपीनेस मिलती है। तो पूछे सच्ची गीता पाठशाला क्यों लिखते हो? सिर्फ गीता पाठशाला लिखना कामन हो जाता है। सच्ची अक्षर पढ़ने से खैंच हो सकती है। शायद झूठी भी तो है। तो सच्ची अक्षर जरूर लिखना पड़े। पावन दुनिया सतयुग को पतित दुनिया कलियुग को कहा जाता है। सतयुग में यह पावन थे। कैसे बने सो सिखलाते हैं। बाप ब्रह्मा द्वारा पढ़ाते हैं। नहीं तो पढ़ायेंगे कैसे। यह यात्रा समझेंगे वही जिन्होंने कल्प पहले समझा है। भक्ति मार्ग के दुबन में फँसे हुए हैं। भक्ति का भभका बहुत है। यह तो कुछ भी नहीं है। सिर्फ स्मृति में रखो- अभी वापस जाना है। पवित्र बनकर जाना है। इसके लिये याद में रहना है। बाप जो स्वर्ग का मालिक बनाते हैं उनको याद नहीं कर सकते! मुख्य बात यह है। सभी कहते हैं इसमें ही मेहनत है। बच्चे भाषण तो अच्छा करते हैं परन्तु योग में रहकर समझायें तो असर भी अच्छा होगा। याद में तुमको ताकत मिलती है। सतोप्रधान बनने से सतोप्रधान विश्व के मालिक बनेंगे। याद को नेष्ठा कहेंगे क्या! हम आधा घण्टा नेष्ठा में बैठे, यह रांग है। बाप सिर्फ कहते हैं याद में रहो। सामने बैठ सिखलाने की दरकार नहीं। बेहद बाप को बहुत लव से याद करना है क्योंकि बहुत खजाना देते हैं। याद से खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। अतीन्द्रिय सुख फील होगा। बाप कहते हैं तुम्हारी यह लाईफ बहुत वैल्युबुल है, इनको तन्दुरुस्त रखना है। जितना जीयेंगे उतना खजाना लेंगे। खजाना पूरा तब मिलेगा जबकि हम सतोप्रधान बन जायेंगे। मुरली में भी बल होगा। तलवार में जौहर होता है ना। तुम्हारे में भी याद का जौहर पड़े तब तलवार तीखी हो। ज्ञान में इतना जौहर नहीं है इसलिये किसको असर नहीं होता है। फिर उनके कल्याण लिये बाबा को आना है। जब तुम याद में जौहर भरेंगे तो फिर विद्वान आचार्य आदि को अच्छा तीर लगेगा इसलिए बाबा कहते हैं चार्ट रखो। कई कहते हैं बाबा को बहुत याद करते हैं परन्तु मुख नहीं खुलता। तुम याद में रहो तो विकर्म विनाश होंगे। अच्छा - बच्चों को गुडनाईट।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1. घर में रहते भी रूहानी सेवा करनी है। पवित्र बनना और बनाना है।
2. इस जीते जागते नर्क में रहते हुए भी बेहद के बाप से स्वर्ग का वर्सा लेना है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है।
 
वरदान:एक बाबा शब्द की स्मृति द्वारा कमजोरी शब्द को समाप्त करने वाले सदा समर्थ आत्मा भव
जिस समय कोई कमजोरी वर्णन करते हो, चाहे संकल्प की, बोल की, चाहे संस्कार-स्वभाव की तो यही कहते हो कि मेरा विचार ऐसे कहता है, मेरा संस्कार ही ऐसा है। लेकिन जो बाप का संस्कार, संकल्प सो मेरा। समर्थ की निशानी ही है बाप समान। तो संकल्प, बोल, हर बात में बाबा शब्द नेचुरल हो और कर्म करते करावनहार की स्मृति हो तो बाबा के आगे माया अर्थात् कमजोरी आ नहीं सकती।
 
स्लोगन:जिसके पास गम्भीरता की विशेषता है, उन्हें हर कार्य में स्वत: सिद्धि प्राप्त होती है।

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Details ( Page:- Murali 14-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 14.01.18     
Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban ( Revise – 19-04 – 83)
Sangam yug ka prabhu fal khane se sarb praptiyan .
Vardan – mere ko tere me parivartan kar sada halka rahnewale double light farista bhav.
Slogan – Baap ke upper balihar jaane ka haar pahan lo toh maya se har ni hoga.
 
ENGLISH SUMMARY - 14.01.18     
Headline - You receive all attainments by eating Godly fruit of the confluence age.
Blessing:May you be a double-light angel who remains constantly light by transforming “mine” into “Yours”.
While walking and moving around, always have the awareness, “I am an angel”. Remain constantly aware of what the form, words and deeds of an angel are, because since you now belong to the Father, you have made everything “mine” into “Yours”. Therefore, you have become light (angels). In order to fulfil this aim, simply remember one expression: “Everything belongs to the Father, nothing is mine.” Wherever you used to use the word “mine”, now say “Yours” and you will not feel any burden but will constantly fly in the flying stage.
Slogan:Wear the garland (haar) of surrendering (balihaar) yourself to the Father and you will not be defeated (haar – defeat) by Maya.
 
HINDI DETAIL MURALI

14-01-18   प्रात:मुरली

ओम् शान्ति''अव्यक्त-बापदादा''        रिवाइज: 19-04-83 मधुबन

 
संगमयुग का प्रभु फल खाने से सर्व प्राप्तियाँ
 
आज बापदादा अपने सर्व स्नेही बच्चों को स्नेह का रिटर्न देने, मिलन मनाने, स्नेह का प्रत्यक्षफल, स्नेह की भावना का श्रेष्ठ फल देने के लिए बच्चों के संगठन में आये हैं। भक्ति में भी स्नेह और भावना भक्त-आत्मा के रूप में रही। तो भक्त रूप में भक्ति थी लेकिन शक्ति नहीं थी। स्नेह था लेकिन पहचान वा सम्बन्ध श्रेष्ठ नहीं था। भावना थी लेकिन अल्पकाल की कामना भरी भावना थी। अभी भी स्नेह और भावना है लेकिन समीप सम्बन्ध के आधार पर स्नेह है। अधिकारीपन के शक्ति की, अनुभव के अथॉरिटी की श्रेष्ठ भावना है। भिखारीपन की भावना बदल, सम्बन्ध बदल अधिकारीपन का निश्चय और नशा चढ़ गया। ऐसे सदा श्रेष्ठ आत्माओं को प्रत्यक्षफल प्राप्त हुआ है। सभी प्रत्यक्षफल के अनुभवी आत्मायें हो? प्रत्यक्षफल खाकर देखा है? और फल तो सतयुग में भी मिलेंगे और अब कलियुग के भी बहुत फल खाये। लेकिन संगमयुग का प्रभु फल, प्रत्यक्ष फल अगर अब नहीं खाया तो सारे कल्प में नहीं खा सकते। बापदादा सभी बच्चों से पूछते हैं - प्रभु फल, अविनाशी फल, सर्व शक्तियां, सर्वगुण, सर्व सम्बन्ध के स्नेह के रस वाला फल खाया है? सभी ने खाया है या कोई रह गया है? यह ईश्वरीय जादू का फल है। जिस फल खाने से लोहे से पारस से भी ज्यादा हीरा बन जाते हो। इस फल से जो संकल्प करो वह प्राप्त कर सकते हो। अविनाशी फल, अविनाशी प्राप्ति। ऐसे प्रत्यक्ष फल खाने वाले सदा ही माया के रोग से तन्दरूस्त रहते हैं। दु:ख, अशान्ति से, सर्व विघ्नों से सदा दूर रहने का अमर फल मिल गया है! बाप का बनना और ऐसे श्रेष्ठ फल प्राप्त होना।
 
आज बापदादा आये हुए विशेष पाण्डव सेना को देख हर्षित तो हो ही रहे हैं। साथ-साथ ब्रह्मा बाप के हमजिन्स से सदा पार्टी की जाती, पिकनिक मनाई जाती। तो आज इस प्रभु फल की पिकनिक मना रहे हैं। लक्ष्मी-नारायण भी ऐसी पिकनिक नहीं करेंगे। ब्रह्मा बाप और ब्राह्मणों की यह अलौकिक पिकनिक है। ब्रह्मा बाप हमजिन्स को देख हर्षित होते हैं। लेकिन हमजिन्स ही बनना। हर कदम में फालो फादर करने वाले समान साथी अर्थात् हमजिन्स। ऐसे हमजिन्स हो ना वा अभी सोच रहे हो क्या करें, कैसे करें। सोचने वाले हो वा समान बनाने वाले हो? सेकण्ड में सौदा करने वाले हो वा अभी भी सोचने का समय चाहिए? सौदा करके आये हो वा सौदा करने आये हो? परमीशन किसको मिली है, सभी ने फार्म भरे थे? वा छोटी-छोटी ब्राह्मणियों को बातें बताके पहुँच गये हो? ऐसे बहुत मीठी-मीठी बातें बताते हैं। बापदादा के पास सभी के मन के सफाई की और चतुराई की दोनों बातें पहुँचती हैं। नियम प्रमाण सौदा करके आना है। लेकिन मधुबन में कई सौदा करने वाले भी आ जाते हैं। करके आने वाले के बजाए यहाँ आकर सौदा करते हैं इसलिए बापदादा क्वान्टिटी में क्वालिटी को देख रहे हैं। क्वान्टिटी की विशेषता अपनी है, क्वालिटी की विशेषता अपनी है। चाहिए दोनों ही। गुलदस्ते में वैरायटी रंग रूप वाले फूलों से सजावट होती है। पत्ते भी नहीं होंगे तो गुलदस्ता नहीं शोभेगा। तो बापदादा के घर के श्रृंगार तो सभी हुए, सभी के मुख से बाबा शब्द तो निकलता ही है। बच्चे घर का श्रृंगार होते हैं। अभी भी देखो यह ओम् शान्ति भवन का हाल आप सबके आने से सज गया है ना। तो घर के श्रृंगार, बाप के श्रृंगार सदा चमकते रहो। क्वान्टिटी से क्वालिटी में परिवर्तन हो जाओ। समझा - आज तो सिर्फ मिलने का दिन था फिर भी ब्रह्मा बाप को हमजिन्स पसन्द आ गये, इसलिए पिकनिक की। अच्छा।
 
सदा प्रभु फल खाने के अधिकारी, सदा ब्रह्मा बाप समान सेकण्ड में सौदा करने वाले, हर कर्म में कर्म योगी, ब्रह्मा बाप को फालो करने वाले, ऐसे बाप समान विशेष आत्माओं को, चारों ओर के क्वालिटी और क्वान्टिटी वाले बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
 
पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकत (अधरकुमारों से)
 
1- सदा अपने को विश्व के अन्दर कोटो में से कोई हम हैं - ऐसे अनुभव करते हो? जब भी यह बात सुनते हो - कोटों से कोई, कोई में भी कोई तो वह स्वयं को समझते हो? जब हूबहू पार्ट रिपीट होता है तो उस रिपीट हुए पार्ट में हर कल्प आप लोग ही विशेष होंगे ना! ऐसे अटल विश्वास रहे। सदा निश्चय बुद्धि सभी बातों में निश्चिन्त रहते हैं। निश्चय की निशानी है निश्चिन्त। चिन्तायें सारी मिट गई। बाप ने चिंताओं की चिता से बचा लिया ना! चिंताओं की चिता से उठाकर दिलतख्त पर बिठा दिया। बाप से लगन लगी और लगन के आधार पर लगन की अग्नि में चिन्तायें सब ऐसे समाप्त हो गई जैसे थी ही नहीं। एक सेकेण्ड में समाप्त हो गई ना! ऐसे अपने को शुभचिन्तक आत्मायें अनुभव करते हो! कभी चिंता तो नहीं रहती! न तन की चिंता, न मन में कोई व्यर्थ चिंता और न धन की चिंता क्योंकि दाल रोटी तो खाना है और बाप के गुण गाना है। दाल रोटी तो मिलनी ही है। तो न धन की चिंता, न मन की परेशानी और न तन के कर्मभोग की भी चिंता क्योंकि जानते हैं यह अन्तिम जन्म और अन्त का समय है, इसमें सब चुक्तु होना है इसलिए सदा शुभचिन्तक। क्या होगा! कोई चिंता नहीं। ज्ञान की शक्ति से सब जान गये। जब सब कुछ जान गये तो क्या होगा, यह क्वेश्चन खत्म - क्योंकि ज्ञान है जो होगा वह अच्छे ते अच्छा होगा। तो सदा शुभचिन्तक, सदा चिन्ताओं से परे निश्चय बुद्धि, निश्चिन्त आत्मायें, यही तो जीवन है। अगर जीवन में निश्चिन्त नहीं तो वह जीवन ही क्या है! ऐसी श्रेष्ठ जीवन अनुभव कर रहे हो? परिवार की भी चिन्ता तो नहीं है? हरेक आत्मा अपना हिसाब किताब चुक्तु भी कर रही है और बना भी रही है, इसमें हम क्या चिंता करें। कोई चिंता नहीं। पहले चिता पर जल रहे थे, अभी बाप ने अमृत डाल जलती चिता से मरजीवा बना दिया। जिंदा कर दिया। जैसे कहते हैं मरे हुए को जिंदा कर दिया। तो बाप ने अमृत पिलाया और अमर बना दिया। मरे हुए मुर्दे के समान थे और अब देखो क्या बन गये! मुर्दे से महान बन गये। पहले कोई जान नहीं थी तो मुर्दे समान ही कहेंगे ना। भाषा भी क्या बोलते थे, अज्ञानी लोग भाषा में बोलते हैं - मर जाओ ना। या कहेंगे हम मर जाएं तो बहुत अच्छा। अब तो मरजीवा हो गये, विशेष आत्मायें बन गये। यही खुशी है ना। जलती हुई चिता से अमर हो गये - यह कोई कम बात है! पहले सुनते थे भगवान मुर्दे को भी जिंदा करता है, लेकिन कैसे करता, यह नहीं समझते थे। अभी समझते हो हम ही जिंदा हो गये तो सदा नशे और खुशी में रहो।
 
टीचर्स के साथ:- सेवाधारियों की विशेषता क्या है? सेवाधारी अर्थात् आंख खुले और सदा बाप के साथ बाप के समान स्थिति का अनुभव करे। अमृतवेले के महत्व को जानने वाले विशेष सेवाधारी। विशेष सेवाधारी की महिमा ह़ै जो विशेष वरदान के समय को जानें और विशेष वरदानों का अनुभव करें। अगर अनुभव नहीं तो साधारण सेवाधारी हुए, विशेष नहीं। विशेष सेवाधारी बनना है तो यह विशेष अधिकार लेकर विशेष बन सकते हो। जिसको अमृतवेले का, संकल्प का, समय का और सेवा का महत्व है ऐसे सर्व महत्व को जानने वाले विशेष सेवाधारी होते हैं। तो इस महत्व को जान महान बनना है। इसी महत्व को जान स्वयं भी महान बनो और औरों को भी महत्व बतलाकर, अनुभव कराकर महान बनाओ। अच्छा - ओम् शान्ति।
 
अव्यक्त महावाक्य पर्सनल

 
सफल करो और सफलता मूर्त बनो
 
जैसे ब्रह्मा बाप ने निश्चय के आधार पर, रूहानी नशे के आधार पर निश्चित भावी के ज्ञाता बन सेकेण्ड में सब कुछ सफल कर दिया; अपने लिए नहीं रखा, सफल किया। जिसका प्रत्यक्ष सबूत देखा कि अन्तिम दिन तक तन से पत्र-व्यवहार द्वारा सेवा की, मुख से महावाक्य उच्चारण किये। अन्तिम दिन भी समय, संकल्प, शरीर को सफल किया। तो सफल करने का अर्थ ही है-श्रेष्ठ तरफ लगाना। ऐसे जो सफल करते हैं उन्हें सफलता स्वत: प्राप्त होती है। सफलता प्राप्त करने का विशेष आधार ही है-हर सेकेण्ड, हर श्वांस, हर खजाने को सफल करना। संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क जिसमें भी सफलता अनुभव करने चाहते हो तो स्व के प्रति चाहे अन्य आत्माओं के प्रति सफल करते जाओ। व्यर्थ न जाने दो तो ऑटोमेटिकली सफलता के खुशी की अनुभूति करते रहेंगे क्योंकि सफल करना अर्थात् वर्तमान के लिए सफलता मूर्त बनना और भविष्य के लिए जमा करना।
 
सेवा में सफलता प्राप्त करने के लिए समर्पण भाव और बेफिक्र स्थिति चाहिए। सेवा में जरा भी मेरेपन का भाव मिक्स न हो। कोई भी बात का फिक्र न हो क्योंकि फिक्र करने वाला समय भी गंवाता, इनर्जी भी व्यर्थ जाती और काम भी गंवा देता है। वह जिस काम के लिए फिक्र करता वह काम ही बिगड़ जाता है। दूसरा - सदा सफलता मूर्त बनने का साधन है-एक बल एक भरोसा। निश्चय सदा ही निश्चिंत बनाता है और निश्चिंत स्थिति वाला जो भी कार्य करेगा उसमें सफल जरूर होगा। जैसे ब्रह्मा बाप ने दृढ़ संकल्प से हर कार्य में सफलता प्राप्त की, दृढ़ता सफलता का आधार बना। ऐसे फालो फादर करो। हर खजाने को, गुणों को, शक्तियों को कार्य में लगाओ तो बढ़ते जायेंगे। बचत की विधि, जमा करने की विधि को अपनाओ तो व्यर्थ का खाता स्वत: ही परिवर्तन हो सफल हो जायेगा। बाप द्वारा जो भी खजाने मिले हैं उनका दान करो, कभी भी स्वप्न में भी गलती से प्रभू देन को अपना नहीं समझना। मेरा यह गुण है, मेरी शक्ति है-यह मेरापन आना अर्थात् खजानों को गंवाना। अपने ईश्वरीय संस्कारों को भी सफल करो तो व्यर्थ संस्कार स्वत: ही चले जायेंगे। ईश्वरीय संस्कारों को बुद्धि के लॉकर में नहीं रखो। कार्य में लगाओ, सफल करो। सफल करना माना बचाना या बढ़ाना। मंसा से सफल करो, वाणी से सफल करो, सम्बन्ध-सम्पर्क से, कर्म से, अपने श्रेष्ठ संग से, अपने अति शक्तिशाली वृत्ति से सफल करो। सफल करना ही सफलता की चाबी है। आपके पास समय और संकल्प रूपी जो श्रेष्ठ खजाने हैं, इन्हें ''कम खर्च बाला नशीन'' की विधि द्वारा सफल करो। संकल्प का खर्च कम हो लेकिन प्राप्ति ज्यादा हो। जो साधारण व्यक्ति दो चार मिनट संकल्प चलाने के बाद, सोचने के बाद सफलता या प्राप्ति कर सकता है वह आप एक दो सेकेण्ड में कर सकते हो। ऐसे ही वाणी और कर्म, कम खर्चा और सफलता ज्यादा हो तब ही कमाल गाई जायेगी। तो आपके पास जो भी प्रापर्टी है, समय, संकल्प, श्वांस, तन-मन-धन सब सफल करो, व्यर्थ नहीं गंवाओ, न आइवेल के लिए सम्भालकर रखो। ज्ञान धन, शक्तियों का धन, गुणों का धन हर समय मैं पन से न्यारे बन सफल करो तो जमा होता जायेगा। सफल करना अर्थात् पदमगुणा सफलता का अनुभव करना।
 
इस ब्राह्मण जीवन में -
* जो समय को सफल करते हैं वह समय की सफलता के फलस्वरूप राज्य-भाग्य का फुल समय राज्य-अधिकारी बनते हैं।
* जो श्वांस सफल करते हैं, वह अनेक जन्म सदा स्वस्थ रहते हैं। कभी चलते-चलते श्वांस बन्द नहीं होगा, हार्ट फेल नहीं होगा।
* जो ज्ञान का खजाना सफल करते हैं, वह ऐसा समझदार बन जाते हैं जो भविष्य में अनेक वजीरों की राय नहीं लेनी पड़ती, स्वयं ही समझदार बन राज्य-भाग्य चलाते हैं।
* जो सर्व शक्तियों का खजाना सफल करते हैं अर्थात् उन्हें कार्य में लगाते हैं वह सर्व शक्ति सम्पन्न बन जाते हैं। उनके भविष्य राज्य में कोई शक्ति की कमी नहीं होती। सर्व शक्तियां स्वत: ही अखण्ड, अटल, निर्विघ्न कार्य की सफलता का अनुभव कराती हैं।
* जो सर्व गुणों का खजाना सफल करते हैं, वह ऐसे गुणमूर्त बनते हैं जो आज लास्ट समय में भी उनके जड़ चित्र का गायन ‘सर्व गुण सम्पन्न देवता' के रूप में होता है।
* जो स्थूल धन का खजाना सफल करते हैं वह 21 जन्मों के लिए मालामाल रहते हैं। तो सफल करो और सफलता मूर्त बनो। अच्छा।
 
वरदान:मेरे को तेरे में परिवर्तन कर सदा हल्का रहने वाले डबल लाइट फरिश्ता भव!
चलते-फिरते सदा यही स्मृति में रहे कि हम हैं ही फरिश्ते। फरिश्तों का स्वरूप क्या, बोल क्या, कर्म क्या...वह सदा स्मृति में रहें क्योंकि जब बाप के बन गये, सब कुछ मेरा सो तेरा कर दिया तो हल्के (फरिश्ते) बन गये। इस लक्ष्य को सदा सम्पन्न करने के लिए एक ही शब्द याद रहे - सब बाप का है, मेरा कुछ नहीं। जहाँ मेरा आये वहाँ तेरा कह दो, फिर कोई बोझ फील नहीं होगा, सदा उड़ती कला में उड़ते रहेंगे।
 
स्लोगन-बाप के ऊपर बलिहार जाने का हार पहन लो तो माया से हार नहीं होगी।

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Details ( Page:- Murali 15-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 15.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Yahi Sangam yug hai jab Aatma aur Paramatma ka sangam(mel) hota hai.Satguru ek he baar aakar baccho ko satya gyan de,satya bolna shikhate hain.
Q- Kin baccho ki avastha bahut first class rehti hai?
A- Jinki buddhi me rehta yah sab kuch Baba ka hai.Har kadam Shrimat lene wale,poora tyag karne wale baccho ki avastha bahut first class rehti hai.Yatra lambi hai isiliye oonche Baap ki oonchi mat lete rehna hai.
Q-Murli soonte samay apaar shukh kin baccho ko bhasta hai?
A-Jo samajhte hain hum Shiv baba ki murli soon rahe hain.Yah murli Shiv Baba ne Brahma tab se soonayi.Most beloved Baba hume sada manushya se Devta banane ke liye yah soona rahe hain.Murli soonte yah smriti rahe to shukh bhasega.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Baap dwara jo shukh shanti ka khazana mila hai woh sabko dena hai.Gyan se apni avastha zamane ki mehnat karni hai.
2)Devi goon dharan karne ke liye deha bhaan ko bhool apne ko aatma samajh asariri ban ek Preetam ko yaad karna hai.
Vardan:-Swayang ko behad ki stage par samajh sada shrest part bajane wale Hero Partdhari bhava.
Slogan:-Satyata ki shakti paas ho to khushi aur shakti prapt hoti rahegi.
 
ENGLISH SUMMARY - 15.01.18     
Sweet children, this is the confluence age when there is the meeting of souls with the Supreme Soul. The Satguru only comes once and gives you children true knowledge and teaches you to speak the truth.
 
Question:Which children's stage remains first class?
Answer:Those whose intellects are aware that everything belongs to Baba. The stage of the children who follow shrimat at every step and who completely renounce everything remains first class. The journey is long and so you must continue to follow the elevated directions of the highest Father.
 
Question:Which children experience infinite happiness while listening to the murli?
Answer:
Those who understand that they are listening to Shiv Baba's murli and that Shiv Baba speaks this murli through the body of Brahma. Our most beloved Baba is speaking this to us to make us constantly happy and to change us from human beings into deities. If you have this awareness while listening to the murli you will experience happiness.
Song:Beloved, come and meet me.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. Give everyone the treasures of happiness and peace that you have received from the Father. Use this knowledge to make effort and make your stage strong.
2. In order to imbibe divine virtues, renounce body consciousness, consider yourself to be a soul, become bodiless and remember the one Beloved.
 
Blessing:May you be a hero actor and consider yourself to be on the unlimited stage performing an elevated part.
All of you are showpieces in the showcase of the world. You are on the biggest stage of all among many unlimited souls. Create each thought, speak every word and perform every act with the awareness: Souls of the world are watching us. When you have this awareness, all of your part will be elevated and you will become a hero actor. Everyone looks at you instrument souls with a desire for attaining something. Therefore, as the children of the Bestower, constantly continue to give and continue to fulfil everyone’s desires.
Slogan:When you have the power of truth within you, you will continue to receive happiness and power.
HINDI DETAIL MURALI

15/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे मीठे बच्चे - यही संगमयुग है जब आत्मा और परमात्मा का संगम (मेल) होता है, सतगुरू एक ही बार आकर बच्चों को सत्य ज्ञान दे, सत्य बोलना सिखाते हैं"
 
प्रश्न:किन बच्चों की अवस्था बहुत फर्स्टक्लास रहती है?
 
उत्तर:जिनकी बुद्धि में रहता यह सब कुछ बाबा का है। हर कदम श्रीमत लेने वाले, पूरा त्याग करने वाले बच्चों की अवस्था बहुत फर्स्ट क्लास रहती है। यात्रा लम्बी है इसलिए ऊंचे बाप की ऊंची मत लेते रहना है।
 
प्रश्न:मुरली सुनते समय अपार सुख किन बच्चों को भासता है?
 
उत्तर:जो समझते हैं हम शिवबाबा की मुरली सुन रहे हैं। यह मुरली शिवबाबा ने ब्रह्मा तन से सुनाई है। मोस्ट बिलवेड बाबा हमें सदा सुखी मनुष्य से देवता बनाने के लिए यह सुना रहे हैं। मुरली सुनते यह स्मृति रहे तो सुख भासेगा।
 
गीत:-प्रीतम आन मिलो...  ओम् शान्ति।
 
यह दु:खिया जिया तो दु:खधाम में ही होता है। सुखी जीव आत्मायें सुखधाम में होती हैं। सभी भक्तों का प्रीतम एक है, जिसको ही याद किया जाता है। उनको प्रीतम कहा जाता है। याद करते हैं, जब दु: होता है। यह कौन बैठ समझाते हैं? सच्चा-सच्चा प्रीतम। सच्चा बाप, सच्चा टीचर, सच्चा सतगुरू... सभी का प्रीतम वह एक है। परन्तु प्रीतम आता कब है, यह कोई नहीं जानते हैं। प्रीतम खुद आकर अपने भक्तों को, अपने बच्चों को बताते हैं कि मैं आता ही हूँ सिर्फ संगमयुग पर एक बार। मेरा आना और जाना उसका जो बीच है उसको संगम कहा जाता है। और सभी आत्मायें तो बहुत बारी जन्म-मरण में आती हैं, मैं एक ही बार आता हूँ। मैं सतगुरू भी एक ही हूँ। बाकी गुरू तो अनेक हैं। उन्हों को सतगुरू नहीं कहेंगे क्योंकि वह कोई सत्य नहीं बोलते, वह सत परमात्मा को जानते ही नहीं। जो सत को जान जाते हैं वह हमेशा सत्य बोलते हैं। वह सतगुरू है ही सत बोलने वाला सच्चा सतगुरू। सच्चा बाप, सच्चा शिक्षक खुद आकर बताते हैं कि मैं संगमयुग पर आता हूँ। मेरी आयु इतनी ही है, जितना समय मैं आता हूँ। पतितों को पावन बनाकर ही जाता हूँ। जब से मेरा जन्म हुआ, तब से मैं सहज राजयोग सिखाना आरम्भ करता हूँ फिर जब सिखाकर पूरा करता हूँ तो पतित दुनिया विनाश को पाती है, और मैं चला जाता हूँ। बस मैं इतना ही समय आता हूँ। शास्त्रों में तो कोई टाइम है नहीं। शिवबाबा कब जन्म लेते हैं, कितना दिन भारत में रहते हैं, यह बाप स्वयं ही बैठ बताते हैं कि मैं आता ही हूँ संगम पर। संगमयुग की आदि, संगमयुग का अन्त गोया मेरे आने की आदि जाने की अन्त। बाकी मध्य में बैठ मैं राजयोग सिखाता हूँ। बाप खुद ही बैठ बताते हैं कि मैं इनकी ही वानप्रस्थ अवस्था में आता हूँ - पराये देश और पराये तन में, तो मेहमान हुआ ना। मैं इस रावण की दुनिया में मेहमान ठहरा। इस संगमयुग की महिमा बड़ी भारी जबरदस्त है। बाप आते ही हैं रावण राज्य का विनाश कर रामराज्य की स्थापना करने। शास्त्रों में दन्त कथायें बहुत लिख दी हैं। रावण को जलाते आते हैं। सारी सृष्टि इस समय जैसे लंका है। सिर्फ सीलान को लंका नहीं कहा जाता। यह सारी सृष्टि रावण के रहने का स्थान है वा शोकवाटिका है। सभी दु:खी हैं। बाप कहते हैं मैं इसको अशोकवाटिका अथवा हेविन बनाने आता हूँ। हेविन में सभी धर्म तो होते नहीं। वहाँ था एक ही धर्म, जो अभी नहीं है। अब फिर से देवता बनाने राजयोग सिखला रहा हूँ। सभी तो नहीं सीखेंगे। मैं भारत में ही आता हूँ। भारत में ही स्वर्ग होता है। क्रिश्चियन लोग भी हेविन को मानते हैं। कहते हैं लेफ्ट फार हेविनली अबोड। गॉड फादर के पास गया। बाकी हेविन को थोड़ेही समझते हैं। हेविन अलग चीज़ है। तो बाप समझाते हैं कि मैं कब और कैसे आता हूँ। आकर त्रिकालदर्शी बनाता हूँ। त्रिकालदर्शी और कोई होता नहीं। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को मैं ही जानता हूँ। अब कलियुग का विनाश होना है। आसार भी देखने में रहे हैं। समय वही संगम का है। एक्यूरेट टाइम कुछ नहीं कह सकते। बाकी हाँ राजधानी पूरी स्थापन हो जायेगी। बच्चे कर्मातीत अवस्था को पायेंगे तो ज्ञान खत्म हो जायेगा। लड़ाई आरम्भ हो जायेगी। मैं भी अपना पावन बनाने का पार्ट पूरा करके जाऊंगा। देवी-देवता धर्म स्थापन करना - यह मेरा ही पार्ट है। भारतवासी यह कुछ भी नहीं जानते। अब शिवरात्रि मनाते हैं तो जरूर शिवबाबा ने कोई कार्य किया होगा। उन्होंने फिर कृष्ण का नाम डाल दिया है। यह तो कामन भूल देखने में आती है। शिव पुराण आदि किसी शास्त्र में भी यह नहीं है कि शिवबाबा आकर राजयोग सिखाते हैं। वास्तव में हरेक धर्म का एक-एक शास्त्र है। देवता धर्म का भी एक शास्त्र होना चाहिए। परन्तु उसका रचयिता कौन! इसमें ही मूँझ गये हैं।
 
बाप समझाते हैं मुझे जरूर ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण धर्म रचना पड़े। ब्रह्मा मुख वंशावली ब्रह्माकुमार कुमारियां ठहरे। बहुतों के नाम बदली हुए, उनसे बहुत भागन्ती हो गये। साथ में रीप्लेस भी होते हैं। बाकी देखा गया नाम से कोई फायदा नहीं। वह तो भूल भी जाते हैं। वास्तव में तुमको योग लगाना है बाप से। नाम शरीर का मिलता है। आत्मा का तो नाम है नहीं। आत्मा 84 जन्म लेती है। हर जन्म में नाम रूप देश काल सब बदल जाता है। ड्रामा में कोई को भी जो एक बारी पार्ट मिला हुआ है, उसी रूप में फिर कभी पार्ट बजा सके। वही पार्ट फिर 5 हजार वर्ष के बाद बजायेगी। ऐसे नहीं कृष्ण उसी नाम रूप से फिर कोई सकता है। नहीं। यह तो जानते हैं आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है तो फीचर आदि एक मिले दूसरे से। 5 तत्वों के अनुसार फीचर्स बदलते जाते हैं। कितने फीचर्स हैं। परन्तु यह सब पहले से ही ड्रामा में नूँध है। नया कुछ नहीं बनता है। अब शिवरात्रि मनाई जाती है। जरूर शिव आया है। वही सारी दुनिया का प्रीतम है। लक्ष्मी-नारायण वा राधे कृष्ण वा ब्रह्मा विष्णु आदि कोई प्रीतम नहीं हैं। गॉड फादर ही प्रीतम है। बाप तो जरूर वर्सा देते हैं, इसलिए बाप प्यारा लगता है। बाप कहते हैं मुझे याद करो क्योंकि मेरे से तुमको वर्सा पाना है। बच्चे जानते हैं इस पढ़ाई अनुसार जाकर सूर्यवंशी देवता वा चन्द्रवंशी क्षत्रिय बनेंगे। वास्तव में सभी भारतवासियों का धर्म एक होना चाहिए। परन्तु देवता धर्म नाम बदल हिन्दू नाम रख दिया है क्योंकि वह दैवी गुण नहीं हैं। अब बाप बैठ धारण कराते हैं। कहते हैं अपने को आत्मा समझ अशरीरी हो जाओ। तुम कोई परमात्मा नहीं हो। परमात्मा तो एक शिव है। वह सभी का प्रीतम एक ही बार संगमयुग पर आते हैं। यह संगमयुग बहुत छोटा है। सभी धर्मों का विनाश होगा। ब्राह्मण कुल भी वापिस जायेगा क्योंकि उन्हों को फिर दैवी कुल में ट्रान्सफर होना है। वास्तव में यह पढ़ाई है। सिर्फ भेंट की जाती है। वह विषय विकार हैं जहर। यह ज्ञान है अमृत। यह तो मनुष्य को देवता बनाने की पाठशाला है। आत्मा में जो खाद पड़ी है, एकदम मुलम्मा बन गई है। उसको बाप आकर हीरे जैसा बनाते हैं। शिव रात्रि कहते हैं। रात्रि में शिव आया। परन्तु कैसे आया, किसके गर्भ में आया? या किस शरीर में प्रवेश किया? गर्भ में तो आते नहीं हैं। उनको शरीर का लोन लेना पड़ता है। वह जरूर आकरके नर्क को स्वर्ग बनायेंगे। परन्तु कब और कैसे आते हैं, यह किसको पता नहीं है। शास्त्र तो बहुत पढ़ते हैं परन्तु मुक्ति-जीवनमुक्ति तो किसको मिलती नहीं है और ही तमोप्रधान बन गये हैं। सो तो सभी को जरूर बनना है। सभी मनुष्यों को स्टेज पर जरूर हाज़िर होना है। बाप आते ही अन्त में हैं। उनकी ही सब महिमा गाते हैं कि तुम्हरी गति मत तुम ही जानो। तुम्हारे में क्या ज्ञान है, कैसे तुम सद्गति करते हो सो तो तुम ही जानो। तो वह श्रीमत देने आयेगा तो जरूर ना! परन्तु कैसे आते हैं, किस शरीर में आते हैं। वह कोई जानते नहीं। खुद कहते हैं साधारण तन में मुझे आना है। मुझे ब्रह्मा नाम भी जरूर रखना पड़े। नहीं तो ब्राह्मण कैसे पैदा हों! ब्रह्मा कहाँ से आये? ऊपर से तो नहीं आयेगा! वह है सूक्ष्मवतनवासी अव्यक्त, सम्पूर्ण ब्रह्मा। यहाँ तो जरूर व्यक्त में आकर रचना रचनी पड़े। हम अनुभव से बता सकते हैं। इतना समय आते और जाते हैं। बाप कहते हैं मैं भी ड्रामा में बांधा हुआ हूँ, और मेरा पार्ट भी सिर्फ एक बार आने का है। भल दुनिया में उपद्रव बहुत होते रहते हैं। उस समय कितना ईश्वर को पुकारते हैं। परन्तु मुझे तो अपने समय पर ही आना है और आता भी हूँ वानप्रस्थ अवस्था में। यह ज्ञान तो बड़ा सहज है। परन्तु अवस्था जमाने में मेहनत है, इसलिए कहेंगे मंजिल बड़ी ऊंची है। बाप नॉलेजफुल है तो जरूर उसने बच्चों को नॉलेज दी है तब तो उनका गायन है - तुम्हरी गत मत तुम ही जानो।
 
बाप कहते हैं मेरे पास जो सुख-शान्ति का खजाना है वह बच्चों को ही आकर देता हूँ। यह जो माताओं पर अत्याचार आदि होते हैं, यह भी ड्रामा में नूँध हैं, तब तो पाप का घड़ा भरेगा। कल्प-कल्प ऐसे ही रिपीट होता है। यह बातें भी तुम अभी जानते हो फिर भूल जायेंगे। यह ज्ञान सतयुग में होता नहीं। अगर होता तो परम्परा चलता। वहाँ तो प्रालब्ध है जो अभी के पुरुषार्थ से पाते हैं। यहाँ के पुरुषार्थ वाली आत्मायें वहाँ होती हैं, दूसरी आत्मायें वहाँ होती नहीं, जिनको ज्ञान की दरकार रहे। यह भी जानते हैं कोई विरला निकलेगा। बहुत अच्छा-अच्छा भी करेंगे। समझो विलायत वाला कोई बड़ा आदमी निकलता है, समझता है। परन्तु कहाँ भट्ठी में रहेंगे, क्या समझेंगे! कहेंगे बात तो ठीक है परन्तु पवित्र नहीं रह सकते, अरे इतने सब पवित्र रहते हैं। शादी कर इकट्ठे रहकर भी पवित्र रहते हैं तो उन्हों को इनाम भी बहुत मिलता है। यह भी रेस है। उस रेस में फर्स्ट नम्बर जाने से 4-5 लाख मिलेंगे। यहाँ तो 21 जन्मों के लिए पूरी राजाई मिलती है। कम बात है! यह मुरली तो सब बच्चों के पास जायेगी। टेप में भी सुनेंगे। कहेंगे शिवबाबा ब्रह्मा तन से मुरली सुना रहे हैं अथवा बच्चियां सुनायेंगी तो कहेंगी शिवबाबा की मुरली सुनाते हैं तो बुद्धि एकदम वहाँ जानी चाहिए। वह सुख अन्दर में भासना चाहिए। मोस्ट बिलवेड बाबा हमको सदा सुखी मनुष्य से देवता बनाते हैं, तो उनकी याद बहुत रहनी चाहिए। परन्तु माया याद को ठहरने नहीं देती। त्याग भी पूरा चाहिए। यह सब कुछ बाबा का है, यह अवस्था फर्स्टक्लास रहनी चाहिए। बहुत बच्चे हैं जो श्रीमत लेते रहते हैं। श्रीमत में जरूर कल्याण ही होगा। मत भी ऊंची है, यात्रा भी लम्बी है फिर तुम इस मृत्युलोक में नहीं आयेंगे। सतयुग है ही अमरलोक।
 
उस दिन बाबा ने बहुत अच्छी रीति समझाया कि वहाँ तुम मरते नहीं हो। खुशी से पुराना चोला बदल नया लेते हो। सर्प का मिसाल तुम्हारे लिए है। भ्रमरी का भी तुम्हारे ऊपर मिसाल है। कछुए का भी तुम्हारा मिसाल है। सन्यासियों ने तो कापी की है। भ्रमरी का मिसाल अच्छा है। विष्टा के कीड़े को ज्ञान की भूँ-भूँ कर परिस्तानी परीज़ादा बनाते हो। अभी पुरुषार्थ अच्छी तरह करना है। ऊंच पद अथवा अच्छा नम्बर लेना है तो मेहनत भी करनी है। भल धन्धा आदि भी करो वह टाइम छूट है। फिर भी टाइम बहुत मिलता है। अपना योग का चार्ट देखना चाहिए क्योंकि माया बहुत विघ्न डालती है।
 
बाबा बच्चों को बार-बार समझाते हैं मीठे बच्चे, भूले-चूके भी ऐसे मोस्ट बिलवेड बाप वा साजन को फारकती शल (कभी) कोई देवे, इतना महामूर्ख कोई बने। परन्तु माया बना देती है। अब आगे चलकर तुम देखेंगे जो कुर्बान जाते थे, बहुत अच्छी सर्विस करते थे उन्हों का भी माया क्या-क्या हाल कर देती है क्योंकि श्रीमत छोड़ देते हैं इसलिए बाबा कहते हैं ऐसा बड़े ते बड़ा महामूर्ख नहीं बनना। अच्छा-
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बाप द्वारा जो सुख शान्ति का खजाना मिला है वह सबको देना है। ज्ञान से अपनी अवस्था जमाने की मेहनत करनी है।
2) दैवी गुण धारण करने के लिए देहभान को भूल अपने को आत्मा समझ अशरीरी बन एक प्रीतम को याद करना है।
 
वरदान:स्वयं को बेहद की स्टेज पर समझ सदा श्रेष्ठ पार्ट बजाने वाले हीरो पार्टधारी भव!
आप सब विश्व के शोकेस में रहने वाले शोपीस हो, बेहद की अनेक आत्माओं के बीच बड़े ते बड़ी स्टेज पर हो। इसी स्मृति से हर संकल्प, बोल और कर्म करो कि विश्व की आत्मायें हमें देख रही हैं इससे हर पार्ट श्रेष्ठ होगा और हीरो पार्टधारी बन जायेंगे। सभी आप निमित्त आत्माओं से प्राप्ति की भावना रखते हैं तो सदा दाता के बच्चे देते रहो और सर्व की आशायें पूर्ण करते रहो।
स्लोगन:सत्यता की शक्ति पास हो तो खुशी और शक्ति प्राप्त होती रहेगी।

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Details ( Page:- Murali 16-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 16.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Baap ko yaad karne ki khoob mehnat karo,kyunki tumhe sachcha sona banna hai.
Q-Achche purusharthiyon ki nishaani kya hogi?
A-Jo achche purusharthi honge woh kadam-kadam Shrimat par chalenge.Sada Shrimat par chalne wale he oonch pad pate hain.Baba baccho ko sada Shrimat par chalne ke liye kyun kehta?Kyunki wohi ek sachcha-sachcha mashook hai.Baki sab unke aashik hain.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Gyan Sagar se baadal bhar gyan varsha karni hai.Jitna ho sake yaad ki yatra ko bhi badhana hai.Yaad se he sachcha sona banna hai.
2)Shrimat par chal achche manners aur Devi goon dharan karne hain.Sachkhand me chalne ke liye bahut-bahut sachcha banna hai.
 
Vardan:-Master knowledgeful ban 5 hazaar varsh ki janm patri ko janne wale Swadarshan Chakradhari bhava.
Slogan:-Apne sathiyon ko bhi Baap ke sang ka rang lagao to unke sang ka rang aapko nahi lagega.
 
ENGLISH SUMMARY - 16.01.18     
Sweet children, make a great deal of effort to remember the Father, because you have to become real gold.
 
Question:What are the signs of good effort-makers?
 
Answer:
Those who are true effort-makers follow shrimat at every step. Those who constantly follow shrimat are the ones who claim a high status. Why does Baba tell you children to follow shrimat constantly? Because He is the true Beloved and the rest are His lovers.
Om Shanti
 
Both old and new children have understood the meaning of ‘Om shanti’. You children have come to know that all of us souls are children of the Supreme Soul. The Supreme Soul is the Highest on High and the Beloved who is loved by all. The significance of knowledge and devotion has been explained to you children. Knowledge means the day, the golden and silver ages. Devotion means the night, the copper and iron ages. This applies to Bharat. You do not have that much connection with other religions. You are the ones who experience 84 births. It is you people of Bharat who come first. The cycle of 84 births is for you people of Bharat. No one can say that those of the Islamic or Buddhist religion take 84 births; no. It is only the people of Bharat who take 84 births. Bharat is the imperishable land. It is never destroyed, whereas all other lands are destroyed. Bharat is the highest-on-high land; it is imperishable. It is only the land of Bharat that becomes heaven; no other land becomes heaven. It has been explained to you children that only Bharat existed in the new world of heaven, the golden age. It was Bharat that was called heaven. They take 84 births. Finally, all become the residents of hell and those same people of Bharat then become residents of heaven. At this time all are residents of hell. Later, all other lands will be destroyed and only Bharat will remain. There is limitless praise of the land of Bharat. In the same way, the praise of the Supreme Father, the Supreme Soul, and the praise of the Gita are also limitless, but only of the real Gita. While listening and studying the false Gita, you have continued to fall. The Father is now teaching you Raja Yoga. This is the most auspicious confluence age of the Gita. Bharat will then become the most elevated of all. That original deity religion doesn’t exist now; that kingdom doesn’t exist now and that age doesn’t exist now. Baba has explained that the mistake of putting Krishna’s name in the Gita is fixed in the drama. When the path of devotion begins, there will first be the Gita. The Gita and all the scriptures etc. are now to be destroyed. Only the deity religion will remain. It is not that the Gita, the Bhagawad etc. will remain with it; no. You receive the reward, you receive salvation and so there is no need for scriptures etc. There are no gurus or scriptures etc. in the golden age. At this time there are innumerable gurus who teach devotion. There is only one spiritual Father, whose praise is limitless, who grants you salvation. He is called the World Almighty Authority. It is mostly the residents of Bharat who make the mistake of saying that He is Antaryami that He knows what is inside everyone. The Father says: Children, I don’t know what is going on inside everyone. My duty is to purify the impure. I am not Antaryami. This false praise is given on the path of devotion. I am called into the impure world. I only come once, when the old world has to be made new. Human beings don’t know that this world becomes old from new and that, from old, it then becomes new. Everything passes through the stages of sato, rajo to tamo. Human beings are the same: they are at first satopradhan children and then they go through the stages of adolescence and old age, that is, they go through the rajo and tamo stages. When their bodies become old, they shed them and become children. The world also changes from new to old. You children know that Bharat was very elevated in the new world. The praise of Bharat is limitless. There are no other lands that are as wealthy, happy or pure. The satopradhan world is now being established. Brahma, Vishnu and Shankar have been shown in the picture of the Trimurti, but no one understands the meaning of that. In fact, ‘Trimurti Shiva’ not ‘Trimurti Brahma’ should be said. Who created Brahma, Vishnu and Shankar? It was Shiv Baba, the Highest on High. It is said: Salutations to the Deity Brahma, salutations to the Deity Vishnu, salutations to the Deity Shankar and salutations to the Supreme Soul Shiva. Therefore, He is the highest of all. He is the Creator. It is sung that the Supreme Father, the Supreme Soul, creates Brahmins through Brahma. They also receive their inheritance from the Supreme Father, the Supreme Soul. He Himself sits here and teaches Brahmins, because He is the Father as well as the Supreme Teacher. He sits here and explains how the cycle of the history and geography of the world turns. He alone is the knowledge-full One. It is not that He is Janijananhar. That too is a mistake. On the path of devotion, no one knows His occupation or His biography. That is like the worship of dolls. In Calcutta, there is so much worship of those dolls. They worship them, feed them and then sink them in the sea. Shiv Baba is the most beloved. The Father says, they also create an image of Me out of clay, worship it and then break it up. They make it in the morning and break it up in the evening. All of that is the path of devotion, the worship of blind faith. Human beings sing: You are worthy of worship and You are a worshipper. However, the Father says: I am ever worthy of worship. I simply come and make impure ones pure. I give you your fortune of a kingdom for 21 births. There is temporary happiness on the path of devotion. Sannyasis say: Happiness is like the droppings of a crow. Sannyasis renounce their homes and families. That is limited renunciation; they are hatha yogis. They don’t even know God. They remember the brahm element. The brahm element is not God. There is only one incorporeal God Shiva, who is the Father of all. The brahm element is the place where we souls reside. Brahmand is the sweet home. We souls come from there to play our parts. The soul says: I shed a body and take another. It is the residents of Bharat who take 84 births. Those who have done the most devotion will also take the most knowledge. The Father says: O children, stay in your households, but follow shrimat. All of you souls are lovers of the one Beloved, the Supreme Soul. You have continued to remember Him since the copper age. Souls remember the Father at a time of sorrow. This is the land of sorrow. Souls are originally residents of the land of peace. Then they enter the land of happiness and take 84 births. The meaning of “hum so, so hum” has also been explained. They say that a soul is the Supreme Soul and that the Supreme Soul is a soul. The Father now says: How can souls be the Supreme Soul? There is only the one Supreme Soul and the rest are His children. Even sages and holy men give a wrong meaning for “hum so”. The Father has now explained the meaning of “hum so”: “We souls were deities in the golden age, then we became warriors, merchants and then shudras. We have now become Brahmins in order to become deities.” This is the accurate meaning. They are totally wrong. The Father says: By following the dictates of Ravan, human beings have become so false! This is why it is said: Maya is false, the body is false and the world is false. You will not say this in the golden age. That is the land of truth. There is no trace or sign of anything false there, whereas, here, there is no trace of truth. If there is truth, it is like a pinch of salt in a sackful of flour. Human beings with divine virtues exist in the golden age. Theirs is the deity religion. All other religions come later on. Then there is duality. The devilish kingdom of Ravan begins in the copper age. The kingdom of Ravan doesn’t exist in the golden age. None of the five vices exist there and so they are completely viceless. Rama and Sita are called 14 degrees full. No one knows why Rama has been shown with a bow and arrow; it is not a question of violence. You are Godly students. He is the Father and, because you are students, He is also your Teacher. Then He grants you children salvation and sends you to heaven. Therefore, He is also your Satguru. Here, He is the Father, Teacher and Satguru – all three. You have become His children. Therefore, you should have so much happiness! You children know that it is now the kingdom of Ravan. Ravan is the greatest enemy of Bharat. You children receive this knowledge from the knowledge-full Father. He is the Father, the Ocean of Knowledge and the Ocean of Bliss. You clouds fill yourselves from the Ocean of Knowledge and go and shower knowledge on others. You are the Ganges of knowledge. This praise applies to you. However, no one can become pure by bathing in the water of the Ganges. They think that they will become pure by bathing in dirty water. They give a lot of importance to spring water. All of that is the path of devotion. There is no devotion in the golden and silver ages. That is the completely viceless world. The Father says: O children, I have now come to make you pure. Remember Me for this one birth, become pure, and you will become satopradhan. I am the Purifier. Increase your pilgrimage of remembrance as much as possible. You should not say “Shiv Baba, Shiv Baba” through your mouth. It should be just as a lover and beloved remember each other: once they have seen each other, that’s it; each one’s intellect remembers the other. On the path of devotion, you receive visions of whomever you remember or whomever you worship. However, all of that is temporary. You have been coming down by doing devotion. Death is now standing ahead of you. Only after cries of distress will there be cries of victory. Rivers of blood will flow in Bharat. All have now become tamopradhan and everyone now has to become satopradhan. However, only those who became deities a cycle ago will become this. They will come and claim their full inheritance from the Father. If you did less devotion, you would not take the full knowledge and you will claim a status, numberwise, among the subjects. Those who are good effort makers follow shrimat at every step and claim a good status. You need good manners too. You also have to imbibe divine virtues which you will continue to have for 21 births. Everyone now has devilish traits because this world is impure. The history and geography of the world has been explained to you children. At this time, the Father says: Children, now make a lot of effort for remembrance and you will become real gold. Satyug is the golden age, real gold. Then, in the silver age, silver alloy is added and the degrees continue to decrease. Now, no degrees remain. The Father comes when it reaches this condition. This too is fixed in the drama. You are actors. You know that we have come here to play our parts. If actors don’t know the beginning, middle or end of their drama, they are called senseless! The unlimited Father says: Everyone has become so senseless. I now make you sensible and make you into diamonds. Then Ravan comes and makes you as worthless as shells. This old world is now to be destroyed. I take everyone home like swarms of mosquitoes. Your aim and objective is in front of you. Only when you become like them can you become residents of heaven. You BKs are making this effort. However, because the intellects of human beings are tamopradhan, they do not understand that all of you are Brahma Kumars and Kumaris and that there must also definitely be Brahma, the Father of People. Brahmins are the topknot. Brahmins then become deities. They have removed the Brahmins and Shiva from the variety-form image. Brahmins are now making Bharat into heaven. Achcha.
 
To the sweetest, beloved, long-long and now-found children, numberwise, according to your efforts, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.
 
Essence for Dharna:
1. You clouds must fill yourselves from the Ocean of Knowledge and then go and shower knowledge. Increase your pilgrimage of remembrance as much as possible. Become real gold by having remembrance.
2. Follow shrimat and imbibe good manners and divine virtues. In order to go to the land of truth, become very true and honest.
 
Blessing:May you be a spinner of the discus of self-realisation and by being master knowledge-full, know your horoscope of 5,000 years.
Those who become spinners of the discus of self-realisation at this time claim a right to the fortune of the kingdom of the world in the future. To be a spinner of the discus of self-realisation means to know all your different parts in the whole cycle. At this time, you children especially know your horoscope of 5,000 years and have become master knowledge-full. All of you know the special aspect that you become those who play hero parts throughout the whole cycle by making your life like a diamond in this last birth.
Slogan:Colour your companions with the colour of the Father’s company and you will not be coloured by their company.
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16/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे "मीठे बच्चे - बाप को याद करने की खूब मेहनत करो, क्योंकि तुम्हें सच्चा सोना बनना है"
प्रश्न:अच्छे पुरुषार्थियों की निशानी क्या होगी?
उत्तर:जो अच्छे पुरुषार्थी होंगे वह कदम-कदम श्रीमत पर चलेंगे। सदा श्रीमत पर चलने वाले ही ऊंच पद पाते हैं। बाबा बच्चों को सदा श्रीमत पर चलने के लिए क्यों कहता? क्योंकि वही एक सच्चा-सच्चा माशूक है। बाकी सब उनके आशिक हैं।
 
ओम् शान्ति।
 
ओम् शान्ति का अर्थ तो नये वा पुराने बच्चों ने समझा है। तुम बच्चे जान गये हो कि हम सभी आत्मायें परमात्मा की सन्तान हैं। परमात्मा है ऊंचे ते ऊंच और बहुत प्यारे ते प्यारा माशूक सभी का। बच्चों को ज्ञान और भक्ति का राज़ तो समझाया है। ज्ञान माना दिन, सतयुग-त्रेता, भक्ति माना रात, द्वापर और कलियुग। भारत की ही बात है। और धर्मों से तुम्हारा जास्ती कनेक्शन नहीं है, 84 जन्म भी तुम ही भोगते हो। पहले-पहले भी तुम भारतवासी आये हो। 84 जन्मों का चक्र तुम भारतवासियों के लिए है। ऐसे कोई नहीं कहेंगे - इस्लामी, बौद्धी आदि 84 जन्म लेते हैं। नहीं, भारतवासी ही लेते हैं। भारत ही अविनाशी खण्ड है, यह कब विनाश नहीं होता और सभी खण्डों का विनाश हो जाता है। भारत ही सबसे ऊंच ते ऊंच है। अविनाशी है। भारत खण्ड ही स्वर्ग बनता है और कोई खण्ड स्वर्ग नहीं बनता। बच्चों को समझाया गया है - नई दुनिया सतयुग में भारत ही होता है। भारत ही स्वर्ग कहलाता है। वही फिर 84 जन्म लेते हैं। आखरीन नर्कवासी बनते हैं, फिर वही भारतवासी स्वर्गवासी बनेंगे। इस समय सभी नर्कवासी हैं। फिर और सब खण्ड विनाश होंगे, बाकी भारत ही रहेगा। भारत खण्ड की महिमा अपरमअपार है। वैसे परमपिता परमात्मा की महिमा और गीता की महिमा भी अपरमअपार है। परन्तु सच्ची गीता की। झूठी गीता तो सुनते-सुनते पढ़ते-पढ़ते नीचे गिरते आये हैं। अभी बाप तुमको राजयोग सिखलाते हैं। यह गीता का पुरुषोत्तम संगमयुग है। भारत ही फिर पुरुषोत्तम बनने का है। अभी वह आदि सनातन देवी देवता धर्म नहीं है। राज्य भी नहीं है। तो वो युग भी नहीं है। बाबा ने समझाया है - यह भूल भी ड्रामा में है। गीता पर फिर कृष्ण का नाम रखेंगे। जब भक्तिमार्ग शुरू होगा तो पहले-पहले गीता ही होगी। अभी यह गीता आदि सब शास्त्र खत्म हो जाने हैं। बाकी सिर्फ देवी देवता धर्म ही रहेगा। ऐसे नहीं कि उनके साथ गीता भागवत आदि भी रहेंगे। नहीं। प्रालब्ध मिल गई, सद्गति हो गई तो फिर कोई शास्त्र आदि की दरकार ही नहीं। सतयुग में कोई भी गुरू शास्त्र आदि नहीं होते। इस समय तो अनेक गुरू हैं भक्ति सिखलाने वाले। सद्गति देने वाला तो एक ही रूहानी बाप है, जिसकी अपरमअपार महिमा है। उसे ही वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी कहा जाता है। भारतवासी बहुत करके यह भूल करते हैं जो कहते हैं वह अन्तर्यामी है। सबके अन्दर को जानता है। बाप कहते हैं बच्चे मैं कोई के अन्दर को नहीं जानता हूँ। मेरा तो काम ही है पतितों को पावन बनाना। बाकी मैं अन्तर्यामी नहीं हूँ। यह भक्तिमार्ग की उल्टी महिमा है। मुझे बुलाते ही हैं पतित दुनिया में। और मैं एक ही बार आता हूँ, जबकि पुरानी दुनिया को नया बनाना है। मनुष्यों को यह पता ही नहीं कि यह जो दुनिया है वह नई से पुरानी, पुरानी से नई कब बनती है। हर चीज़ सतो, रजो, तमो में जरूर आती है। मनुष्य भी एक जैसे होते हैं। बालक पहले सतोप्रधान है फिर युवा, वृद्ध होते हैं अर्थात् रजो, तमो में आते हैं। बूढ़ा शरीर होता है वह छोड़ जाकर बच्चा बनते हैं। दुनिया भी नई सो पुरानी होती है। बच्चे जानते हैं नई दुनिया में भारत कितना ऊंच था। भारत की महिमा अपरमअपार है। इतना धनवान, सुखी, पवित्र और कोई खण्ड है नहीं। अब सतोप्रधान दुनिया स्थापन हो रही है। त्रिमूर्ति में भी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर दिखाया है। उनका अर्थ कोई समझते नहीं हैं। वास्तव में कहना चाहिए त्रिमूर्ति शिव न कि ब्रह्मा। ब्रह्मा विष्णु शंकर को क्रियेट किसने किया.... ऊंचे ते ऊंच शिवबाबा है। कहते हैं ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम:, शंकर देवताए नम:, शिव परमात्माए नम:। तो वह ऊंच हुआ ना। वह है रचयिता। गाते भी हैं परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मणों की स्थापना करते हैं फिर परमात्मा बाप द्वारा वर्सा भी मिलता है। फिर खुद बैठ ब्राह्मणों को पढ़ाते हैं क्योंकि वह बाप भी है, सुप्रीम टीचर भी है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे चक्र लगाती है, वह बैठ समझाते हैं। वही नॉलेजफुल है। बाकी ऐसे नहीं कि वह जानीजाननहार है। यह भी भूल है। भक्तिमार्ग में कोई बायोग्राफी, आक्यूपेशन को नहीं जानते। तो यह जैसे गुड़ियों की पूजा हो जाती है। कलकत्ते में गुड़ियों की पूजा कितनी होती है, फिर उनकी पूजा कर खिला-पिलाकर समुद्र में डुबो देते हैं। शिवबाबा मोस्ट बिलवेड है। बाप कहते हैं मेरा भी मिट्टी का लिंग बनाकर पूजा आदि कर फिर तोड़फोड़ देते हैं। सवेरे बनाते हैं, शाम को तोड़ देते हैं। यह सब है भक्तिमार्ग, अन्धश्रद्धा की पूजा। मनुष्य गाते भी हैं आपेही पूज्य आपेही पुजारी। बाप कहते हैं मैं तो सदैव पूज्य हूँ। मैं तो आकर सिर्फ पतितों को पावन बनाता हूँ। 21 जन्मों के लिए राज्य भाग्य देता हूँ। भक्ति में है अल्पकाल का सुख, जिसको सन्यासी काग विष्टा समान सुख कहते हैं। सन्यासी घरबार छोड़ देते हैं। वह है हद का सन्यास, हठयोगी हैं ना। भगवान को तो जानते ही नहीं। ब्रह्म को याद करते हैं। ब्रह्म तो भगवान नहीं। भगवान तो एक ही निराकार शिव है, जो सर्व आत्माओं का बाप है। ब्रह्म है हम आत्माओं के रहने का स्थान। वह ब्रह्माण्ड, स्वीट होम है। वहाँ से हम आत्मायें यहाँ पार्ट बजाने आती हैं। आत्मा कहती है हम एक शरीर छोड़ दूसरा शरीर लेता हूँ, 84 जन्म भी भारतवासियों के हैं। जिन्हों ने बहुत भक्ति की है, वही फिर ज्ञान भी जास्ती उठायेंगे। बाप कहते हैं बच्चे गृहस्थ व्यवहार में भल रहो, परन्तु श्रीमत पर चलो। तुम सब आत्मायें आशिक हो, एक परमात्मा माशूक के। द्वापर से लेकर तुम याद करते आये हो। दु:ख में आत्मा बाप को याद करती है। यह है ही दु:खधाम। आत्मायें असली शान्तिधाम की निवासी हैं। पीछे आई सुखधाम में। फिर हमने 84 जन्म लिए। ''हम सो, सो हम'' का अर्थ भी समझाया है। वह कह देते आत्मा सो परमात्मा, परमात्मा सो आत्मा। अब बाप समझाते हैं आत्मा सो परमात्मा कैसे हो सकता। परमात्मा तो एक है। उनके सब बच्चे हैं। साधू सन्त आदि भी हम सो का अर्थ रॉग करते हैं। अब बाप ने समझाया है ''हम सो'' का अर्थ ही है - हम आत्मा सतयुग में सो देवी-देवता थी, फिर हम सो क्षत्रिय, हम सो वैश्य, हम सो शूद्र बनी। अब फिर हम सो ब्राह्मण बने हैं, हम सो देवता बनने के लिए। यह है यथार्थ अर्थ। वह है बिल्कुल रॉग। बाप कहते हैं मनुष्य रावण की मत पर चल कितने झूठे हो गये हैं इसलिए कहावत है - झूठी माया, झूठी काया...सतयुग में ऐसे नहीं कहेंगे। वह है सचखण्ड। वहाँ झूठ का नाम-निशान नहीं। यहाँ फिर सच का नाम नहीं है। फिर भी आटे में नमक कहा जाता है। सतयुग में हैं दैवीगुण वाले मनुष्य। उन्हों का है देवता धर्म। पीछे और-और धर्म हुए हैं। तो द्वेत हुआ। द्वापर से आसुरी रावणराज्य शुरू हो जाता है। सतयुग में रावण राज्य भी नहीं तो 5 विकार भी नहीं हो सकते। वह है सम्पूर्ण निर्विकारी। राम सीता को 14 कला सम्पूर्ण कहा जाता है। राम को बाण क्यों दिया है? यह भी कोई नही जानते। हिंसा की तो बात नहीं। तुम हो गाडली स्टूडेण्ट, तो फादर भी हुआ। स्टूडेण्ट हैं तो वह टीचर हुआ। फिर तुम बच्चों को सद्गति दे स्वर्ग में ले जाते हैं तो सतगुरू हुआ। बाप, टीचर, गुरू तीनों ही हो गया। उनके तुम बच्चे बने हो तो तुमको कितनी खुशी होनी चाहिए। तुम बच्चे जानते हो अभी है रावण राज्य। रावण भारत का सबसे बड़ा दुश्मन है। यह नॉलेज भी तुम बच्चों को नॉलेजफुल बाप से मिली है। वह बाप ही ज्ञान का सागर, आनन्द का सागर है। ज्ञान सागर से तुम बादल भरकर फिर जाए वर्षा करते हो। ज्ञान गंगायें तुम हो, तुम्हारी ही महिमा है। बाकी पानी की गंगा में स्नान करने से पावन तो कोई बनता ही नहीं। मैले गन्दे पानी में स्नान करने से भी समझते हैं हम पावन बन जायेंगे। चश्में (झरने) के पानी को भी बहुत महत्व देते हैं। यह सब है भक्ति मार्ग। सतयुग त्रेता में भक्ति होती नहीं। वह है सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया।
 
बाप कहते हैं बच्चे मैं तुमको अभी पावन बनाने आया हूँ। यह एक जन्म मुझे याद करो और पावन बनो तो तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। मैं ही पतित-पावन हूँ। जितना हो सके याद की यात्रा को बढ़ाओ। मुख से शिवबाबा, शिवबाबा कहना नहीं है। जैसे आशिक माशुक को याद करते हैं। एक बार देखा बस, बुद्धि में उनकी याद रहेगी। भक्ति में जो जिसको याद करते, जिसकी पूजा करते हैं उनका साक्षात्कार हो जाता है। परन्तु वह सब है अल्पकाल के लिए। भक्ति से नीचे ही उतरते आये हैं। अब तो मौत सामने खड़ा है। हाय-हाय के बाद ही जयजयकार होनी है। भारत में ही रक्त की नदियॉ बहनी हैं। अब सब तमोप्रधान बन गये हैं फिर सबको सतोप्रधान बनना है। परन्तु बनेंगे वही जो कल्प पहले देवता बने होंगे। वही आकर बाप से पूरा-पूरा वर्सा लेंगे। अगर भक्ति कम की होगी तो ज्ञान भी पूरा नहीं उठायेंगे। फिर प्रजा में नम्बरवार पद पायेंगे। अच्छे पुरुषार्थी कदम-कदम श्रीमत पर चल अच्छा पद पायेंगे। मैनर्स भी अच्छे चाहिए। दैवी गुण भी धारण करने हैं। वह फिर 21 जन्म चलेंगे। अब हैं सबके आसुरी गुण क्योंकि पतित दुनिया है ना। तुम बच्चों को वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी भी समझाई गई है। इस समय बाप कहते हैं बच्चे याद की बहुत मेहनत करो तो तुम सच्चा सोना बन जायेंगे। सतयुग है गोल्डन एज, सच्चा सोना। फिर त्रेता में चाँदी की अलाए पड़ती है तो कलायें कम होती जाती हैं। अब तो कोई कला नहीं है। जब ऐसी हालत हो जाती है तब बाप आते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। तुम एक्टर्स हो ना। तुम जानते हो हम यहाँ पार्ट बजाने आये हैं। पार्टधारी अगर ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को न जाने तो उनको बेसमझ कहा जाता है। बेहद का बाप कहते हैं सभी कितना बेसमझ बन गये हैं। अब मैं तुमको समझदार हीरे जैसा बनाता हूँ। फिर रावण आकर कौड़ी जैसा बनाते हैं, अब इस पुरानी दुनिया का विनाश होना है। सबको मच्छरों सदृश्य ले जाता हूँ। तुम्हारी एम आब्जेक्ट सामने खड़ी है। ऐसा बनना है तब तुम स्वर्गवासी बनेगे। तुम बी.के. यह पुरुषार्थ कर रहे हो। परन्तु मनुष्यों की बुद्धि तमोप्रधान होने कारण यह भी समझते नहीं कि इतने सब बी.के. हैं तो जरूर प्रजापिता ब्रह्मा भी होगा। ब्राह्मण हैं चोटी। ब्राह्मण फिर देवता, चित्रों में ब्राह्मणों को, शिव को गुम कर दिया है। ब्राह्मण अब भारत को स्वर्ग बना रहे हैं। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) ज्ञान सागर से बादल भर ज्ञान वर्षा करनी है। जितना हो सके याद की यात्रा को भी बढ़ाना है। याद से ही सच्चा सोना बनना है।
2) श्रीमत पर चल अच्छे मैनर्स और दैवीगुण धारण करने हैं। सचखण्ड में चलने के लिए बहुत-बहुत सच्चा बनना है।
 
वरदान:मास्टर नॉलेजफुल बन 5 हजार वर्ष की जन्म पत्री को जानने वाले स्वदर्शन चक्रधारी भव!
जो अभी स्वदर्शन चक्रधारी बनते हैं वही भविष्य में चक्रवर्ती राज्य-भाग्य के अधिकारी बनते हैं। स्वदर्शन चक्रधारी अर्थात् अपने सारे चक्र के अन्दर सर्व भिन्न-भिन्न पार्ट को जानने वाले। आप बच्चे विशेष इस समय 5 हजार वर्ष की जन्मपत्री को जानकर मास्टर नॉलेजफुल बन गये। सभी ने यह विशेष बात जान ली कि इस अन्तिम जन्म में हीरे तुल्य जीवन बनाने से सारे कल्प के अन्दर हीरो पार्ट बजाने वाले बन जाते हैं।
स्लोगन:अपने साथियों को भी बाप के संग का रंग लगाओ तो उनके संग का रंग आपको नहीं लगेगा।
 
 

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Details ( Page:- Murali 17-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 17.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Tumhe behad ka pakka sanyasi banna hai,kisi bhi chiz me lobh briti nahi rakhni hai.
Q-Baap ki taakat prapt karne ke liye tum bacche sabse achcha karm kaun sa karte ho?
A-Sabse achcha karm hai Baap par apna sab kuch (tan-mann-dhan sahit) arpan karna.Jab tum sab kuch arpit karte ho to Baap tumhe return me itni taakat deta,jisse tum sare Biswa par shukh-shanti ka atal akhand rajya kar sako.
Q- Baap ne kaun si seva baccho ko shikhlayi hai jo koi manushya nahi shikhla sakta?
A-Roohani seva.Tum aatmaon ko bikaro ki bimari se choodani ke liye gyan ka injection lagate ho.Tum ho roohani social worker.Manushya jismani seva karte lekin gyan injection dekar aatma ko jaagti-jyoti nahi bana sakte.Yah seva Baap he baccho ko shikhlate hain.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1)Amritvele ke suddh aur shant samay me oothkar Baap ko yaad karna hai.Deha sahit sab kuch bhoolne ka abhyas karna hai.
2)Past so past kar is antim janm me Baap ko pavitrata ki madad karni hai.Tan-mann-dhan se Bharat ko Swarg banane ki seva me lagana hai.
 
Vardan:-Apne adi aur ant dono swaroop ko samne rakh khushi wo nashe me rehne wale Smrit Swaroop bhava.
Slogan:-Jinke paas gyan ka athah dhan hai,unhe sampannta ki anubhooti hoti hai.
 
ENGLISH SUMMARY - 17.01.18     
Sweet children, you have to become firm unlimited sannyasis. You shouldn’t have an attitude of greed for anything.
 
Question:What is the best action you children perform through which you attain strength from the Father?
Answer:The best action of all is to surrender everything you have, that is, your mind, body and wealth, to the Father. When you surrender everything, the Father gives you so much strength in return that you are able to rule the world of eternal unbroken, constant peace and happiness.
 
Question:What service, which no human being can teach, has the Father taught you children?
Answer:Spiritual service. You inject souls with injections of knowledge to cure them of the sickness of the vices. You are spiritual social workers. People can do physical service but they cannot give souls the injection of knowledge and make them constantly ignited lights. Only the Father teaches you children how to do this service.
Essence for Dharna:
1. Wake up in the early morning hours of nectar, at the pure and peaceful time, and remember the Father. Practise forgetting everything including the consciousness of your body.
2. Let the past be the past and give the help of purity to the Father in this last birth. Stay busy in the service of making Bharat into heaven with your body, mind and wealth.
 
Blessing:May you be an embodiment of remembrance and maintain your happiness and intoxication by keeping both your original and your final forms in front of you.
In order to show the difference between Adi Dev Brahma and the first soul, Shri Krishna, they are shown together. Similarly, all of you also have to keep your Brahmin form and your deity form in front of you and see how you were such elevated souls at the beginning and are at the end. You attained the fortune of the kingdom for half the cycle and remained worthy of respect, worthy of worship, elevated souls. By maintaining this intoxication and happiness, you will become embodiments of remembrance.
 
Slogan:Those who have plenty of the wealth of knowledge experience fullness.
 
 
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17/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे "मीठे बच्चे - तुम्हें बेहद का पक्का सन्यासी बनना है, किसी भी चीज़ में लोभ वृत्ति नहीं रखनी है"
प्रश्न:बाप की ताकत प्राप्त करने के लिए तुम बच्चे सबसे अच्छा कर्म कौन सा करते हो?
उत्तर:सबसे अच्छा कर्म है बाप पर अपना सब कुछ (तन-मन-धन सहित) अर्पण करना। जब तुम सब कुछ अर्पित करते हो तो बाप तुम्हें रिटर्न में इतनी ताकत देता, जिससे तुम सारे विश्व पर सुख-शान्ति का अटल अखण्ड राज्य कर सको।
 
प्रश्न:बाप ने कौन सी सेवा बच्चों को सिखलाई है जो कोई मनुष्य नहीं सिखला सकता?
उत्तर:
रूहानी सेवा। तुम आत्माओं को विकारों की बीमारी से छुड़ाने के लिए ज्ञान का इंजेक्शन लगाते हो। तुम हो रूहानी सोशल वर्कर। मनुष्य जिस्मानी सेवा करते लेकिन ज्ञान इंजेक्शन देकर आत्मा को जागती-ज्योत नहीं बना सकते। यह सेवा बाप ही बच्चों को सिखलाते हैं।
 
ओम् शान्ति।
भगवानुवाच - यह तो समझाया गया है कि मनुष्य को भगवान कभी भी नहीं कहा जा सकता। यह है मनुष्य सृष्टि और ब्रह्मा विष्णु शंकर हैं सूक्ष्मवतन में। शिवबाबा है आत्माओं का अविनाशी बाप। विनाशी शरीर का बाप तो विनाशी है। यह तो सब जानते हैं। पूछा जाता है कि तुम्हारे इस विनाशी शरीर का बाप कौन है? आत्मा का बाप कौन है? आत्मा जानती है - वह परमधाम में रहते हैं। अभी तुम बच्चों को देह-अभिमानी किसने बनाया? देह को रचने वाले ने। अब देही-अभिमानी कौन बनाता है? जो आत्माओं का अविनाशी बाप है। अविनाशी माना जिसका आदि-मध्य-अन्त नहीं है। अगर आत्मा का और परम आत्मा का आदि मध्य अन्त कहें तो फिर रचना का भी सवाल उठ जाए। उनको कहा जाता है अविनाशी आत्मा, अविनाशी परमात्मा। आत्मा का नाम आत्मा है। बरोबर आत्मा अपने को जानती है कि हम आत्मा हैं। मेरी आत्मा को दु:खी मत करो। मैं पापात्मा हूँ - यह आत्मा कहती है। स्वर्ग में कभी भी यह अक्षर आत्मायें नहीं कहेंगी। इस समय ही आत्मा पतित है, जो फिर पावन बनती है। पतित आत्मा ही पावन आत्मा की महिमा करती है। जो भी मनुष्यात्माएं हैं उनको पुनर्जन्म तो जरूर लेना ही है। यह सब बातें हैं नई। बाप फरमान करते हैं - उठते बैठते मुझे याद करो। आगे तुम पुजारी थे। शिवाए नम: कहते थे। अब बाप कहते हैं तुम पुजारियों ने नम: तो बहुत बारी किया। अब तुमको मालिक, पूज्य बनाता हूँ। पूज्य को कभी नम: नहीं करना पड़ता। पुजारी नम: अथवा नमस्ते कहते हैं। नमस्ते का अर्थ ही है नम: करना। कांध थोड़ा नीचे जरूर करेंगे। अब तुम बच्चों को नम: कहने की दरकार नहीं। न लक्ष्मी-नारायण नम:, न विष्णु देवताए नम:, न शंकर देवताए नम:। यह अक्षर ही पुजारीपन का है। अब तो तुमको सारी सृष्टि का मालिक बनना है। बाप को ही याद करना है। कहते भी हैं वह सर्व समर्थ है। कालों का काल, अकालमूर्त है। सृष्टि का रचयिता है। ज्योर्तिबिन्दु स्वरूप है। आगे उनकी बहुत महिमा करते थे, फिर कह देते थे सर्वव्यापी, कुत्ते बिल्ली में भी है तो सभी महिमा खत्म हो जाती। इस समय के सब मनुष्य ही पाप आत्मायें हैं तो फिर जानवरों की क्या महिमा होगी। मनुष्य की ही सारी बात है। आत्मा कहती है मैं आत्मा हूँ, यह मेरा शरीर है। जैसे आत्मा बिन्दु है वैसे परमपिता परमात्मा भी बिन्दु है। वह भी कहते मैं पतितों को पावन बनाने साधारण तन में आता हूँ। आकर बच्चों का ओबीडियेन्ट सर्वेन्ट बन सर्विस करता हूँ। मैं रूहानी सोशल वर्कर हूँ। तुम बच्चों को भी रूहानी सेवा करना सिखलाता हूँ। और सब जिस्मानी हद की सेवा करना सिखलाते हैं। तुम्हारी है रूहानी सेवा, तब कहा जाता है ज्ञान अंजन सतगुरू दिया... सच्चा सतगुरू वह एक ही है। वही अथॉरिटी है। सभी आत्माओं को आकर इन्जेक्शन लगाते हैं। आत्माओं में ही विकारों की बीमारी है। यह ज्ञान का इन्जेक्शन और कोई के पास होता नहीं। पतित आत्मा बनी है न कि शरीर, जिसको इन्जेक्शन लगायें। पाँच विकारों की कड़ी बीमारी है। इसके लिए इन्जेक्शन ज्ञान सागर बाप के सिवाए कोई के पास भी है नहीं। बाप आकर आत्माओं से बात करते हैं कि हे आत्मायें तुम जागती ज्योति थी, फिर माया ने परछाया डाला। डालते-डालते तुमको धुन्धकारी बुद्धि बना दिया है। बाकी कोई युद्धिष्ठिर व धृतराष्ट्र की बात नहीं है। यह रावण की बात है।
 
बाप कहते हैं - मैं आता ही हूँ साधारण रीति। मेरे को विरला ही कोई जान सकते हैं। शिव जयन्ती अलग है, कृष्ण जयन्ती अलग है। परमपिता परमात्मा शिव को कृष्ण से मिला नहीं सकते। वह निराकार, वह साकार। बाप कहते हैं मैं हूँ निराकार, मेरी महिमा भी गाते हैं - हे पतित-पावन आकर इस भारत को फिर से सतयुगी दैवी राजस्थान बनाओ। कोई समय दैवी राजस्थान था। अभी नहीं है। फिर कौन स्थापन करेगा? परमपिता परमात्मा ही ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया स्थापन करते हैं। अभी है पतित प्रजा का प्रजा पर राज्य, इनका नाम ही है कब्रिस्तान। माया ने खत्म कर दिया है। अब तुमको देह सहित देह के सब सम्बन्धियों को भूल मुझ बाप को याद करना है। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी भल करो। जो कुछ समय मिले तो मुझे याद करने का पुरुषार्थ करो। यह एक ही तुमको युक्ति बताते हैं। सबसे जास्ती मेरी याद तुमको अमृतवेले रहेगी क्योंकि वह शान्त, शुद्ध समय होता है। उस समय न चोर चोरी करते, न कोई पाप करते, न कोई विकार में जाते। सोने के टाइम सब शुरू करते हैं। उसको कहा जाता है घोर तमोप्रधान रात। अब बाप कहते हैं - बच्चे पास्ट इज़ पास्ट। भक्तिमार्ग का खेल पूरा हुआ, अब तुमको समझाया जाता है यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है। यह प्रश्न उठ नहीं सकता कि सृष्टि की वृद्धि कैसे होगी। वृद्धि तो होती ही रहती है। जो आत्मायें ऊपर हैं, उनको नीचे आना ही है। जब सभी आ जायेंगे तब विनाश शुरू होगा। फिर नम्बरवार सबको जाना ही है। गाइड सबसे आगे होता है ना।
 
बाप को कहा जाता है लिबरेटर, पतित-पावन। पावन दुनिया है ही स्वर्ग। उनको बाप के सिवाए कोई बना न सके। अब तुम बाप की श्रीमत पर भारत की तन मन धन से सेवा करते हो। गाँधी जी चाहते थे, परन्तु कर न सके। ड्रामा की भावी ऐसी थी। जो पास्ट हुआ। पतित राजाओं का राज्य खत्म होना था तो उनका नाम-निशान खत्म हो गया। उन्हों की प्रापर्टी का भी नाम निशान नहीं है। खुद भी समझते थे लक्ष्मी-नारायण ही स्वर्ग के मालिक थे। परन्तु यह कोई नहीं जानते कि उन्हों को ऐसा किसने बनाया? जरूर स्वर्ग के रचयिता बाप से वर्सा मिला होगा और कोई इतना भारी वर्सा दे न सके। यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। गीता में हैं परन्तु नाम बदल दिया है। कौरव और पाण्डव दोनों को राजाई दिखाते हैं। परन्तु यहाँ दोनों को राजाई नहीं है। अब बाप फिर स्थापना करते हैं। तुम बच्चों को खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। अब नाटक पूरा होता है। हम अब जा रहे हैं। हम स्वीट होम में रहने वाले हैं। वो लोग कहते हैं फलाना पार निर्वाण गया वा ज्योति ज्योति में समाया अथवा मोक्ष को पाया। भारतवासियों को स्वर्ग मीठा लगता है, वह कहते हैं स्वर्ग पधारा। बाप समझाते हैं मोक्ष तो कोई पाता नहीं। सभी का सद्गति दाता बाप ही है, वह जरूर सबको सुख ही देगा। एक निर्वाणधाम में बैठे और एक दु:ख भोगे, यह बाप सहन कर नहीं सकते। बाप है पतित-पावन। एक है मुक्तिधाम पावन, दूसरा है जीवन मुक्तिधाम पावन। फिर द्वापर के बाद सभी पतित बन जाते हैं। पाँच तत्व आदि सब तमोप्रधान बन जाते हैं फिर बाप आकर पावन बनाते हैं फिर वहाँ पवित्र तत्वों से तुम्हारा शरीर गोरा बनता है। नेचुरल ब्युटी रहती है। उनमें कशिश रहती है। कृष्ण में कितनी कशिश है। नाम ही है स्वर्ग तो फिर क्या? परमात्मा की महिमा बहुत करते हैं, अकालमूर्त.... फिर उनको ठिक्कर भित्तर में ठोक दिया है। बाप को कोई भी जानते नहीं, जब बाप आये तब आकर समझाये। लौकिक बाप भी जब बच्चे रचे तब तो बाप की बॉयोग्राफी का उनको पता पड़े। बाप के बिगर बच्चों को बाप की बॉयोग्राफी का पता कैसे पड़े। अब बाप कहते हैं लक्ष्मी-नारायण को वरना है तो मेहनत करनी पड़े। जबरदस्त मंजिल है, बहुत भारी आमदनी है। सतयुग में पवित्र प्रवृति मार्ग था। पवित्र राजस्थान था सो अब अपवित्र हो गया है। सब विकारी बन गये हैं। यह है ही आसुरी दुनिया। बहुत करप्शन लगी हुई है। राजाई में तो ताकत चाहिए। ईश्वरीय ताकत तो है नहीं। प्रजा का प्रजा पर राज्य है, जो दान पुण्य अच्छे कर्म करते हैं उनको राजाई घर में जन्म मिलता है। वह कर्म की ताकत रहती है। अभी तुम तो बहुत ऊंचे कर्म करते हो। तुम अपना सब कुछ (तन-मन-धन) शिवबाबा को अर्पण करते हो, तो शिवबाबा को भी बच्चों के सामने सब कुछ अर्पण करना पड़े। तुम उनसे ताकत धारण कर सुख शान्ति का अखण्ड अटल राज्य करते हो। प्रजा में तो कुछ भी ताकत नहीं है। ऐसे नहीं कहेंगे कि धन दान किया तब एम.एल.ए. आदि बने। धन दान करने से धनवान घर में जन्म मिलता है। अभी तो राजाई कोई है नहीं। अब बाबा तुमको कितनी ताकत देते हैं। तुम कहते हो हम नारायण को वरेंगे। हम मनुष्य से देवता बन रहे हैं। यह हैं सब नई-नई बातें। नारद की बात अभी की है। रामायण आदि भी अभी के हैं। सतयुग त्रेता में कोई शास्त्र होता नहीं। सभी शास्त्रों का अभी से तैलुक है। झाड़ को देखेंगे मठ पंथ सब बाद में आते हैं। मुख्य है ब्राह्मण वर्ण, देवता वर्ण, क्षत्रिय वर्ण... ब्राह्मणों की चोटी मशहूर है। यह ब्राह्मण वर्ण सबसे ऊंचा है जिसका फिर शास्त्रों में वर्णन नहीं है। विराट रूप में भी ब्राह्मणों को उड़ा दिया है। ड्रामा में ऐसी नूँध है। दुनिया के लोग यह नहीं समझते कि भक्ति से नीचे उतरते हैं। कह देते हैं भक्ति से भगवान मिलता है। बहुत पुकारते हैं, दु:ख में सिमरण करते हैं। सो तो तुम अनुभवी हो। वहाँ दु:ख की बात नहीं, यहाँ सबमें क्रोध है, एक दो को गाली देते रहते हैं।
 
अभी तुम शिवाए नम: नहीं कहेंगे। शिव तो तुम्हारा बाप है ना। बाप को सर्वव्यापी कहने से ब्रदरहुड उड़ जाता है। भारत में कहते तो बहुत अच्छा हैं - हिन्दू चीनी भाई-भाई, चीनी मुस्लिम भाई-भाई। भाई-भाई तो हैं ना। एक बाप के बच्चे हैं। इस समय तुम जानते हो हम एक बाप के बच्चे हैं। यह ब्राह्मणों का सिजरा फिर से स्थापन हो रहा है। इस ब्राह्मण धर्म से देवी-देवता धर्म निकलता है। देवी-देवता धर्म से क्षत्रिय धर्म। क्षत्रिय से फिर इस्लामी धर्म निकलेगा... सिजरा है ना। फिर बौद्धी, क्रिश्चियन निकलेंगे। ऐसे वृद्धि होते-होते इतना बड़ा झाड हो गया है। यह है बेहद का सिजरा, वह होता है हद का। यह डीटेल की बातें जिसको धारण नहीं हो सकती, उनके लिए बाप सहज युक्ति बताते हैं कि बाप और वर्से को याद करो, तो स्वर्ग में जरूर आयेंगे। बाकी ऊंच पद प्राप्त करना है तो उसके लिए पुरुषार्थ करना है। यह तो तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा भी तुमको समझाते हैं, यह बाबा भी समझाते हैं। वही हमारी तुम्हारी बुद्धि में है। भल हम शास्त्र आदि पढ़े हुए हैं परन्तु जानते हैं इन सबसे कोई भगवान नहीं मिलता। बाप समझाते हैं मीठे-मीठे बच्चे शिवबाबा को और वर्से को याद करते रहो। बाबा आप बहुत मीठे हो, कमाल है आपकी, ऐसे-ऐसे महिमा करनी चाहिए बाबा की। तुम बच्चों को ईश्वरीय लाटरी मिली है। अब मेहनत करनी है ज्ञान और योग की। इसमें जबरदस्त प्राइज़ मिलती है तो पुरुषार्थ करना चाहिए। अच्छा!
 
मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) अमृतवेले के शुद्ध और शान्त समय में उठकर बाप को याद करना है। देह सहित सब कुछ भूलने का अभ्यास करना है।
2) पास्ट सो पास्ट कर इस अन्तिम जन्म में बाप को पवित्रता की मदद करनी है। तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में लगना है।
 
वरदान:अपने आदि और अन्त दोनों स्वरूप को सामने रख खुशी व नशे में रहने वाले स्मृति स्वरूप भव!
जैसे आदि देव ब्रह्मा और आदि आत्मा श्रीकृष्ण दोनों का अन्तर दिखाते भी साथ दिखाते हो। ऐसे आप सब अपना ब्राह्मण स्वरूप और देवता स्वरूप दोनों को सामने रखते हुए देखो कि आदि से अन्त तक हम कितनी श्रेष्ठ आत्मायें रही हैं। आधाकल्प राज्य भाग्य प्राप्त किया और आधाकल्प माननीय, पूज्यनीय श्रेष्ठ आत्मा बनें। तो इसी नशे और खुशी में रहने से स्मृति स्वरूप बन जायेंगे।
स्लोगन:जिनके पास ज्ञान का अथाह धन है, उन्हें सम्पन्नता की अनुभूति होती है।

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Details ( Page:- Murali 18-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 18.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Apna swabhav bahut he mitha aur shant banao,bolchal aisa ho jo sab kahe yah to jaise Devta hain.
 
Q-Hriday ko suddh banane ke liye kaun sa souk hona chahiye?
A-Hriday ko suddh banana hai to yogi banne banane ka souk hona chahiye.Yog ki sthiti se he hriday suddh banta hai.Agar deha me moh hai,deha abhimaan rehta haia to samjho humari avastha bahut kacchi hai.Dehi-abhimaani bacche he sachcha diamond bante hain isiliye jitna ho sake dehi-abhimaani banne ka bhyas karo.Baap ko yaad karo.
 
Vardan:-Apne mastak beech sada Baap ki smriti emerge rakhne wale Mastakmani bhava
Slogan:-Befikra badshahi ki sthiti ka anubhav karna hai to mere ko tere me parivartan kar do.
 
ENGLISH SUMMARY - 18.01.18     
Sweet children, make your nature very sweet and peaceful. Let your way of speaking and behaving be such that everyone says: You are like a deity.
 
Question:What interest should you have in order to make your heart pure?
Answer:
In order to make your heart pure, let there be the interest to become yogi and make others yogi. It is only with the stage of yoga that the heart becomes pure and clean. If there is attachment to your body and also body consciousness, then understand that your stage is very weak. Only the children who are soul conscious become true diamonds . Therefore, practise being soul conscious and remember the Father as much as possible.
 
Blessing:May you be a jewel of the forehead and constantly keep the awareness of the Father in the centre of your forehead.
“A jewel of the forehead” means one who constantly has the remembrance of the Father in his forehead. This is called the highest stage. Constantly consider yourself to be an elevated soul in a high stage and continue to move forward. Those who stay in this high stage are easily able to cross all the many situations down below. The problems remain down below and you yourself remain up above. The place for the jewel of the forehead is high up on the forehead and this is why you must not come down, but remain constantly up above.
 
Slogan:In order to experience the stage of a carefree emperor, transform “mine” into “Yours”.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

18/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे "पिताश्री जी के पुण्य स्मृति दिवस पर सुनाने के लिए बापदादा के मधुर महावाक्य"
मीठे बच्चे - अपना स्वभाव बहुत ही मीठा और शांत बनाओ, बोलचाल ऐसा हो जो सब कहें यह तो जैसे देवता हैं।
 
प्रश्न:हृदय को शुद्ध बनाने के लिए कौन सा शौक होना चाहिए?
उत्तर:
हृदय को शुद्ध बनाना है तो योगी बनने बनाने का शौक होना चाहिए। योग की स्थिति से ही हृदय शुद्ध बनता है। अगर देह में मोह है, देह अभिमान रहता है तो समझो हमारी अवस्था बहुत कच्ची है। देही-अभिमानी बच्चे ही सच्चा डायमण्ड बनते हैं इसलिए जितना हो सके देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करो। बाप को याद करो।
 
ओम् शान्ति।
 
बच्चे जानते हैं अभी भगवान सम्मुख बैठकर हमको ज्ञान के गीत सुनाते हैं वा ज्ञान की डांस कराते हैं। इस ज्ञान डांस से तुम देवताओं मुआफिक सदा सुखी और हर्षित रहेंगे। भगवान को ही बेहद का बाप वा विश्व का रचयिता कहा जाता है। आत्मा समझती है बाबा हमारे लिए स्वर्ग की सौगात लाये हैं। वही रचयिता है। स्वर्ग का मालिक बनाने के लिए राजयोग सिखाते हैं। कहते हैं बाप को और विश्व के मालिकपने को याद करो। बाप बेहद का मालिक है तो जरूर बेहद की बड़ी दुनिया ही रचेंगे। तुम बच्चों के लिए सारी विश्व ही घर है अर्थात् पार्ट बजाने का स्थान है। बेहद का बाप आकरके बेहद का विश्व अथवा घर बनाते हैं, वह है स्वर्ग। तो ऐसे बाप का बच्चों को कितना शुक्रिया मानना चाहिए। विश्व का रचता बाप डायरेक्ट समझा रहे हैं हम तुमको विश्व का मालिक बनाने आया हूँ तो तुम्हारा स्वभाव बहुत फर्स्टक्लास चाहिए। तुम्हारी चलन ऐसी होनी चाहिए जो सब कहें कि यह तो जैसे देवता है। देवतायें नामीग्रामी हैं। कहते हैं इनका स्वभाव एकदम देवताई है। बिल्कुल मीठे शान्त स्वभाव के हैं। तो ऐसे बच्चों को बाप भी देख खुश होते हैं। बाबा स्वर्ग का मालिक बनाने आते हैं तो तुम्हें कितना मददगार बनना चाहिए। सर्विस में आपेही लग जाना चाहिए। ऐसे नहीं मैं थक गया हूँ, फुर्सत नहीं है। समय पर सब काम करने में कल्याण है। यज्ञ सर्विस का इज़ाफा शिवबाबा देते हैं। बाबा बच्चों की दैवी चलन देखते हैं तो कुर्बान जाते हैं।
 
मीठे बच्चे, तुम जानते हो हमको पढ़ाने वाला कौन है! इस चैतन्य डिब्बी में चैतन्य हीरा बैठा है, वही सत-चित आनन्द स्वरूप है। सत बाप तुम्हें सच्ची-सच्ची श्रीमत देते हैं। बाप के बने हो तो कदम-कदम श्रीमत पर चलना है। चुप रहना है और पढ़ना है, एक बाप को याद करना है। घड़ी-घड़ी इस बैज को देखते रहो तो बाप और वर्से की याद आयेगी। याद से ही तुम जैसे सारे विश्व को शान्ति का दान देते हो। हर एक बच्चे को अपनी प्रजा भी बनानी है, वारिस भी बनाने हैं। मुरली कोई भी मिस नहीं करनी चाहिए। बाबा बहुत प्यार से समझाते हैं - मीठे बच्चे अपने पर रहम करो, कोई अवज्ञा नहीं करो।
 
बाप की दिल अन्दर बच्चों को सदा सुखी बनाने की कितनी फर्स्टक्लास आश रहती है कि बच्चे लायक बन स्वर्ग के मालिक बनें। जो खुशबूदार फूल हैं वह खींचते हैं। जो जैसा है ऐसी सर्चलाइट लेने की कशिश करते हैं। खुशबूदार, गुणवान बच्चों को देख प्यार में खुशी में नयन गीले हो जाते हैं। कुछ तकलीफ होती है तो बाबा सर्चलाइट देते हैं।
 
बाबा समझाते हैं मीठे बच्चे, तुम्हें इस पुरानी दुनिया में कोई भी आशा नहीं रखनी है। अब तो एक ही श्रेष्ठ आश रखनी है कि हम तो चलें सुखधाम। कहाँ भी ठहरना नहीं है। देखना नहीं है। आगे बढ़ते जाना है। एक तरफ ही देखते रहो तब ही अचल-अडोल स्थिर अवस्था रहेगी। अब यह दुनिया खत्म होनी ही है, इसकी बहुत सीरियस हालत है। इस समय सबसे अधिक गुस्सा प्रकृति को आता है इसलिए सब खलास कर देती है। तुम जानते हो यह प्रकृति अभी अपना गुस्सा जोर से दिखायेगी। सारी पुरानी दुनिया को डुबो देगी। अर्थक्वेक में मकान आदि सब गिर पड़ेंगे। अनेक प्रकार से मौत होंगे। यह सब ड्रामा का प्लैन बना हुआ है। इसमें दोष किसी का भी नहीं है। विनाश तो होना ही है इसलिए तुम्हें इससे बुद्धि का योग हटा देना है। तुमने तो अपना सब कुछ इन्श्योर कर दिया है इसलिए तुम्हें किसी भी प्रकार की चिंता नहीं। तुम्हारा सब कुछ सफल हो रहा है।
 
अब तुम कहेंगे वाह सतगुरू वाह! जिसने हमको यह रास्ता बताया है। वाह तकदीर वाह! वाह ड्रामा वाह! तुम्हारे दिल से निकलता - शुक्रिया बाबा आपका जो हमारे दो मुट्ठी चावल लेकर हमें सेफ्टी से भविष्य में सौगुणा रिटर्न देते हो। परन्तु इसमें भी बच्चों की बड़ी विशाल बुद्धि चाहिए। बच्चों को अथाह ज्ञान धन का खजाना मिलता रहता तो अपार खुशी होनी चाहिए ना। जितना हृदय शुद्ध होगा तो औरों को भी शुद्ध बनायेंगे। योग की स्थिति से ही हृदय शुद्ध बनता है। तुम बच्चों को योगी बनने बनाने का शौक होना चाहिए। अगर देह में मोह है, देह-अभिमान रहता है तो समझो हमारी अवस्था बहुत कच्ची है। देही-अभिमानी बच्चे ही सच्चा डायमण्ड बनते हैं इसलिए जितना हो सके देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करो। बाप को याद करो। बाबा अक्षर सबसे बहुत मीठा है। बाप बड़े प्यार से बच्चों को पलकों पर बिठाकर साथ ले जायेंगे। ऐसे बाप की याद के नशे में चकनाचूर होना चाहिए। बाप को याद करते-करते खुशी में ठण्डे ठार हो जाना चाहिए। जैसे बाप अपकारियों पर उपकार करते हैं - तुम भी फालो फादर करो। सुखदाई बनो।
 
तुम बच्चे इस पढ़ाई से कितनी ऊंची कमाई करते हो। तुम पदमापदम पति बनते हो। बाबा तुम्हें कितना धनवान बनाते हैं। बाप तुमको अखुट खजाने में ऐसा वज़न करते हैं जो 21 जन्म साथ रहेगा। वहाँ दु:ख का नाम नहीं। कभी अकाले मृत्यु नहीं होगा। मौत से कभी डरेंगे नहीं। यहाँ कितना डरते हैं, रोते हैं। तुमको तो खुशी है - यह पुराना शरीर छोड़ जाए नई दुनिया में प्रिन्स बनेंगे। तुम इस पुरानी दुनिया से ममत्व मिटाते रहो, इस देह को भी भूलते जाओ। हम आत्मा इन्डिपिडेंट हैं। बस एक बाप के सिवाए और किसी की याद न आये। जीते जी जैसेकि मौत की अवस्था में रहना है। इस दुनिया से मर गये। कहते भी हैं ना - आप मुये मर गई दुनिया। शरीर के भान को उड़ाते रहो। एकान्त में बैठ यह अभ्यास करो - बाबा बस अभी हम आपकी गोद में आये कि आये। एक की याद में शरीर का अन्त हो - इसको कहा जाता है एकान्त।
 
तुम बच्चे अभी ड्रामा के राज़ को भी जानते हो - बाप तुम्हें निराकारी, आकारी और साकारी दुनिया का सब समाचार सुनाते हैं। आत्मा कहती है अभी हम पुरुषार्थ कर रहे हैं, नई दुनिया में जाने के लिए। हम स्वर्ग में चलने लायक जरूर बनेंगे। अपना और दूसरों का कल्याण करेंगे। अच्छा-बाप मीठे बच्चों को समझाते हैं, बाप दु:ख हर्ता सुख कर्ता है तो बच्चों को भी सबको सुख देना है। बाप का राइट हैण्ड बनना है। ऐसे बच्चे ही बाप को प्रिय लगते हैं। शुभ कार्य में राइट हाथ को ही लगाते हैं। तो बाप कहते हर बात में राइटियस बनो, एक बाप को याद करो तो फिर अन्त मति सो गति हो जायेगी। इस पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा दो। यह तो कब्रिस्तान है। धन्धाधोरी बच्चों आदि के चिन्तन में मरे तो मुफ्त अपनी बरबादी कर देंगे। शिवबाबा को याद करने से तुम बहुत आबाद होंगे। देह-अभिमान में आने से बरबादी हो जाती है। देही-अभिमानी बनने से आबादी होती है। धन की भी बहुत लालच नहीं रखनी चाहिए। उसी फिकरात में शिवबाबा को भी भूल जाते हैं। बाबा देखते हैं सब कुछ बाप को अर्पण कर फिर हमारी श्रीमत पर कहाँ तक चलते हैं। शुरू-शुरू में बाप ने भी ट्रस्टी हो दिखाया ना। सब कुछ ईश्वर अर्पण कर खुद ट्रस्टी बन गया। बस ईश्वर के काम में ही लगाना है। विघ्नों से कभी डरना नहीं चाहिए। जहाँ तक हो सके सर्विस में अपना सब कुछ सफल करना है। ईश्वर अर्पण कर ट्रस्टी बन रहना है। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
सृष्टि परिवर्तन का आधार - संगठित रूप में सभी का एक संकल्प

(अव्यक्त महावाक्य -1975)

 
संगठित रुप से सर्व ब्राह्मणों के अन्दर रहम की भावना, विश्व-कल्याण की भावना, सर्व-आत्माओं को दु:खों से छुड़ाने की शुभ कामनाएं जब तक हर एक के दिल से उत्पन्न नहीं होंगी तब तक विश्व-परिवर्तन का कार्य रुका हुआ है। अब संगठित रुप में एक संकल्प को अपनाओ अर्थात् दृढ़ संकल्प की इक्ट्ठी अंगुली सभी मिलकर दो, तब इस कलियुगी पर्वत को परिवर्तन कर गोल्डन वर्ल्ड ला सकेंगे।
 
तो चेक करो हमारा यह संगठन एक संकल्प वाला कहाँ तक बना है? शास्त्रों में गायन है कि ब्रह्मा को संकल्प उठा कि सृष्टि रचें तो सृष्टि रची गई। यहाँ अकेले ब्रह्मा की तो बात नहीं है, लेकिन ब्रह्मा सहित सब ब्राह्मणों का भी जब एक साथ यह संकल्प उठे कि अब हम सब एवररेडी हैं और नई दुनिया की स्थापना होनी ही चाहिए या होगी ही-ऐसा दृढ संकल्प जब ब्राह्मणों के अन्दर उत्पन्न हो तब ही सृष्टि का परिवर्तन हो अर्थात् नई सृष्टि की रचना प्रैक्टिकल में दिखाई दे। इसमें भी संगठन का बल चाहिए। एक दो का व सिर्फ आठ का नहीं, लेकिन सारे संगठन का एक संकल्प चाहिये। संकल्प से सृष्टि रचना, इसका रहस्य इस प्रकार से है। जब सबके अन्दर संकल्प उत्पन्न होगा तो सेकेण्ड में समाप्ति का नगाड़ा बजना शुरु हो जायेगा।
 
एक तरफ समाप्ति का नगाड़ा, दूसरी तरफ नई दुनिया का नज़ारा साथ-साथ दिखाई देगा। वहाँ ही विनाश की अति होगी और वहाँ ही जलमई के बीच चारों ओर विनाश में एक हिस्सा धरती और बाकी तीन हिस्सा जलमई। यह जो सभी पीछे-पीछे अनेक धर्मो के कारण अनेक खण्ड बने हैं, वह सब समाप्त होंगे। कुछ देश एक सैरगाह के रुप में जल के बीच एक टापू के मुआफिक हो जायेंगे। तो एक तरफ विनाश की अति के नगाड़े होंगे, दूसरी तरफ फर्स्ट प्रिन्स (श्रीकृष्ण) के जन्म का आवाज बुलन्द होगा, वह पत्ते पर नहीं आयेगा। दिखाते हैं ना जलमई के बाद पत्ते पर श्रीकृष्ण आया। इसका भी रहस्य है। भारत जब परिस्तान बनता है तो तीन हिस्सा जलमई होने के कारण उसको जलमई दिखा दिया है। ऐसे जलमई के बीच पहला पत्ता जो फर्स्ट आत्मा है, उसके जन्म का चारों और आवाज प्रसिद्ध होगा कि फर्स्ट प्रिन्स प्रत्यक्ष हो चुका है, जन्म हो चुका है। तो वह भी अति में होगा अर्थात् जलमई के तीन हिस्से का नज़ारा होगा और एक हिस्सा भारत-परिस्तान के रुप में प्रगट होगा। जो दिखाते हैं कि सोने की द्वारिका पानी से निकल आयी। लेकिन पानी से नहीं, तीन हिस्से पानी में होंगे और उस पानी के बीच सोनी द्वारिका दिखाई देगी इसलिये कहते हैं कि सोने की द्वारिका पानी से निकल आयी। उसी समय पर फर्स्ट आत्मा के जन्म की जयजयकार होगी। ऐसे नज़ारे सामने आते हैं? तो पुरानी दुनिया के महाविनाश का नगाड़ा और नये फर्स्ट प्रिन्स के जन्म का नज़ारा साथ-साथ दिखाई देगा। जैसे नगाड़ा बजाने से पहले नगाड़े को गर्म किया जाता है तब आवाज बुलन्द होती है। तो यह भी योग अग्नि से नगाड़ा बजने के पहले तैयारी चाहिए, तब नगाड़े में आवाज़ बुलन्द होगी। इस इन्तज़ाम में लगे हुए हो ना! इन्तज़ार करने वालों को भी इन्तज़ाम में लगाओ तब जयजयकार हो जायेगी।
 
जब शरीर को चलाना आ जायेगा तब राज्य चलाना भी आ जायेगा। शरीर को चलाना अर्थात् राज्य करना। तो राज्य करने के संस्कार भरने हैं ना! नॉलेजफुल कहा जाता है, तो फुल नॉलेज में तन, मन, धन और जन सब आ जाता है। अगर एक की भी नॉलेज कम है तो नॉलेजफुल नहीं कहेंगे। समझा? सदा सफलतामूर्त बनने का आधार भी नॉलेजफुल है। नॉलेज नहीं तो सफलतामूर्त भी नहीं हो सकते। समय के प्रमाण पुरुषार्थ की गति भी तीव्र होनी चाहिए। समय की रफ्तार तेज है और चलने वालों की रफ्तार ढीली है तो समय पर कैसे पहुँचेंगे! एक बल, एक भरोसा, यह है मुख्य सब्जेक्ट। हर समय एक की ही याद में एकरस रहना। इसी पुरुषार्थ में ही सदा सफल हो तो मंजिल पर पहुँच जायेंगे। जो अटूट स्नेह में रहते हैं उनको सहयोग भी स्वत: प्राप्त होता है।
 
मुरली है लाठी, इस लाठी के आधार से कोई कमी भी होगी तो वह भर जायेगी। यह आधार ही अपने घर तक और अपने राज्य तक पहुँचायेगा लेकिन लक्ष्य से, नियमपूर्वक नहीं, लेकिन लगन से। तो लगन से मुरली पढ़ना व सुनना अर्थात् मुरलीधर की लगन में रहना। मुरलीधर से स्नेह की निशानी मुरली है। जितना मुरली से स्नेह है उतना ही समझो मुरलीधर से भी स्नेह है। सच्चे ब्राह्मण की परख मुरली से होगी। मुरली से लगन अर्थात् सच्चा ब्राह्मण। मुरली से लगन कम अर्थात् हाफ कास्ट ब्राह्मण। अच्छा!
 
वरदान:अपने मस्तक बीच सदा बाप की स्मृति इमर्ज रखने वाले मस्तकमणि भव!
मस्तकमणि अर्थात् जिसके मस्तक में सदा बाप की याद रहे, इसी को ही ऊंची स्टेज कहा जाता है। अपने को सदा ऐसी ऊंची स्टेज पर स्थित रहने वाली श्रेष्ठ आत्मा समझ आगे बढ़ते रहो। जो इस ऊंची स्टेज पर रहते हैं वह नीचे की अनेक प्रकार की बातों को सहज पार कर लेते हैं। समस्यायें नीचे रह जाती हैं और स्वयं ऊपर हो जाते। मस्तकमणि का स्थान ही ऊंचा मस्तक है इसलिए नीचे नहीं आना, सदा ऊपर रहो।
 
स्लोगन:बेफिक्र बादशाह की स्थिति का अनुभव करना है तो मेरे को तेरे में परिवर्तन कर दो।

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Details ( Page:- Murali 19-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 19.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Paras buddhi banne ke liye Baap jo samjhate hain usey achchi tarah se samajhna hai,swayang me dharna kar dusro ko karana hai.
Q-Kaun sa ek raaz bahut he guhya,gopniya aur samajhne ka hai?
A- Nirakar Baap sabhi ka mata-pita kaise bante hain,woh shristi ki rachna kis bidhi se karte hain,yah bahut he guhya aur gopaniya raaz hai.Nirakar Baap mata bigar shristi to rach nahi sakte.Kaise woh sarir dharan kar,usme pravesh kar unke mukh se bacche adopt karte hain,yah Brahma pita bhi hai to mata bhi hai-yah baat bahut he samajhkar simran karne wa smriti me rakhne ki hai.
 
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Baap se 21 pidhi ka varsha lene k liye nirantar Baap aur varse ko yaad karne ka purusharth karna hai.Kisi bhi dehadhari ko yaad nahi karna hai.
2)Buddhi me swadarshan chakra firate rehna hai.Hume pujari se pujya banna hai-yah smriti he swadarshan chakra hai.
 
Vardan:-Sada sneh aur sahayog dwara abinashi ratna ka title prapt karne wale Amar bhava.
Slogan:-Pavitrata ki yathart dharna hai to har karm yatharth aur yuktiyukt hoga.
 
ENGLISH SUMMARY - 19.01.18     
Sweet children, in order to make your intellects divine, understand very clearly the things that the Father explains. First imbibe these yourself and then inspire others to do the same.
Question:Which very deep and entertaining aspect should you understand very clearly?
Answer:
How the incorporeal Father becomes everyone’s Mother and the Father and the method He uses to create the world is a very deep and entertaining aspect. The incorporeal Father cannot create the world without a mother. How He adopts a body by entering it, how He adopts you children through that one’s mouth, how Brahma is the father and also a mother are all aspects that have to be very clearly understood and remembered and kept in your consciousness.
 
Song:You are the Mother and the Father.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. In order to claim your inheritance for 21 generations, constantly make effort to remember the Father and the inheritance. Do not remember any bodily beings.
2. Continue to make your intellect spin the discus of self-realization: We were worthy of worship and we then became worshippers. We have completed the cycle of 84 births and the drama is now about to repeat again. From being worshippers, we have to become worthy of worship. To have this awareness means to spin the discus of self-realization.
 
Blessing:May you be immortal with your love and co-operation and always have the title of an imperishable jewel.
Those who are always loving and co-operative in the task of establishment receive the title of imperishable jewel. You are such imperishable jewels that no one can ever shake you and no obstruction can obstruct you. Only such imperishable jewels are blessed with the blessing of being immortal. They are real gold and the Father’s companions. They consider the Father’s task to be their own. They remain constantly with the Father and this is why they become imperishable.
 
Slogan:When you have the accurate dharna of purity, every action of yours is accurate and filled with wisdom (yuktiyukt).
 
HINDI DETAIL MURALI

19/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे "मीठे बच्चे - पारसबुद्धि बनने के लिए बाप जो समझाते हैं उसे अच्छी तरह से समझना है, स्वयं में धारणा कर दूसरों को कराना है"
 
प्रश्न:कौन सा एक राज़ बहुत ही गुह्य, गोपनीय और समझने का है?
उत्तर:
निराकार बाप सभी का मात-पिता कैसे बनते हैं, वह सृष्टि की रचना किस विधि से करते हैं, यह बहुत ही गुह्य और गोपनीय राज़ है। निराकार बाप माता बिगर सृष्टि तो रच नहीं सकते। कैसे वह शरीर धारण कर, उसमें प्रवेश कर उनके मुख से बच्चे एडाप्ट करते हैं, यह ब्रह्मा पिता भी है तो माता भी है - यह बात बहुत ही समझकर सिमरण करने वा स्मृति में रखने की है।
 
गीत:-तुम्हीं हो माता....  ओम् शान्ति।
 
जिसको मात-पिता कहते हो तो जरूर फरमान पिता ही करेंगे। यह तो माता पिता कम्बाइण्ड है। यह बात मनुष्यों के लिए समझना बड़ा डिफीकल्ट है और यही मुख्य बात है समझने की। निराकार परमपिता परमात्मा जिसको पिता कहा जाता है उनको माता भी कहते, यह वण्डरफुल बात है। परमपिता परमात्मा मनुष्य सृष्टि रचेगा, तो माता जरूर चाहिए। यह बात बड़ी गुह्य है और कोई की बुद्धि में कभी आ न सके। अब वह है सभी का बाप, माता भी जरूर चाहिए। वह पिता तो है निराकार, फिर माँ किसको रखे? शादी तो नहीं की होगी। यह हैं अति गुह्य गोपनीय समझने की बातें। नये-नये तो समझ न सकें। पुराने भी मुश्किल समझकर और उस स्मृति में रहते हैं। बच्चे ही मॉ बाप की स्मृति में रहेंगे ना। भारत में लक्ष्मी-नारायण को भी कह देते हैं तुम मात-पिता...तो राधे कृष्ण के आगे भी जाकर कहते - तुम मात-पिता... अब वह तो हैं प्रिन्स प्रिन्सेज। उन्हों को मात-पिता कोई बेसमझ भी न कहे। मनुष्यों की तो कहने की टेव (आदत) पड़ गई है। परन्तु यह बात ही न्यारी है। लक्ष्मी-नारायण को तो उनके बच्चे ही कहेंगे तुम मात-पिता.... मनुष्य समझते हैं जिसके पास बहुत धन है, महल-माड़ियॉ हैं वह स्वर्ग में हैं। उन्हों के बच्चे कहेंगे हमारे माँ बाप के पास बहुत सुख है। जरूर आगे जन्म में कुछ अच्छे कर्म किये हैं। अच्छा यह जो गाया जाता है तुम मात पिता... परमपिता परमात्मा रचयिता तो एक है, जिसके हम बच्चे हैं वह भी निराकार है। हम आत्मायें भी निराकार हैं। परन्तु निराकार फिर सृष्टि कैसे रचते हैं। माता बिगर तो सृष्टि रची नहीं जा सकती। वण्डर है सृष्टि रचने का। एक तो परमात्मा रचयिता है नई दुनिया का। पुरानी दुनिया में आकर नई दुनिया रचते हैं। परन्तु कैसे रचते हैं। यह बड़ी गुह्य बात है - जो निराकार को हम मात-पिता कहते हैं। बाप खुद समझाते हैं मैं बच्चों को एडाप्ट करता हूँ। पेट से बच्चे निकलने की बात ही नहीं। इतने ढेर बच्चे पेट से कैसे निकलेंगे। तो कहते हैं मैं इस शरीर को धारण कर इनके मुख द्वारा बच्चे एडाप्ट करता हूँ। यह ब्रह्मा पिता भी है, मनुष्य सृष्टि रचने वाला और माता भी है। जिसके मुख से बच्चे एडाप्ट करता हूँ। इस रीति बच्चों को एडाप्ट करना - यह सिर्फ बाप का काम है। सन्यासी तो कर न सकें। उन्हों के हैं जिज्ञासु, फालोअर्स, शिष्य। यहाँ तो हुई रचना की बात। तो बाबा इनमें प्रवेश करते, यह है मुख वंशावली जो कहते हैं तुम मात-पिता... तो माता यह सिद्ध हुई। वह बाप इसमें प्रवेश हो रचते हैं। यह बूढ़ा प्रजापिता भी ठहरा फिर माता भी बूढ़ी ठहरी। बूढ़ी ही चाहिए ना। अब बच्चों को मात-पिता को याद करना पड़े। इनकी तो प्रापर्टी है नहीं। तुम बनते हो वारिस, इसलिए इनको बापदादा कहते हैं। तुमको प्रजापिता ब्रह्मा से प्रापर्टी नहीं लेनी है। यह दादा (ब्रह्मा) भी उनसे लेते हैं। इनको दादा भी तो माता भी कहा जाता है। नहीं तो मात-पिता कैसे सिद्ध हो। मात-पिता बिगर बच्चे कैसे हों - यह बड़ी गुह्य समझने और सिमरण करने की बात है। बाबा आप पिता हो, इस माता द्वारा हमने जन्म लिया है। बरोबर वर्सा भी याद आता है। याद उस बाप को करना है। ज्ञान से तुम समझ भी सकते हो कि कैसे बाप पतित दुनिया में आते हैं। कहते हैं जिसमें प्रवेश करता हूँ, यह हमारा बच्चा भी है, तुम्हारा बाप भी है और फिर माता भी है। तुम हो गये बच्चे। तो बाप को याद करने से वर्सा मिलता है। माता को याद करने से वर्सा नहीं मिलेगा। निरन्तर उस बाप को याद करना है। बाकी इस शरीर को भूलना है। यह ज्ञान की बातें समझने की हैं।
 
बाप पुरानी दुनिया में आकर नई दुनिया रचते हैं। पुरानी को खलास कर देते हैं। नहीं तो कौन खलास करे। गाया भी हुआ है शंकर द्वारा पुरानी दुनिया का विनाश - यह ड्रामा में नूँध है इसलिए गायन में भी आता है। तुम बच्चे जानते हो हमारे लिए नई राजधानी बन रही है। विनाश की फुल तैयारियाँ हैं। तुम इतने ढेर हो, सब राजाई पद पा रहे हो। ऐसे नहीं अन्धश्रद्धा से मान लिया है। कोई ने कहा राम की सीता चुराई गई। सत। कोई भी बात न समझो तो समझने की कोशिश करो। नहीं तो बेसमझ के बेसमझ ही रह जायेंगे। भक्तिमार्ग में तो अल्पकाल का सुख मिलता है। उसका फल उस ही जन्म में वा दूसरे जन्म में अल्पकाल के लिए मिल जाता है। तीर्थ यात्रा पर जाते हैं, कुछ समय तो पवित्र रहते हैं, पाप नहीं करते। दान पुण्य भी करते हैं, इसको काग विष्टा के समान सुख कहा जाता है। यह तुम बच्चे ही समझ सकते हो क्योंकि तुम बन्दर से बदल मन्दिर लायक बने हो। सतयुग में तुम पारसबुद्धि थे क्योंकि पारसनाथ, पारसनाथिनी का राज्य था। सोने के महल थे। अब तो पत्थर ही पत्थर हैं। पारसबुद्धि से पत्थरबुद्धि कौन बनाते हैं? 5 विकार रूपी रावण। जब सब पत्थरबुद्धि बन पड़ते हैं तब ही फिर पारसबुद्धि बनाने वाला बाप आते हैं। कितना सहज समझकर समझाते हैं। बीज और झाड़। बाकी डिटेल तो समझाते रहते हैं, समझाते रहेंगे। नटशेल में कहते हैं बाप को याद करो, जिससे वर्सा मिलता है। माता को याद करने की जरूरत नहीं। बाप कहते हैं बच्चे मुझे याद करो तो जरूर बच्चों ने माता से जन्म लिया होगा? जन्म लिया, बाप से वर्सा लेने के लिए। तो इस माता को भी छोड़ो, सब देहधारियों को छोड़ो क्योंकि अब वर्सा बाप से लेना है। अब बच्चे समझ गये हैं कि हम आत्मा रूहानी बाप के बच्चे हैं और फिर जिस्मानी मात-पिता के भी बच्चे बने हैं। वह बेहद का बाप नई सृष्टि रचते हैं। भारत स्वर्ग था ना। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक थे, अब नहीं हैं। बेहद का बाप समझाते हैं - तुम हर जन्म में हद का वर्सा लेते आये हो। नर्क में तो है ही हद का वर्सा। स्वर्ग में हद का वर्सा नहीं कहेंगे। वह है बेहद का वर्सा क्योंकि बेहद के अर्थात् सारे सृष्टि के मालिक हैं और कोई धर्म नहीं है। हद का वर्सा शुरू होता है द्वापर से। सतयुग में है बेहद का। तुम प्रालब्ध भोगते हो। वहाँ तुमको बेहद की बादशाही है। यथा राजा रानी तथा प्रजा। प्रजा भी कहेगी हम सारे सृष्टि के मालिक हैं। अभी तो प्रजा ऐसे नहीं कहेगी कि हम सारे सृष्टि के मालिक हैं। अभी तो हदें लगी पड़ी हैं। वह कहते हैं हमारे पानी के अन्दर नहीं आ सकते, यह टुकड़ा हमारा है। वहाँ प्रजा भी कहेगी हम विश्व के मालिक हैं। हमारे महाराजा महारानी लक्ष्मी-नारायण भी विश्व के मालिक। यह अभी हम समझते हैं कि वहाँ एक ही राज्य रहता है। वह है बेहद की बादशाही। भारत क्या था, किसकी बुद्धि में भी नहीं है। तुम बच्चों को अब शिक्षा मिलती है कि बेहद के बाप से वर्सा लो। हम कहते हैं तो जरूर हम ले रहे हैं। बेहद का बाप है ही स्वर्ग का रचयिता। गाया भी जाता है 21 पीढ़ी राज्य-भाग्य। पीढ़ी क्यों कहते हैं? क्योंकि वहाँ बूढ़े होकर मरेंगे। वहाँ अकाले मृत्यु नहीं होगा। मातायें कभी विधवा नहीं बनेंगी। रोना पीटना नहीं होगा। यहाँ तो कितना रोते पीटते हैं। वहाँ बच्चों को भी रोने की दरकार नहीं। यहाँ तो बच्चों को रुलाते रहते हैं कि मुख बड़ा हो। वहाँ ऐसी बात नहीं। यह तो सब बच्चे समझते हैं कि हम अभी बेहद के बाप से कल्प पहले मिसल वर्सा ले रहे हैं। 84 जन्म पूरे हुए, अब जाना है। निरन्तर बाप और वर्से को याद करने से विकर्म विनाश होंगे। मन्मनाभव का अर्थ कितना सहज है। गीता भल झूठी है, परन्तु उसमें कुछ न कुछ तो सच है ना। मुझ अपने बाप को याद करो, कृष्ण तो ऐसे नहीं कहेंगे कि मुझे याद करो, तुमको मेरे पास आना है। परमात्मा अभी सर्व आत्माओं को कहते हैं कि तुम सभी आत्माओं को मच्छरों सदृश्य आना है। तो जरूर आत्मा, परमात्मा बाप को ही फालो करेगी। कृष्ण तो देहधारी हो गया। वह कह न सके। वह ऐसे नहीं कहेंगे कि मुझ आत्मा को याद करो। उनका नाम ही कृष्ण है। आत्मा कोई भी नहीं कह सकती, आत्मायें सभी भाई-भाई हैं। यह तो बाप कहते हैं मैं निराकार हूँ, मुझ परम आत्मा का नाम है शिव। तो कृष्ण कैसे कहेंगे। उनको तो शरीर है। शिवबाबा को तो अपना शरीर है नहीं। शिवबाबा कहते हैं बच्चे तुम्हें भी पहले अपना शरीर नहीं था। तुम आत्मा निराकार थी, फिर शरीर लिया है। अब तुमको ड्रामा के आदि मध्य अन्त की स्मृति आई है। बाप सृष्टि कैसे, कब और क्यों रचते हैं? सृष्टि तो है ना। गायन भी है ब्रह्मा द्वारा नई सृष्टि की रचना की। तो जरूर पुरानी सृष्टि से ही नई सृष्टि की रचना करते होंगे। कहते भी हैं मनुष्य से देवता बनाया। बाप कहते हैं मैं तुमको इस पढ़ाई से मनुष्य से देवता बनाता हूँ। पूज्य देवता थे, फिर पुजारी बन गये हो। मनुष्य तो समझते नहीं कि 84 जन्म कैसे लेते हैं। क्या सभी 84 जन्म लेंगे? सृष्टि वृद्धि को प्राप्त करती रहती है। तो सभी कैसे 84 जन्म लेंगे! जरूर जो पीछे आयेंगे उनके जन्म कम होंगे। 25-50 वर्ष के अन्दर 84 जन्म कैसे लेंगे? यह है स्वदर्शन पा। उन्होंने फिर स्वदर्शन चक्र को एक हथियार का रूप बना दिया है। अब तुम आत्माओं को यह स्मृति आई है कि हमने 84 जन्म ऐसे-ऐसे भोगे। अभी चक्र पूरा होता है, फिर से ड्रामा को रिपीट करना है। पहले-पहले आदि सनातन देवी-देवता धर्म जरूर चाहिए, जो प्राय:लोप हो गया है।
 
मनुष्य कहते हैं हे गॉड फादर रहम करो। तो बाप कहते हैं - अच्छा तुमको दु:ख से लिब्रेट कर सुखी बनाता हूँ। बाप का काम ही है सबको सुखी बनाना, इसलिए मैं कल्प-कल्प आता हूँ, आकर भारत को हीरे जैसा बनाता हूँ। बहुत सुखी बनाता हूँ। बाकी सबको मुक्तिधाम भेज देता हूँ। भक्त चाहते भी हैं भगवान से मिलने क्योंकि सुख के लिए तो सन्यासियों ने कह दिया है कि यह काग विष्टा समान सुख है और दूसरा फिर कहते इस ड्रामा के खेल में फिर आयें ही नहीं। मोक्ष को पा लें। अब मोक्ष तो मिलना नहीं है। यह है बना बनाया ड्रामा। सारे सृष्टि की हिस्ट्री-जॉग्राफी को तुम बच्चे अभी जानते हो कि यह कैसे चक्र लगाती है। जिसको ही स्वदर्शन चक्र कहा जाता है। यह जो दिखाते हैं स्वदर्शन चक्र से सभी के सिर काटे। कंस बध का नाटक दिखाते हैं। ऐसे कुछ भी है नहीं। यहाँ हिंसा की बिल्कुल बात ही नहीं। यह तो पढ़ाई है। पढ़ना है, बाप से वर्सा लेना है। बाप से वर्सा लेने के लिए किसको कतल करते हैं क्या? वह होता है हद का वर्सा, यह है बेहद के बाप से बेहद का वर्सा लेना। गीता में लड़ाई आदि की कितनी बातें लिख दी हैं। वह तो कुछ भी हैं नहीं। पाण्डवों की लड़ाई वास्तव में कोई के साथ है नहीं। यह तो योगबल से बेहद के बाप से तुम बच्चे वर्सा ले रहे हो, नई दुनिया के लिए। इसमें लड़ाई की कोई बात नहीं। अच्छा।
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) बाप से 21 पीढ़ी का वर्सा लेने के लिए निरन्तर बाप और वर्से को याद करने का पुरुषार्थ करना है। किसी भी देहधारी को याद नहीं करना है।
2) बुद्धि में स्वदर्शन चक्र फिराते रहना है। हम पूज्य थे, फिर पुजारी बनें, 84 जन्मों का चक्र पूरा किया, फिर से ड्रामा रिपीट होना है, हमें पुजारी से पूज्य बनना है -यह स्मृति ही स्वदर्शन चक्र है।
 
वरदान:सदा स्नेह और सहयोग द्वारा अविनाशी रत्न का टाइटल प्राप्त करने वाले अमर भव!
जो स्थापना के कार्य में सदा स्नेही और सहयोगी रहते हैं उन्हें अविनाशी रत्न का टाइटल मिल जाता है। ऐसे अविनाशी रत्न जो कभी कोई भी हिला न सके। कोई भी रूकावट रोक न सके। ऐसे अविनाशी रत्न ही अमरभव के वरदानी हैं। रीयल गोल्ड हैं, बाप के साथी हैं। वे बाप के कार्य को अपना समझते हैं। सदा साथ रहते हैं इसलिए अविनाशी बन जाते हैं।
 
स्लोगन:पवित्रता की यथार्थ धारणा है तो हर कर्म यथार्थ और युक्तियुक्त होगा।

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Details ( Page:- Murali 20-Dec-2017 )
HINGLISH SUMMARY - 20.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Ek manmana bhava ke mahamantra se tum samajhdar bante ho,yahi mantra sab paapo se mukt karne wala hai.
Q-Sare gyan ka saar kya hai,manmana bhava rehne walo ki nishaani kya hogi?
A- Sare gyan ka saar hai ki ab humko wapis ghar jana hai.Yah chhi-chhi duniya hai,isko chhod hume apne ghar chalna hai.Agar yah yaad rahe to bhi manmana bhava hua.Manmana bhava rehne wale bacche sada gyan ka bichaar sagar manthan karte rahenge.Woh Baba se mithi-mithi roohrihan karenge.
Q-Kis aadat ke vasibhoot aatma Baap ki yaad me nahi rah sakti?
A-Agar gandey chitra dekhne ki,gandey samachar padhne ki aadat padi to Baap ki yaad rah nahi sakti.Cinema hai doujak ka dwar,jo britiyon ko kharab kar deta hai.
 
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Sukhdata ke hum bacche hain,hume sabko sukh dena hai.Mansa-vacha-karmana kisi ko bhi dukh nahi dena hai.
2)Padhai aur padhane wala dono he wonderful hain.Aisi wonderful padhai ko kabhi bhi miss nahi karna hai.Absent nahi hona hai.
 
Vardan:-Saath rahenge,saath jiyenge,  is vayde ki smriti dwara combined rehne wale Sahajyogi bhava.
Slogan:-Question mark ka tedha rasta lene ke bajaye kalyan ki bindi lagana he kalyankari banna hai.
ENGLISH SUMMARY - 20.01.18     
Sweet children, you become sensible with this one great mantra of “Manmanabhav”. This is the mantra that liberates you from all sins.
 
Question:What is the essence of the entire knowledge? What are the signs of those who remain “Manmanabhav”?
Answer:
The essence of the entire knowledge is that we now have to return home. This world is dirty; we have to renounce it and return to our home. Simply to remember this much is also to be “Manmanabhav”. The children who remain in the stage of “Manmanabhav” constantly churn the ocean of knowledge. They have sweet spiritual conversations with Baba.
 
Question:By coming under the influence of which habit is a soul not able to stay in remembrance of the Father?
 
Answer:
If a soul has the habit of looking at dirty pictures or reading the dirty news, he is unable to stay in remembrance of the Father. The cinema too is a gateway to hell and it spoils your attitude.
 
Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. You are the children of the Bestower of Happiness, and you therefore have to give happiness to everyone. Never cause anyone sorrow through your thoughts, words or deeds.
2. Both the Teacher and the teachings are wonderful. Never be absent or miss such wonderful teachings.
Blessing:May you be an easy yogi who remains combined with the awareness of the promise “We will stay together, we will live together”.
You children have promised, “We will stay together, live together and move along together”. By keeping this promise in your awareness, you can remain combined with the Father for this form is said to be that of an easy yogi. It is not of those who consciously have to have yoga, but of those who are always combined, that is, those who live together. Those who stay together in this way are constant yogis, easy yogis and constantly co-operative yogis who become angels in their flying stage.
Slogan:Instead of taking the crooked path of a question mark, to put the full stop of benefit is to be benevolent.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

20/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे "मीठे बच्चे - एक मनमनाभव के महामंत्र से तुम समझदार बनते हो, यही मंत्र सब पापों से मुक्त करने वाला है"
 
प्रश्न:सारे ज्ञान का सार क्या है, मनमनाभव रहने वालों की निशानी क्या होगी?
 
उत्तर:सारे ज्ञान का सार है कि अब हमको वापिस घर जाना है। यह छी-छी दुनिया है, इसको छोड़ हमें अपने घर चलना है। अगर यह याद रहे तो भी मनमनाभव हुआ। मनमनाभव रहने वाले बच्चे सदा ज्ञान का विचार सागर मंथन करते रहेंगे। वह बाबा से मीठी-मीठी रूहरिहान करेंगे।
 
प्रश्न:किस आदत के वशीभूत आत्मा बाप की याद में नहीं रह सकती?
उत्तर:
अगर गन्दे चित्र देखने की, गन्दे समाचार पढ़ने की आदत पड़ी तो बाप की याद रह नहीं सकती। सिनेमा है दोज़क का द्वार, जो वृत्तियों को खराब कर देता है।
 
ओम् शान्ति।
रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। समझाना उनको होता है, जिसमें कुछ कम समझ है। तुम अभी बहुत समझदार बन चुके हो जो समझते हो कि यह हमारा बेहद का बाप भी है, बेहद की शिक्षा भी देते हैं। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ भी समझाते हैं। स्टूडेण्ट की बुद्धि में नॉलेज होनी चाहिए ना और फिर बाप साथ में भी जरूर ले जायेगा क्योंकि बाप जानते हैं कि यह पुरानी छी-छी दुनिया है। इस पुरानी दुनिया से मैं बच्चों को घर ले जाने लिए आया हूँ। बाबा समझाते हैं यहाँ बैठे बैठे बच्चों के अन्दर में जरूर आता होगा कि ओहो! यह हमारा बेहद का बाप भी है, फिर शिक्षा भी बहुत ऊंची देते हैं। सारी रचना के आदि मध्य अन्त का राज़ भी समझाया है। यह सब याद करना भी मनमनाभव है। यह भी तुम्हारे चार्ट में आ सकता है। यह तो बहुत सहज है। और भल कुछ भी न करो, परन्तु उठते बैठते, चलते फिरते बुद्धि में यह याद रहे। वण्डरफुल चीज़ को याद करना होता है। तुम समझते हो बाबा को याद करने से, पढ़ाई पढ़ने से हम फिर से विश्व का मालिक बनते हैं। यह बुद्धि में चलता रहना चाहिए। भल कहाँ भी बस-ट्रेन आदि में बैठे हो परन्तु बुद्धि में याद हो। पहले-पहले तो बच्चों को बाप चाहिए। तुम जानते हो हम आत्माओं का रूहानी बेहद का बाप है। सहज याद दिलाने लिए बाबा युक्ति बताते हैं। मामेकम् याद करो तो आधाकल्प के जो तुम्हारे विकर्म हैं, वह सब योग अग्नि से भस्म हो जायें। जन्म-जन्मान्तर बहुत ही यज्ञ जप तप आदि किये हैं। भक्ति मार्ग वालों को पता नहीं है कि यह सब क्यों करते हैं। इनसे क्या प्राप्ति होगी। मन्दिरों में जाते हैं इतनी भक्ति करते हैं, समझते हैं यह सब परम्परा से चला आया है। शास्त्रों के लिए भी कहेंगे कि यह परम्परा से चले आये हैं। परन्तु मनुष्यों को पता ही नहीं है कि स्वर्ग में तो शास्त्र होते नहीं। वह समझते हैं सृष्टि के शुरू से ही यह सब चला आता है। न किसको यह कह सकते कि बेहद का बाप कौन है। यहाँ हद का बाप वा हद का टीचर तो नहीं है। हद के टीचर से तो तुम सब पढ़े हुए हो। जो पढ़कर ही नौकरी आदि करते हैं, कमाई करते हैं। तुम बच्चे जानते हो यह जो हमारा बेहद का बाप है, उनका कोई भी बाप है नहीं और यह बेहद का टीचर भी है। इनका कोई टीचर नहीं। इन देवताओं को किसने पढ़ाया, यह तो जरूर याद आना चाहिए ना! यह भी मनमनाभव है। यह पढ़ाई तो कहाँ से पढ़े नहीं हैं। बाप स्वयं ही नॉलेजफुल है। इनको किसने पढ़ाया है क्या? मनुष्य सृष्टि का वह बीजरूप है और चैतन्य है, ज्ञान का सागर है। चैतन्य होने कारण मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ का आदि से अन्त तक राज़ सुनाते हैं। अन्त में आकर आदि का ज्ञान सुनाते हैं और कहते हैं हे बच्चों जिस तन में मैं विराजमान हूँ, इन द्वारा मैं आदि से लेकर इस समय तक सब कुछ सुनाता हूँ। अन्त के लिए तो पीछे समझायेंगे। तुम आगे चलकर समझ जायेंगे कि अब अन्त है क्योंकि उस समय तुम कर्मातीत अवस्था को पहुँच जायेंगे और आसार भी देखेंगे कि इस पुरानी छी-छी दुनिया का विनाश तो होना ही है। यह कोई नई बात नहीं है। अनेक बार देखा है और देखते ही रहेंगे। कल्प पहले राज्य लिया था फिर गँवाया अब फिर ले रहे हैं। बाबा हमको पढ़ाते हैं। तुम समझते हो हम ही विश्व के मालिक थे, फिर 84 जन्म लिये, फिर बाबा विश्व का मालिक बनाने के लिए वही ज्ञान दे रहे हैं। तुम अन्दर में समझते हो बाबा टीचर भी है। अच्छा अगर बाप याद नहीं पड़ता तो टीचर को याद करो। टीचर कब भूलेगा क्या? टीचर से तो पढ़ते रहते हो। हाँ माया ग़फलत कराती है वह तुमको पता नहीं पड़ता है। माया आंखों में एकदम धूल डाल देती है। जो हमको भगवान पढ़ाते हैं, यह एकदम भूल जाते हैं। बाप हर बात की समझानी देते हैं। यह है बेहद की समझानी। वह है हद की। यह बेहद की नॉलेज बाबा कल्प-कल्प तुम बच्चों को देते हैं। अच्छा जास्ती पढ़ नहीं सकते हो तो भला बाबा के रूप से याद करो। उनका तो कोई बाप है नहीं, वह सबका बाप है। परन्तु उनके बच्चे सब हैं। कोई बता सकेगा कि शिवबाबा किसका बच्चा है? वह है बेहद का बाप। बच्चे समझते हैं हम बेहद के बाप के बने हैं। यह हमारी पढ़ाई भी वन्डरफुल है और हम ब्राह्मण ही पढ़ते हैं। देवता वा क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह पढ़ाई नहीं पढ़ सकते। बाप की यह नॉलेज ही बिल्कुल न्यारी है। तुम्हारे सिवाए कोई समझ न सके। तुम बच्चों को खुशी का पारा चढ़ता है कि हम तमोप्रधान से सतोप्रधान बनें। अब ऊंच पद पाने लिए खूब पुरुषार्थ करना है। ऐसे नहीं स्वर्ग में तो सब जायेंगे। अगर ज्ञान और योग की धारणा नहीं होगी तो ऊंच पद नहीं मिलेगा।
 
बाबा कहते हैं 16 कला सम्पूर्ण बनने में याद की बहुत मेहनत है। देखना है किसको दु:ख तो नहीं देते हैं? हम सुखदाता के बच्चे हैं। सबको सुख देना है। मन्सा, वाचा, कर्मणा किसको दु:ख नहीं देना है। इस समय तुम जो पढ़ते हो, गुलगुल बनते हो। यह कमाई ही तुम्हारे साथ चलने वाली है, इसमें कोई किताब आदि पढ़ने की जरूरत ही नहीं। उस पढ़ाई में कितने किताब आदि पढ़ने पड़ते हैं। यह बाबा की नॉलेज सबसे न्यारी है और बड़ी सहज भी है। परन्तु है सब गुप्त। तुम्हारे सिवाए कोई समझ न सके कि यह क्या पढ़ते हैं। वन्डरफुल पढ़ाई है। बाप कहते हैं कभी अबसेन्ट नहीं होना। पढ़ाई कभी नहीं छोड़ना। बाबा के पास सबका रजिस्टर आता है। उनसे ही बाबा समझ जाता है यह 10 मास अबसेन्ट रहा, यह 6 मास रहा। कोई तो चलते-चलते पढ़ाई भी छोड़ देते हैं। यह बहुत वन्डरफुल चीज़ है। ऐसी वन्डरफुल चीज़ और कोई होती ही नहीं। कल्प-कल्प तुम बच्चों को ऐसा बाप आकर मिलता है। तुम बच्चे जानते हो यह साकार बाबा तो पुनर्जन्म में आता है। यह 84 का चक्र खाते हैं ततत्वम्, यह खेल है ना। खेल कभी भूला नहीं जाता है। खेल सदैव याद रहता है।
 
बाबा समझाते हैं एक तो यह दुनिया दोज़क है और इसमें भी खास यह बाइसकोप (सिनेमा) दोज़क है। वहाँ जाने से वृत्तियां बहुत खराब हो जाती हैं। अखबार में भी कोई अच्छे-अच्छे चित्र देखते हैं तो उसमें भी बुद्धि जाती है - यह खूबसूरत है, इनको प्राइज़ मिलनी चाहिए, ख्यालात चलती हैं। ऐसा देखे ही क्यों! बुद्धि से समझते हैं यह सारी दुनिया ही खत्म हो जाने वाली है। तुम सिर्फ मुझे ही याद करो। ऐसी-ऐसी चीजें न देखो, न ख्याल करो। यह तो पुरानी दुनिया के छी-छी (गन्दे) शरीर हैं, इनके तरफ क्या देखना है। एक बाप को ही देखना है। बाबा कहते हैं मीठे-मीठे बच्चे मंजिल बहुत ऊंची है। माया कोई कम नहीं है। माया का देखो कितना भभका है। उस तरफ है साइन्स और यहाँ है तुम्हारी साइलेन्स। वो लोग चाहते हैं मुक्ति को पायें। यहाँ तुम्हारी एम आबजेक्ट है जीवनमुक्ति को पाने की। जीवनमुक्ति पाने का कोई रास्ता बता न सके। सन्यासी आदि कोई भी यह नॉलेज दे न सके। वो किसको समझा नहीं सकते कि गृहस्थ व्यवहार में रहकर पवित्र बनना है। यह एक ही बाप समझाते हैं। भक्ति मार्ग में टाइम वेस्ट ही होता आया है। कितनी भूलें होती हैं। भूल करते-करते भोले ही बन गये हैं। यह लास्ट जन्म 100 परसेन्ट भूलों का ही है। जरा भी बुद्धि काम नहीं करती। अब बाबा तुमको समझाते हैं, तब तुम समझते हो। अभी तुम सब समझ गये हो तो औरों को भी समझाते हो। खुशी का पारा भी तुम्हें चढ़ता है। वन्डर है ना - इस बाप को कोई बाप नहीं, कोई शिक्षक नहीं। तब सीखा कहाँ से! मनुष्य वन्डर खायेंगे। बहुत समझते हैं इनका जरूर कोई गुरू होगा। अगर यह भी गुरू से सीखा हुआ हो फिर गुरू के और भी शिष्य होने चाहिए। सिर्फ यह एक शिष्य थोड़ेही होगा। गुरू के तो बहुत शिष्य होते हैं। आगाखां के देखो कितने शिष्य हैं। उन्हों को गुरू के लिए देखो कितना रिगार्ड रहता है। उनको हीरों में वज़न करते हैं। तुम किसमें वज़न करेंगे? यह तो सबसे सुप्रीम है। इनका वजन कितना होगा? तुम क्या करेंगे! वज़न करें तो कितना होगा? कोई चीज़ पड़ सकती है? शिवबाबा तो बिन्दी है ना। आजकल वज़न बहुत करते हैं। कोई सोने में, कोई चांदी में, प्लैटिनम में भी करते हैं। वह सोने से भी महंगा होता है। अब बाप समझाते हैं वह जिस्मानी गुरू तो तुम्हें सद्गति देते नहीं। सद्गति में ले जाने वाला तो एक ही बाप है, उनको किसमें वज़न करेंगे? मनुष्य तो सिर्फ भगवान-भगवान ही कहते रहते हैं। लेकिन यह नहीं जानते कि वह बाप है, टीचर भी है। बैठे कितना साधारण हैं। बच्चों का मुखड़ा देखने के लिए थोड़ा सा ऊपर बैठते हैं। मददगार बच्चों के बिगर हम स्थापना कैसे कर सकते हैं। जो जास्ती मदद करते हैं उनको जरूर बाबा लव करेंगे। लौकिक में भी एक बच्चा 2000 कमाता, दूसरा 1000 कमाता होगा। तो बाप का लव किस पर रहेगा? परन्तु आजकल तो बच्चे पूछते ही बाप को कहाँ हैं? बेहद का बाप भी देखते हैं फलाने-फलाने बच्चे बहुत अच्छे मददगार हैं। बच्चों को देख-देख बाबा हर्षित होते हैं। आत्मा खुश होती है। कल्प-कल्प मैं आता हूँ और बच्चों को देख बहुत खुश होता हूँ। जानता हूँ कल्प-कल्प यह हमारे मददगार बनते हैं। यह बाबा का प्यार कल्प-कल्प का बन जाता है। कहाँ भी बैठे हो बुद्धि में यह सोचो बाबा हमारा बाप भी है, टीचर भी है, गुरू भी है। स्वयं ही सब कुछ है। तब तो सब उनको ही याद करते हैं। सतयुग में कोई याद नहीं करेंगे क्योंकि 21 जन्मों के लिए बाप बेड़ा पार कर देते हैं। ऐसे-ऐसे सिमरण कर बच्चों को हर्षित होना चाहिए। खुशी होनी चाहिए कि हम ऐसे बाप की सर्विस करें। बाप का सबको परिचय दें। यह बेहद का बाप है। बाप ही स्वर्ग की स्थापना करते हैं। बाप ही हम सबको साथ भी ले जाते हैं। ऐसी-ऐसी समझानी से सर्वव्यापी कह नहीं सकेंगे। बाप ने कहा है विनाश काले विपरीत बुद्धि विनशन्ति। वह सब खत्म हो जायेंगे, बाकी तुम विजय पायेंगे। तुम राजधानी स्थापन कर रहे हो। आत्माओं का बाप आत्माओं को बैठ समझाते हैं। तो ऐसी-ऐसी वन्डरफुल बातें सबको सुनानी चाहिए। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) सुखदाता के हम बच्चे हैं, हमें सबको सुख देना है। मन्सा-वाचा-कर्मणा किसी को भी दु:ख नहीं देना है।
2) पढ़ाई और पढ़ाने वाला दोनों ही वन्डरफुल हैं। ऐसी वन्डरफुल पढ़ाई को कभी भी मिस नहीं करना है। अबसेन्ट नहीं होना है।
 
वरदान:साथ रहेंगे, साथ जियेंगे.... इस वायदे की स्मृति द्वारा कम्बाइन्ड रहने वाले सहजयोगी भव!
 
आप बच्चों का वायदा है कि साथ रहेंगे, साथ जियेंगे, साथ चलेंगे... इस वायदे को स्मृति में रख बाप और आप कम्बाइन्ड रूप में रहो तो इस स्वरूप को ही सहजयोगी कहा जाता है। योग लगाने वाले नहीं लेकिन सदा कम्बाइन्ड अर्थात् साथ रहने वाले। ऐसे साथ रहने वाले ही निरन्तर योगी, सदा सहयोगी, उड़ती कला में जाने वाले फरिश्ता स्वरूप बनते हैं।
स्लोगन:क्वेश्चन मार्क का टेढ़ा रास्ता लेने के बजाए कल्याण की बिन्दी लगाना ही कल्याणकारी बनना है।

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Details ( Page:- Murali 21-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 21.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Sangamyugi maryadaon par chalna hi purusattam banna hai.
Vardan- Karavanhar ki smruti dwara bade se bade karya ko sahaj karnewale nimitt karanhar bhav,
Slogan – Gyani tu atma wah hai jo arji dalne ke vajaye sada raji rahe.
 
ENGLISH SUMMARY - 21.01.18     
Headline - To follow the codes of conduct of the confluence age is to become a most elevated being.
Blessing:May you be an instrument, one who acts, and make the biggest of all tasks easy with the awareness of Karavanhar (One who inspires).
BapDada Himself becomes Karavanhar and carries out the biggest task of establishment through you instrument karanhar children. The Father and the children are combined in the term “Karankaravanhar”. It is the children’s hands and the Father’s task. It is only you children who have received the golden chance to extend your hands. However, the experience you have is that the One who is inspiring you makes you into instruments and enables you to do everything. In every action, He is your Companion as Karavanhar.
 
Slogan:A gyani soul is one who remains constantly happy instead of making requests.
HINDI DETAIL MURALI

21/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन ( 21 -04-18 )

संगमयुगी मर्यादाओं पर चलना ही पुरूषोत्तम बनना है
 
आज बापदादा सर्व मर्यादा पुरूषोत्तम बच्चों को देख रहे हैं। संगमयुग की मर्यादायें ही पुरूषोत्तम बनाती हैं इसलिए मर्यादा पुरूषोत्तम कहा जाता है। इन तमोगुणी मनुष्य आत्माओं और तमोगुणी प्रकृति के वायुमण्डल, वायब्रेशन से बचने का सहज साधन - यह मर्यादायें हैं। मर्यादाओं के अन्दर रहने वाले सदा मेहनत से बचे हुए हैं। मेहनत तब करनी पड़ती है जब मर्यादाओं की लकीर से संकल्प, बोल वा कर्म से बाहर निकल आते हैं। मर्यादायें हर कदम के लिए बापदादा द्वारा मिली हुई हैं - उसी प्रमाण पर कदम उठाने से स्वत: ही मर्यादा पुरुषोत्तम बन जाते हैं। अमृतवेले से लेकर रात तक मर्यादापूर्वक जीवन को अच्छी तरह से जानते हो! उसी प्रमाण चलना - यही पुरूषोत्तम बनना है। जब नाम ही पुरूषोत्तम है अर्थात् सर्व साधारण पुरूषों से उत्तम। तो चेक करो कि हम श्रेष्ठ आत्माओं की पहली मुख्य बात स्मृति उत्तम है? स्मृति उत्तम है तो वृत्ति और दृष्टि, स्थिति स्वत: ही श्रेष्ठ है। स्मृति के मर्यादा की लकीर जानते हो? मैं भी श्रेष्ठ आत्मा और सर्व भी एक श्रेष्ठ बाप की आत्मायें हैं! वैरायटी आत्मायें वैरायटी पार्ट बजाने वाली हैं। यह पहला पाठ नैचुरल रूप में स्मृति स्वरूप में रहे। देह को देखते भी आत्मा को देखें। यह समर्थ स्मृति हर सेकण्ड स्वरूप में आये, स्मृति स्वरूप हो जाएं। सिर्फ सिमरण में न हो कि मैं भी आत्मा, यह भी आत्मा। लेकिन मैं भी हूँ ही आत्मा, यह भी है ही आत्मा। इस पहली स्मृति की मर्यादा स्वयं को सदा निर्विघ्न बनाती और औरों को भी इस श्रेष्ठ स्मृति के समर्थ पन के वायब्रेशन फैलाने के निमित्त बन जाते हैं, जिससे और भी निर्विघ्न बन जाते हैं।
 
 
 
पाण्डव सेना मिलन मनाने तो आई लेकिन मिलन के साथ-साथ पहली मर्यादा के लकीर का फाउन्डेशन ‘स्मृति भव' का वरदान भी सदा साथ ले जाना। ‘स्मृति भव' ही समर्थ भव है। जो भी कुछ सुना उसका इसेन्स क्या ले जायेंगे? इसेन्स है ''स्मृति भव''। इसी वरदान को सदा अमृतवेले रिवाइज करना। हर कार्य करने के पहले इस वरदान के समर्थ स्थिति के आसन पर बैठ निर्णय कर व्यर्थ है वा समर्थ है, फिर कर्म में आना। कर्म करने के बाद फिर से चेक करो कि कर्म का आदिकाल और अन्तकाल तक समर्थ रहा? नहीं तो कई बच्चे कर्म के आदिकाल समय समर्थ स्वरूप से शुरू करते लेकिन मध्य में समर्थ के बीच व्यर्थ वा साधारण कर्म कैसे हो गया, समर्थ के बजाए व्यर्थ की लाइन में कैसे और किस समय गये, यह मालूम नहीं पड़ता। फिर अन्त में सोचते हैं कि जैसे करना था वैसे नहीं किया। लेकिन रिज़ल्ट क्या हुई! करके फिर सोचना यह त्रिकालदर्शी आत्माओं के लक्षण नहीं हैं इसलिए तीनों कालों में स्मृति भव वा समर्थ भव। समझा क्या ले जाना है। समर्थ स्थिति के आसन को कभी छोड़ना नहीं। यह आसन ही हंस आसन है। हंस की विशेषता, निर्णय शक्ति की विशेषता है। निर्णय शक्ति द्वारा सदा ही मर्यादा पुरूषोत्तम स्थिति में आगे बढ़ते जायेंगे। यह वरदान ‘आसन' और यह ईश्वरीय टाइटिल ‘मर्यादा पुरूषोत्तम' का सदा साथ रहे। अच्छा - आज तो सिर्फ बधाई देने का दिन है। सेवा पर जा रहे हैं तो बधाई का दिन है ना! लौकिक घर नहीं लेकिन सेवा स्थान पर जा रहे हैं। बगुलों के बीच भी जा रहे हो लेकिन सेवा अर्थ जा रहे हो। कर्म सम्बन्ध नहीं समझ के जाना लेकिन सेवा का सम्बन्ध है। कर्म सम्बन्ध चुक्तु करने नहीं बैठे हो लेकिन सेवा का सम्बन्ध निभाने के लिए बैठे हो। कर्मबन्धन नहीं, सेवा का बन्धन है। अच्छा -
सदा व्यर्थ को समाप्त कर समर्थ स्थिति के हंस आसन पर स्थिति रहने वाले, हर कर्म को त्रिकालदर्शी शक्ति से, तीनों काल समर्थ बनाने वाले, सदा स्वत: आत्मिक स्थिति में स्थित रहने वाले ऐसे मर्यादा पुरूषोत्तम श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
 
पार्टियों के साथ अव्यक्त बापदादा की मुलाकात
 
1- सदा अपने को श्रेष्ठ भाग्यवान अनुभव करते हो? जिसका बाप ही भाग्य विधाता हो वह कितना न भाग्यवान होगा! भाग्यविधाता बाप है तो वह वर्से में क्या देगा? जरूर श्रेष्ठ भाग्य ही देगा ना! सदा भाग्यविधाता बाप और भाग्य दोनों ही याद रहें। जब अपना श्रेष्ठ भाग्य स्मृति में रहेगा तब औरों को भी भाग्यवान बनाने का उमंग-उत्साह रहेगा क्योंकि दाता के बच्चे हो। भाग्य विधाता बाप ने ब्रह्मा द्वारा भाग्य बांटा, तो आप ब्राह्मण भी क्या करेंगे? जो ब्रह्मा का काम, वह ब्राह्मणों का काम। तो ऐसे भाग्य बांटने वाले। वे लोग कपड़ा बांटेंगे, अनाज बाटेंगे, पानी बाटेंगे लेकिन श्रेष्ठ भाग्य तो भाग्य विधाता के बच्चे ही बाँट सकते। तो भाग्य बांटने वाली श्रेष्ठ भाग्यवान आत्मायें हो। जिसे भाग्य प्राप्त है उसे सब कुछ प्राप्त है। वैसे अगर आज किसी को कपड़ा देंगे तो कल अनाज की कमी पड़ जायेगी, कल अनाज देंगे तो पानी की कमी पड़ जायेगी। एक-एक चीज़ कहाँ तक बांटेंगे। उससे तृप्त नहीं हो सकते। लेकिन अगर भाग्य बांटा तो जहाँ भाग्य है वहाँ सब कुछ है। वैसे भी कोई को कुछ प्राप्त हो जाता है तो कहते हैं वाह मेरा भाग्य! जहाँ भाग्य है वहाँ सब प्राप्त है। तो आप सब श्रेष्ठ भाग्य का दान करने वाले हो। ऐसे श्रेष्ठ महादानी, श्रेष्ठ भाग्यवान। यही स्मृति सदा उड़ती कला में ले जायेगी। जहाँ श्रेष्ठ भाग्य की स्मृति होगी वहाँ सर्व प्राप्ति की स्मृति होगी। इस भाग्य बांटने में फ्राकदिल बनो। यह अखुट है। जब थोड़ी चीज़ होती है तो उसमें कन्जूसी की भावना आ सकती लेकिन यह अखुट है इसलिए बांटते जाओ। सदा देते रहो, एक दिन भी दान देने के सिवाए न हो। सदा के दानी सारा समय अपना खजाना खुला रखते हैं। एक घण्टा भी दान बन्द नहीं करते। ब्राह्मणों का काम ही है सदा विद्या लेना और विद्या का दान करना। तो इसी कार्य में सदा तत्पर रहो।
2- सदा अपने को संगमयुगी हीरे तुल्य आत्मायें अनुभव करते हो? आप सभी सच्चे हीरे हो ना! हीरे की बहुत वैल्यु होती है। आपके ब्राह्मण जीवन की कितनी वैल्यु है! इसीलिये ब्राह्मणों को सदा चोटी पर दिखाते हैं। चोटी अर्थात् ऊंचा स्थान। वैसे ऊंचे हैं देवता लेकिन देवताओं से भी ऊंचे तुम ब्राह्मण हो - ऐसा नशा रहता है? मैं बाप का, बाप मेरा - यही ज्ञान है ना! यही एक बात याद रखनी है। सदा मन में यही गीत चलता रहे ''जो पाना था वह पा लिया।'' मुख का गीत तो एक घण्टा भी गायेंगे तो थक जायेंगे; लेकिन यह गीत गाने में थकावट नहीं होती। बाप का बनने से सब कुछ बन जाते हो, डांस करने वाले भी, गीत गाने वाले भी, चित्रकार भी, प्रैक्टिकल अपना फरिश्ते का चित्र बना रहे हो। बुद्धियोग द्वारा कितना अच्छा चित्र बना लेते हो। तो जो कहो वह सब कुछ हो। बड़े ते बड़े बिज़नेसमैन भी हो, मिलों के मालिक भी हो, तो सदा अपने इस आक्यूपेशन को स्मृति में रखो। कभी खान के मालिक बन जाओ तो कभी आर्टिस्ट बन जाओ, कभी डांस करने वाले बन जाओ... बहुत रमणीक ज्ञान है, सूखा नहीं है। कई कहते हैं क्या रोज़ वही आत्मा, परमात्मा का ज्ञान सुनते रहें, लेकिन यह आत्मा परमात्मा का सूखा ज्ञान नहीं है। बहुत रमणीक ज्ञान है, सिर्फ रोज़ अपना नया-नया टाइटिल याद रखो - मैं आत्मा तो हूँ लेकिन कौन सी आत्मा हूँ? कभी आर्टिस्ट की आत्मा हूँ, कभी बिजनेसमैन की आत्मा हूँ... तो ऐसे रमणीकता से आगे बढ़ते रहो। बाप भी रमणीक है ना। देखो, कभी धोबी बन जाता तो कभी विश्व का रचयिता, कभी ओबीडियन्ट सर्वेन्ट... तो जैसा बाप वैसे बच्चे... ऐसे ही इस रमणीक ज्ञान का सिमरण कर हर्षित रहो।
 
वर्तमान समय के प्रमाण स्वयं और सेवा दोनों की रफ्तार का बैलेन्स चाहिए। हरेक को सोचना चाहिए जितनी सेवा ली है उतना रिटर्न दे रहे हैं! अभी समय है सेवा करने का। जितना आगे बढ़ेंगे, सेवा के योग्य समय होता जायेगा लेकिन उस समय परिस्थितियाँ भी अनेक होंगी। उन परिस्थितियों में सेवा करने के लिए अभी से ही सेवा का अभ्यास चाहिए। उस समय आना जाना भी मुश्किल होगा। मन्सा द्वारा ही आगे बढ़ाने की सेवा करनी पड़ेगी। वह देने का समय होगा, स्वयं में भरने का नहीं इसलिए पहले से ही अपना स्टाक चेक करो कि सर्वशक्तियों का स्टाक भर लिया है? सर्वशक्तियाँ, सर्वगुण सर्व ज्ञान के खजाने, याद की शक्ति से सदा भरपूर। किसी भी चीज़ की कमी नहीं चाहिए।
 
 
 
28 तारीख अमृतवेले बापदादा ने सतगुरूवार की मुबारक दी:- वृक्षपति दिवस की मुबारक। वृक्षपति दिवस पर सदाकाल के लिए बृहस्पति की दशा कायम रहे, यही सदा स्मृति स्वरूप रहना। अब तो सभी ने वायदा पक्का किया है ना! कुमार ग्रुप तैयार हो गया तो आवाज बुलन्द फैल जायेगा। गवर्मेन्ट तक पहुँच जायेगा। लेकिन अविनाशी रहेंगे तो, गड़बड़ नहीं करना। उमंग-उत्साह, हिम्मत अच्छी है, जहाँ हिम्मत है वहाँ मदद तो है ही। शक्तियाँ क्या सोच रही हैं? शक्तियों के बिना तो शिव भी नहीं है। शिव नहीं तो शक्तियाँ नहीं, शक्तियाँ नहीं तो शिव भी नहीं। बाप भी भुजाओं के बिना क्या कर सकता! तो पहली भुजायें कौन? वाह रे मैं! अच्छा।
 
परमात्म प्यार में सदा लवलीन रहो (अव्यक्त महावाक्य - पर्सनल)
 
परमात्म-प्यार के अनुभवी बनो तो इसी अनुभव से सहजयोगी बन उड़ते रहेंगे। परमात्म-प्यार उड़ाने का साधन है। उड़ने वाले कभी धरनी की आकर्षण में आ नहीं सकते। माया का कितना भी आकर्षित रूप हो लेकिन वह आकर्षण उड़ती कला वालों के पास पहुँच नहीं सकती। यह परमात्म प्यार की डोर दूर-दूर से खींच कर ले आती है। यह ऐसा सुखदाई प्यार है जो इस प्यार में एक सेकण्ड भी खो जाते हैं उनके अनेक दु:ख भूल जाते हैं और सदा के लिए सुख के झूले में झूलने लगते हैं। जीवन में जो चाहिए अगर वह कोई दे देता है तो यही प्यार की निशानी होती है। तो बाप का आप बच्चों से इतना प्यार है जो जीवन के सुख-शान्ति की सब कामनायें पूर्ण कर देते हैं। बाप सुख ही नहीं देते लेकिन सुख के भण्डार का मालिक बना देते हैं। साथ-साथ श्रेष्ठ भाग्य की लकीर खींचने का कलम भी देते हैं, जितना चाहे उतना भाग्य बना सकते हो - यही परमात्म प्यार है। जो बच्चे परमात्म प्यार में सदा लवलीन, खोये हुए रहते हैं उनकी झलक और फ़लक, अनुभूति की किरणें इतनी शक्तिशाली होती हैं जो कोई भी समस्या समीप आना तो दूर लेकिन आंख उठाकर भी नहीं देख सकती। उन्हें कभी भी किसी भी प्रकार की मेहनत हो नहीं सकती । बाप का बच्चों से इतना प्यार है जो अमृतवेले से ही बच्चों की पालना करते हैं। दिन का आरम्भ ही कितना श्रेष्ठ होता है! स्वयं भगवन मिलन मनाने के लिये बुलाते हैं, रुहरिहान करते हैं, शक्तियाँ भरते हैं! बाप की मोहब्बत के गीत आपको उठाते हैं। कितना स्नेह से बुलाते हैं, उठाते हैं - मीठे बच्चे, प्यारे बच्चे, आओ.....। तो इस प्यार की पालना का प्रैक्टिकल स्वरूप है ‘सहज योगी जीवन'। जिससे प्यार होता है, उसको जो अच्छा लगता है वही किया जाता है। तो बाप को बच्चों का अपसेट होना अच्छा नहीं लगता इसलिए कभी भी यह नहीं कहो कि क्या करें, बात ही ऐसी थी इसलिए अपसेट हो गये... अगर बात अपसेट की आती भी है तो आप अपसेट स्थिति में नहीं आओ। बापदादा का बच्चों से इतना प्यार है जो समझते हैं हर एक बच्चा मेरे से भी आगे हो। दुनिया में भी जिससे ज्यादा प्यार होता है उसे अपने से भी आगे बढ़ाते हैं। यही प्यार की निशानी है। तो बापदादा भी कहते हैं मेरे बच्चों में अब कोई भी कमी नहीं रहे, सब सम्पूर्ण, सम्पन्न और समान बन जायें।
 
 
 
परमात्म प्यार आनंदमय झूला है, इस सुखदाई झूले में झूलते सदा परमात्म प्यार में लवलीन रहो तो कभी कोई परिस्थिति वा माया की हलचल आ नहीं सकती। परमात्म-प्यार अखुट है, अटल है, इतना है जो सर्व को प्राप्त हो सकता है। लेकिन परमात्म-प्यार प्राप्त करने की विधि है-न्यारा बनना। जो जितना न्यारा है उतना वह परमात्म प्यार का अधिकारी है। परमात्म प्यार में समाई हुई आत्मायें कभी भी हद के प्रभाव में नहीं आ सकती, सदा बेहद की प्राप्तियों में मगन रहती हैं। उनसे सदा रूहानियत की खुशबू आती है। प्यार की निशानी है-जिससे प्यार होता है उस पर सब न्यौछावर कर देते हैं। बाप का बच्चों से इतना प्यार है जो रोज़ प्यार का रेसपान्ड देने के लिए इतना बड़ा पत्र लिखते हैं। यादप्यार देते हैं और साथी बन सदा साथ निभाते हैं। तो इस प्यार में अपनी सब कमजोरियां कुर्बान कर दो। बच्चों से बाप का प्यार है इसलिए सदा कहते हैं बच्चे जो हो, जैसे हो-मेरे हो। ऐसे आप भी सदा प्यार में लवलीन रहो दिल से कहो बाबा जो हो वह सब आप ही हो। कभी असत्य के राज्य के प्रभाव में नहीं आओ। जो प्यारा होता है उसे याद किया नहीं जाता, उसकी याद स्वत: आती है। सिर्फ प्यार दिल का हो, सच्चा और नि:स्वार्थ हो। जब कहते हो मेरा बाबा, प्यारा बाबा-तो प्यारे को कभी भूल नहीं सकते। और नि:स्वार्थ प्यार सिवाए बाप के किसी आत्मा से मिल नहीं सकता इसलिए कभी मतलब से याद नहीं करो, नि:स्वार्थ प्यार में लवलीन रहो।
 
 
 
आदिकाल, अमृतवेले अपने दिल में परमात्म प्यार को सम्पूर्ण रूप से धारण कर लो। अगर दिल में परमात्म प्यार, परमात्म शक्तियाँ, परमात्म ज्ञान फुल होगा तो कभी और किसी भी तरफ लगाव या स्नेह जा नहीं सकता। ये परमात्म प्यार इस एक जन्म में ही प्राप्त होता है। 83 जन्म देव आत्मायें वा साधारण आत्माओं द्वारा प्यार मिला, अभी ही परमात्म प्यार मिलता है। वह आत्म प्यार राज्य-भाग्य गँवाता है और परमात्म प्यार राज्य-भाग्य दिलाता है। तो इस प्यार के अनुभूतियों में समाये रहो। बाप से सच्चा प्यार है तो प्यार की निशानी है-समान, कर्मातीत बनो। ‘करावनहार' होकर कर्म करो, कराओ। कर्मेन्द्रियां आपसे नहीं करावें लेकिन आप कर्मेन्द्रियों से कराओ। कभी भी मन-बुद्धि वा संस्कारों के वश होकर कोई भी कर्म नहीं करो। अच्छा!
वरदान:करावनहार की स्मृति द्वारा बड़े से बड़े कार्य को सहज करने वाले निमित्त करनहार भव
बापदादा स्थापना का बड़े से बड़ा कार्य स्वयं करावनहार बन निमित्त करनहार बच्चों द्वारा करा रहे हैं। करन-करावनहार इस शब्द में बाप और बच्चे दोनों कम्बाइन्ड हैं। हाथ बच्चों का और काम बाप का। हाथ बढ़ाने का गोल्डन चांस बच्चों को ही मिला है। लेकिन अनुभव यहीं करते हो कि कराने वाला करा रहा है, निमित्त बनाए चला रहा है। हर कर्म में करावनहार के रूप में साथी है।
स्लोगन:ज्ञानी तू आत्मा वह है जो अर्जी डालने के बजाए सदा राज़ी रहे।

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Details ( Page:- Murali 22-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 22.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Tum Ishwariya santan ho,tumhara yah amulya jeevan hai,tumhara Ishwariya kul bahut he shrest hai.Swayang Bhagwan ne tumhe adopt kiya hai,isi nashe me raho.
 
Q- Sarir ka bhaan toot jaye-uske liye kis abhyas ki absyakta hai?
A-Chalte firte abhyas karo ki is sarir me hum thode time ke liye nimitt matra hain.Jaise Baap thode samay ke liye sarir me aaye hain aise hum aatma ne bhi Shrimat par Bharat ko Swarg banane ke liye yah sarir dharan kiya hai.Baap aur varsha yaad rahe to sarir ka bhaan toot jayega,isko he kaha jata hai second me jeevanmukti.2-Amritvele ooth Baap se mithi-mithi baatein akro to sarir ka bhaan khatam hota jayega.
 
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Sada is nashe me rehna hai ki hum Baap ke saath Swarg ki sthapana ke nimitt hain.Baap hume Biswa ka mallik banate hain._
2)Baap samaan sukh dene wala banna hai.Kabhi kisi ko dukhi nahi karna hai.Sabko sachcha rashta batana hai.Apni unnati ke liye apna chart rakhna hai.
 
Vardan:-Har karm ka bojh Baap par chhod swayang trusty ban rehne wale Double light Farishta bhava.
Slogan:-Umang-utsah ke pankh saath ho to udti kala me udte rahenge.
 
ENGLISH SUMMARY - 22.01.18     
Sweet children, you are God’s children and this is your invaluable life. Your Godly clan is the most elevated. Maintain the intoxication that God Himself has adopted you.
Question:What do you need to practise in order to break the consciousness of the body?
Answer:
1.While walking or moving around, practise being aware that you are in your present body for this short time in name only. Just as the Father has entered a body for a short time, in the same way, we souls have also adopted these bodies in order to make Bharat into heaven by following shrimat. Remember the Father and the inheritance and the consciousness of the body will then break. This is called liberation-in-life in a second.
2. Wake up at amrit vela and have a sweet conversation with the Father and the consciousness of the body will end.
Song:Salutations to Shiva.  Om Shanti
Essence for Dharna:
1. Constantly stay in the intoxication of being the instruments who establish heaven with the Father. The Father makes you into the masters of the world.
2. Become those who give happiness like the Father. You must not cause anyone sorrow. Show everyone the true path. In order to experience self-progress, keep a chart for yourself.
 
Blessing:May you live as a trustee and leave all the burdens of every action to the Father and become a double-light angel.
BapDada always helps the children who remain courageous. When you children have elevated thoughts, the Father becomes present. Simply leave everything to the Father and then the Father knows what His task is. Do not take the burden of the responsibilities upon yourself. Be a trustee and you will remain constantly light; a double-light angel who continues to fly. When your heart is clean, all your desires are fulfilled.
Slogan:When you have the wings of zeal and enthusiasm with you, you will continue to fly in the flying stage.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

22/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे मीठे बच्चे - तुम ईश्वरीय सन्तान हो, तुम्हारा यह अमूल्य जीवन है, तुम्हारा ईश्वरीय कुल बहुत ही श्रेष्ठ है। स्वयं भगवान ने तुम्हें एडाप्ट किया है, इसी नशे में रहो
 
प्रश्न:शरीर का भान टूट जाए - उसके लिए किस अभ्यास की आवश्यकता है?
उत्तर:चलते फिरते अभ्यास करो कि इस शरीर में हम थोड़े टाइम के लिए निमित्त मात्र हैं। जैसे बाप थोड़े समय के लिए शरीर में आये हैं ऐसे हम आत्मा ने भी श्रीमत पर भारत को स्वर्ग बनाने के लिए यह शरीर धारण किया है। बाप और वर्सा याद रहे तो शरीर का भान टूट जायेगा, इसको ही कहा जाता है सेकण्ड में जीवनमुक्ति। 2- अमृतवेले उठ बाप से मीठी-मीठी बातें करो तो शरीर का भान खत्म होता जायेगा।
 
गीत:ओम् नमो शिवाए...   ओम् शान्ति।
 
भगवान होता ही है एक जो बाप भी है, बच्चों को समझाया गया है - आत्मा का रूप कोई इतना बड़ा लिंग नहीं है। आत्मा तो बहुत छोटी स्टार मिसल भ्रकुटी के बीच में है। कोई इतना बड़ा ज्योर्तिलिंगम् नहीं है, जैसे मन्दिरों में रखा हुआ है। नहीं। जैसे आत्मा वैसे परमात्मा बाप है। आत्मा का रूप मनुष्य जैसा नहीं है। आत्मा तो मनुष्य तन का आधार लेने वाली है। आत्मा ही सब कुछ करती है। संस्कार सब आत्मा में हैं। आत्मा स्टार है। आत्मा ही अच्छे वा बुरे संस्कारों अनुसार जन्म लेती है। तो इन बातों को अच्छी रीति समझना है। मन्दिरों में लिंग रखा हुआ है इसलिए समझाने के लिए हम भी शिवलिंग दिखाते हैं। इसका नाम शिव है, बिगर नाम के कोई चीज होती नहीं। कुछ कुछ आकार है। बाप है परमधाम में रहने वाला। परमात्मा बाप कहते हैं जैसे आत्मा शरीर में आती है वैसे मुझे भी आना पड़ता है, नर्क को स्वर्ग बनाने। बाप की महिमा सबसे न्यारी है। अभी तुम बच्चे जानते हो, तुम आत्मायें आई हो यहाँ पार्ट बजाने। यह बेहद का अनादि अविनाशी ड्रामा है, इनका कभी विनाश नहीं होता। यह फिरता ही रहता है। बाप रचता भी एक है, रचना भी एक है। यह बेहद सृष्टि का चक्र है। 4 युग हैं। दूसरा है कल्प का संगमयुग, जिसमें ही बाप आकर पतित दुनिया को पावन बनाते हैं। यह चक्र फिरता रहता है। तुम बच्चों को अब स्मृति आई है कि हम सब आत्मायें परमधाम में रहने वाली हैं। इस कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजाने आई हैं। इस बेहद के ड्रामा को रिपीट होना है। बाप है बेहद का मालिक। उस बाप की अपरमअपार महिमा है। ऐसी महिमा और कोई की नहीं है। वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। सबका फादर है। बाप कहते हैं मैं पराई रावण की दुनिया में आता हूँ। एक तरफ है आसुरी गुणों वाली सम्प्रदाय। दूसरी तरफ है दैवीगुणों वाली सम्प्रदाय, इनको कंसपुरी भी कहते हैं। कंस असुर को कहा जाता है। कृष्ण को देवता कहा जाता है। अब बाप आये हैं देवता बनाने और सबको वापिस ले जाने, और कोई की ताकत नहीं। बाप ही बैठ बच्चों को शिक्षा दे दैवी गुण धारण कराते हैं। यह बाप की ही फर्जअदाई है। बाप कहते हैं जब सभी तमोप्रधान हो जाते हैं, मुझे भूल जाते हैं, सिर्फ भूल जाते हैं परन्तु मुझे पत्थर ठिक्कर में ठोक देते हैं, इतनी ग्लानी कर देते हैं तब तो मैं आता हूँ। मेरे जैसी ग्लानी किसकी नहीं करते, तब तो मैं आकर तुम्हारा लिबरेटर बनता हूँ। सबको मच्छरों सदृश्य ले जाऊंगा। और कोई ऐसे कह सके कि मनमनाभव। मुझ अपने परमपिता परमात्मा को याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। कृष्ण तो कह सके। परमात्मा की महिमा तो बच्चे जानते हैं। वह ज्ञान का सागर, सुख का सागर है। फिर सेकण्ड नम्बर में है ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। ब्रह्मा द्वारा स्थापना कौन करेगा? क्या श्रीकृष्ण? परमपिता परमात्मा शिव बैठ समझाते हैं कि पहले-पहले हमको चाहिए ब्राह्मण। तो ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण मुख वंशावली रचता हूँ। वह हैं कुख वंशावली। तुम अब संगम में ब्रह्मा की सन्तान हो। बाप आकर शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। अभी तुम हो ईश्वरीय कुल के। ईश्वर हुआ निराकार, ब्रह्मा हुआ साकार। बाप पहले-पहले ब्राह्मण फिर देवता बनाते हैं। देवता के बाद क्षत्रिय...यह चक्र फिरता रहता है। फिर इनसे और धर्म निकले हैं। मूल है भारत, यह भारत अविनाशी खण्ड है, जहाँ बाप आकर स्वर्ग बनाते हैं। वह बाप भी है, टीचर भी है, तुम्हारा सतगुरू भी है। उनको फिर सर्वव्यापी कैसे कह सकते। वह तो तुम्हारा बाप है। इस दुनिया में सिवाए तुम ब्राह्मणों के कोई त्रिकालदर्शी हो नहीं सकता। तुम बच्चे समझते हो परमपिता परमात्मा के साथ हम परमधाम के रहने वाले हैं। फिर नम्बरवार कर्मक्षेत्र पर आते हैं। फिर पिछाड़ी में हम ही जाते हैं। 84 जन्म पूरे लेने हैं।
 
बाप समझाते हैं - तुमने कितने जन्म लिए और कैसे वर्णो में आये। यह चक्र चलता रहता है। अभी तुम हो ईश्वरीय सम्प्रदाय, यह तुम्हारा अमूल्य जीवन है जबकि तुम ईश्वरीय सन्तान बने हो। ब्रह्मा द्वारा बाप आकर एडाप्ट करते हैं। बाप है स्वर्ग का रचयिता तो खुद ही आकर स्वर्ग का मालिक भी बनाते हैं। अब सारे विश्व में शान्ति स्थापना करना - यह बाप का ही काम है। बाप कहते हैं मेरा पार्ट है, मैं तुमको फिर से राजयोग सिखलाता हूँ, जिससे तुम एवरहेल्दी बनेंगे। जैसे देवता बने थे, फिर अब रिपीट होता है। यह सैपलिंग लग रहा है। बाप बागवान है, इन द्वारा कलम लगा रहे हैं। बाप सम्मुख बैठ समझाते हैं - मेरे सिकीलधे बच्चे, बहुत समय से बिछुड़े हुए बच्चे, याद है ना - मैंने तुमको स्वर्ग में भेजा था। फिर तुम 84 का चक्र लगाकर अब आकर मिले हो। अब अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। तुमको वापिस जरूर ले जाना है। तुम चाहो चाहो ले जरूर जाना है। पहले आदि सनातन दैवी राज्य चला फिर आसुरी राज्य चला। दैवी राज्य के बाद पवित्रता तो चली गई फिर सिंगल ताज हो गया, अब तो प्रजा का प्रजा पर राज्य है फिर दैवी राज्य की स्थापना हो रही है। आसुरी राज्य के विनाश के लिए इस रूद्र यज्ञ से यह विनाश ज्वाला प्रज्वलित हुई है। तुम पतित सृष्टि पर थोड़ेही राज्य करेंगे। अभी है संगम। सतयुग में तो ऐसे नहीं कहेंगे। अभी तुम बच्चे पुरूषार्थ कर रहे हो। कराने वाला कौन है? श्रीमत देने वाला समर्थ, श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ है ही एक बाप। वही ब्रह्मा द्वारा स्थापना करा रहे हैं। बाप कहते हैं मैं भारत का मोस्ट ओबीडियन्ट सर्वेन्ट हूँ। भारत को स्वर्ग बनाता हूँ। वहाँ यथा राजा रानी तथा प्रजा सब सुखी रहते हैं। नैचुरल ब्युटी रहती है। लक्ष्मी-नारायण को देखो कितने सुन्दर हैं। हेविनली गॉड फादर है हेविन स्थापना करने वाला। सारी दुनिया में गीता के लिए कहते हैं कृष्ण भगवानुवाच। परन्तु कृष्ण तो कह सके मनमनाभव, मामेकम् याद करो तो विकर्म भस्म हों। और कोई उपाय भी नहीं है। गंगा तो पतित-पावनी है नहीं। वह थोड़ेही कहेगी कि मामेकम् याद करो। यह तो एक बाप ही बैठ समझाते हैं। बाप आत्माओं से बात करते हैं। बाप ही सबका सद्गति दाता है। उनके मन्दिर भी हैं। द्वापर से सब यादगार बनना शुरू होते हैं। सोमनाथ का मन्दिर है, परन्तु वह क्या करके गये हैं - यह कोई नहीं जानते। वह शिव शंकर को मिला देते हैं। अब कहाँ शिव परमधाम के निवासी और कहाँ शंकर सूक्ष्मवतन के वासी। कुछ भी समझते नहीं। बाप कहते हैं कितने भी वेद शास्त्र आदि कोई पढ़े, जप तप करे परन्तु मेरे से मिल नहीं सकते। भल मैं भावना का भाड़ा सबको देता हूँ, परन्तु वह तो अखण्ड ज्योति ब्रह्म को ही परमात्मा समझ लेते हैं। ब्रह्म का साक्षात्कार हो परन्तु उससे कुछ भी हांसिल नहीं होगा। कोई को हनूमान का, कोई को गणेश का साक्षात्कार कराता हूँ, वह तो मैं अल्पकाल के लिए मनोकामना पूर्ण करता हूँ। अल्पकाल लिए खुशी तो रहती है। परन्तु फिर भी सबको तमोप्रधान तो बनना है। चाहे सारा दिन गंगा में जाकर बैठ जाएं तो भी तमोप्रधान तो सबको बनना ही है।
 
बाप कहते हैं बच्चे पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया का 21 जन्म के लिए मालिक बनेंगे। और कोई सतसंग नहीं जहाँ इतनी प्राप्ति हो। बाप ही आकर राजयोग सिखलाते हैं तो कितना श्रीमत पर चलना चाहिए। पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। बाप श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मत देते हैं। श्रीमत से भारत को स्वर्ग बनाना है। तुम्हें ड्रामा के राज को अच्छी तरह से समझना है और पुरूषार्थ करना है। पुरूषार्थ कर ऐसा लायक बनना है। तुम बच्चों को नशा होना चाहिए कि हम बाप के साथ स्वर्ग की स्थापना करने आये हैं। हम वहाँ के रहवासी हैं। इस शरीर में हम निमित्त मात्र हैं थोड़े टाइम के लिए। बाबा भी थोड़े टाइम के लिए आये हैं, इस शरीर का भान टूट जाना चाहिए। अपने बाप और वर्से को याद करो, इसको ही सेकण्ड में जीवनमुक्ति कहा जाता है। बाप कहते हैं मैं आया हूँ सबको वापिस ले जाने। अब तुम अपने को आत्मा समझ सवेरे उठकर बाबा को याद करो। उनसे बातें करो। तुम जानते हो हमारे 84 जन्म पूरे हुए। अब हम ईश्वरीय सन्तान बने हैं। फिर दैवी सन्तान, फिर क्षत्रिय सन्तान बनेंगे। बाबा हमको विश्व का मालिक बनाते हैं। बाबा की बैठ महिमा करो। बाबा आपने तो कमाल की है। कल्पकल्प आकर हमको पढ़ाते हो। बाबा आपका ज्ञान बड़ा वन्डरफुल है। स्वर्ग कितना वन्डरफुल है। वह हैं जिस्मानी वन्डर्स, यह है रूहानी बाप का स्थापना किया हुआ वन्डर। बाप आये हैं कृष्णपुरी स्थापना करने। इन लक्ष्मी-नारायण ने यह प्रालब्ध कहाँ से पाई? बाप द्वारा। जगत अम्बा और जगत पिता के साथ बच्चे भी होंगे। वह हैं ब्राह्मण, जगत अम्बा तो ब्राह्मणी थी। वह है कामधेनु। सबकी मनोकामनायें पूर्ण कर देती है। यह जगत अम्बा ही फिर स्वर्ग की महारानी बनती है। कितना वन्डरफुल राज है। यह बाप अपनी अवस्था को जमाने के लिए भिन्न-भिन्न युक्तियां बताते रहते हैं। रात को जागो। बाबा को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। अगर पूरा पुरूषार्थ होगा तो याद ठहरेगी। पास विद आनर हो जाना है। 8 को ही स्कालरशिप मिलती है। सब कहते हैं - हम लक्ष्मी-नारायण को वरें, तो पास होकर दिखाना है। अपने को देखना है कि मेरे में कोई बन्दरपना तो नहीं है? उसको निकालते जाओ। देखो, सारे दिन में किसको दु: तो नहीं दिया? बाप है सबको सुख देने वाला। बच्चों को भी ऐसा बनना है। वाचा, कर्मणा से कोई को भी दु: नहीं देना है। सच्चा-सच्चा रास्ता बताना है। वह है हद के बाप का वर्सा। यह है बेहद के बाप का वर्सा, सो तो जिसको मिलता होगा वही बतायेंगे। जो अपने धर्म के होंगे उन्हों को झट टच होगा।
 
बाप कहते हैं फिर से दैवी धर्म स्थापना करने मैं ब्रह्मा के तन में आता हूँ। तुम बच्चों की बुद्धि में है कि अभी हम ब्राह्मण हैं फिर देवता बनना है। पहले सूक्ष्मवतन में जाकर फिर शान्तिधाम में जायेंगे। वहाँ से फिर नई दुनिया में, गर्भ महल में आयेंगे। यहाँ गर्भजेल में आते हैं। इनको कहते हैं झूठी माया, झूठी काया... बाप कहते हैं कितनी धर्म ग्लानी की है, शिव जयन्ती मनाते हैं परन्तु शिव कब आया, किसमें प्रवेश किया, यह कोई को पता नहीं है। जरूर कोई शरीर में आकर नर्क को स्वर्ग बनाया होगा ना। बाप बच्चों को बहुत अच्छी रीति समझाते हैं और राय देते हैं अपना चार्ट बनाओ। सारे दिन में कितना समय बाप को याद किया! सवेरे उठकर बाप को, वर्से को याद करो। हम बेहद के बाप के साथ आये हैं। गुप्तवेष में भारत को स्वर्ग बनाने। अब हमको वापिस जाना है। जाने से पहले अपनी राजधानी जरूर स्थापना करनी है। अब तुम हो संगम पर। बाकी सारी दुनिया है कलियुग में। तुम संगमयुगी ब्राह्मण हो। बाप बच्चों के लिए सौगात ले आते हैं - मुक्ति और जीवनमुक्ति की। सतयुग में भारत जीवनमुक्त था, बाकी सब आत्मायें मुक्तिधाम में थी। बाप हथेली पर बहिश्त ले आते हैं तो जरूर उसके लिए लायक भी खुद ही बनायेंगे। अच्छा!
 
मीठे मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) सदा इस नशे में रहना है कि हम बाप के साथ स्वर्ग की स्थापना के निमित्त हैं। बाप हमें विश्व का मालिक बनाते हैं।
2) बाप समान सुख देने वाला बनना है। कभी किसी को दु:खी नहीं करना है। सबको सच्चा रास्ता बताना है। अपनी उन्नति के लिए अपना चार्ट रखना है।
 
वरदान:हर कर्म का बोझ बाप पर छोड़ स्वयं ट्रस्टी बन रहने वाले डबल लाइट फरिश्ता भव !
हिम्मत रखने वाले बच्चों को बापदादा सदा ही मदद करते हैं। बच्चे श्रेष्ठ संकल्प करते और बाप हाजिर हो जाते। सिर्फ बाप के ऊपर सारा कार्य छोड़ दो तो बाप जाने, कार्य जाने। खुद अपने ऊपर जवाबदारियों का बोझ नहीं उठाओ, ट्रस्टी बनकर रहो तो सदा हल्के, डबल लाइट फरिश्ता बन उड़ते रहेंगे। दिल साफ है तो मुराद हांसिल हो जाती है।
स्लोगन:उमंग-उत्साह के पंख साथ हों तो उड़ती कला में उड़ते रहेंगे।

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Details ( Page:- Murali 23-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 23.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Tum ho most lucky bacche kyunki tumhare samookh swayang Baap hai,woh tumhe soona rahe hain.
Q- Bhakti marg ka kaun sa sanskar sabhi tum baccho me nahi ho sakta?Kyun?
A- Bhakti marg me jis bhi Devi ya Devta ke paas jayenge usse kuch na kuch maangte he rahenge.Kisi se dhan magenge,kisi se putra mangenge.Yah maangne ke sanskar abhi tum baccho me nahi ho sakte kyunki Baap ne Sangam par tumhe kaamdhenu banaya hai.Tum Baap samaan sabki manokaamnaye porn karne wale ho.Tum swayang ke prati koi aasha nahi rakh sakte.Tum jaante ho fal dene wala ek he data Baap hai,jise yaad karne se sab praptiyan ho jati hain isiliye maangne ke sanskar samapt ho jate hain.
 
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Krishnapuri me chalne ke liye purusharth bahut achcha karna hai.Sudra pan ke sanskaro ko parivartan kar pakka Brahman banna hai.
2)Buddhibal se yaad ki sidhi par chadhna hai.Sidhi chadhne se he apaar sukh ka anubhav hoga.
 
Vardan:-Har aatma ko second me mukti-jeevanmukti ka adhikar dilane wale Master Satguru bhava.
Slogan:-Agyankari bano to Bapdada ke dil ki duwayein prapt hoti rahengi.
 
ENGLISH SUMMARY - 23.01.18     
Sweet children, you are the most lucky children because the Father Himself speaks to you personally.
Question:Which sanskars of the path of devotion can you children not have and why?
Answer:
People on the path of devotion go to deity idols and they ask them for something or other. From one they would ask for wealth and from another a son. You children must no longer have the sanskars of asking because it is now the confluence age and the Father has made you Kamdhenu (those who fulfil all desires). Like the Father, you fulfil everyone’s desires. You cannot have any desires yourselves. You know that only the one Father, the Bestower, gives the fruit and that you receive all attainments by remembering Him. This is why the sanskars of asking have ended.
 
Song:Salutations to Shiva.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. In order to go to the land of Krishna, make very good effort. Transform your sanskars of a shudra and become a firm Brahmin.
2. Climb the ladder of remembrance with the power of the intellect. By climbing this ladder, you will experience infinite happiness.
 
Blessing:May you be a master satguru and enable every soul to claim a right to liberation and liberation-in-life in a second.
Until now you have been playing the parts of master bestowers and master teachers. However, you must now become the children of the Satguru and play the parts of being bestower of blessings for liberation and liberation-in-life. “A master Satguru” means one who fully follows the father, and one who follows the versions of the Satguru completely. Only such master satgurus can take others beyond with a glance, that is, only they can do the service of enabling others to claim a right to liberation and liberation-in-life.
Slogan:Be obedient and you will continue to receive blessings from BapDada’s heart.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

23/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे मीठे बच्चे - तुम हो मोस्ट लकी बच्चे क्योंकि तुम्हारे सम्मुख स्वयं बाप है, वह तुम्हें सुना रहे हैं
 
प्रश्न:भक्ति मार्ग का कौन सा संस्कार अभी तुम बच्चों में नहीं हो सकता? क्यों?
उत्तर:
भक्ति मार्ग में जिस भी देवी या देवता के पास जायेंगे उससे कुछ कुछ मांगते ही रहेंगे। किसी से धन मांगेंगे, किसी से पुत्र मांगेगे। यह मांगने के संस्कार अभी तुम बच्चों में नहीं हो सकते क्योंकि बाप ने संगम पर तुम्हें कामधेनु बनाया है। तुम बाप समान सबकी मनोकामनायें पूर्ण करने वाले हो। तुम स्वयं के प्रति कोई आशा नहीं रख सकते। तुम जानते हो फल देने वाला एक ही दाता बाप है, जिसे याद करने से सब प्राप्तियां हो जाती हैं इसलिए मांगने के संस्कार समाप्त हो जाते हैं।
 
गीत:ओम् नमो शिवाए...   ओम् शान्ति।
 
भगवानुवाच। अब अच्छी रीति समझकर फिर समझाने के लिए एक गीता शास्त्र ही है। शास्त्र तो बनाया है मनुष्यों ने। परन्तु राजयोग मनुष्य नहीं सिखाते। बाप कहते हैं मैंने ही 5 हजार वर्ष पहले भी तुम भारतवासी सिकीलधे बच्चों को राजयोग सिखाया था। सिकीलधे का अर्थ तो समझाया है कि तुम ही पूरे 84 जन्म लेकर फिर आए मिले हो। 5 हजार वर्ष पहले भी तुम मिले थे और तुम आकर ब्रह्मा मुख वंशावली अर्थात् ब्राह्मण ब्राह्मणी बने थे। बाप डायरेक्ट बोलते हैं। वह गीता पाठी आदि यह बातें नहीं करेंगे। बाप डायरेक्ट समझाकर गये थे फिर भक्ति मार्ग से शास्त्र बनाते हैं। अब ड्रामा पूरा होता है। फिर बाप आया है कहते हैं बच्चों को, कौन से बच्चे? कहते हैं खास तुम और आम सारी दुनिया। तुम अभी सम्मुख हो। तुमको बैठ बाबा ने अपना परिचय दिया है। यह राजयोग तुमको और कोई सिखला सके। बाप ने ही पहले योग सिखलाया था, अब सिखला रहे हैं जिससे तुम फिर राजाओं का राजा बनेंगे और कोई स्वर्ग का मालिक बना सके। मैं तुम्हारा बाप आया हूँ फिर से तुमको राजयोग सिखलाने। अच्छा अब बाबा तुमको झाड़ पर समझाते हैं। यह समझानी भी बहुत जरूरी है। इनको कल्प-वृक्ष कहा जाता है। बाप कहते हैं यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ कल्प वृक्ष है। वह गीता सुनाने वाले कहेंगे भगवान ने यह कहा था और तुम कहेंगे भगवान कह रहा है। यह है मनुष्य सृष्टि का झाड़। इसमें कोई फल फ्राट आम आदि नहीं हैं। उस फल फ्राट का झाड़ जो होता है उनका बीज नीचे, झाड़ ऊपर में होता है। इनका बीच ऊपर और झाड़ नीचे हैं। कहते भी हैं ईश्वर ने हमको पैदा किया है अर्थात् बाप ने बच्चे दिये हैं। बाप ने धन दिया है। बाबा आप हमारे सब दु: दूर करो। बाबा, बाबा कहते रहते हैं। कितनी अशान्ति रहती है। लक्ष्मी-नारायण के आगे जाते हैं। उनसे मांगते हैं, महालक्ष्मी हमको धन दो। यह सब मांगने के संस्कार हैं। जगत अम्बा से कोई पुत्र मांगेंगे तो कोई कहेंगे हमारी बीमारी दूर करो। लक्ष्मी के आगे ऐसी आशायें नहीं रखेंगे, उनसे सिर्फ धन मांगते हैं। यह तो तुम जानते हो - जगत अम्बा सो लक्ष्मी, सो फिर 84 जन्मों का चक्र लगाकर फिर जगत अम्बा बनती है। झाड़ में देखो जगत अम्बा बैठी है। यही फिर महारानी बनेंगी जरूर, तुम बच्चे भी राजधानी में आयेंगे। तुम कल्प वृक्ष के नीचे बैठे हो। संगम पर फाउन्डेशन लगा रहे हो। कामधेनु के तुम बच्चे ही सबकी मनोकामना पूर्ण करने वाले हो। तुम भारत माता शक्ति सेना हो, इसमें पाण्डव भी हैं।
 
बच्चों को समझाया गया है कि याद एक बाप को ही करना है। देने वाला एक बाप है। भल तुम किसकी भी भक्ति करो, किसको भी याद करो परन्तु फल देने वाला फिर भी एक ही दाता है। वही सब कुछ देता है। भक्ति मार्ग में तुम नारायण की, कृष्ण की पूजा करते हो कृष्ण को झुलाते भी हो, प्यार करते हो। उनसे तुम क्या मांगेंगे। तुम चाहते हो हम उनकी राजधानी में जायें अथवा हमको कृष्ण जैसा बच्चा मिले। गाते हैं भजो राधे गोविन्द चलो वृन्दावन। जहाँ राज्य भाग्य करते थे वैकुण्ठ में। उस समय कोई भी अप्राप्ति नहीं होती। कृष्ण के राज्य को याद तो बहुत करते हैं। भारत में जब कृष्ण का राज्य था तो और कोई राज्य नहीं था। अब बाप आये हैं कहते हैं चलो कृष्णपुरी में, चलकर कृष्ण की पत्नि बनो या राधे का पति बनो। बात एक ही है। वहाँ विष नहीं मिलेगा। वह है ही सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया। अभी तुम स्टूडेन्ट हो, पढ़ रहे हो नर से नारायण, बेगर से प्रिन्स बनने के लिए। यहाँ भल कोई करोड़पति हैं, 50 करोड़ हैं लेकिन तुम्हारी भेंट में वह गरीब हैं क्योंकि यह सब उनका धन मिट्टी में मिल जाना है। कुछ भी साथ नहीं चलेगा। हाथ खाली जायेंगे। तुम तो हाथ भरतू करके जाते हो 21 जन्मों के लिए। अभी तुम राजयोग सीख रहे हो। फिर सतयुग में आकर राज्य करेंगे। तुम पुनर्जन्म लेते वर्णो में आते रहते हो। सतयुग में हैं 16 कला, त्रेता में हैं 14 कला। फिर भक्ति मार्ग शुरू होता है फिर इब्राहम, बुद्ध आते हैं। क्राइस्ट के 3 हजार वर्ष पहले देवी-देवताओं का राज्य था। अब सारा झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाया हुआ है। अभी तुम कल्पवृक्ष के नीचे संगम पर बैठे हो, इसको कहा जाता है कल्प का संगम अथवा कलियुग और सतयुग का संगम। सतयुग के बाद त्रेता, फिर त्रेता के बाद द्वापर और कलियुग का संगम। कलियुग के बाद फिर सतयुग जरूर आयेगा। बीच में संगम जरूर चाहिए। कल्प के संगमयुगे बाप आते हैं। उन्होंने कल्प अक्षर बदल सिर्फ युगे- युगे लिख दिया है। बाप कहते हैं मैं निराकार परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर हूँ। भारत में ही शिव जयन्ती गाई जाती है। कृष्ण तो ज्ञान दे सके। घोड़े गाड़ी में सिर्फ कृष्ण का ही चित्र दिखाया है परन्तु कृष्ण आयेगा कब? द्वापर में कैसे आयेगा। तुम तो कहते हो स्वर्ग में कृष्ण के साथ मिलेंगे। बाप कहते हैं भक्ति में कृष्ण का साक्षात्कार मैं तुमको कराता हूँ। कृष्ण जयन्ती पर बहुत प्रेम से उनको झूला झुलाते हैं। पूजा करते हैं। उनको जैसे सच-सच कृष्ण दिखाई पड़ता है। साक्षात्कार होगा, कृष्ण का चित्र होगा तो उनको भी उठाकर भाकी पहनेंगे। भक्ति मार्ग में मैं ही मदद करता हूँ। दाता मैं हूँ। लक्ष्मी की पूजा करते हैं, अब वह तो है ही पत्थर की मूर्ति। वह क्या देगी? देना फिर भी मुझे ही पड़ता है। साक्षात्कार भी मैं ही कराता हूँ। यह भी ड्रामा में नूँध है। जैसे कहते हैं परमपिता परमात्मा के हुक्म से पत्ता-पत्ता हिलता है क्योंकि वह समझते हैं पत्ते-पत्ते में परमात्मा है। क्या परमात्मा बैठ पत्ते को हुक्म करेगा क्या! यह तो ड्रामा बना हुआ है। अभी तुम जैसी एक्ट कर रहे हो, वह कल्प के बाद भी तुम ऐसे ही करेंगे। जो कुछ शूटिंग में शूट हुआ वही चलेगा। उसमें कुछ फर्क नहीं पड़ सकता। ड्रामा को भी अच्छी रीति समझना है। बाप समझाते हैं बेहद का सुख कल्प-कल्प भारत को ही मिलता है। परन्तु जो ब्राह्मण बनते हैं वही वर्णों में आते हैं। 84 जन्म लेते हैं। फिर Dरों के जन्म नम्बरवार कम होते जायेंगे। कितने छोटेछोटे मठ पंथ हैं। भल उन्हों की महिमा है - क्योंकि पवित्र हैं। स्वर्ग का रचयिता तो है बाप, और कोई मनुष्य थोड़ेही स्वर्ग रचेगा। फिर राजयोग भी कोई सिखलावे?
 
अब तुम कृष्णपुरी में जाने के लिए राजयोग सीख रहे हो। पुरूषार्थ हमेशा ऊंचा करना चाहिए। तुम कहते हो कृष्ण जैसा बच्चा मिले, कृष्ण जैसा पति मिले। कृष्ण ही नारायण बनता है फिर कृष्ण जैसा क्यों कहते! तुमको तो कहना चाहिए नारायण जैसा पति मिले। नारद ने भी कहा हम लक्ष्मी को वरें। राधे के लिए नहीं कहा। बाप समझाते हैं तुमको कृष्णपुरी चलना है तो खूब पुरूषार्थ करो, वह है कृष्ण का दैवी कुल। कंस का है आसुरी कुल। तुम अभी हो संगम पर। शूद्र सम्प्रदाय तो ब्राह्मण ब्राह्मणी कहला सकें। जो ब्राह्मण कहलायें वह शूद्र वर्ण के हैं। भारत की ही बात है। भारत ही स्वर्ग बनता फिर भारत ही नर्क बन जाता है। लक्ष्मी-नारायण को भी 84 जन्म ले रजो तमो में आना ही है। जबकि वह भी चक्र में आते हैं तो बुद्ध आदि वापिस निर्वाणधाम में कैसे जा सकते। कोई तो कह देते कृष्ण सर्वव्यापी है, जिधर देखो कृष्ण ही कृष्ण है। राम के भक्त कहेंगे राम सर्वव्यापी है। वह कृष्ण को नहीं मानेंगे। बाबा के पास एक राधापंथी आया था कहता था राधे ही राधे... राधे हाजिराहजूर है। तेरे में मेरे में राधे ही राधे है। गणेश का पुजारी कहेगा तेरे में मेरे में गणेश ही गणेश है। क्रिश्चियन फिर कहते क्राइस्ट गॉड का सन (बच्चा) है। अरे क्राइस्ट सन था तो तुम किसके सन (बच्चे) हो? अनेक मत मतान्तर हैं। रास्ता कोई को भी मिलता नहीं। सिर्फ माथा टेकते, भटकते रहते हैं। मुक्ति और जीवनमुक्ति भगवान ही देंगे ना! उनसे हम क्या मांगें! कोई को पता ही नहीं। बाप को जानने कारण निधनके बन गये हैं। फिर धनी आकर धणका बनाते हैं। मनुष्य कितने धक्के खाते हैं, समझते हैं भक्ति से भगवान मिलेगा। बाप कहते हैं मैं आता ही हूँ अपने समय पर। भल कोई कितना भी पुकारे परन्तु मैं आता हूँ संगम पर। एक ही बार भारत को स्वर्ग बनाए सबको शान्ति में भेज देता हूँ। फिर नम्बरवार अपने-अपने समय पर आते हैं। जो देवी-देवता थे वह भी सब आत्मायें बैठी हुई हैं। फिर से अपना राज्य भाग्य ले रहे हैं। अभी तो देवी-देवता धर्म ही नहीं है। सब अपने को हिन्दू कहलाने लग पड़े हैं। ड्रामा अनुसार फिर भी ऐसा होगा। जो कुछ हो चुका है वह फिर रिपीट होगा। फिर ऐसे हम चक्र में आयेंगे, इतने जन्म लेंगे। हिसाब निकालो। हर एक धर्म वाले पीछे कितने जन्म लेंगे? झाड़ पर समझाना बहुत सहज है। आपेही मनुष्यों को टच होगा कि कोई की प्रेरणा से यह विनाश ज्वाला की तैयारी हो रही है। यूरोपवासी यादव बाम्ब्स बनाते हैं। वह भी कहते हैं हमको कोई प्रेरणा देने वाला है। हम जानते हैं कि इससे हम अपने ही कुल का विनाश करते हैं। चाहते हुए भी यह मौत का सामान बनाते हैं। धीरे-धीरे प्रभाव पड़ेगा। धीरे धीरे झाड़ बढ़ता है ना। कोई कांटे से कली, कोई फूल बनते हैं। कोई कोई फूलों को भी तूफान लगता है तो मुरझा जाते हैं। बाबा ने कल्प-कल्प कहा था आश्चर्यवत सुनन्ती, कथन्ती... अब फिर बाबा खुद कह रहे हैं, हमारे पास आवन्ती, ब्रह्माकुमार कुमारी बनन्ती, कथन्ती फिर भी अहो मम माया अच्छे-अच्छे बच्चों को खावन्ती (खा गई) आगे चलकर देखना कैसे अच्छे-अच्छे बच्चे भी खत्म हो जाते हैं।
 
जो पास्ट हो गया सो फिर अब प्रेजन्ट में बाप समझाते हैं। फिर भक्ति मार्ग में शास्त्र बनायेंगे। यह ड्रामा ऐसा बना हुआ है। अब बाप आकर ब्रह्मा द्वारा सभी वेदों शास्त्रों का सार समझा रहे हैं। जो धर्म स्थापना करते हैं उनके नाम पर ही शास्त्र बनाते हैं। उसको धर्म शास्त्र कहा जाता है। देवी-देवता धर्म का शास्त्र एक ही गीता है। हरेक धर्म का एक शास्त्र होना चाहिए। श्रीमत भगवद गीता ठीक है। भगवानुवाच है। भगवान ने आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना की। यह है सबसे प्राचीन धर्म। हरेक धर्म का अपना-अपना शास्त्र है और पढ़ते रहते हैं। अभी तुम देवता बनते हो लेकिन तुमको शास्त्र पढ़ने की दरकार नहीं, वहाँ शास्त्र होता ही नहीं। यह सब खत्म हो जायेंगे फिर गीता कहाँ से आई? द्वापर में बैठ मनुष्यों ने बनाई, जो गीता अभी है फिर भी वही गीता खोजकर निकालेंगे। जैसे कल्प पहले बनाई है वैसे फिर यह शास्त्र बनेंगे। भक्ति मार्ग की सामग्री बनती ही जायेगी।
 
बाप समझाते हैं सिकीलधे बच्चे मुझ बाप की श्रीमत पर चल श्रेष्ठ बनो। तुम अभी संगमयुग पर राजयोग सीख रहे हो, जबकि कलियुग को सतयुग बनाना है। उन्होंने कल्प की आयु लम्बी बताए सभी को घोर अन्धियारे में डाल दिया है। मनुष्य तो मूंझे हुए हैं, ड्रामा अनुसार तुम बच्चों को ही बेहद के बाप से वर्सा लेना है। बाबा ने बहुत युक्तियां बताई हैं सिर्फ बाबा को याद करो, चार्ट रखो। भोजन बनाने समय भी याद करो। भोजन बनाने समय पति, बच्चा याद पड़ता है तो शिवबाबा क्यों नही पड़ सकता! यह तुम्हारा काम है। बाबा बुद्धि की सीढ़ी देते हैं फिर चढ़ो चढ़ो, यह है तुम्हारा काम। जितना याद करेंगे उतनी सीढ़ी चढ़ते जायेंगे। नहीं तो इतना सुख नहीं मिलेगा। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे अर्थात् 5 हजार वर्ष के बाद फिर आए मिले हुए बच्चों वो नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमर्निंग। मीठे-मीठे रूहानी बाप का रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) कृष्णपुरी में चलने के लिए पुरूषार्थ बहुत अच्छा करना है। शूद्र पन के सस्कारों को परिवर्तन कर पक्का ब्राह्मण बनना है।
2) बुद्धिबल से याद की सीढ़ी पर चढ़ना है। सीढ़ी चढ़ने से ही अपार सुख का अनुभव होगा।
 
वरदान:हर आत्मा को सेकण्ड में मुक्ति-जीवनमुक्ति का अधिकार दिलाने वाले मास्टर सतगुरू भव!
 
अभी तक मास्टर दाता वा मास्टर शिक्षक का पार्ट बजा रहे हो। लेकिन अभी सतगुरू के बच्चे बन गति और सद्गति के वरदाता का पार्ट बजाना है। मास्टर सतगुरू अर्थात् सम्पूर्ण फालो करने वाले। सतगुरू के वचन पर सदा सम्पूर्ण रीति चलने वाले। ऐसे मास्टर सतगुरू ही सेकण्ड में नजर से निहाल करने अर्थात् मुक्ति जीवनमुक्ति का अधिकार दिलाने की सेवा कर सकते हैं।
 
स्लोगन:आज्ञाकारी बनो तो बापदादा के दिल की दुआयें प्राप्त होती रहेंगी।

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Details ( Page:- Murali 24-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 24.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Tum Rajrishi ho,tumhe behad ka Baap sari purani duniya ka sanyas shikhlate hain jisse tum rajai pad pa sako.
 
Q- Is samay kisi bhi manushya ke karm akarm nahi ho sakte hain,kyun?
A-Kyunki sari duniya me maya ka rajya hai.Sab me 5 bikar pravesh hain isiliye manushya jo bhi karm karte hain,wo bikarm he banta hai.Satyug me he karm akarm hote hain kyunki wahan maya hoti nahi.
 
Q-Kin baccho ko bahut achchi prize milti hai?
A- Jo Shrimat par pavitra ban andho ki lathi bante hain.Kabhi 5 bikaro ke vas ho kul kalankit nahibante,unhe bahut achchi prize mil jati hai.Agar koi baar-baar maya seh haar khate hain to unka passport he cancel ho jata hai.
 
Dharana ke l iye mukhya saar:-
1)Saubhagyashali banne ke liye Baap se pavitrata ki pratigyan karni hai.Is chi-chi patit duniya se dil nahi lagani hai.
2)Maya ka ghunsa kabhi nahi khana hai.Kul kalankit nahi banna hai.Layak ban Swarg ka passport Baap se lena hai.
 
Vardan:-Apni shrest sthiti dwara bhatakti huyi aatmaon ko shrest thikana dene wale Light Swaroop bhava.
Slogan:-Seva ke mahatwa ko jaan koi na koi seva me busy rehne wale he allround sevadhari hain.
 
ENGLISH SUMMARY - 24.01.18     
Sweet children, you are Raja Rishis. The Father is teaching you to renounce the whole of the old world. By doing this you become able to claim a royal status.
 
Question:Why can none of the acts that human beings perform at this time be neutral?
Answer:
Because Maya’s kingdom is over the whole world, the five vices have entered everyone and this is why the acts they perform are sinful. Maya doesn’t exist in the golden age, and so the acts that human beings perform there are neutral.
 
Question:Which children receive a very good prize?
Answer:Those who become pure on the basis of shrimat and become sticks for the blind, and those who are never influenced by the five vices and do not defame the clan’s name receive a very good prize. The passports of those who are repeatedly defeated by Maya are cancelled.
 
Song:Salutations to Shiva  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. In order to become one hundred times fortunate, promise the Father that you will remain pure. Do not attach your heart to this dirty, impure world.
2. Never be defeated by Maya.You must not become those who defame the clan's name. Become worthy of claiming your passport to heaven from the Father.
 
Blessing:May you be an embodiment of light and show wandering souls the elevated destination with your elevated stage.
Just as moths automatically fly to a physical light, similarly, wandering souls will come to you sparkling stars at a fast speed. For this, you have to practise constantly seeing the sparkling star on each one’s forehead. See but do not see the body. Let your vision always be on the sparkling star (the light). When you have such spiritual vision in a natural way, wandering souls will then find their true destination through your elevated stage.
 
Slogan:Those who know the importance of service and who remain busy in one or another type of service are all-round servers.
 
HINDI DETAIL MURALI

24/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे “मीठे बच्चे - तुम राजऋषि हो, तुम्हें बेहद का बाप सारी पुरानी दुनिया का सन्यास सिखलाते हैं जिससे तुम राजाई पद पा सको
 
प्रश्न:इस समय किसी भी मनुष्य के कर्म अकर्म नहीं हो सकते हैं, क्यों?
उत्तर:
क्योंकि सारी दुनिया में माया का राज्य है। सबमें 5 विकार प्रवेश हैं इसलिए मनुष्य जो भी कर्म करते हैं, वह विकर्म ही बनता है। सतयुग में ही कर्म अकर्म होते हैं क्योंकि वहाँ माया होती नहीं।
प्रश्न:किन बच्चों को बहुत अच्छी प्राइज मिलती है?
उत्तर:जो श्रीमत पर पवित्र बन अन्धों की लाठी बनते हैं। कभी 5 विकारों के वश हो कुल कलंकित नहीं बनते, उन्हें बहुत अच्छी प्राइज मिल जाती है। अगर कोई बार-बार माया से हार खाते हैं तो उनका पासपोर्ट ही कैन्सिल हो जाता है।
 
गीत:ओम् नमो शिवाए...  ओम् शान्ति।
 
सबसे ऊंच है परमपिता परमात्मा अर्थात् परम आत्मा। वह है रचयिता। पहले ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को रचते हैं फिर आओ नीचे अमरलोक में, वहाँ है लक्ष्मी-नारायण का राज्य। सूर्यवंशी का राज्य, चन्द्रवंशी का नहीं है। यह कौन समझा रहे हैं? ज्ञान का सागर। मनुष्य, मनुष्य को कब समझा न सके। बाप सबसे ऊंच है, जिसको भारतवासी मात-पिता कहते हैं। तो जरूर प्रैक्टिकल में मात-पिता चाहिए। गाते हैं तो जरूर कोई समय हुए होंगे। तो पहले-पहले ऊंच ते ऊंच है वह निराकार परमपिता परमात्मा, बाकी तो हरेक में आत्मा है। आत्मा जब शरीर में है तो दु:खी वा सुखी बनती है। यह बड़ी समझने की बातें हैं। यह कोई दन्त कथायें नहीं हैं। बाकी जो भी गुरू गुसाई आदि सुनाते हैं, वह सब दन्त कथायें हैं। अब भारत नर्क है। सतयुग में इनको स्वर्ग कहा जाता है। लक्ष्मी-नारायण राज्य करते थे, वहाँ सब सौभाग्यशाली रहते थे। कोई दुर्भाग्यशाली थे ही नहीं। कोई भी दु:ख रोग था ही नहीं। यह है पाप आत्माओं की दुनिया। भारतवासी स्वर्गवासी थे, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। कृष्ण को तो सभी मानते हैं। देखो, इनको दो गोले दिये हैं। कृष्ण की आत्मा कहती है अब मैं नर्क को लात मार रहा हूँ। स्वर्ग हाथ में ले आया हूँ। पहले कृष्णपुरी थी, अब कंसपुरी है। इसमें यह कृष्ण भी है। इनके 84 जन्मों के अन्त का यह जन्म है। परन्तु अब वह कृष्ण का रूप नहीं है। यह बाप बैठ समझाते हैं। बाप ही आकर भारत को स्वर्ग बनाते हैं। अब नर्क है फिर स्वर्ग बनाने बाप आये हैं। यह पुरानी दुनिया है। जो नई दुनिया थी, अब वह पुरानी है। मकान भी नये से पुराना होता है। आखरीन तोड़ने लायक हो जाता है। अब बाप कहते हैं मैं बच्चों को स्वर्गवासी बनाने राजयोग सिखाता हूँ। तुम हो राजऋषि। राजाई प्राप्त करने के लिए तुम सन्यास करते हो विकारों का। वह हद के सन्यासी घरबार छोड़ जंगल में चले जाते हैं। परन्तु हैं फिर भी पुरानी दुनिया में। बेहद का बाप तुमको नर्क का सन्यास कराते हैं और स्वर्ग का साक्षात्कार कराते हैं। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तुमको ले जाने। बाप सभी को कहते हैं तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो। यह तो जरूर है जो जैसा कार्य करेगा अच्छा वा बुरा, उस संस्कार अनुसार जाकर जन्म लेंगे। कोई साहूकार, कोई गरीब, कोई रोगी कोई तन्दरूस्त बनते हैं। यह है अगले जन्मों के कर्मो का हिसाब। कोई तन्दरूस्त है जरूर आगे जन्म में हॉस्पिटल आदि बनाये होंगे। दान पुण्य जास्ती करते हैं तो साहूकार बनते हैं। नर्क में मनुष्य जो भी कर्म करते हैं वह जरूर विकर्म ही बनेंगे क्योंकि सबमें 5 विकार हैं। अब सन्यासी पवित्र बनते हैं, पाप करना छोड़ देते हैं, जंगल में जाकर रहते हैं। परन्तु ऐसे नहीं उनके कर्म अकर्म होते हैं। बाप समझाते हैं इस समय है ही माया का राज्य इसलिए मनुष्य जो भी कर्म करेंगे वह पाप ही होंगे। सतयुग त्रेता में माया होती नहीं, इसलिए कभी विकर्म नहीं बनते। न दु:ख होगा। इस समय एक तो हैं रावण की जंजीरें, फिर भक्तिमार्ग की जंजीरें। जन्म-जन्मान्तर धक्के खाते आये हैं। बाप कहते हैं हमने आगे भी कहा था कि इन जप तप आदि से मैं नहीं मिलता हूँ। मैं आता ही तब हूँ जब भक्ति का अन्त होता है। भक्ति शुरू होती है द्वापर से। मनुष्य दु:खी होते हैं तब याद करते हैं। सतयुग त्रेता में हैं सौभाग्यशाली और यहाँ हैं दुर्भाग्यशाली। रोते पीटते रहते हैं। अकाले मृत्यु होता रहता है। बाप कहते हैं मैं आऊंगा तब जब नर्क को स्वर्ग बनना है। भारत प्राचीन देश है, जो पहले थे, उनको ही अन्त तक रहना है। 84 का चक्र गाया जाता है। गवर्मेन्ट जो त्रिमूर्ति बनाती है उनमें होना चाहिए ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, परन्तु जानवर लगा देते हैं। बाप रचयिता का चित्र है नहीं और नीचे चक्र भी लगाया है। वह समझते हैं चरखा है परन्तु है ड्रामा सृष्टि का चक्र। अब चक्र का नाम रखा है अशोक चक्र। अब तुम इस चक्र को जानने से ही अशोक बन जाते हो। बात तो ठीक है, सिर्फ उलट पुलट कर दिया है। तुम इस 84 जन्मों के चक्र को याद करने से ही चक्रवर्ती राजा बनते हो - 21 जन्मों के लिए। इस दादा ने भी 84 जन्म पूरे किये हैं। यह कृष्ण का अन्तिम जन्म है। इनको बाप बैठ समझाते हैं। वास्तव में तुम सबका अन्तिम जन्म है, जो भारतवासी देवी-देवता धर्म के थे उन्हों ने ही पूरे 84 जन्म भोगे हैं। अभी तो सबका चक्र पूरा होता है। अब यह तुम्हारा तन छी-छी हो गया है। यह दुनिया ही छी-छी है, इसलिए तुमको इस दुनिया से सन्यास कराते हैं। इस कब्रिस्तान से दिल नहीं लगानी है। अब बाप और वर्से से दिल लगाओ। तुम आत्मा अविनाशी हो, यह शरीर विनाशी है। अब मुझे याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। गायन भी है अन्तकाल जो स्त्री सिमरे... अब बाप कहते हैं अन्तकाल जो शिवबाबा सिमरे वह नारायण पद प्राप्त कर सकता है। नारायण पद मिलता ही है सतयुग में। बाप के सिवाए यह पद कोई दिला न सके। यह पाठशाला है ही मनुष्य से देवता बनने की। पढ़ाने वाला है बाप। जिसकी महिमा सुनी - ओम् नमो शिवाए। तुम जानते हो हम उनके बच्चे बन गये हैं। अब वर्सा ले रहे हैं।
अब तुम मनुष्य मत पर नहीं चलते। मनुष्य मत पर चलने से तो सब नर्कवासी बन गये हैं। शास्त्र भी मनुष्यों के ही गाये हुए हैं अथवा बनाये हुए हैं। सारा भारत इस समय धर्म भ्रष्ट, कर्म भ्रष्ट बन पड़ा है। देवतायें तो पवित्र थे। अब बाप कहते हैं अगर सौभाग्यशाली बनने चाहते हो तो पवित्र बनो, प्रतिज्ञा करो - बाबा हम पवित्र बन आपसे पूरा वर्सा जरूर लेंगे। यह तो पुरानी पतित दुनिया खत्म होने वाली है। लड़ाई झगड़ा क्या क्या लगा पड़ा है। क्रोध कितना है। बाम्बस कितने बड़े-बड़े बनाये हैं। कितने क्रोधी, लोभी हैं। वहाँ श्रीकृष्ण कैसे गर्भ महल से निकलते हैं सो तो बच्चों ने साक्षात्कार किया है। यहाँ है गर्भ जेल, बाहर निकलने से माया पाप कराने लग पड़ती है। वहाँ तो गर्भ महल से बच्चा निकलता है, रोशनी हो जाती है। बड़े आराम से रहते हैं। गर्भ से निकला और दासियाँ उठा लेती, बाजे बजने लग पड़ते। यहाँ वहाँ में कितना फर्क है।
अब तुम बच्चों को तीन धाम समझाये हैं। शान्तिधाम से ही आत्मायें आती हैं। आत्मा तो स्टार के मिसल है, जो भ्रकुटी के बीच में रहती है। आत्मा में 84 जन्मों का अविनाशी रिकार्ड भरा हुआ है। न ड्रामा कभी विनाश होता, न एक्ट बदली हो सकती। यह भी वण्डर है - कितनी छोटी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट बिल्कुल एक्यूरेट भरा हुआ है। यह कभी पुराना नहीं होता। नित्य नया है। हूबहू आत्मा फिर से अपना वही पार्ट शुरू करती है। अब तुम बच्चे आत्मा सो परमात्मा नहीं कह सकते। हम सो का अर्थ बाप ही यथार्थ रीति समझाते हैं। वे तो उल्टा अर्थ बना देते हैं या तो कहते अहम् ब्रह्मस्मि, हम परमात्मा हैं माया को रचने वाले। अब वास्तव में माया को रचा नहीं जाता। माया है 5 विकार। वह बाप माया को नहीं रचते। बाप तो नई सृष्टि रचते हैं। मैं सृष्टि रचता हूँ, यह और कोई नहीं कह सकते। बेहद का बाप एक ही है। ओम् का अर्थ भी बच्चों को समझाया गया है। आत्मा है ही शान्त स्वरूप। शान्तिधाम में रहती है। परन्तु बाप है ज्ञान का सागर, आनन्द का सागर। आत्मा की यह महिमा नहीं गायेंगे। हाँ आत्मा में नॉलेज आती है। बाप कहते हैं मैं एक ही बार आता हूँ। मुझे वर्सा भी जरूर देना पड़े। मेरे वर्से से भारत एकदम स्वर्ग बन जाता है। वहाँ पवित्रता, सुख-शान्ति सब कुछ था। यह है बेहद के बाप का सदा सुख का वर्सा। पवित्रता थी तो सुख शान्ति भी थी। अभी अपवित्रता है तो दु:ख अशान्ति है। बाप बैठ समझाते हैं तुम आत्मा पहले पहले मूलवतन में थी। फिर देवी-देवता धर्म में आई, फिर क्षत्रिय धर्म में आई, 8 जन्म सतोप्रधान में फिर 12 जन्म सतो में, फिर 21 जन्म द्वापर में, फिर 42 जन्म कलियुग में। यहाँ शूद्र बन पड़े, अब फिर ब्राह्मण वर्ण में आना है फिर देवता वर्ण में जायेंगे। अब तुम ईश्वरीय गोद में हो। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। 84 जन्मों को जानने से फिर उसमें सब कुछ आ जाता है। सारे चक्र का ज्ञान बुद्धि में है। यह भी तुम जानते हो सतयुग में है एक धर्म। वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी राज्य। अब तुम लक्ष्मी-नारायण पद पा रहे हो। सतयुग है पावन दुनिया, वहाँ बहुत थोड़े होते हैं। बाकी सब आत्मायें मुक्तिधाम में रहती हैं। सबका सद्गति दाता एक ही बाप है। उनको कोई जानता ही नहीं और ही कह देते हैं कि परमात्मा सर्वव्यापी है। बाप कहते हैं तुमको किसने कहा? कहते हैं गीता में लिखा हुआ है। गीता किसने बनाई? भगवानुवाच, मैं तो इस साधारण ब्रह्मा तन का आधार लेता हूँ। लड़ाई के मैदान में एक अर्जुन को कैसे बैठ ज्ञान सुनायेंगे। तुमको कोई लड़ाई वा जुआ आदि थोड़ेही सिखाई जाती है। भगवान तो है ही मनुष्य से देवता बनाने वाला। वह कैसे कहेंगे कि जुआ खेलो, लड़ाई करो। फिर कहते द्रोपदी को 5 पति थे। यह कैसे हो सकता। कल्प पहले बाबा ने स्वर्ग बनाया था। अब फिर से बना रहे हैं। कृष्ण के 84 जन्म पूरे हुए, यथा राजा रानी तथा प्रजा, सबके 84 जन्म पूरे हुए। अब तुम शूद्र से बदल ब्राह्मण बने हो। जो ब्राह्मण धर्म में आयेंगे, वही मम्मा बाबा कहेंगे। फिर भल कोई माने वा न माने। समझते हैं हमारे लिए मंजिल ऊंची है। फिर भी कुछ न कुछ सुनते हैं तो स्वर्ग में जरूर आयेंगे। परन्तु कम पद पायेंगे। वहाँ यथा राजा रानी तथा प्रजा सब सुखी रहते हैं। नाम ही है हेविन। हेविनली गॉड फादर हेविन स्थापना करते हैं, यह है हेल। सब सीताओं को रावण ने जेल में बाँध रखा है। सभी शोक में बैठ भगवान को याद कर रहे हैं कि इस रावण से छुड़ाओ। सतयुग है अशोक वाटिका। जब तक सूर्यवंशी राजधानी तुम्हारी स्थापना नहीं हुई है तब तक विनाश नहीं हो सकता। राजधानी स्थापना हो, बच्चों की कर्मातीत अवस्था हो तब फाइनल लड़ाई होगी, तब तक रिहर्सल होती रहती है। इस लड़ाई के बाद स्वर्ग के गेट खुलने वाले हैं। तुम बच्चों को स्वर्ग में चलने लायक बनना है। बाबा पासपोर्ट निकालते हैं। जितनाजितना पवित्र बनेंगे, अन्धों की लाठी बनेंगे तो प्राइज भी अच्छी मिलेगी। बाबा से प्रतिज्ञा करनी है मीठे बाबा हम आपकी याद में जरूर रहेंगे। मुख्य बात है पवित्रता की। पाँच विकारों का दान जरूर देना पड़े। कोई हार खाकर खड़े भी हो जाते हैं। अगर दो चार बारी माया का घूँसा खाकर फिर गिरा तो नापास हो जायेगा। पासपोर्ट कैन्सिल हो जाता है। बाप कहते हैं बच्चे कुल कलंकित मत बनो। तुम विकारों को छोड़ो। मैं तुमको स्वर्ग का मालिक अवश्य ही बनाऊंगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) सौभाग्यशाली बनने के लिए बाप से पवित्रता की प्रतिज्ञा करनी है। इस छी-छी पतित दुनिया से दिल नहीं लगानी है।
2) माया का घूँसा कभी नहीं खाना है। कुल कलंकित नहीं बनना है। लायक बन स्वर्ग का पासपोर्ट बाप से लेना है।
 
वरदान:अपनी श्रेष्ठ स्थिति द्वारा भटकती हुई आत्माओं को श्रेष्ठ ठिकाना देने वाले लाइट स्वरूप भव!
जैसे स्थूल रोशनी (लाइट) पर परवाने स्वत: आते हैं, ऐसे आप चमकते हुए सितारों पर भटकी हुई आत्मायें फास्ट गति से आयेंगी। इसके लिए अभ्यास करो - हर एक के मस्तक पर सदा चमकते हुए सितारे को देखने का। शरीरों को देखते भी न देखो। सदा नजर चमकते हुए सितारे (लाइट) तरफ जाये। जब ऐसी रूहानी नजर नेचुरल हो जायेगी, तो आपकी इस श्रेष्ठ स्थिति द्वारा भटकती हुई आत्माओं को यथार्थ ठिकाना मिल जायेगा।
 
स्लोगन:सेवा के महत्व को जान कोई न कोई सेवा में बिजी रहने वाले ही आलराउन्ड सेवाधारी हैं।
 
 
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HINGLISH SUMMARY - 25.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Yah shristi wa zamana dukh ka hai isse nastmoha bano,naye zamane ko yaad karo,buddhiyog is duniya se nikaal nayi duniya se lagao.
Q-Krishnapuri me chalne ke liye tum bacche kaun si taiyari karte aur karate ho?
A-Krishnapuri me chalne ke liye sirf is antim janm me sab bikaro ko chhod pawan banna aur dusro ko banana hai.Pawan banna he Dukhdham se Sukhdham me jane ki taiyari hai.Tum sabko yahi sandesh do ki yah dirty duniya hai,isse buddhiyog nikalo to nayi Satyugi duniya me chale jayenge.
 
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Deha se sarv dharmo ko chhod,asariri aatma samajh ek Baap ko yaad karna hai.Yog aur gyan ki dharna se aatma ko pawan banana hai.
2)Baap jo knowledge dete hain,us par bichaar sagar manthan kar sabko Baap ka paigam dena hai.Buddhi ko bhatkana nahi hai.
 
Vardan:-Maryada Purushottam ban sada udti kala me udne wale Numberone Bijayi bhava.
Slogan:-Ek Baap ke shrest sang me raho to dusra koi sang prabhav nahi daal sakta.

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Details ( Page:- Murali 25-JAN-2018 )
ENGLISH SUMMARY - 25.01.18     
Sweet children, at this time, the world is one of sorrow. Conquer your attachment to this world and remember the new age. Remove your intellects yoga from this old world and connect it to the new world.
 
Question:What preparations are you children making and inspiring others to make in order to go to the land of Krishna?
Answer:
In order to go to the land of Krishna, you simply have to renounce all the vices in this, your last birth. Become pure and inspire others to become pure. To become pure is the preparation you need to make in order to go from the land of sorrow to the land of happiness. Give everyone the message that this world is dirty and that, in order to go to the new, golden-aged world, they have to remove their intellects’ yoga from this world.
 
Song:The heart says thanks to the One who gives it support.  Om Shanti
Essence for Dharna:
1. Renounce all the religions of the body. Become a bodiless soul and remember the Father. Purify the soul with yoga and imbibe knowledge.
2. Churn the knowledge that the Father gives and give everyone the Father’s message. Do not allow your intellect to wander around.
 
Blessing:May you be a number one, victorious soul who is the most elevated being following the highest codes of conduct and who is constantly flying in the flying stage.
The sign of number one souls is that they win in every situation. They are never defeated by anything; they are constantly victorious. If, while moving along, you are defeated by any situation, the reason for that is that there is some fluctuation in your following the codes of conduct. However, this confluence age is for becoming the highest of all beings, the ones who follow the highest codes of conduct. Neither man nor woman but the highest of all beings - constantly maintain this awareness and you will continue to move into the flying stage and not stop down below. Those who are in the flying stage are able to overcome all problems in a second.
 
Slogan:Stay in the company of the one Father and no other company will be able to influence you.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

25/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे “मीठे बच्चे - यह सृष्टि वा जमाना दु:ख का है इससे नष्टोमोहा बनो, नये जमाने को याद करो, बुद्धियोग इस दुनिया से निकाल नई दुनिया से लगाओ
 
प्रश्न: कृष्णपुरी में चलने के लिए तुम बच्चे कौन सी तैयारी करते और कराते हो?
उत्तर:कृष्णपुरी में चलने के लिए सिर्फ इस अन्तिम जन्म में सब विकारों को छोड़ पावन बनना और दूसरों को बनाना है। पावन बनना ही दु:खधाम से सुखधाम में जाने की तैयारी है। तुम सबको यही सन्देश दो कि यह डर्टी दुनिया है, इससे बुद्धियोग निकालो तो नई सतयुगी दुनिया में चले जायेंगे।
 
गीत:मुझको सहारा देने वाले....  ओम् शान्ति।
इस गीत में बच्चे कहते हैं कि बाबा। बच्चों की बुद्धि चली जाती है बेहद के बाप तरफ। जिन बच्चों को अब सुख मिल रहा है अथवा सुखधाम का रास्ता मिल रहा है। समझते हैं बरोबर बाप स्वर्ग के 21 जन्मों का सुख देने आया है। इस सुख की प्राप्ति के लिए स्वयं बाप आकर शिक्षा दे रहे हैं। समझा रहे हैं कि यह जो जमाना है अर्थात् इतने जो मनुष्य हैं वे कुछ भी दे नहीं सकते हैं। यह तो सब रचना है ना। आपस में भाई-बहन हैं। तो रचना एक दो को सुख का वर्सा दे कैसे सकते! सुख का वर्सा देने वाला जरूर एक रचयिता बाप ही होगा। इस जमाने में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो किसको सुख दे सके। सुखदाता सद्गति दाता है ही एक सतगुरू। अब सुख कौन सा मांगते हैं? यह तो सभी भूल गये हैं कि स्वर्ग में बहुत सुख थे और अभी नर्क में दु:ख है। तो जरूर सभी बच्चों पर मालिक को ही तरस पड़ेगा। बहुत हैं जो सृष्टि के मालिक को मानते हैं। परन्तु वह कौन हैं, उनसे क्या मिलता है वह कुछ पता नहीं है। ऐसे तो नहीं मालिक से हमको दु:ख मिला है। याद करते ही हैं उनको सुख शान्ति के लिए। भक्त भगवान को याद करते हैं जरूर प्राप्ति के लिए। दु:खी हैं तब सुख-शान्ति के लिए याद करते हैं। बेहद का सुख देने वाला एक है, बाकी हद का अल्पकाल सुख तो एक दो को देते ही रहते हैं। वह कोई बड़ी बात नहीं। भक्त सभी पुकारते हैं एक भगवान को, जरूर भगवान सबसे बड़ा है, उनकी महिमा बहुत बड़ी है। तो जरूर बहुत सुख देने वाला होगा। बाप कभी बच्चों को वा जमाने को दु:ख नहीं दे सकते। बाप समझाते हैं तुम विचार करो - मैं जो सृष्टि अथवा जमाना रचता हूँ तो क्या दु:ख देने के लिए? मैं तो रचता हूँ सुख देने के लिए। परन्तु यह ड्रामा सुख दु:ख का बना हुआ है। मनुष्य कितने दु:खी हैं। बाप समझाते हैं कि जब नया जमाना, नई सृष्टि होती है, तो उसमें सुख होता है। दु:ख पुरानी सृष्टि में होता है। सब कुछ पुराना जड़जड़ीभूत हो जाता है। पहले जो मैं सृष्टि रचता हूँ उसको सतोप्रधान कहा जाता है। उस समय सभी मनुष्य कितने सुखी रहते हैं। वह धर्म अब प्राय:लोप होने के कारण कोई की बुद्धि में नहीं है।
तुम बच्चे जानते हो नया जमाना सतयुग था। अब पुराना है तो आशा रखते हैं कि बाप जरूर नई दुनिया बनायेगा। पहले नई सृष्टि नये जमाने में बहुत थोड़े थे और बहुत सुखी थे, जिन सुखों का पारावार नहीं था। नाम ही कहते हैं स्वर्ग, वैकुण्ठ, नई दुनिया। तो जरूर उसमें नये मनुष्य होंगे। जरूर वह देवी-देवताओं की राजधानी मैंने स्थापना की होगी ना। नहीं तो जब कलियुग में एक भी राजा नहीं, सब कंगाल हैं। फिर एकदम सतयुग में देवी-देवताओं की राजाई कहाँ से आई? यह दुनिया बदली कैसे? परन्तु सभी की बुद्धि इतनी मारी हुई है जो कुछ भी समझते नहीं हैं। बाप आकर बच्चों को समझाते हैं। मनुष्य मालिक पर दोष धरते हैं कि वही सुख दु:ख देते हैं, परन्तु ईश्वर को तो याद ही करते हैं कि आकर हमको सुख- शान्ति दो। स्वीट होम में ले चलो। फिर पार्ट में तो जरूर भेजेंगे ना! कलियुग के बाद फिर सतयुग जरूर आना है। मनुष्य तो रावण की मत पर हैं। श्रेष्ठ मत तो है ही श्रीमत। बाप कहते हैं मैं सहज राजयोग सिखाता हूँ। मैं कोई गीता का श्लोक आदि नहीं गाता हूँ जो तुम गाते हो। क्या बाप बैठ गीता सिखायेंगे? मैं तो सहज राजयोग सिखाता हूँ। स्कूल में गीत कविताएं सुनाई जाती हैं क्या? स्कूल में तो पढ़ाया जाता है। बाप भी कहते हैं तुम बच्चों को मैं पढ़ा रहा हूँ, राजयोग सिखला रहा हूँ। मेरे साथ और कोई का भी योग नहीं है। सब मेरे को भूल गये हैं। यह भूलना भी ड्रामा में नूँध है। मैं आकर फिर याद दिलाता हूँ। मैं तो तुम्हारा बाप हूँ। मानते भी हो इनकारपोरियल गॉड है तो उनके तुम भी इनकारपोरियल बच्चे हो। निराकार आत्मायें, तुम फिर यहाँ आते हो पार्ट बजाने। सभी निराकार आत्माओं का निवास स्थान निराकारी दुनिया है, जो ऊंच ते ऊंच है। यह साकारी दुनिया फिर आकारी दुनिया और वह निराकारी दुनिया सबसे ऊपर तीसरे तबके पर है। बाप सम्मुख बैठ बच्चों को समझाते हैं, हम भी वहाँ के रहने वाले हैं। जब नई दुनिया थी तो वहाँ एक धर्म था, जिसको हेविन कहा जाता है। बाप को कहा ही जाता है हेविनली गॉड फादर। कलियुग है कंसपुरी। सतयुग है कृष्णपुरी। तो पूछना चाहिए अब तुम कृष्णपुरी चलेंगे? अगर तुम कृष्णुपरी चलने चाहते हो तो पवित्र बनो। जैसे हम तैयारी कर रहे हैं दु:खधाम से सुखधाम में चलने की, ऐसे तुम भी करो। उसके लिए विकार जरूर छोड़ने पड़ेंगे। यह सबका अन्तिम जन्म है। सभी को वापस जाना है। क्या तुम भूल गये हो - 5 हजार वर्ष पहले यह महाभारी लड़ाई नहीं लगी थी? जिसमें सभी धर्म विनाश हुए थे और एक धर्म की स्थापना हुई थी। सतयुग में देवी देवतायें थे ना। कलियुग में नहीं हैं। अब तो रावण राज्य है। आसुरी मनुष्य हैं। उन्हों को फिर देवता बनाना पड़े। तो उसके लिए आसुरी दुनिया में आना पड़े वा दैवी दुनिया में आयेंगे? वा दोनों के संगम पर आयेंगे? गाया भी हुआ है कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे-युगे आता हूँ। बाप हमको ऐसे समझाते हैं, हम उनकी श्रीमत पर हैं। कहते हैं मैं गाइड बन तुम बच्चों को वापिस ले जाने के लिए आया हूँ, इसलिए मुझे कालों का काल भी कहते हैं। कल्प पहले भी महाभारी लड़ाई लगी थी, जिससे स्वर्ग के द्वार खुले थे। परन्तु सभी तो वहाँ नहीं गये, सिवाए देवी-देवताओं के। बाकी सब शान्तिधाम में थे। तो मैं निर्वाणधाम का मालिक आया हूँ, सभी को निर्वाणधाम ले जाने। तुम रावण की जंजीरों में फँसे हुए विकारी मूत पलीती आसुरी गुणों वाले हो। काम है नम्बरवन डर्टी। फिर क्रोध, लोभ नम्बरवार डर्टी हैं। तो सारी दुनिया से नष्टोमोहा भी होना है तब तो स्वर्ग चलेंगे। जैसे बाप हद का मकान बनाते हैं तो बुद्धि उसमें लग जाती है। बच्चे कहते हैं बाबा इसमें यह बनाना, अच्छा मकान बनाना। वैसे बेहद का बाप कहते हैं मैं तुम्हारे लिए नई दुनिया स्वर्ग कैसा अच्छा बनाता हूँ। तो तुम्हारा बुद्धियोग पुरानी दुनिया से टूट जाना चाहिए। यहाँ रखा ही क्या है? देह भी पुरानी, आत्मा में भी खाद पड़ी हुई है। वह निकलेगी तब जब तुम योग में रहेंगे। ज्ञान भी धारण होगा। यह बाबा भाषण कर रहे हैं ना। हे बच्चे, तुम सभी आत्मायें मेरी रचना हो। आत्मा के स्वरूप में भाई-भाई हो। अब तुम सभी को मेरे पास वापिस आना है। अभी सब तमोप्रधान बन चुके हो। रावण राज्य है ना। तुम पहले नहीं जानते थे कि रावण राज्य कब से आरम्भ होता है। सतयुग में 16 कला हैं, फिर 14 कला होती हैं। तो ऐसे नहीं एकदम दो कला कम हो जाती हैं। धीरे- धीरे उतरते हैं। अभी तो कोई कला नहीं है। पूरा ग्रहण लगा हुआ है। अब बाप कहते हैं कि दे दान तो छूटे ग्रहण। 5 विकारों का दान दे दो और कोई पाप नहीं करो। भारतवासी रावण को जलाते हैं, जरूर रावण का राज्य है। परन्तु रावण राज्य किसको कहते हैं, राम राज्य किसको कहते हैं, यह भी नहीं जानते। कहते हैं रामराज्य हो, नया भारत हो परन्तु एक भी नहीं जानते कि नई दुनिया नया भारत कब होता है। सभी कब्र में सोये पड़े हैं।
अब तुम बच्चों को तो सतयुगी झाड़ देखने में आ रहे हैं। यहाँ तो कोई देवता है नहीं। तो यह बाप आकर सब समझाते हैं। मात-पिता तुम्हारा वही है, स्थूल में फिर यह मात-पिता हैं। तुम मात-पिता उनको गाते हो। सतयुग में तो ऐसे नहीं गायेंगे। वहाँ न कृपा की बात है, यहाँ मात-पिता का बनकर फिर लायक भी बनना पड़ता है। बाप स्मृति दिलाते हैं हे भारतवासी तुम भूल गये हो, तुम देवतायें कितने धनवान थे, कितने समझदार थे। अब बेसमझ बन देवाला मार दिया है। ऐसा बेसमझ माया रावण ने तुमको बनाया है, तब तो रावण को जलाते हो। दुश्मन का एफीजी बनाए उनको जलाते हैं ना। तुम बच्चों को कितनी नॉलेज मिलती है। परन्तु विचार सागर मंथन नहीं करते, बुद्धि भटकती रहती है तो ऐसी-ऐसी प्वाइन्ट्स भाषण में सुनाने भूल जाते हैं। पूरा समझाते नहीं हैं। तुमको तो बाप का पैगाम देना है कि बाबा आया हुआ है। यह महाभारी लड़ाई सामने खड़ी है। सभी को वापिस जाना है। स्वर्ग स्थापना हो रहा है। बाप कहते हैं देह सहित देह के सभी सम्बन्धों को भूल मुझे याद करो। बाकी सिर्फ ऐसे नहीं कहना है कि इस्लामी, बौद्धी आदि सब भाई-भाई हैं। यह तो सभी देह के धर्म हैं ना। सभी की जो आत्मायें हैं वह बाप की सन्तान हैं। बाप कहते हैं यह सब देह के धर्म छोड़ मामेकम् याद करो। यह बाप का मैसेज देने के लिए हम शिव जयन्ती मना रहे हैं। हम ब्रह्माकुमार कुमारियां शिव के पोत्रे हैं। हमको उनसे स्वर्ग की राजधानी का वर्सा मिल रहा है। बाप हमको पैगाम देते हैं कि मनमनाभव। इस योग अग्नि से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। अशरीरी बनो। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
रात्रि क्लास:
अभी तुम बच्चे स्थूलवतन, सूक्ष्मवतन और मूलवतन को अच्छी तरह समझ गये हो। सिर्फ तुम ब्राह्मण ही यह नॉलेज पाते हो। देवताओं को तो यह दरकार ही नहीं है। तुमको सारे विश्व की अब नॉलेज है। तुम पहले शूद्र वर्ण के थे। फिर ब्रह्माकुमार बने तो यह नॉलेज देते हैं जिससे तुम्हारी डीटी डिनायस्टी स्थापना हो रही है। बाप आकर ब्राह्मण कुल, सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी डिनायस्टी स्थापना करते हैं। वह भी इस संगम पर स्थापना करते हैं। और धर्म वाले फट से डिनायस्टी नहीं स्थापना करते हैं। उनको गुरू नहीं कहा जाता। बाप ही आकर धर्म की स्थापना करते हैं। बाप कहते हैं अभी सिर पर फुरना है बाप की याद का, जिसे घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। पुरूषार्थ कर धंधा आदि भी करते रहे और याद भी करते रहे हेल्दी बनने के लिये। बाप कमाई बड़ी जोर से कराते हैं, इसमें सभी कुछ भुलाना पड़ता है। हम आत्मा जा रही हैं, प्रैक्टिस कराई जाती है। खाते हो तो क्या बाप को याद नहीं कर सकते हो? कपड़ा सिलाई करते हैं बुद्धियोग बाप की याद में रहे। किचड़ा तो निकालना है। बाबा कहते हैं शरीर निर्वाह लिए भल कोई काम करो। है बहुत सहज। समझ गये हो 84 का चक्र पूरा हुआ। अब बाप राजयोग सिखाने आये हैं। यह वर्ल्ड की हिस्ट्री-जाग्राफी इस समय रिपीट होती है। कल्प पहले जैसे ही रिपीट हो रही है। रिपीटेशन का राज भी बाप ही समझाते हैं। वन गाड, वन रिलीजन भी कहते हैं ना। वहाँ ही शान्ति होगी। वह है अद्वैत राज्य, द्वैत माना आसुरी रावण राज्य। वह है देवता, यह है दैत्य। आसुरी राज्य और दैवी राज्य का भारत पर ही खेल बना हुआ है। भारत का आदि सनातन धर्म था, पवित्र प्रवृत्ति मार्ग था। फिर बाप आकर पवित्र प्रवृत्ति मार्ग बनाते हैं। हम सो देवता थे, फिर कला कम होती गई। हम सो शूद्र डिनायस्टी में आये। बाप पढ़ाते ऐसे हैं जैसे टीचर लोग पढ़ाते हैं, स्टूडेन्ट सुनते हैं। अच्छे स्टूडेन्ट पूरा ध्यान देते हैं, मिस नहीं करते हैं। यह पढ़ाई रेग्युलर चाहिए। ऐसी गॉडली युनिवर्सिटी में अपसेन्ट होनी नहीं चाहिए। बाबा गुह्य-गुह्य बातें सुनाते रहते हैं। अच्छा, गुडनाईट। रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) देह के सब धर्मों को छोड़, अशरीरी आत्मा समझ एक बाप को याद करना है। योग और ज्ञान की धारणा से आत्मा को पावन बनाना है।
2) बाप जो नॉलेज देते हैं, उस पर विचार सागर मंथन कर सबको बाप का पैगाम देना है। बुद्धि को भटकाना नहीं है।
 
वरदान:मर्यादा पुरूषोत्तम बन सदा उड़ती कला में उड़ने वाले नम्बरवन विजयी भव!
नम्बरवन की निशानी है हर बात में विन करने वाले। किसी भी बात में हार न हो, सदा विजयी। यदि चलते-चलते कभी हार होती है तो उसका कारण है मर्यादाओं में नीचे ऊपर होना। लेकिन यह संगमयुग है मर्यादा पुरूषोत्तम बनने का युग। पुरूष नहीं, नारी नहीं लेकिन पुरूषोत्तम हैं, इसी स्मृति में सदा रहो तो उड़ती कला में जाते रहेंगे, नीचे नहीं रूकेंगे। उड़ती कला वाला सेकण्ड में सर्व समस्यायें पार कर लेगा।
स्लोगन:एक बाप के श्रेष्ठ संग में रहो तो दूसरा कोई संग प्रभाव नहीं डाल सकता।

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Details ( Page:- Murali 26-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 26.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Tum moti choogne wale hans ho,tumhari hai hans mandali,tum lucky sitare ho,kyunki swayang gyan surya Baap tumhe samookh padha rahe hain.
Q-Baap ne sabhi baccho ko kaun si roshni di hai,jisse purusharth tibra ho gaya?
A-Baap ne roshni di,bacche ab is Drama ki ant hai,tumhe nayi duniya me chalna hai.Aise nahi jo milna hoga woh milega.Purusharth hai first.Pavitra bankar auro ko pavitra banana,yah bahut badi seva hai.Yah roshni aate he tum baccho ka purusharth tibra ho gaya.
 
Dharana ke liye mukhya saar:-
1)Sachche-sachche khudayi khidmatgar athawa Ishwariya salvation army ban sabko maya se liberate karna hai.Is jeevan me koudi se heere jaisa banna aur banana hai.
2)Jaise Baba bichaar sagar manthan karte hain,aise gyan ka bichaar sagar manthan karna hai.Kalyankari ban alokik seva me tatpar rehna hai.Dil ki sachchayi se seva karni hai.
 
Vardan:-Mere-pan ki smriti me sneh aur rahem ki dhristi prapt karne wale Samarthi Sampann bhava.
Slogan:Jo Baap ke pyare hain,unka anya kisi byakti wa vaibhav se pyaar ho nahi sakta.
 
ENGLISH SUMMARY - 26.01.18     
Sweet children, you are the swans who pick up pearls. Your group is the group of swans (hans mandli). You are the lucky stars because the Father, the Sun of Knowledge is personally teaching you Himself.
 
Question:What enlightenment has the Father given all of you children through which your efforts have become intense?
Answer:The Father has given you this enlightenment: Children, it is now the end of this drama. You have to go to the new world. Don't think that you will receive whatever you are to receive. First, there has to be effort. To become pure and purify others is a very great service. As soon as you children received this enlightenment your efforts became intense.
 
Song:You are the Ocean of Love. We thirst for one drop.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. Become true helpers of God, that is, become the Godly Salvation Army and liberate everyone from Maya. Become like a diamond from a shell in this life and also make others the same.
2. Just as Baba churns the ocean of knowledge, so churn the knowledge in the same way. Become benevolent and remain occupied in spiritual service. Serve with honesty in your heart.
Blessing:May you have the awareness of “mine” and receive the dristhi of love and mercy and become filled with power.
BapDada, the Ocean of Mercy, sees such children who recognise the Father and say from their hearts, “My Baba”. Then, in return, He gives multimillion fold spiritual love. The vision of mercy and love constantly enables such souls to move forward. This spiritual awareness of “mine” becomes a blessing for the children to fill themselves with power. BapDada does not need to give blessings through words, for every child continues to be sustained with subtle thoughts of love.
 
Slogan:Those who love the Father cannot have love for any other people or possessions.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

26/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे मीठे बच्चे - तुम मोती चुगने वाले हंस हो, तुम्हारी है हंसमण्डली, तुम लकी सितारे हो, क्योंकि स्वयं ज्ञान सूर्य बाप तुम्हें सम्मुख पढ़ा रहे हैं
 
प्रश्न:बाप ने सभी बच्चों को कौन सी रोशनी दी है, जिससे पुरूषार्थ तीव्र हो गया?
उत्तर:बाप ने रोशनी दी, बच्चे अब इस ड्रामा की अन्त है, तुम्हें नई दुनिया में चलना है। ऐसे नहीं जो मिलना होगा वह मिलेगा। पुरूषार्थ है फर्स्ट। पवित्र बनकर औरों को पवित्र बनाना, यह बहुत बड़ी सेवा है। यह रोशनी आते ही तुम बच्चों का पुरूषार्थ तीव्र हो गया।
 
गीत:तू प्यार का सागर है...   ओम् शान्ति।
 
बच्चे जानते हैं कि प्यार का सागर, शान्ति का सागर, आनन्द का सागर बेहद का बाप सम्मुख बैठ हमको शिक्षा दे रहे हैं। कितने लकी सितारे हैं, जिनको सम्मुख ज्ञान सूर्य बाप पढ़ा रहे हैं। अब जो बगुला मण्डली थी, वह हंसमंड ली बन गई है। मोती चुगने लग गये हैं। यह भाई-बहन सब हैं हंस, इनको हंस मण्डली भी कहा जाता है। कल्प पहले वाले ही इस समय, इस जन्म में एक दो को पहचानते हैं। रूहानी पारलौकिक माँ बाप और भाई बहन आपस में एक दो को पहचानते हैं। याद है कि 5 हजार वर्ष पहले भी हम आपस में इसी नाम रूप से मिले थे? यह तुम अभी कह सकते हो, फिर कभी भी कोई जन्म में ऐसे कह नहीं सकेंगे। जो भी ब्रह्माकुमार कुमारियाँ बनते हैं, वही एक दो को पहचानेंगे। बाबा आप भी वही हो, हम आपके बच्चे भी वही हैं, हम भाई-बहन फिर से अपने बाप से वर्सा लेते हैं। अभी बाप और बच्चे सम्मुख बैठे हैं फिर यह नाम-रूप आदि सब बदल जायेगा। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण ऐसे थोड़ेही कहेंगे कि हम वही कल्प पहले वाले लक्ष्मी-नारायण हैं वा प्रजा थोड़ेही कहेगी कि यह वही कल्प पहले वाले लक्ष्मी-नारायण हैं। नहीं। यह सिर्फ इस समय तुम बच्चे ही जानते हो। इस समय तुम बहुत कुछ जान जाते हो। पहले तो तुम कुछ नहीं जानते थे। मैं ही कल्प के संगमयुगे आकर अपनी पहचान देता हूँ। यह सिर्फ बेहद का बाप ही कह सकते हैं। नई दुनिया की स्थापना तो पुरानी दुनिया का विनाश भी जरूर होना चाहिए। यह है दोनों का संगमयुग। यह बहुत कल्याणकारी युग है। सतयुग को वा कलियुग को कल्याणकारी नहीं कहेंगे। तुम्हारा यह अभी का जीवन अमूल्य गाया हुआ है। इसी जीवन में कौड़ी से हीरे जैसा बनना है। तुम बच्चे सच्चे-सच्चे खुदाई खिदमतगार हो। ईश्वरीय सैलवेशन आर्मी हो। ईश्वर आकर माया से तुमको लिबरेट करते हैं। तुम जानते हो कि हमको इनपर्टाक्युलर (खास) और दुनिया को इनजनरल (आम) माया की जंजीरों से छुड़ाते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। अब बड़ाई किसको देवें? जिसकी एाक्टिंग अच्छी होती है, उनका ही नाम होता है। तो बड़ाई भी परमपिता परमात्मा को ही दी जाती है। अब धरती पर पापात्माओं का बहुत बोझ है। सरसों मिसल कितने ढेर मनुष्य हैं। बाप आकर बोझ उतारते हैं। वहाँ तो कुछ लाख ही होते हैं, तो क्या क्वार्टर परसेन्ट भी नहीं हुआ। तो इस ड्रामा को भी अच्छी रीति समझना है। परमात्मा को सर्वशक्तिमान् कहते हैं। यह भी उनका ड्रामा में पार्ट है। बाप कहते हैं मैं भी ड्रामा में बाँधा हुआ हूँ। यदा यदाहि धर्मस्य... लिखा हुआ है। अब वही धर्म की ग्लानि भी भारत में बरोबर है। मेरी भी ग्लानी करते हैं, देवताओं की भी ग्लानी करते हैं, इसलिए बहुत पाप आत्मा बन पड़े हैं। यह भी उन्हों को बनना ही है। सतो, रजो, तमो में आना ही है। तुम इस ड्रामा को समझ गये हो। बुद्धि में चक्र फिरता रहता है। बाप ने आकर रोशनी दी है। अभी इस ड्रामा की अन्त है। अब तुम फिर नई दुनिया के लिए पुरूषार्थ करो। ऐसे नहीं जो मिलना होगा वह मिलेगा। नहीं। पुरूषार्थ फर्स्ट। सारी ताकत पवित्रता में है। पवित्रता की बलिहारी है। देवतायें पवित्र हैं तब अपवित्र मनुष्य उन्हों के आगे जाकर माथा झुकाते हैं। सन्यासियों को भी माथा टेकते हैं। मरने के बाद उन्हों का यादगार बनाया जाता है क्योंकि पवित्र बने हैं। कोई-कोई जिस्मानी काम भी बहुत करते हैं। हॉस्पिटल खोलते हैं वा कालेज बनाते हैं तो उन्हों का भी नाम निकलता है। सबसे बड़ा नाम उनका है जो सबको पवित्र बनाते हैं और जो उनके मददगार बनते हैं। तुम पवित्र बनते हो, उस एवर-प्योर के साथ योग लगाने से। जितना तुम योग लगाते जायेंगे उतना तुम पवित्र बनते जायेंगे, फिर अन्त मती सो गति। बाप के पास चले जायेंगे। वो लोग यात्रा पर जाते हैं तो ऐसे नहीं समझते हैं कि बाप के पास जाना है। फिर भी पवित्र रहते हैं। यहाँ तो बाप सभी को पवित्र बनाते हैं। ड्रामा को भी समझना कितना सहज है। बहुत प्वॉइन्ट्स समझाते रहते हैं। फिर कहते हैं सिर्फ बाप और वर्से को याद करो। मरने समय सब भगवान की याद दिलाते हैं। अच्छा भगवान क्या करेगा? फिर कोई शरीर छोड़ते हैं तो कहते हैं स्वर्गवासी हुआ। गोया परमात्मा की याद में शरीर छोड़ने से वैकुण्ठ में चले जायेंगे। वो लोग बाप को जानते नहीं। यह भी किसकी बुद्धि में नहीं है कि हम बाप को याद करने से, वैकुण्ठ में पहुँच जायेंगे। वह सिर्फ कहते हैं परमात्मा को याद करो। अंग्रेजी में गॉड फादर कहते हैं। यहाँ तुम कहते हो परमपिता परमात्मा। वो लोग पहले गॉड फिर फादर कहते। हम पहले परमपिता फिर परमात्मा कहते। वह सबका फादर है। अगर सभी फादर हों तो फिर ओ गॉड फादर कह न सकें। थोड़ी सी बात भी नहीं समझ सकते। बाप ने तुमको सहज करके समझाया है। मनुष्य जब दु:खी होते हैं तो परमात्मा को याद करते हैं। मनुष्य हैं देह-अभिमानी और याद करती है देही (आत्मा) अगर परमात्मा सर्वव्यापी है तो फिर आत्मा (देही) क्यों याद करे? अगर आत्मा निर्लेप है फिर भी देही अथवा आत्मा क्या याद करती है? भक्तिमार्ग में आत्मा ही परमात्मा को याद करती है क्योंकि दु:खी है। जितना सुख मिला है उतना याद करना पड़ता है।
यह है पढ़ाई, एम-आबजेक्ट भी क्लीयर है। इसमें अंधश्रद्धा की कोई बात नहीं। तुम सभी धर्म वालों को जानते हो - इस समय सभी मौजूद हैं। अब फिर देवी-देवता धर्म की हिस्ट्री-रिपीट होनी है। यह कोई नई बात नहीं। कल्प-कल्प हम राज्य लेते हैं। जैसे वह हद का खेल रिपीट होता है वैसे यह बेहद का खेल है। आधाकल्प का हमारा दुश्मन कौन? रावण। हम कोई लड़ाई कर राज्य नहीं लेते हैं। न कोई हिंसक लड़ाई लड़ते हैं, न कोई जीत पहनने के लिए लश्किर लेकर लड़ते हैं। यह हार जीत का खेल है। परन्तु हार भी सूक्ष्म तो जीत भी सूक्ष्म। माया से हारे हार है, माया से जीते जीत है। मनुष्यों ने माया के बदले मन अक्षर डाल दिया है तो उल्टा हो गया है। यह ड्रामा में खेल भी पहले ही बना हुआ है। बाप खुद बैठ परिचय देते हैं। रचयिता को और कोई मनुष्य जानते ही नहीं, तो परिचय कैसे दे सकते। रचयिता है एक बाप, बाकी हम हैं रचना। तो जरूर हमको राज्य-भाग्य मिलना चाहिए। मनुष्य तो कह देते परमात्मा सर्वव्यापी है तो सब रचता हो गये। रचना को उड़ा दिया है, कितने पत्थरबुद्धि, दु:खी हो गये हैं। सिर्फ अपनी महिमा करते हैं कि हम वैष्णव हैं, गोया हम आधा देवता हैं। समझते हैं देवतायें वैष्णव थे। वास्तव में वेजीटेरियन का मुख्य अर्थ है अहिंसा परमोधर्म। देवताओं को पक्के वैष्णव कहा जाता है। ऐसे तो अपने को वैष्णव कहलाने वाले बहुत हैं। परन्तु लक्ष्मी-नारायण के राज्य में वैष्णव सम्प्रदाय पवित्र भी थे। अब उस वैष्णव सम्प्रदाय का राज्य कहाँ है? अब तुम ब्राह्मण बने हो, तुम ब्रह्माकुमार कुमारियां हो तो जरूर ब्रह्मा भी होगा, तब तो नाम रखा हुआ है शिववंशी प्रजापिता ब्रह्मा की औलाद। गाया भी जाता है कि शिवबाबा आया था, उसने ब्राह्मण सम्प्रदाय रची, जो ब्राह्मण फिर देवता बने। अब तुम शुद्र से ब्राह्मण बने हो तब ब्रह्माकुमार कुमारी कहलाते हो। विराट रूप के चित्र पर भी समझाना अच्छा है। विष्णु का ही विराट रूप दिखाया है। विष्णु और उसकी राजधानी (सन्तान) ही विराट चक्र में आते हैं। यह सब बाबा के विचार चलते हैं। तुम भी विचार सागर मंथन की प्रैक्टिस करेंगे तो रात्रि को नींद नहीं आयेगी। यही चिंतन चलता रहेगा। सुबह को उठ धन्धे आदि में लग जायेंगे। कहते हैं सुबह का सांई.... तुम भी किसको बैठ समझायेंगे तो कहेंगे - ओहो! यह तो हमको मनुष्य से देवता, बेगर से प्रिन्स बनाने आये हैं। पहले अलौकिक सेवा करनी चाहिए, स्थूल सर्विस बाद में। शौक चाहिए। खास मातायें बहुत अच्छी रीति सर्विस कर सकती हैं। माताओं को कोई धिक्कारेंगे नहीं। सब्जी वाले, अनाज वाले, नौकर आदि सबको समझाना है। कोई रह न जाए जो उल्हना देवे। सर्विस में दिल की सच्चाई चाहिए। बाप से पूरा योग चाहिए तब धारणा हो सके। वक्खर (सामग्री) भरकर फिर पोर्ट पर स्टीम्बर डिलेवरी करने जायें। उनको फिर घर में सुख नहीं आयेगा, भागता रहेगा। यह चित्र भी बहुत मदद देते हैं। कितना साफ है - शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी की स्थापना करा रहे हैं। यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ, कृष्ण ज्ञान यज्ञ नहीं। इस रूद्र ज्ञान यज्ञ से विनाश ज्वाला प्रज्जवलित हुई है। कृष्ण तो यज्ञ रच नहीं सकते। वह 84 जन्म लेंगे तो नाम-रूप बदल जायेगा और कोई रूप में कृष्ण हो न सके। कृष्ण का पार्ट तो जब उसी रूप में आये तब ही रिपीट करे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) सच्चे-सच्चे खुदाई खिदमतगार अथवा ईश्वरीय सैलवेशन आर्मी बन सबको माया से लिबरेट करना है। इस जीवन में कौड़ी से हीरे जैसा बनना और बनाना है।
2) जैसे बाबा विचार सागर मंथन करते हैं, ऐसे ज्ञान का विचार सागर मंथन करना है। कल्याणकारी बन अलौकिक सेवा में तत्पर रहना है। दिल की सच्चाई से सेवा करनी है।
 
वरदान:मेरे-पन की स्मृति से स्नेह और रहम की दृष्टि प्राप्त करने वाले समर्था सम्पन्न भव
 
जो बच्चे बाप को पहचान कर दिल से एक बार भी “मेरा बाबा कहते हैं तो रहम के सागर बापदादा ऐसे बच्चों को रिटर्न में पदमगुणा उसी रूहानी प्यार से देखते हैं। रहम और स्नेह की दृष्टि उन्हें सदा आगे बढ़ाती रहती है। यही रूहानी मेरे पन की स्मृति ऐसे बच्चों के लिए समर्था भरने की आशीर्वाद बन जाती है। बापदादा को मुख से आशीर्वाद देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है लेकिन सूक्ष्म स्नेह के संकल्प से हर बच्चे की पालना होती रहती है।
 
स्लोगन:जो बाप के प्यारे हैं, उनका अन्य किसी व्यक्ति वा वैभव से प्यार हो नहीं सकता।

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Details ( Page:- Murali 27-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 27.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Bhakto par jab bheed padi hai,bipda aayi hai tab Baap aaye hain,gyan se gati sadgati karne.
Q- Bikarmajeet kaun bante hain?Bikarmajeet banne walo ki nishaani kya hogi?
A-Bikarmajeet wohi bante jo karm-akarm aur bikarm ki gati ko jaan shrest karm karte hain.Bikarmajeet banne wale kabhi karm koot te nahi.Unke karm bikarm nahi bante.
Q-Is samay Baap double service kaun si karte hain?
A- Aatma aur sarir dono ko pawan bhi banate aur fir apne saath wapas ghar bhi le jate hain.Charitra ek Baap ke hain.Manushyo ke ho nahi sakte.
 
Dhrana ke liye mukhya saar:-
1)Ek Baap se he sarv roohani sambandh rakhne hain.Serviceable baccho ka kadar rakhna hai.Aap samaan banane ki seva karni hai.
2)Behad Baap dwara hume behad Biswa ka rajya bhagya mil raha hai.Dharti ashmaan sab par humara adhikar hoga-is nashe aur khushi me rehna hai.Baap aur varshe ko yaad karna hai.
 
Vardan:-Buddhi roopi vimaan dwara second me tino loko ka sair karne wale Sahajyogi bhava.
Slogan:-Shrest karm ka gyan he shrest bhagya ki lakeer khinchne ka kalam hai.
 
ENGLISH SUMMARY - 27.01.18     
Sweet children, it is when devotees experience difficulties and calamities that the Father comes to grant them salvation and liberation by giving knowledge.
Question:Who can become conquerors of sinful actions? What are the signs of those who become conquerors of sinful actions?
Answer:Those who understand the philosophy of karma, that of actions, neutral actions and sinful actions and who perform elevated actions, are the ones who become conquerors of sinful actions. Those who are to become conquerors of sinful actions never have to repent for their own actions. Their actions do not become sinful.
 
Question:What double service does the Father do at this time?
Answer:
The Father purifies both souls and bodies. He also takes you souls back home with Him. This divine activity is only performed by the Father, not by human beings.
 
Song:Salutations to Shiva.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. Have all spiritual relationships with the one Father. Appreciate the serviceable children. Serve to make others similar to yourself.
2. We receive our fortune of the kingdom of the unlimited world from the unlimited Father. We will have a right over the earth, the sky, everything; maintain this happiness and intoxication. Remember the Father and the inheritance.
 
Blessing:May you be an easy yogi who tours around the three worlds in a second with the plane of your intellect.
BapDada gives you children an invitation: Children, put on the switch of thoughts and come to the subtle region. Take the rays of the sun, the moonlight of the moon, have a picnic and play games. For this, the plane of your intellect simply needs to have refined petrol. “Double refined” means firstly, in the incorporeal to have the intoxication of this faith: I am a soul, a child of the Father. Secondly, in the corporeal form, to have the intoxication of all relationships. This intoxication and happiness will make you an easy yogi and you will also continue to tour around the three worlds.
Slogan:The knowledge of elevated actions is the pen with which to draw the line of elevated fortune.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

27/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे “मीठे बच्चे - भक्तों पर जब भीड़ पड़ी है, विपदा आई है तब बाप आये हैं, ज्ञान से गति सद्गति करने
 
प्रश्न:विकर्माजीत कौन बनते हैं? विकर्माजीत बनने वालों की निशानी क्या होगी?
उत्तर:विकर्माजीत वही बनते जो कर्म-अकर्म और विकर्म की गति को जान श्रेष्ठ कर्म करते हैं। विकर्माजीत बनने वाले कभी भी कर्म कूटते नहीं। उनके कर्म विकर्म नहीं बनते।
 
प्रश्न:इस समय बाप डबल सर्विस कौन सी करते हैं?
उत्तर:आत्मा और शरीर दोनों को पावन भी बनाते और फिर अपने साथ वापस घर भी ले जाते हैं। चरित्र एक बाप के हैं। मनुष्यों के हो नहीं सकते।
 
गीत:ओम् नमो शिवाए...  ओम् शान्ति।
यह गीत बच्चों ने सुना। जो भी भक्ति मार्ग वाले हैं, वह ऐसे गीत गाते हैं। घोर अन्धियारे से उजियारा चाहते हैं और दु:ख से छूटने की पुकार करते रहते हैं। तुम तो हो शिव वंशी ब्रह्माकुमार कुमारियां। यह तो समझने की बात है। इतने बच्चे कुख वंशावली तो हो नहीं सकते। जरूर मुख वंशावली होंगे। कृष्ण को इतनी रानियां अथवा बच्चे नहीं थे। गीता का भगवान तो राजयोग सिखलाते हैं, तो जरूर मुख वंशावली होंगे। प्रजापिता अक्षर तो नामीग्रामी है। इनके मुख से बाप आकर ब्राह्मण धर्म रचते हैं। प्रजापिता नाम बाप का शोभता है। अब तुम प्रैक्टिकल में उस बाप के बने हो। वह तो कह देते कि कृष्ण भी भगवान था, शिव भी भगवान था। रूद्र भगवान के बदले कृष्ण का नाम डाल दिया है। कहते भी हैं शंकर पार्वती, रूद्र पार्वती नहीं कहेंगे। शिव शंकर महादेव कहते हैं। अब कृष्ण कहाँ से आया। उनको तो रूद्र वा शंकर नहीं कहेंगे। भक्त गाते हैं परन्तु भगवान को नहीं जानते। भारत में वास्तव में सच्चे-सच्चे भक्त वह हैं, जो पूज्य थे वही अब पुजारी बने हैं। उनमें भी नम्बरवार हैं। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। तुम हो ब्राह्मण, वह हैं शूद्र। देवता धर्म वाले ही बहुत दु:खी होते हैं क्योंकि उन्होंने बहुत सुख भी देखे हैं। अब तुम्हारा दर-दर भटकना बन्द हो गया है, आधाकल्प के लिए। यह राज भी तुम ब्राह्मण ही जानते हो, सो भी नम्बरवार। जिन्होंने कल्प पहले जितना पुरूषार्थ किया था उतना ही अब करते हैं। ऐसे नहीं जो ड्रामा में होगा, फिर भी पुरूषार्थ का नाम आता है। ड्रामा को बच्चों से पुरूषार्थ कराना ही है। जैसा पुरूषार्थ वैसा पद मिलेगा। हम जानते हैं कल्प पहले भी ऐसा पुरूषार्थ किया था। ऐसे सितम हुए थे, यज्ञ में विघ्न पड़े थे।
तुम बच्चे जानते हो बाबा फिर से आया हुआ है। कल्प पहले भी इसी समय आया था जबकि अग्रेजों का राज्य था। जिन्हों से कांग्रेस ने राज्य लिया फिर पाकिस्तान हुआ। यह कल्प पहले भी हुआ था। गीता में यह बातें नहीं हैं। आखरीन समझ जायेंगे कि बरोबर अब वही समय है। कोई-कोई समझते हैं कि ईश्वर आ गया है। जब महाभारी लड़ाई लगी थी तो भगवान आया था। कहते ठीक हैं, सिर्फ नाम बदल दिया है। रूद्र नाम लेवें तो भी समझें कि ठीक है। रूद्र ने ज्ञान यज्ञ रचा था, जिससे दुनिया की विपदा टली थी। यह भी धीरे-धीरे तुम्हारे द्वारा पता लग जायेगा। इसमें अभी समय पड़ा है। नहीं तो यहाँ ऐसी भीड़ मच जाए जो तुम पढ़ भी न सको। यहाँ भीड़ का कायदा नहीं है। गुप्तवेश में काम चलता रहेगा। अब कोई बड़ा आदमी यहाँ आये तो कहेंगे इनका माथा खराब है। यह तो बाप तुम बच्चों को पढ़ा रहे हैं। देवता धर्म तो भगवान आकर रचेगा ना। वह अब आया है नई दुनिया रचने, भक्तों की भीड़ (विपदा) उतारने। विनाश के बाद तो कोई दु:ख होगा नहीं। वहाँ सतयुग में भक्त होते नहीं। न कोई ऐसे कर्म करेंगे जो दु:खी हों।
(बम्बई से रमेश भाई का फोन आया) बापदादा चले आते हैं तो बच्चे उदास होते हैं। जैसे स्त्री का पति विलायत में जाता है तो याद में रो पड़ती है। वह है जिस्मानी संबंध। यहाँ बाबा के साथ रूहानी संबंध है। बाबा से बिछुड़ते हैं तो प्रेम के आंसू आ जाते हैं। जो सर्विसएबुल बच्चे हैं, बाबा को उनका कदर है। सपूत बच्चों को फिर बाप का कदर रहता है। शिवबाबा का तो बहुत ऊंचे ते ऊंचा संबंध है। उनसे ऊंच संबंध तो कोई होता नहीं। शिवबाबा तो बच्चों को अपने से भी ऊंच बनाते हैं। पावन तो तुम बनते हो, परन्तु बाप समान एवर पावन नहीं हो सकते। हाँ पावन देवता बनते हो। बाप तो ज्ञान का सागर है। हम कितना भी सुनें तो भी ज्ञानसागर नहीं बन सकते। वह ज्ञान का सागर, आनंद का सागर है, बच्चों को आनंदमय बनाते हैं। और तो सिर्फ नाम रखवाते हैं। इस समय दुनिया में भक्त माला बड़ी लम्बी चौड़ी है। तुम्हारी है 16108 की माला। भक्त तो करोड़ों हैं। यहाँ भक्ति की बात नहीं। ज्ञान से ही सद्गति होती है। अब तुमको भक्ति की जंजीरों से छुड़ाया जाता है। बाबा कहते हैं सब भक्तों पर जब भीड़ होती है तब मुझे आना पड़ता है, सभी की गति सद्गति करने। स्वर्ग के देवताओं ने जरूर ऐसे कर्म किये हैं तब इतना ऊंच पद पाया है। कर्म तो मनुष्यों के चले आते हैं। परन्तु वहाँ कर्म कूटते नहीं। यहाँ कर्म विकर्म बनते हैं क्योंकि माया है। वहाँ माया होती नहीं। तुम विकर्माजीत बनते हो, जिन बच्चों को अभी कर्म अकर्म और विकर्म की गति समझाता हूँ वही विकर्माजीत बनेंगे। कल्प पहले भी तुम बच्चों को राजयोग सिखाया था, वही अब भी सिखला रहा हूँ। कांग्रेसियों ने फिरंगियों (अंग्रेजों) को निकाल राजाओं से राजाई छीन ली और राजा नाम ही गुम कर दिया। 5 हजार वर्ष पहले भारत राजस्थान था, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। देवताओं का राज्य था तो परिस्तान था। जरूर उन्हों को भगवान ने राजयोग सिखाया होगा तब उन्हों का नाम भगवती भगवान पड़ा है। परन्तु अभी अपने में ज्ञान है तो हम भगवती भगवान नहीं कह सकते। नहीं तो यथा राजा रानी तथा प्रजा भी भगवती भगवान होने चाहिए। परन्तु ऐसे हो नहीं सकता। लक्ष्मी-नारायण का नाम भी प्रजा में कोई अपने ऊपर रख न सके, लॉ नहीं है। विलायत में भी राजा का नाम कोई अपने ऊपर नहीं रखेंगे। उनकी बहुत इज्जत करते हैं। तो बच्चे समझते हैं 5 हजार वर्ष पहले बाप आया था। अब भी बाप आया है - दैवी राजस्थान स्थापना करने। शिवबाबा का आना भी अब हुआ है। वह है पाण्डवों का पति, न कि कृष्ण। बाप पण्डा बनकर आया है वापिस ले जाने के लिए और नई सतयुगी दुनिया रचने के लिए। तो जरूर ब्रह्मा द्वारा ही ब्राह्मण रचेंगे। कृष्ण तो हो न सके। मुख्य गीता को ही खण्डन कर दिया है। अब बाप समझाते हैं मैं कृष्ण नहीं हूँ। मुझे रूद्र वा सोमनाथ कह सकते हैं। तुमको ज्ञान सोमरस पिला रहा हूँ। बाकी लड़ाई आदि की कोई बात नहीं। तुमको योगबल से राजाई का माखन मिल जाता है। कृष्ण को माखन जरूर मिलता है। यह है कृष्ण के अन्तिम जन्म की आत्मा। इनको (ब्रह्मा सरस्वती को) भी बाप ऐसे कर्म सिखला रहे हैं जो भविष्य में लक्ष्मी-नारायण बन जाते हैं। यह लक्ष्मी-नारायण ही छोटे पन में राधे कृष्ण हैं इसलिए लक्ष्मी-नारायण के साथ राधे कृष्ण का भी चित्र दिया है। बाकी इनकी कोई बड़ाई नहीं है। चरित्र है एक गीता के भगवान का। वह शिवबाबा बच्चों को भिन्न-भिन्न साक्षात्कार कराते हैं। बाकी मनुष्य के कोई चरित्र नहीं हैं। क्राइस्ट आदि ने भी आकर धर्म स्थापना किया सो तो सभी को अपना पार्ट बजाना ही है, इसमें चरित्र की तो कोई बात ही नहीं। वह कोई को गति दे न सकें। अब बेहद का बाप कहते हैं कि मैं तुम बच्चों की डबल सर्विस करने आया हूँ, जिससे तुम्हारी आत्मा और शरीर दोनों पवित्र हो जायेंगे। सभी को वापिस घर मुक्तिधाम में ले जाता हूँ। फिर वहाँ से अपना-अपना पार्ट बजाने आयेंगे। कितना अच्छी रीति बच्चों को समझाते हैं। इन लक्ष्मी-नारायण के चित्र पर समझाना बड़ा सहज है। त्रिमूर्ति और शिवबाबा का चित्र भी है। कोई कहते हैं त्रिमूर्ति न हो, जैसे कोई कहते हैं कृष्ण के चित्र में 84 जन्मों की कहानी न हो। मनुष्य जब सुनते हैं कि कृष्ण भी 84 जन्म ले पतित बनते हैं तो उन्हें घबराहट आ जाती है। हम सिद्ध कर बतलाते हैं, जरूर पहले नम्बर वाले श्रीकृष्ण को सबसे जास्ती जन्म लेने पड़ेंगे। नई-नई प्वाइंट्स तो रोज आती हैं, परन्तु धारणा भी होनी चाहिए। सबसे सहज है लक्ष्मी-नारायण के चित्र पर समझाना। मनुष्य थोड़ेही कोई भी चित्र का अर्थ समझते हैं। उल्टा सुल्टा चित्र बना देते हैं। नारायण को दो भुजायें तो लक्ष्मी को 4 भुजायें दे देते हैं। सतयुग में इतनी भुजायें होती नहीं। सूक्ष्मवतन में तो हैं ही ब्रह्मा विष्णु शंकर। उन्हों को भी इतनी भुजायें हो नहीं सकती। मूलवतन में हैं ही निराकारी आत्मायें। फिर यह 8-10 भुजा वाले कहाँ के रहने वाले हैं। मनुष्य सृष्टि में रहने वाले पहले-पहले हैं लक्ष्मीनारा यण, दो भुजा वाले। परन्तु उनको 4 भुजायें दे दी हैं। नारायण को सांवरा तो लक्ष्मी को गोरा दिखाते हैं। तो उनके जो बच्चे होंगे, वह कैसे और कितनी भुजाओं वाले होंगे? क्या बच्चे को 4 भुजा, बच्ची को दो भुजा होंगी क्या? ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछ सकते हो। बच्चों को समझाया है हमेशा ऐसे समझो कि हमको शिवबाबा मुरली सुनाते हैं। कभी यह (ब्रह्मा) भी सुनाते हैं। शिवबाबा कहते हैं मैं गाइड बनकर आया हूँ। यह ब्रह्मा है मेरा बच्चा बड़ा। कहते हैं त्रिमूर्ति ब्रह्मा। त्रिमूर्ति शंकर वा विष्णु नहीं कहेंगे। महादेव शंकर को कहते हैं। फिर त्रिमूर्ति ब्रह्मा क्यों कहते हैं? इसने प्रजा रची है तो यह उनकी (शिवबाबा की) वन्नी (युगल) बनते हैं। शंकर वा विष्णु को वन्नी नहीं कहेंगे। यह बहुत वन्डरफुल बातें समझने की हैं। यहाँ सिर्फ बाप और वर्से को याद करना है। बस इसमें ही मेहनत है। अभी तुम कितने समझदार बने हो। बेहद के बाप द्वारा तुम बेहद के मालिक बनते हो। यह धरती, यह आसमान सब तुम्हारा हो जायेगा। ब्रह्माण्ड भी तुम्हारा हो जायेगा। आलमाइटी अथॉरिटी राज्य होगा। वन गवर्मेन्ट होगी। जब सूर्यवंशी गवर्मेन्ट थी तो चन्द्रवंशी नहीं थे। फिर चन्द्रवंशी होते हैं तो सूर्यवंशी नहीं। वह पास्ट हो गया। ड्रामा पलट गया। यह बड़ी वन्डरफुल बातें हैं। बच्चों को कितना खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। बेहद के बाप से हम बेहद का वर्सा जरूर लेंगे। उस पति को कितना याद करते हैं। यह बेहद की बादशाही देने वाला है। ऐसे पतियों के पति को कितना याद करना पड़े। कितनी भारी प्राप्ति होती है। वहाँ तुम कोई से कभी भीख नहीं मांगते हो। वहाँ गरीब होते नहीं। बेहद का बाप भारत की झोली भर देते हैं। लक्ष्मी-नारायण के राज्य को गोल्डन एज कहा जाता है। अब है आइरन एज, फर्क देखो कितना है। बाप कहते हैं मैं बच्चों को राजयोग सिखला रहा हूँ। तुम सो देवी-देवता थे फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बने। अब फिर सो ब्राह्मण बने हो, फिर सो देवता बनेंगे। इस 84 के चक्र को तुम याद करो। चित्रों पर समझाना बड़ा सहज है। जब देवी-देवताओं का राज्य था तो कोई और राज्य नहीं था। एक ही राज्य था, बहुत थोड़े थे। उसको कहा जाता है स्वर्ग, वहाँ पवित्रता भी थी, सुख-शान्ति भी थी। पुनर्जन्म लेते-लेते नीचे आये हैं। 84 जन्म भी इन्होंने लिये हैं, यही तमोप्रधान बन जाते हैं। फिर उन्हों को ही सतोप्रधान होना है। सतोप्रधान कैसे बनें, जरूर सिखलाने वाला चाहिए। सिवाए बाप के कोई सिखला न सके। तुम जानते हो शिवबाबा इनके बहुत जन्मों के अन्त में इनमें प्रवेश करते हैं। कितना साफ करके समझाते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) एक बाप से ही सर्व रूहानी सम्बन्ध रखने हैं। सर्विसएबुल बच्चों का कदर रखना है। आप समान बनाने की सेवा करनी है।
2) बेहद बाप द्वारा हमें बेहद विश्व का राज्य भाग्य मिल रहा है। धरती आसमान सब पर हमारा अधिकार होगा - इस नशे और खुशी में रहना है। बाप और वर्से को याद करना है।
 
वरदान:बुद्धि रूपी विमान द्वारा सेकण्ड में तीनों लोकों का सैर करने वाले सहजयोगी भव!
 
बापदादा बच्चों को निमन्त्रण देते हैं कि बच्चे संकल्प का स्विच आन करो और वतन में पहुंच कर सूर्य की किरणें लो, चन्द्रमा की चांदनी भी लो, पिकनिक भी करो और खेलकूद भी करो। इसके लिए सिर्फ बुद्धि रूपी विमान में डबल रिफाइन पेट्रोल की आवश्यकता है। डबल रिफाइन अर्थात् एक निराकारी निश्चय का नशा कि मैं आत्मा हूँ, बाप का बच्चा हूँ, दूसरा साकार रूप में सर्व संबंधों का नशा। यह नशा और खुशी सहजयोगी भी बना देगी और तीनों लोकों का सैर भी करते रहेंगे।
 
स्लोगन:श्रेष्ठ कर्म का ज्ञान ही श्रेष्ठ भाग्य की लकीर खींचने का कलम है।

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Details ( Page:- Murali 28-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 28.01.18  
   Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban ( 24-04-83)
Ruhani Personality
Vardan – Abhyash ki exercise dwara sukhma shaktiyon ki Jeevan mei samane wale Shakti sampanna bhav.
Slogan – Swaman mei sthit rahnewali atma dusro ko bhi maan de agge badhati hai
 
ENGLISH SUMMARY - 28.01.18     
Headline - Spiritual Personality.
Blessing:May you be filled with all powers and by practising exercise, fill your life with subtle powers.
Mother Brahma has spiritual motherly attachment for you children and with the invocation of subtle love, he therefore makes a special group of you children emerge in the subtle region and feeds you with the nourishment of powers. Just as they were fed ghee here and also made to do exercise, in the same way, he also feeds you ghee in the subtle region, that is, he gives you things with subtle powers and also makes you practise exercise. He makes you race around the three worlds, so that there can be special hospitality in your lives and all the children become filled with powers.
Slogan:Souls who remain stable in their self-respect give respect to others and move forward.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

28-01-18 प्रात:मुरली

ओम् शान्ति “अव्यक्त-महावाक्य रिवाइज:24-04-83   मधुबन

 
"रूहानी पर्सनैलिटी"
आज बापदादा विश्व की सर्व आत्माओं प्रति प्रत्यक्ष जीवन का प्रमाण देने वाले बच्चों से मिलने आये हैं। कुमार सो ब्रह्माकुमार, तपस्वी कुमार, राजऋषि कुमार, सर्व त्याग से भाग्य प्राप्त करने वाले कुमार ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं का आज विशेष संगठन है। कुमार जीवन शक्तिशाली जीवन गाई जाती है। लेकिन ब्रह्माकुमार डबल शक्तिशाली कुमार हैं। एक तो शारीरिक शक्ति, दूसरी आत्मिक शक्ति। साधारण कुमार शारीरिक शक्ति वा विनाशी आक्यूपेशन की शक्ति वाले हैं। ब्रह्माकुमार अविनाशी ऊंचे ते ऊंचे मास्टर सर्वशक्तिवान के आक्यूपेशन के शक्तिशाली हैं। आत्मा पवित्रता की शक्ति से जो चाहे वह कर सकती है। ब्रह्माकुमारों का संगठन विश्व परिवर्तक संगठन है। सभी अपने को ऐसे शक्तिशाली समझते हो? अपने को पवित्रता का जन्म-सिद्ध अधिकार प्राप्त किया हुआ अधिकारी आत्मा समझते हो? ब्रह्माकुमार का अर्थ ही है पवित्र कुमार। ब्रह्मा बाप ने दिव्य जन्म देते “पवित्र भव, योगी भव यही वरदान दिया। ब्रह्मा बाप ने जन्मते ही बड़ी माँ के रूप में पवित्रता के प्यार से पालना की। माँ के रूप से सदा पवित्र बनो, योगी बनो, श्रेष्ठ बनो, बाप समान बनो, विशेष आत्मा बनो, सर्वगुण मूर्त बनो, ज्ञान मूर्त बनो, सुख शान्ति स्वरूप बनो, हर रोज यह लोरी दी। बाप के याद की गोदी में पालना किया। सदा खुशियों के झूले में झुलाया। ऐसे मात-पिता के श्रेष्ठ बच्चे ब्रह्माकुमार वा कुमारी हैं। ऐसा स्मृति का समर्थ नशा रहता है? ब्रह्माकुमार के विशेष जीवन के महत्व को सदा याद रखते हो? सिर्फ नामधारी ब्रह्माकुमार तो नहीं? अपने आपको श्रेष्ठ जीवनधारी ब्रह्माकुमार समझते हो? सदा यह याद रहता है कि विश्व की विशाल स्टेज पर पार्ट बजाने वाले विशेष पार्टधारी हैं? वा सिर्फ घर में वा सेवाकेन्द्र पर वा दफ्तर में पार्ट बजाने वाले हैं? हर कर्म करते विश्व की आत्मायें हमें देख रही हैं, यह स्मृति में रहता है? विश्व की आत्मायें जिस नजर से आप सबको देखती हैं - यही विशेष पार्टधारी अर्थात् हीरो पार्टधारी हैं, उसी प्रमाण हर कर्म करते रहते हो? वा यह याद रहता है कि साधारण रूप से आपस में बोल रहे हैं, चल रहे हैं?
ब्रह्माकुमार का अर्थ ही है - सदा प्युरिटी की पर्सनैलिटी और रॉयल्टी में रहना। यही प्युरिटी की पर्सनैलिटी विश्व की आत्माओं को प्युरिटी की तरफ आकर्षित करेगी। और यही प्युरिटी की रॉयल्टी धर्मराजपुरी की रायलिटी देने से छुड़ायेगी। रॉयल्टी के दोनों ही अर्थ होते हैं। इसी रॉयल्टी के अनुसार भविष्य रॉयल फैमली में आ सकेंगे। तो चेक करो ऐसी रॉयल्टी और पर्सनैलिटी जीवन में अपनाई है? यूथ ग्रुप पर्सनैलिटी को ज्यादा बनाती है ना! तो अपनी रूहानी पर्सनैलिटी अविनाशी पर्सनैलिटी अपनाई है? जो भी देखे हरेक ब्रह्माकुमार और कुमारी से यह पर्सनैलिटी अनुभव करे। शरीर की पर्सनैलिटी वह तो आत्माओं को देहभान में लाती है और प्युरिटी की पर्सनैलिटी देही-अभिमानी बनाए बाप के समीप लाती है। तो विशेष कुमार ग्रुप को अब क्या सेवा करनी है? एक तो अपने जीवन परिवर्तन द्वारा आत्माओं की सेवा, अपने जीवन के द्वारा आत्माओं को जीयदान देना। स्व-परिवर्तन द्वारा औरों को परिवर्तन करना। अनुभव कराओ कि ब्रह्माकुमार अर्थात् वृत्ति, दृष्टि, कृति और वाणी परिवर्तन। साथ-साथ प्युरिटी की पर्सनैलिटी, रूहानी रॉयल्टी का अनुभव कराओ। आते ही, मिलते ही इस पर्सनैलिटी की ओर आकर्षित हों। सदा बाप का परिचय देने वाले वा बाप का साक्षात्कार कराने वाले रूहानी दर्पण बन जाओ। जिस चित्र और चरित्र से सर्व को बाप ही दिखाई दे। किसने बनाया? बनाने वाला सदा दिखाई दे। जब भी कोई वन्डरफुल वस्तु को देखते हैं वा वन्डरफुल परिवर्तन देखते हैं तो सबके मन से, मुख से यही आवाज निकलता है कि किसने बनाई वा यह परिवर्तन कैसे हुआ! किस द्वारा हुआ! यह तो जानते हो ना। इतना बड़ा परिवर्तन जो कौड़ी से हीरा बन जाए तो सबके मन में बनाने वाला स्वत: ही याद आयेगा। कुमार ग्रुप भाग-दौड़ बहुत करता है। सेवा में भी बहुत भाग दौड़ करते हो ना! लेकिन सेवा के क्षेत्र में भाग दौड़ करते बैलेन्स रखते हो? स्व सेवा और सर्व की सेवा दोनों का बैलेन्स सदा रहता है? बैलेन्स नहीं होगा तो सेवा की भाग दौड़ में माया भी बुद्धि की भाग दौड़ करा देती है।
बैलेन्स से कमाल होती है। बैलेन्स रखने वाले का परिणाम सेवा में भी कमाल होगी। नहीं तो बाहरमुखता के कारण कमाल के बजाए अपने वा दूसरों के भाव-स्वभाव की धमाल में आ जाते हो। तो सदा सर्व की सेवा के साथ-साथ पहले स्व सेवा आवश्यक है। यह बैलेन्स सदा स्व में और सेवा में उन्नति को प्राप्त कराता रहेगा। कुमार तो बहुत कमाल कर सकते हैं। कुमार जीवन के परिवर्तन का प्रभाव जितना दुनिया पर पड़ेगा उतना बड़ों का नहीं। कुमार ग्रुप गवर्मेन्ट को भी अपने परिवर्तन द्वारा प्रभु परिचय दे सकते हो। गवर्मेन्ट को भी जगा सकते हो, लेकिन वह परीक्षा लेंगे। ऐसे ही नहीं मानेंगे। तो ऐसे कुमार तैयार है? गुप्त सी.आई.डी. आपके पेपर लेंगे कि कहाँ तक विकारों पर विजयी बने हैं? आप सबके नाम गवर्मेन्ट में भेजें? 500 कुमार भी कोई कम थोड़ेही हैं। सबने लेजर में अपना नाम और एड्रेस भरा है ना। तो आपकी लिस्ट भेजें? सभी सोच रहे हैं पता नहीं कौन से सी.आई.डी. आयेंगे! जान बूझ कर क्रोध दिलायेंगे। पेपर तो प्रैक्टिकल लेंगे ना! प्रैक्टिकल पेपर देने लिए तैयार हो? बापदादा के पास सबका हाँ और ना फिल्म की रीति से भर जाता है। यह लक्ष्य रखो कि ऐसा रूहानी आत्मिक शक्तिशाली यूथ ग्रुप बनावें जो विश्व को चैलेन्ज करे कि हम रूहानी यूथ ग्रुप विश्व शान्ति की स्थापना के कार्य में सदा सहयोगी हैं। और इसी सहयोग द्वारा विश्व परिवर्तन करके दिखायेंगे। समझा क्या करना है। ऐसा पक्का ग्रुप हो। ऐसे नहीं आज चैलेन्ज करे और कल स्वयं ही चेन्ज हो जाएं। तो ऐसा संगठन तैयार करो। मैजारटी नये-नये कुमार हैं। लेकिन लास्ट सो फास्ट जाकर दिखाओ। बैलेन्स की कमाल से विश्व को कमाल दिखाओ। अच्छा !
ऐसे सदा स्व परिवर्तन द्वारा सर्व का परिवर्तन करने वाले, अपने जन्म-सिद्ध वरदान वा अधिकार, ’योगी भव, पवित्र भव को सदा जीवन में अनुभव कराने वाले, सदा प्युरिटी की पर्सनैलिटी द्वारा अन्य आत्माओं को बाप तरफ आकर्षित कराने वाले, अविनाशी आक्यूपेशन के नशे में रहने वाले, मात पिता की श्रेष्ठ पालना का परिवर्तन द्वारा रिटर्न देने वाले ऐसे रूहानी रॉयल्टी वाली विशेष आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
पार्टियों के साथ:
1- सदा अपने को डबल लाइट अर्थात् सर्व बन्धनों से मुक्त हल्के समझते हो? हल्के-पन की निशानी क्या है? हल्का सदा उड़ता रहेगा। बोझ नीचे ले आता है। सदा स्वयं को बाप के हवाले करने वाले सदा हल्के रहेंगे। अपनी जिम्मेवारी बाप को दे दो अर्थात् अपना बोझ बाप को दे दो तो स्वयं हल्के हो जायेंगे। बुद्धि से सरेन्डर हो जाओ। अगर बुद्धि से सरेन्डर होंगे तो और कोई बात बुद्धि में नहीं आयेगी। बस सब कुछ बाप का है, सब कुछ बाप में है तो और कुछ रहा ही नहीं। जब रहा ही नहीं तो बुद्धि कहाँ जायेगी, कोई पुरानी गली, पुराने रास्ते रह तो नहीं गये हैं! बस एक बाप, एक ही याद का रास्ता, इसी रास्ते से मंजिल पर पहुँचो।
2- सदा खुशी के झूले में झूलने वाले हो ना। कितना बढि़या झूला बापदादा से प्राप्त हुआ है। यह झूला कभी टूट तो नहीं जाता। याद और सेवा की दोनों रस्सियाँ टाइट हैं तो झूला सदा ही एकरस रहता है। नहीं तो एक रस्सी ढीली, एक टाइट तो झूला हिलता रहेगा। झूला हिलेगा तो झूलने वाला गिरेगा। अगर दोनों रस्सियाँ मजबूत हैं तो झूलने में मनोरंजन होगा। अगर गिरे तो मनोरंजन के बजाए दु:ख हो जायेगा। तो याद और सेवा दोनों रस्सियाँ समान रहें, फिर देखो ब्राह्मण जीवन का कितना आनंद अनुभव करते हो। सर्वशक्तिवान बाप का साथ है, खुशियों का झूला है और चाहिए ही क्या।
3- सदा बाप और सेवा दोनों ही याद रखते हैं ना! याद और सेवा दोनों का बैलेन्स सदा रखते हो? क्योंकि याद के बिना सेवा सफल नहीं होती और सेवा के बिना मायाजीत नहीं बन सकते, क्योंकि सेवा में बिजी रहने से, इस ज्ञान का मनन करने से माया सहज ही किनारा कर लेती है। बिना याद के सेवा करेंगे तो सफलता कम और मेहनत ज्यादा। और याद में रहकर सेवा करेंगे तो सफलता ज्यादा और मेहनत कम। तो दोनों का बैलेन्स रहता है? बैलेन्स रखने वाले को स्वत: ही ब्लैसिंग मिलती रहती, मांगना नहीं पड़ता। जिन आत्माओं की सेवा करते, उन आत्माओं के मन से, वाह श्रेष्ठ आत्मा सुनाने वाली, वाह मेरी तो जीवन बदल दी...यह वाह-वाह ही आशीर्वाद बन जाती है। ऐसी आशीर्वाद का अनुभव करते हो? जिस दिन याद में रहकर सेवा करेंगे उस दिन अनुभव करेंगे बिना मेहनत के नैचुरल खुशी। ऐसी खुशी का अनुभव है ना! इसी आधार से सभी आगे बढ़ते जा रहे हो। समझते हो कि हर समय हमारी स्व उन्नति और विश्व उन्नति होती जा रही है? अगर स्व उन्नति नहीं तो विश्व उन्नति के भी निमित्त नहीं बन सकेंगे। स्व उन्नति का साधन है याद और विश्व उन्नति का साधन है सेवा। सदा इसी में आगे बढ़ते चलो। संगम पर बाप ने सबसे बड़ा खजाना कौन सा दिया है? खुशी का। कितने प्रकार की खुशी का खजाना प्राप्त है। अगर खुशी की वैरायटी प्वाइंटस निकालो तो कितने प्रकार की होंगी! संगमयुग पर सबसे बड़े ते बड़ी सौगात, खजाना, पिकनिक का सामान... सब खुशी है। रोज अमृतवेले खुशी की एक प्वाइंट सोचो...तो सारा दिन खुशी में रहेंगे। कई बच्चे कहते हैं मुरली में तो रोज वही प्वाइंट होती है, लेकिन जो प्वाइंट पक्की नहीं हुई है वह पक्की कराने के लिए रोज देनी पड़ती है। जैसे स्कूल में स्टूडेन्ट कोई बात पक्की याद नहीं करते तो 50 बार भी वही बात लिखते हैं, तो बापदादा भी रोज कहते बच्चे अपने को आत्मा समझो और मुझे याद करो क्योंकि यह प्वाइंट अभी तक कच्ची है। तो रोज खुशी की नई-नई प्वाइंट्स बुद्धि में रखो और सारा दिन खुशी में रहते दूसरों को भी खुशी का दान देते रहो - यही सबसे बड़े ते बड़ा दान है। दुनिया में अनेक साधन होते हुए भी अन्दर की सच्ची अविनाशी खुशी नहीं है, आपके पास वही खुशी है तो खुशी का दान देते रहो।
4- सदा अपने को कमल पुष्प समान पुरानी दुनिया के वातावरण से न्यारे और एक बाप के प्यारे, ऐसा अनुभव करते हो? जो न्यारा वही प्यारा और जो प्यारा वही न्यारा। तो कमल समान हो या वातावरण में रहकर उसके प्रभाव में आ जाते हो? जहाँ भी जो भी पार्ट बजा रहे हो, वहाँ पार्ट बजाते पार्ट से सदा न्यारे रहते हो या पार्ट के प्यारे बन जाते हो, क्या होता है? कभी योग लगता, कभी नहीं लगता इसका भी कारण क्या है? न्यारेपन की कमी। न्यारे न होने के कारण प्यार का अनुभव नहीं होता। जहाँ प्यार नहीं वहाँ याद कैसे आयेगी। जितना ज्यादा प्यार उतना ज्यादा याद। बाप के प्यार के बजाए दूसरों के प्यारे हो जाते हो तो बाप भूल जाता है। पार्ट से न्यारा और बाप का प्यारा बनो, यही लक्ष्य और प्रैक्टिकल जीवन हो। लौकिक में पार्ट बजाते प्यारे बने तो प्यार का रिटर्न क्या मिला? कांटों की शैया ही मिली ना! बाप के प्यार में रहने से सेकण्ड में क्या मिलता है? अनेक जन्मों का अधिकार प्राप्त हो जाता है। तो सदा पार्ट बजाते हुए न्यारे रहो। सेवा के कारण पार्ट बजा रहे हो। सम्बन्ध के आधार पर पार्ट नहीं, सेवा के सम्बन्ध से पार्ट। देह के सम्बन्ध में रहने से नुकसान है, सेवा का पार्ट समझ कर रहो तो न्यारे रहेंगे। अगर प्यार दो तरफ है तो एकरस स्थिति का अनुभव नहीं हो सकता है।
 
वरदान:अभ्यास की एक्सरसाइज द्वारा सूक्ष्म शक्तियों को जीवन में समाने वाले शक्ति सम्पन्न भव!
 
ब्रह्मा माँ की बच्चों में रूहानी ममता है इसलिए सूक्ष्म स्नेह के आह्वान से बच्चों के स्पेशल ग्रुप वतन में इमर्ज कर शक्तियों की खुराक खिलाते हैं। जैसे यहाँ घी पिलाते थे और साथ-साथ एक्सरसाइज कराते थे, ऐसे वतन में भी घी पिलाते अर्थात् सूक्ष्म शक्तियों की चीजें देते और अभ्यास की एक्सरसाइज भी कराते। तीनों लोकों में दौड़ की रेस कराते, जिससे विशेष खातिरी जीवन में समा जाए और सभी बच्चे शक्ति सम्पन्न बन जाएं।
 
स्लोगन:स्वमान में स्थित रहने वाली आत्मा दूसरों को भी मान दे आगे बढ़ाती है।

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Details ( Page:- Murali 29-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 29.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Krodh bahut dukhdayi hai,yah apne ko bhi dukhi karta to dusre ko bhi dukhi karta,isiliye Shrimat par in bhooto par bijay prapt karo.
Q-Kalp-kalp ka daag kin baccho par lagta hai?Unki gati kya hoti hai?
A- Jo apne ko bahut hoshiyar samajhte,Shrimat par poora nahi chalte.Andar koi na koi bikar gupt wo pratykash roop me hai,usey nikalte nahi.maya gherav karti rehti hai.Aise baccho par kalp-kalp ka daag lag jata hai.unhe fir ant me bahut pachtana padega.Wo apne ko ghata daalte hain.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1)Serviceable banne ke liye bikaro ke ansh ko bhi samapt karna hai.Service ke prati oochalte rehna hai.
2)Hum Ishwariya santan hain,Shrimat par Bharat ko Vishnu puri bana rahe hain,jahan sab pakke Vaishnav honge...is nashe me rehna hai.
Vardan:-Ek himmat ki bishesta dwara sarv ka sahayog prapt kar aagey badhne wali Bishesh Aatma bhava.
Slogan:-Buddhi se itne halke raho jo Baap apni palko par bithakar saath le jaye.
 
ENGLISH SUMMARY - 29.01.18     
Sweet children, anger causes a lot of sorrow.     It causes pain to yourself and also to others.Therefore, conquer this evil spirit by following shrimat.
 
Question:Which children have a stain in them every cycle and what will be their destination?
Answer:Those who consider themselves to be very clever and do not follow shrimat completely. One vice or another remains in them in either an incognito way or in a visible form. They do not remove it. Maya continues to surround such souls. There is a flaw in such children every cycle. They will have to repent a great deal at the end. They make a great loss.
 
Song:Human beings of today are in darkness.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. In order to become serviceable, remove any trace of vice. Have a lot of enthusiasm for doing service.
2. We are the children of God. On the basis of shrimat, we are changing Bharat into the land of Vishnu where everyone will be firm Vaishnavs (pure vegetarians). Maintain this intoxication.
 
Blessing:May you be a special soul who receives everyone’s co-operation and moves forward with just the speciality of courage.
The children who remain courageous and fearless move forward by receiving the Father’s help automatically. With the speciality of courage, you receive everyone’s co-operation. With this one speciality, all other specialities come automatically. Take one step forward and you claim a right to many steps of co-operation. Continue to donate and bless others with this speciality, that is, use your speciality for service and you will become a special soul.
 
Slogan:In your intellect remain so light that the Father sits you on His eyelids and takes you back with Him.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

29/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे “मीठे बच्चे - क्रोध बहुत दु:खदाई है, यह अपने को भी दु:खी करता तो दूसरे को भी दु:खी करता, इसलिए श्रीमत पर इन भूतों पर विजय प्राप्त करो
 
प्रश्न:कल्प-कल्प का दाग किन बच्चों पर लगता है? उनकी गति क्या होती है?
 
उत्तर:जो अपने को बहुत होशियार समझते, श्रीमत पर पूरा नहीं चलते। अन्दर कोई न कोई विकार गुप्त व प्रत्यक्ष रूप में है, उसे निकालते नहीं। माया घेराव करती रहती है। ऐसे बच्चों पर कल्प-कल्प का दाग लग जाता है। उन्हें फिर अन्त में बहुत पछताना पड़ेगा। वह अपने को घाटा डालते हैं।
 
गीत:-आज अन्धेरे में है इंसान...  ओम् शान्ति।
 
बच्चे जानते हैं कि बेहद का बाप जिसको हेविनली गॉड फादर कहा जाता है वह सबका बाप है। वह बच्चों को सम्मुख बैठ समझाते हैं। बाप तो सभी बच्चों को इन नयनों से देखते हैं। उनको बच्चों को देखने के लिए दिव्य दृष्टि की दरकार नहीं। बाप जानते हैं परमधाम से बच्चों के पास आया हुआ हूँ। यह बच्चे भी यहाँ देहधारी बन पार्ट बजा रहे हैं, इन बच्चों को सम्मुख बैठ पढ़ाता हूँ। बच्चे भी जानते हैं बेहद का बाप जो स्वर्ग की स्थापना करने वाला है, वह फिर से हमको भक्ति मार्ग के धक्कों से छुड़ाए हमारी ज्योत जगा रहे हैं। सभी सेन्टर्स के बच्चे समझते हैं कि अब हम ईश्वरीय कुल के वा ब्राह्मण कुल के हैं। सृष्टि का रचता कहा जाता है परमपिता परमात्मा को। सृष्टि कैसे रची जाती है, वह बाप बैठ समझाते हैं। बच्चे जानते हैं मात-पिता बिगर कभी मनुष्य सृष्टि रची नहीं जा सकती। ऐसे नहीं कहेंगे कि पिता द्वारा सृष्टि रची जाती है, नहीं। गाया ही जाता है तुम मात-पिता... यह मात-पिता सृष्टि रचकर फिर उन्हों को लायक बनाते हैं। यह बड़ी खूबी है। ऐसे तो नहीं ऊपर से देवतायें आकर धर्म स्थापन करेंगे। जैसे क्राइस्ट क्रिश्चियन धर्म की स्थापना करते हैं। तो क्राइस्ट को भी क्रिश्चियन लोग फादर कहते हैं। अगर फादर है तो मदर भी जरूर चाहिए। उन्होंने मदर रखा है ''मेरी'' को। अब मेरी कौन थी? क्राइस्ट की नई आत्मा ने आकर तन में प्रवेश किया तो जिसमें प्रवेश किया, उसके मुख से प्रजा रची। वह हो गये क्रिश्चियन। यह भी समझाया गया है कि नई आत्मा जो ऊपर से आती है, उनका ऐसा कोई कर्म नहीं है जो दु:ख भोगे। पवित्र आत्मा आती है। जैसे परमपिता परमात्मा कभी दु:ख नहीं भोग सकता। दु:ख अथवा गाली आदि सब इस साकार को देते हैं। तो क्राइस्ट को भी जब क्रास पर चढ़ाया तो जरूर जिस तन में क्राइस्ट की आत्मा ने प्रवेश किया उसने ही यह दु:ख सहन किया। क्राइस्ट की प्युअर सोल तो दु:ख नहीं सहन कर सकती। तो क्राइस्ट हुआ फादर। माँ कहाँ से लावें! फिर मेरी को मदर बना दिया है। दिखाते हैं मेरी कुमारी थी उनसे क्राइस्ट पैदा हुआ। यह सब शास्त्रों से उठाया है। दिखाया है ना कुन्ती कन्या थी उनसे कर्ण पैदा हुआ। अब यह दिव्य दृष्टि की बात है। परन्तु उन्होंने फिर कापी किया है। तो जैसे यह ब्रह्मा मदर है। मुख द्वारा बच्चे पैदा कर फिर सम्भालने के लिए मम्मा को दिया। तो क्राइस्ट का भी ऐसे है। क्राइस्ट ने प्रवेश कर धर्म की स्थापना की। उनको कहेंगे क्राइस्ट की मुख वंशावली भाई और बहन। क्रिश्चियन का प्रजापिता हो गया क्राइस्ट। जिसमें प्रवेश कर बच्चे पैदा किये वह हो गई माता। फिर सम्भालने लिये दिया मेरी को, उन्हों ने मेरी को मदर समझ लिया है। यहाँ तो बाप कहते हैं मैं इनमें प्रवेश कर मुख सन्तान रचता हूँ। तो उसमें यह मम्मा भी मुख सन्तान ठहरी। यह हैं डिटेल में समझने की बातें।
 
दूसरी बात - बाप समझाते हैं आज एक पार्टी आबू में आने वाली है - वेजीटेरियन का प्रचार करने। तो उनको समझाना है बेहद का बाप अब देवी-देवता धर्म की स्थापना कर रहे हैं जो पक्के वेजीटेरियन थे। और कोई भी धर्म इतना वेजीटेरियन होता नहीं है। अब यह सुनायेंगे कि वैष्णव बनने में कितने फायदे हैं। परन्तु सब तो बन नहीं सकते क्योंकि बहुत हिरे हुए हैं। (आदत पड़ी हुई है) छोड़ना बड़ा मुश्किल है। परन्तु इस पर समझाना है कि बेहद के बाप ने जो हेविन स्थापन किया है, उसमें सभी वैष्णव अर्थात् विष्णु की वंशावली थे। देवतायें बिल्कुल वाइसलेस थे। आजकल के वेजीटेरियन तो विशश हैं। क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले भारत हेविन था। तो ऐसे-ऐसे समझाना है। तुम बच्चों के बिगर ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसको मालूम हो कि स्वर्ग क्या चीज़ है? कब स्थापन हुआ? वहाँ कौन राज्य करते हैं? लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में भल जाते हैं। बाबा भी जाते थे परन्तु यह नहीं जानते कि स्वर्ग में इन्हों की राजधानी होती है। सिर्फ महिमा गाते हैं परन्तु उन्हों को किसने राज्य दिया, कुछ भी पता नहीं। अब तक बहुत मन्दिर बनाते हैं क्योंकि समझते हैं लक्ष्मी ने धन दिया है इसलिए दीपमाला पर व्यापारी लोग लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इन मन्दिर बनाने वालों को भी समझाना चाहिए। जैसे फॉरेनर्स आते हैं तो उनको भारत की महिमा बतानी चाहिए कि क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले भारत ऐसा वेजीटेरियन था, ऐसा कोई हो नहीं सकता। उनमें बहुत ताकत थी। गॉड गॉडेज का राज्य कहा जाता है। अब वही राज्य फिर से स्थापन हो रहा है। यह वही समय है। शंकर द्वारा विनाश भी गाया हुआ है, फिर विष्णु का राज्य होगा। बाप द्वारा स्वर्ग का वर्सा लेना हो तो आकर ले सकते हो। रमेश उषा दोनों को सर्विस का बहुत शौक है। यह वन्डरफुल जोड़ा है, बहुत सर्विसएबुल है। देखो नये-नये आते हैं तो पुरानों से भी तीखे चले जाते हैं। बाबा युक्तियां बहुत बताते हैं, परन्तु कोई न कोई विकार का नशा है तो माया उछलने नहीं देती है। कोई में काम का थोड़ा अंश है, क्रोध तो बहुतों में है। परिपूर्ण कोई बना नहीं है। बन रहे हैं। माया भी अन्दर काटती रहती है। जब से रावण राज्य आरम्भ हुआ है तब से इन चूहों ने कुतरना (काटना) शुरू किया है। अब तो भारत बिल्कुल ही कंगाल हो गया है। माया ने सबको पत्थरबुद्धि बना दिया है। अच्छे-अच्छे बच्चों को भी माया ऐसे घेरती है जो उन्हों को पता नहीं पड़ता कि हमारा कदम पीछे कैसे जा रहा है। फिर संजीवनी बूटी सुंघाकर होश में लाते हैं। क्रोध भी दु:खदाई है। अपने को भी दु:खी करता, दूसरों को भी दु:खी करता है। कोई में गुप्त है, कोई में प्रत्यक्ष। कितना भी समझाओ, समझते नहीं हैं। अभी अपने को बहुत होशियार समझते हैं। पीछे बहुत पछताना पड़ेगा। कल्प-कल्प का दाग लग जायेगा। श्रीमत पर चले तो फायदा भी बहुत है। नहीं तो घाटा भी बहुत है। मत दोनों की मशहूर है। श्रीमत और ब्रह्मा की मत। कहते हैं ब्रह्मा भी उतर आये तो भी यह नहीं मानेगा... कृष्ण का नाम नहीं लेते हैं। अब तो परमपिता परमात्मा खुद मत देते हैं। ब्रह्मा को भी उनसे ही मत मिलती है। बाप का बच्चों पर बहुत प्यार होता है। बच्चों को सिरकुल्हे चढ़ाते हैं। बाप की एम रहती है कि बच्चा ऊंच चढ़े तो कुल का नाम निकलेगा। परन्तु बच्चा न बाप की मानें, न दादा की मानें तो गोया बड़ी माँ की भी नहीं माना। उसका क्या हाल होगा! बात मत पूछो। बाकी सर्विसएबुल बच्चे तो बापदादा की दिल पर चढ़ते हैं। तो उनकी बाबा खुद महिमा करते हैं। तो उन्हों को समझाना है कि इसी भारत में विष्णु के घराने का राज्य था जो फिर स्थापन हो रहा है। अब बाबा फिर उसी भारत को विष्णुपुरी बना रहे हैं।
 
तुमको बहुत नशा होना चाहिए। वह लोग तो मुफ्त अपना नाम निकालने के लिए माथा मार रहे हैं। खर्चा तो गवर्मेन्ट से मिल जाता है। सन्यासियों को तो बहुत पैसे मिलते हैं। अभी भी कहते हैं भारत का प्राचीन योग सिखलाने जाते हैं तो झट पैसे देंगे। बाबा को तो किसी के पैसे की दरकार नहीं। यह खुद सारी दुनिया को मदद करने वाला भोला भण्डारी है, मदद मिलती है बच्चों की। हिम्मते बच्चे मददे बाप। जब कोई बाहर से आते हैं तो हिरे हुए हैं, समझते हैं आश्रम है कुछ देवें। परन्तु तुमको बोलना है क्यों देते हो? ज्ञान तो कुछ सुना नहीं है। कुछ पता नहीं। हम बीज बोते हैं स्वर्ग में फल मिलना है, यह पता भी तब हो जब ज्ञान सुनें। ऐसे आने वाले करोड़ों आयेंगे। यह अच्छा है जो बाबा गुप्त रूप में आया है। कृष्ण के रूप में आता तो रेती मुआफिक इकट्ठे हो जाते, एकदम चटक पड़ते, कोई घर में बैठ न सके। तुम ईश्वरीय सन्तान हो। यह भूलो मत। बाप की तो दिल में रहता है कि बच्चे पूरा वर्सा लेवें। स्वर्ग में तो ढेर आयेंगे परन्तु हिम्मत कर ऊंच पद पायें, वह कोटों में कोई निकलेगा। अच्छा!
 
मात-पिता बापदादा का मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
रात्रि क्लास 15-6-68
 
पास्ट जो हो गया है उनको रिवाईज करने से जिनकी कमज़ोर दिल है तो उन्हों के दिल की कमज़ोरी भी रिवाईज हो जाती है इसलिए बच्चों को ड्रामा के पट्टे पर ठहराया गया है। मुख्य फायदा है ही याद से। याद से ही आयु बड़ी होनी है। ड्रामा को बच्चे समझ जायें तो कब ख्याल न हो। ड्रामा में इस समय ज्ञान सीखने और सिखाने का चल रहा है। फिर पार्ट बन्द हो जायेगा। न बाप का, न हमारा पार्ट रहेगा। न उनका देने का पार्ट, न हमारा लेने का पार्ट होगा। तो एक हो जायेंगे ना। हमारा पार्ट नई दुनिया में हो जायेगा। बाबा का पार्ट शान्तिधाम में होगा। पार्ट का रील भरा हुआ है ना हमारा प्रारब्ध का पार्ट, बाबा का शान्तिधाम का पार्ट। देने और लेने का पार्ट पूरा हुआ, ड्रामा ही पूरा हुआ। फिर हम राज्य करने आयेंगे, वह पार्ट चेंज होगा। ज्ञान स्टाप हो जायेगा। हम वह बन जायेंगे। पार्ट ही पूरा तो बाकी फर्क नहीं रहेगा। बच्चों के साथ बाप का भी पार्ट नहीं रहेगा। बच्चे ज्ञान को पूरा ले लेते हैं। तो उनके पास कुछ रहता ही नहीं है। न देने वाले के पास रहता, न लेने वाले में कमी रहती तो दोनों एक दो के समान हो गये। इसमें विचार सागर मंथन करने की बुद्धि चाहिए। खास पुरुषार्थ है याद की यात्रा का। बाप बैठ समझाते हैं। सुनाने में तो मोटी बात हो जाती है, बुद्धि में तो सूक्ष्म है ना। अन्दर में जानते हैं शिव बाबा का रूप क्या है। समझाने में मोटा रूप हो जाता है। भक्ति मार्ग में बड़ा लिंग बना देते हैं। आत्मा है तो छोटी ना। यह है कुदरत। कहाँ तक अन्त पायेंगे? फिर पिछाड़ी में बेअन्त कह देते। बाबा ने समझाया है सारा पार्ट आत्मा में भरा हुआ है। यह कुदतर है। अन्त नहीं पाया जा सकता। सृष्टि चक्र का अन्त तो पाते हैं। रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त को तुम ही जानते हो। बाबा नॉलेजफुल है। फिर भी हम फुल बन जायेंगे, पाने के लिये कुछ रहेगा नहीं। बाप इसमें प्रवेश कर पढ़ाते हैं। वह है बिन्दी। आत्मा का वा परमात्मा का साक्षात्कार होने से खुशी थोड़ेही होती है। मेहनत कर बाप को याद करना है तो विकर्म विनाश होंगे। बाप कहते हैं मेरे में ज्ञान बन्द हो जायेगा तो तेरे में भी बन्द हो जायेगा। नॉलेज ले ऊंच बन जाते हैं। सभी कुछ ले लेते हैं फिर भी बाप तो बाप है ना। तुम आत्मायें आत्मा ही रहेंगे, बाप होकर तो नहीं रहेंगे। यह तो ज्ञान है। बाप बाप है, बच्चे बच्चे हैं। यह सभी विचार सागर मंथन कर डीप में जाने की बातें हैं। यह भी जानते हैं जाना तो सभी को है। सभी चले जाने वाले हैं। बाकी आत्मा जाकर रहेगी। सारी दुनिया ही खत्म होनी है, इसमें निडर रहना होता है। पुरुषार्थ करना है निडर हो रहने का। शरीर आदि का कोई भी भान न आये, उसी अवस्था में जाना है। बाप आप समान बनाते हैं, तुम बच्चे भी आप समान बनाते रहते हो। एक बाप की ही याद रहे ऐसा पुरुषार्थ करना है। अभी टाइम पड़ा है। यह रिहर्सल तीखी करनी पड़े। प्रैक्टिस नहीं होगी तो खड़े हो जायेंगे। टांगे थिरकने लग पड़ेंगी और हार्टफेल अचानक होता रहेगा। तमोप्रधान शरीर को हार्टफेल होने में देरी थोड़ेही लगती है। जितना अशरीरी होते जायेंगे, बाप को याद करते रहेंगे तो नज़दीक आते जायेंगे। योग वाले ही निडर रहेंगे। योग से शक्ति मिलती है। ज्ञान से धन मिलता है। बच्चों को चाहिए शक्ति। तो शक्ति पाने लिये बाप को याद करते रहो। बाबा है अविनाशी सर्जन। वह कब पेशेन्ट बन न सके। अभी बाप कहते हैं तुम अपनी अविनाशी दवाई करते रहो। हम ऐसी संजीवनी बूटी देते हैं जो कब कोई बीमार न पड़े। सिर्फ पतित-पावन बाप को याद करते रहो तो पावन बन जायेंगे। देवतायें सदैव निरोगी पावन हैं ना। बच्चों को यह तो निश्चय हो गया है हम कल्प कल्प वर्सा लेते हैं। अनगिनत बार बाप आया है, जैसे अभी आया है। बाबा जो सिखलाते, समझाते हैं यही राजयोग है। वह गीता आदि सभी भक्ति मार्ग के हैं। यह ज्ञान मार्ग बाप ही बताते हैं। बाप ही आकर नीचे से ऊपर उठाते हैं। जो पक्के निश्चय बुद्धि हैं वही माला का दाना बनते हैं। बच्चे समझते हैं भक्ति करते करते हम नीचे गिरते आये हैं। अभी बाप आकर सच्ची कमाई कराते हैं। लौकिक बाप इतनी कमाई नहीं कराते जितनी पारलौकिक बाप कराते हैं। अच्छा - बच्चों को गुडनाईट और नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) सर्विसएबुल बनने के लिए विकारों के अंश को भी समाप्त करना है। सर्विस के प्रति उछलते रहना है।
2) हम ईश्वरीय सन्तान हैं, श्रीमत पर भारत को विष्णुपुरी बना रहे हैं, जहाँ सब पक्के वैष्णव होंगे... इस नशे में रहना है।
 
वरदान:एक हिम्मत की विशेषता द्वारा सर्व का सहयोग प्राप्त कर आगे बढ़ने वाली विशेष आत्मा भव
जो बच्चे हिम्मत रखकर, निर्भय होकर आगे बढ़ते हैं उन्हें बाप की मदद स्वत: मिलती है। हिम्मत की विशेषता से सर्व का सहयोग मिल जाता है। इसी एक विशेषता से अनेक विशेषतायें स्वत: आती जाती हैं। एक कदम आगे रखा और अनेक कदम सहयोग के अधिकारी बने। इसी विशेषता का औरों को भी दान और वरदान देते रहो अर्थात् विशेषता को सेवा में लगाओ तो विशेष आत्मा बन जायेंगे।
 
स्लोगन:बुद्धि से इतने हल्के रहो जो बाप अपनी पलकों पर बिठाकर साथ ले जाये।

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Details ( Page:- Murali 30-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 30.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
MitheMithe bacche -Tumhe Baap dwara Baap ki leela arthat Drama ke adi-madhya-ant ka gyan mila hai,tum jaante ho ab yah naatak poora hota hai,hum ghar jate hain.
Q- Swayang ko Baap ke paas register karana hai to uske liye kaunsa kayeda hai?
A-Baap ke paas register hone ke liye 1-Baap par poora poora bali chadhna padta.2-Apna sab kuch Bharat ko Swarg banane ki seva me safal karna hota.3-Sampoorn nirbikari banne ka kasam oothana padta aur fir rahkar bhi dikhana hota.Aise baccho ka naam almighty government ke register me aa jata hai.Unhe nasha rehta ki hum Bharat ko Swarg wa Rajasthan bana rahe hain.Hum Bharat ki seva ke liye Baap par bali chadhte hain.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1) Hum Ishwariya santan ek ishwar ki family ke hain.Hume abhi Ishwar mat mil rahi hai,is roohani nashe me rehna hai.Oolti mato par nahi chalna hai.
2)Bharat ki seva ke liye Brahma Baap ke samaan poora-poora bali chadhna hai.Tan-mann-dhan Bharat ko Swarg banane me safal karna hai.Poora-poora philanthropist(dani) banna hai.
Vardan:-Samip sambandh aur sarv prapti dwara Sahajyogi banne wale Sarv Siddhi Swaroop bhava.
Slogan:-Roohani shaan me rehne wale kabhi had ke maan shaan me nahi aa sakte.
 
ENGLISH SUMMARY - 30.01.18     
Sweet children, you have received knowledge of the Father’s divine activity and of the beginning, the middle and the end of the drama from the Father. You know that this drama is now coming to an end and that you are to return home.
Question:Which rules do you have to obey in order to register yourself with the Father?
Answer:In order to register yourself with the Father:     1) Sacrifice yourself completely to the Father. 2) Use everything you have in worthwhile way for the service of making Bharat into heaven.3) Make a vow to become completely viceless and give the proof of that by living in that way practically. The names of such children are registered in the register of the Almighty Government. They have the intoxication that they are making Bharat into heaven, that is, into the land of kings. We are sacrificing ourselves to the Father for the service of Bharat.
 
Song:Salutations to Shiva  Om Shanti
Essence for Dharna:
1. We are the children of God, the family of the one God. We are now receiving God’s directions. Stay in this spiritual intoxication. Don’t follow wrong directions.
2. In order to serve Bharat, sacrifice yourself completely like the father Brahma. Use your body, mind and wealth in a worthwhile way to change Bharat into heaven. Become a complete philanthropist.
 
Blessing:May you become an embodiment of total success and become an easy yogi by having a close relationship and expernceing all attainments.
 
The children who constantly stay in a close relationship and experience all attainments experience easy yoga. They always experience themselves belonging to the Father. They do not consciously have to be reminded “You are a soul, you are a child of the Father”, for they always experience themselves to be embodiments of attainment and have that intoxication. They constantly have elevated zeal and enthusiasm and remain stable in their happiness. They constantly have a powerful stage and this is why they become embodiments of total success.
 
Slogan:Those who maintain their spiritual honour never get caught up in limited regard and honour.
HINDI DETAIL MURALI

30/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे 'मीठे बच्चे - तुम्हें बाप द्वारा बाप की लीला अर्थात् ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान मिला है, तुम जानते हो अब यह नाटक पूरा होता है, हम घर जाते हैं''
 
प्रश्न:स्वयं को बाप के पास रजिस्टर कराना है तो उसके लिए कौनसा कायदा है?
उत्तर:
बाप के पास रजिस्टर होने के लिए 1- बाप पर पूरा पूरा बलि चढ़ना पड़ता। 2-अपना सब कुछ भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में सफल करना होता। 3- सम्पूर्ण निर्विकारी बनने का कसम उठाना पड़ता और फिर रहकर भी दिखाना होता। ऐसे बच्चों का नाम आलमाइटी गवर्मेन्ट के रजिस्टर में आ जाता है। उन्हें नशा रहता कि हम भारत को स्वर्ग वा राजस्थान बना रहे हैं। हम भारत की सेवा के लिए बाप पर बलि चढ़ते हैं।
 
गीत:-ओम् नमो शिवाए.....  ओम् शान्ति।
 
जिसकी महिमा में यह गीत है वही बैठकर अपने रचना की महिमा सुनाते हैं। जिसको लीला भी कहा जाता है। लीला कहा जाता है नाटक को और महिमा होती है गुणवान की। तो उनकी महिमा सबसे न्यारी है। मनुष्य तो जानते नहीं। बच्चे जानते हैं कि उस परमपिता परमात्मा का ही इतना गायन है जिसकी शिव जयन्ती भी अब नजदीक है। शिव जयन्ती के लिए यह गीत भी अच्छा है। तुम बच्चे उसकी लीला को और उनकी महिमा को जानते हो, बरोबर यह लीला है। इसको नाटक (ड्रामा) भी कहा जाता है। बाप कहते हैं कि देवताओं से भी मेरी लीला न्यारी है। हरेक की अलग-अलग लीला होती है। जैसे गवर्मेन्ट में प्रेजीडेन्ट का, मिनिस्टर का मर्तबा अलग-अलग है ना। अगर परमात्मा सर्वव्यापी होता तो सबकी एक एक्ट हो जाती। सर्वव्यापी कहने से ही भूख मरे हैं। कोई भी मनुष्य न बाप को, न बाप की अपरमअपार महिमा को जानते हैं। जब तक बाप को न जानें तब तक रचना को भी जान न सकें। अभी तुम बच्चों ने रचना को भी जाना है। ब्रह्माण्ड, सूक्ष्मवतन और मनुष्य सृष्टि का चक्र बुद्धि में फिरता रहता है। यह है लीला अथवा रचना के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज। इस समय दुनिया के मनुष्य हैं नास्तिक। कुछ भी नहीं जानते और गपोड़े कितने लगाते हैं। साधू लोग भी कानफ्रेन्स आदि करते रहते हैं, बिचारों को यह पता ही नहीं कि अब नाटक पूरा होता है। अभी कुछ टच होता है। जबकि नाटक पूरा होने को आया है। अभी सब कहते हैं रामराज्य चाहिए। क्रिश्चियन के राज्य में ऐसे नहीं कहते थे कि नया भारत हो। अभी बहुत दु:ख है। तो सभी आवाज करते हैं कि हे प्रभू दु:ख से छुड़ाओ। कलियुग अन्त में जरूर जास्ती दु:ख होगा। दिन-प्रतिदिन दु:ख वृद्धि को पाता जायेगा। वह समझते हैं सभी अपना-अपना राज्य करने लग पड़ेंगे। परन्तु यह विनाश तो होना ही है। यह कोई जानते नहीं।
 
तुम बच्चों को कितना खुशी में रहना चाहिए। तुम किसको भी कह सकते हो कि बेहद का बाप स्वर्ग रचता है तो बच्चों को भी स्वर्ग की बादशाही होनी चाहिए। भारतवासी खास इसलिए याद करते हैं। भक्ति करते हैं भगवान से मिलने चाहते हैं। कृष्णपुरी में जाने चाहते हैं, जिसको ही स्वर्ग कहते हैं। परन्तु यह नहीं जानते कि सतयुग में ही कृष्ण का राज्य था। फिर अभी यह कलियुग पूरा होगा, सतयुग आयेगा तब फिर कृष्ण का राज्य होगा। यह तो सभी जानते हैं कि शिव परमात्मा की सभी सन्तान हैं। फिर परमात्मा ने नई सृष्टि रची होगी। तो जरूर ब्रहमा के मुख द्वारा रची होगी। ब्रह्मा मुख वंशावली तो जरूर ब्राह्मण कुल भूषण होंगे, वह समय भी संगम का होगा। संगम है कल्याणकारी युग। जब परमात्मा ने बैठ राजयोग सिखाया होगा। अभी हम हैं ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण। बाकी तुम कहेंगे हम कैसे मानें कि ब्रह्मा के तन में परमात्मा आकर राजयोग सिखाते हैं। तुम भी ब्रह्मा मुख वंशावली बन राजयोग सीखो तो आपेही तुमको भी अनुभव हो जायेगा। इसमें बनावट की वा अन्धश्रधा की कोई बात ही नहीं। अन्धश्रधा तो सारी दुनिया में है, इसमें भी खास भारत में गुड़ियों की पूजा बहुत होती है। आइडल-प्रस्थ भारत को ही कहा जाता है। ब्रह्मा को कितनी भुजायें देते हैं। अभी यह कैसे हो सकता। हाँ ब्रह्मा के बहुत बच्चे हैं। जैसे विष्णु को 4 भुजायें दिखाते हैं दो लक्ष्मी की, दो नारायण की। वैसे ब्रह्मा के भी इतने बच्चे होंगे। समझो 4 करोड़ बच्चे हो तो ब्रह्मा की 8 करोड़ भुजा हो जायें। परन्तु ऐसे है नहीं। बाकी प्रजा तो जरूर होगी। यह भी ड्रामा में नूँध है। बाप आकर यह सब बातें समझाते हैं। वह तो समझ नहीं सकते कि आखरीन क्या होना है। कितने प्लैन्स बनाते हैं। किसम-किसम के प्लैन्स बनाते हैं। यहाँ बाबा का तुम बच्चों के लिए एक ही प्लैन है, और यह राजधानी स्थापन हो रही है। जो जितनी मेहनत कर आप समान बनायेंगे, उतना ऊंच पद पायेंगे। बाप को नॉलेजफुल, ब्लिसफुल, रहमदिल कहते हैं। बाप कहते हैं मेरा भी ड्रामा में पार्ट है। माया सब पर बेरहमी कर रही है। हमको आकर रहम करना पड़ता है। तुम बच्चों को राजयोग भी सिखाता हूँ। सृष्टि चक्र का राज़ भी समझाता हूँ। नॉलेजफुल को ज्ञान का सागर कहा जाता है। तुम बच्चे जानते हो, किसको समझा भी सकते हो। यहाँ अन्धश्रधा की तो कोई बात ही नहीं। हम निराकार परमपिता परमात्मा को मानते हैं। पहले-पहले उनकी महिमा करनी चाहिए। वह आकर राजयोग द्वारा स्वर्ग रचते हैं। फिर स्वर्गवासियों की महिमा करनी चाहिए। भारत स्वर्ग था तो सभी सर्वगुण सम्पन्न 16 कला सम्पूर्ण... थे। 5 हजार वर्ष की बात है। तो परमात्मा की महिमा सबसे न्यारी है। फिर है देवताओं की महिमा। इसमें अन्धश्रधा की कोई बात नहीं। यहाँ तो सब बच्चे हैं। फालोअर्स नहीं हैं। यह तो फैमिली है। हम ईश्वर की फैमिली हैं। असुल में तो हम सब आत्मायें परमपिता परमात्मा के बच्चे हैं तो फैमिली हुई ना। वह निराकार फिर साकार में आते हैं। इस समय यह वन्डरफुल फैमिली है, इसमें संशय की बात ही नहीं। शिव की सभी सन्तान हैं। प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान भी गाये हुए हैं। हम ब्रह्माकुमार कुमारियां हैं, नई सृष्टि की स्थापना हो रही है। पुरानी सृष्टि सामने है। पहले तो बाप की पहचान देनी है। ब्रह्मा वंशी बनने बिगर बाप का वर्सा मिल न सके। ब्रह्मा के पास यह ज्ञान नहीं है। ज्ञान सागर शिवबाबा है। उनसे ही हम वर्सा पाते हैं। हम हैं मुख वंशावली। सभी राजयोग सीख रहे हैं। हम सबको पढ़ाने वाला शिवबाबा है, जो इस ब्रह्मा तन में आकर पढ़ाते हैं। यह प्रजापिता ब्रह्मा जो व्यक्त है, वह जब सम्पूर्ण बन जाते हैं तब फरिश्ता बन जाते हैं। सूक्ष्मवतनवासियों को फरिश्ता कहा जाता है, वहाँ हड्डी मास नहीं रहता। बच्चियां साक्षात्कार भी करती हैं। बाप कहते हैं भक्ति मार्ग में अल्पकाल का सुख भी मेरे द्वारा ही तुमको मिलता है। दाता मैं एक ही हूँ, इसलिए ईश्वर अर्पण करते हैं। समझते हैं ईश्वर ही फल देते हैं। साधू सन्त आदि का कभी नाम नहीं लेते हैं। देने वाला एक बाप है। करके निमित्त कोई द्वारा दिलाते हैं, उनकी महिमा बढ़ाने के लिए। वह सब है अल्पकाल का सुख। यह है बेहद का सुख। नये-नये बच्चे आते हैं तो समझते हैं जिस मत पर हम थे उनको फिर हम यह नॉलेज समझायें। इस समय सब माया की मत पर हैं। यहाँ तो तुमको ईश्वरीय मत मिलती है। यह मत आधाकल्प चलती है क्योंकि सतयुग त्रेता में हम इसकी प्रालब्ध भोगते हैं। वहाँ उल्टी मत होती नहीं क्योंकि माया ही नहीं है। उल्टी मत तो बाद में ही शुरू होती है। अब बाबा हमको आप समान त्रिकालदर्शी, त्रिलोकीनाथ बनाते हैं। ब्रह्माण्ड का मालिक भी बनते हैं, फिर सृष्टि के मालिक भी हम बनते हैं। बाप ने बच्चों की महिमा अपने से भी ऊंच की है। सारी सृष्टि में ऐसा बाप कभी देखा जो बच्चों के ऊपर इतनी मेहनत करे और अपने से भी तीखा बनाये! कहते हैं तुम बच्चों को विश्व की बादशाही देता हूँ, मैं नही भोगता। बाकी दिव्य दृष्टि की चाबी मैं अपने हाथ में रखता हूँ। भक्ति मार्ग में भी मुझे काम में आती है। अब भी ब्रह्मा का साक्षात्कार कराता हूँ कि इस ब्रह्मा के पास जाकर राजयोग सीख भविष्य प्रिन्स बनो। यह तो बहुतों को साक्षात्कार होता है। प्रिन्स तो सभी ताज सहित होते हैं। बाकी बच्चों को यह पता नहीं पड़ता कि सूर्यवंशी प्रिन्स का साक्षात्कार हुआ वा चन्द्रवंशी प्रिन्स का। जो बाप के बच्चे बनते हैं वह प्रिन्स-प्रिन्सेज तो जरूर बनेंगे फिर आगे वा पीछे। अच्छा पुरुषार्थ होगा तो सूर्यवंशी बनेगा नहीं तो चन्द्रवंशी। तो सिर्फ प्रिन्स को देख खुश नहीं होना है। यह सब पुरुषार्थ पर मदार रखते हैं। बाबा तो हर बात क्लीयर कर समझाते हैं, इसमें अन्धश्रधा की बात नहीं है। यह है ईश्वरीय फैमिली। इस हिसाब से तो वह भी ईश्वरीय सन्तान हैं। परन्तु वह कलियुग में हैं, तुम संगम पर हो। किसके पास भी जाओ बोलो हम शिववंशी, ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ही स्वर्ग का वर्सा पा सकते हैं। किसको अच्छी रीति समझाने की मेहनत करनी पड़ती है। 100-50 को समझायें तब उनसे कोई एक निकले। जिसकी तकदीर में होगा वह कोटो में कोई निकलेगा। आप समान बनाने में टाइम लगता है। बाकी साहूकार का आवाज बड़ा होता है। मिनिस्टर के पास जाते हैं तो पहले वह पूछते हैं आपके पास कोई मिनिस्टर आता है? जब सुनाते हैं कि हाँ आते हैं तो कहेंगे अच्छा हम भी चलते हैं।
 
बाप कहते हैं मैं बिल्कुल साधारण हूँ। तो साहूकार कोई विरला ही आते हैं। आने जरूर हैं परन्तु अन्त में। तुम बच्चों को बहुत नशा रहना चाहिए। उन्हों को समझाना है हम तो भारत की तन-मन-धन से सेवा करते हैं। तुम भारत की सेवा के लिए ही बलि चढ़े हो ना। ऐसा फ्लैन्थ्रोफिस्ट कोई होता नहीं। वह तो पैसे इकट्ठे कर मकान आदि बनाते रहते हैं। आखिर तो यह सब कुछ मिट्टी में मिल जाना है। तुमको तो सब कुछ बाबा पर बलि चढ़ाना है। भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में ही सब कुछ लगाना है। तो फिर वर्सा भी तुम ही पाते हो। तुमको नशा चढ़ा हुआ है - हम आलमाइटी अथॉरिटी के बच्चे हैं। हम उनके पास रजिस्टर हो गये। बाबा पास रजिस्टर होने में बहुत मेहनत लगती है। जब सम्पूर्ण निर्विकारी-पने का कसम उठावे और रहकर भी दिखाये तब बाबा उसे रजिस्टर करते हैं। बच्चों को बहुत नशा रहना चाहिए कि हम भारत को स्वर्ग वा राजस्थान बना रहे हैं, तब उस पर राज्य करेंगे। अच्छा!
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) हम ईश्वरीय सन्तान एक ईश्वर की फैमिली के हैं। हमें अभी ईश्वरीय मत मिल रही है, इस रूहानी नशे में रहना है। उल्टी मतों पर नहीं चलना है।
2) भारत की सेवा के लिए ब्रह्मा बाप के समान पूरा-पूरा बलि चढ़ना है। तन-मन-धन भारत को स्वर्ग बनाने में सफल करना है। पूरा-पूरा फ्लैन्थ्रोफिस्ट (दानी) बनना है।
 
वरदान:समीप सम्बन्ध और सर्व प्राप्ति द्वारा सहजयोगी बनने वाले सर्व सिद्धि स्वरूप भव!
जो बच्चे सदा समीप सम्बन्ध में रहते हैं और सर्व प्राप्तियों का अनुभव करते हैं उन्हें सहजयोग का अनुभव होता है। वे सदा यही अनुभव करते कि मैं हूँ ही बाप का। उन्हें याद दिलाना नहीं पड़ता कि मैं आत्मा हूँ, मैं बाप का बच्चा हूँ। लेकिन सदा इसी नशे में प्राप्ति स्वरूप अनुभव करते, सदा श्रेष्ठ उमंग-उत्साह और खुशी में एकरस रहते, सदा शक्तिशाली स्थिति में रहते इसलिए सर्व सिद्धि स्वरूप बन जाते हैं।
 
स्लोगन:रुहानी शान में रहने वाले कभी हद के मान शान में नहीं आ सकते।

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Details ( Page:- Murali 31-JAN-2018 )
HINGLISH SUMMARY - 31.01.18      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe Mithe bacche -Baap tumhe aisa behad ka sukh dene aaye hain jo fir kuch bhi maangne ki darkar nahi rahegi sirf 5 bhooto ko jeeto to biswa ka mallik ban jayenge.
Q- Sahaj marg hote huye bhi dharana na hone k kaaran kya hai?
A-Abagyaein.Baap to sabhi baccho me biswas rakhte hain ki bacche Brahman kul ka naam bala kare.Bharat ko Swarg banane me madadgar bane.Parantu baccho se baar-baar abagyaein ho jati hai,jis kaaran dharana nahi hoti,fir pad kam ho jata hai.Baba kehte bacche sidhi lambi hai isiliye har kadam Shrimat lete raho.
Dharana ke liye mukhya saar:-
1)Shrimat ko chhod kabhi bhi manmat par nahi chalna hai.Mukh se ratna ke bajaye patthar nahi nikalne hain.
2)Baap ki service ka furna rakhna hai.Samay nikaal Ishwariya seva zaroor karni hai.Andho ko rashta batana hai.Sapoot banna hai.
 
Vardan:-Mann ko shrest position me sthit kar pose badalne ke khel ko samapt karne wale Sahajyogi bhava.
Slogan:-Khushiyon ke khaan ki adhikari aatma sada khushi me rehti aur khushi baantti hai.
 
ENGLISH SUMMARY - 31.01.18     
Sweet children, the Father has come to grant you such unlimited happiness that you will never need to ask for anything again. Simply conquer the five vices and you will become the masters of the world.
 
Question:Why are some children unable to imbibe knowledge even though the path is easy?
Answer:Because they are disobedient. The Father has the faith that all His children will glorify the name of the Brahmin clan, that they will help the Father to make Bharat into heaven. However, because some children repeatedly disobey the Father, they’re unable to imbibe this knowledge and their status thereby decreases. Baba says: Children, the ladder is a bit high. Therefore, continue to take shrimat at every step.
 
Song:I have the fortune of great happiness.  Om Shanti
 
Essence for Dharna:
1. Don’t ever put shrimat aside by following the dictates of your own mind. Do not allow stones instead of jewels to emerge from your mouth.
2. Be concerned about doing the Father's service.Definitely make time to do Godly service. Show the path to the blind and become a worthy child.
Blessing:May you stabilize your mind in an elevated position and finish the game of changing poses and thereby become an easy yogi.
The position of someone’s the mind is visible from the poses of the face. Some children sometimes become heavy due to carrying a burden. Because of the sanskar of sometimes thinking too much, they become taller than one can even imagine. Then, sometimes, because of being disheartened, they see themselves as very short. So, see these poses of yours as a detached observer and let your mind remain stable in an elevated position. Transform the different poses and you will be called an easy yogi.
 
Slogan:A soul who has a right to the mine of happiness remains constantly happy and distributes that happiness.
 
 
HINDI DETAIL MURALI

31/01/18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे 'मीठे बच्चे - बाप तुम्हें ऐसा बेहद का सुख देने आये हैं जो फिर कुछ भी मांगने की दरकार नहीं रहेगी सिर्फ 5 भूतों को जीतो तो विश्व का मालिक बन जायेंगे''
 
प्रश्न:सहज मार्ग होते हुए भी धारणा न होने का कारण क्या है?
 
उत्तर: अवज्ञायें। बाप तो सभी बच्चों में विश्वास रखते हैं कि बच्चे ब्राह्मण कुल का नाम बाला करें। भारत को स्वर्ग बनाने में मददगार बनें। परन्तु बच्चों से बार-बार अवज्ञायें हो जाती हैं, जिस कारण धारणा नहीं होती, फिर पद कम हो जाता है। बाबा कहते बच्चे सीढ़ी लम्बी है इसलिए हर कदम श्रीमत लेते रहो।
 
गीत:-बड़ा खुशनसीब हूँ...  ओम् शान्ति।
 
बच्चों को बेहद का बाप एक ही बार मिलता है, बेहद का सुख देने के लिए। फिर और कोई चीज़ मांग नहीं सकते। भक्ति मार्ग में तो भक्त भगवान से, देवताओं से, साधू सन्यासियों से मांगते रहते हैं। जब बेहद का बाप मिल जाता है तो फिर सब कुछ मिल जाता है। बाप स्वर्ग का मालिक बना देता है और क्या चाहिए। बुद्धि से काम लेना है। इस मनुष्य सृष्टि में सबसे ऊंचे ते ऊंचा पद मिलता है सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण को, इससे और कोई पद ऊंच है ही नहीं। तो मांगना बन्द हो जाता है। लक्ष्मी-नारायण के साथ प्रजा भी तो होगी। यथा राजा रानी तथा प्रजा... अब स्वर्ग में इतना ऊंच पद उन्हों को किसने दिया? बाप ने। कब? संगम पर। और कोई दे न सके। इस ड्रामा चक्र पर अच्छी रीति समझाना चाहिए। अब है कलियुग। इसके बाद सतयुग आना है तो सिवाए बाप के कौन बता सकता है। बाप बैठ सृष्टि चक्र का राज़ समझाते हैं। हरेक वस्तु पहले नई फिर पुरानी होती है। वैसे सृष्टि की भी स्टेजेस हैं। अब तमोप्रधान पुरानी दुनिया है। अनेक धर्मो के कितने झगड़े हैं। बाप कहते हैं सभी झगड़े मिटाकर एक धर्म की स्थापना करना मेरा काम है। मैं खुद अपना परिचय देने तुम बच्चों को ब्रह्मा तन से बैठ समझाता हूँ। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का तो आकार है। मनुष्य का भी साकार रूप है। बाकी ऊंचे ते ऊंचे परमात्मा का न आकार है, न साकार है। उनको निराकार कहा जाता है। जैसे आत्मा निराकार है तो निराकार आत्मा कहती है मेरा बाप भी निराकार है। वही एक सभी का बाप ठहरा, बाकी सबके ऊपर शारीरिक नाम है। लक्ष्मी-नारायण का भी नाम है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के भी सूक्ष्म शरीर का नाम है। सिर्फ एक ही निराकार परमात्मा है जिसका नाम शिव है। कहते हैं मैं परम आत्मा तुम बच्चों को भी आप समान बनाता हूँ। मुझ ज्ञान सागर से तुम भी सारे सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज जान जाते हो। प्यार का सागर भी बनाता हूँ। देवतायें प्यार के सागर हैं ना। उन्हों को सभी कितना प्यार करते हैं। सारे सृष्टि चक्र का ज्ञान ही मुख्य है। बाकी तो है मूलवतन, सूक्ष्मवतन, चक्र सृष्टि का गिना जाता है, जो चार युगों में घूमता है। सतयुग में 16 कला फिर त्रेता में 14 कला में आते हैं। जैसे-जैसे जन्म लेते जाते हैं, कलायें कम होती जाती हैं। अब तो देवी-देवता धर्म ही प्राय:लोप है। एक भी मनुष्य नहीं जिसके मुख से निकले कि हम सूर्यवंशी कुल के हैं। और सभी धर्म वाले अपने-अपने धर्म को जानते हैं। अभी फिर से बाप तुमको स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। इस समय कलियुग है पतित दुनिया, इसको पावन तो बाप ही बनायेंगे। यह झाड़, गोला तो अंधों के लिए आइना है। आगे चल तुम्हारे पास जब बहुत आने लगेंगे तो उन्हों को देख और भी आयेंगे। कोई दुकान पर बहुत ग्राहक होते हैं तो उन्हों को देख और भी आते हैं कि यहाँ अवश्य अच्छा माल होगा। वह मशहूर हो जाता है। अभी तुम इतने नामीग्रामी नहीं हुए हो क्योंकि यह नई चीज़ है। बाम्बे में चिमिन्यानंद के पास बहुत जाते हैं। उनका अखबार में भी पड़ता है। यहाँ तो सिर्फ सुनते हैं पवित्र रहना होगा तो वायरे (कन्फ्यूज़) हो जाते हैं। स्त्री पुरुष इकट्ठे रहकर पवित्र रहें, इम्पासिबुल। आग और कपूस है। स्त्री तो नर्क का द्वार है, उनके साथ रहने से नर्क में चले जाते हैं। परन्तु अपने को नर्क का द्वार नहीं समझते। तो मनुष्यों को मुश्किल लगता है परन्तु यहाँ तो तुमको भीती मिलती है - अगर 5 भूतों को जीतेंगे तो स्वर्ग का मालिक बनेंगे। बाम्बे में एक बच्चा आता था, उसने पवित्रता की प्रतिज्ञा की थी तो उनके घर में बहुत झगड़ा चलता था। एक बच्ची जाती थी क्लास करने तो उनका भाई कहता था वहाँ जायेंगे तो मार डालेंगे। वह बच्ची कहती थी मुझे परमपिता परमात्मा का फरमान है - नर्कवासियों को स्वर्गवासी बनाओ। तो मैं अपना धन्धा तुम्हारे कहने से थोड़ेही छोडूँगी। तुमको जो करना है सो करो। ऐसी बहादुर बच्चियां कम हैं। कहाँ-कहाँ विकार के लिए मातायें भी हंगामा करती हैं। परन्तु जो महावीर हैं वह जीत पाते हैं। ऐसे बहादुर मेल्स भी हैं तो फीमेल्स भी हैं। गृहस्थ व्यवहार में रह पवित्र रहना यह और ही अच्छा है। उनको ही महारथी कहा जाता है। भल कोई इस जन्म में ब्रह्मचारी रहते हैं परन्तु अगले जन्म के तो पाप सिर पर हैं। सिर्फ काम विकार नहीं है और भी बहुत पाप होते हैं। देह-अभिमान है तो पाप अवश्य होते हैं। जो मनुष्य खुद ही मांस, शराब आदि खाते हैं वह दूसरों की सद्गति कैसे करेंगे। सद्गति माना शान्ति और सुख में जाना। यहाँ तुम दु:ख में हो, पतित हो तब गुरू चाहते हो। शान्ति है निर्वाणधाम में। स्वर्ग में है सुख, नर्क में है दु:ख। यह बातें बाप ही समझाते हैं। तो इनका सपूत बच्चा बन वर्सा लेना चाहिए। अब तुमको वापिस जाना है तो पवित्र भी जरूर बनना पड़े। मरने समय भी कहते हैं भगवान को याद करो तो ऊपर चले जायेंगे, फिर वापिस आयेंगे नहीं। परन्तु ऐसे तो है नहीं। कोई को पता ही नहीं है कि ऊपर जाने का मंत्र कौन दे सकता है।
 
बाबा कहते हैं मैं आकर तुमको इस माया से छुड़ाता हूँ। तुम तो जितना छूटने की करेंगे, उतना फँसते जायेंगे इसलिए मेरी श्रीमत पर चलो। अपनी आसुरी मत बन्द कर दो। अपनी मत पर चला गोया वह दुर्गति को पाने का पुरुषार्थ करते हैं। आखिर अधोगति को पा लेते हैं। वह सारा बाप को हरेक की चलन से पता पड़ जाता है। जैसे तीर्थो पर जाते हैं तो झट मालूम पड़ जाता है - यह बीमार है, ठण्डी सहन नहीं कर सकेगा। खुद भी कहते हैं मैं थक गया हूँ। कमर टूट गई है, तो इससे समझ लेते हैं कि इनकी तकदीर में शायद है नहीं। अब यह है बेहद की बात, जब श्रीमत छोड़ अपनी मत पर चलते हैं तो चाल चलन उनकी बदल जाती है। फिर मुख से रत्न के बदले पत्थर निकलने लगते हैं। तो जो जमा किया था उसका घाटा हो पड़ता है। बाबा कहेंगे ऐसा बच्चा शल (कभी) कोई न निकले। महारथियों को भी माया ऐसा पकड़ती है जो बात मत पूछो। समाचार तो बाबा के पास आता है। लिखते हैं फलाना बहुत अच्छा चल रहा था, अब माया बिल्ली ने पकड़ लिया है। नहीं आते हैं तो उनको अपना फोटो भेज दो कि देखो तुमने प्रतिज्ञा की थी, अब आइने में अपना मुँह देखो। बोलो, लक्ष्मी-नारायण को वरने लायक हो? माया ऐसी है जो सपूत के बदले कपूत बना देती है। गिरते हैं तो तकदीर को लकीर लगा देते हैं। देह-अभिमान बड़ा प्रबल है। धनवान हूँ, ऐसा हूँ, झट देह-अभिमान आ जाता है। तो बेहद के बाप की भी नहीं मानते हैं। यह भी ड्रामा कहेंगे। फिर बच्चों को लिखना पड़ता है कि इनको संजीवनी बूटी सुँघाओ। मुरली सुनाओ तो ग्रहण हट जाये। हम सभी शिवबाबा की सर्विस में हैं। मकान बनाना भी बाबा की सर्विस है। बाप बच्चों की सर्विस करने आये हैं। बादशाही देते हैं तो बच्चों को भी बाप की सर्विस का फुरना रखना चाहिए। गॉडली सर्विस करना तो बहुत सहज है। गृहस्थ व्यवहार में रहते कुछ न कुछ टाइम निकाल सर्विस करनी चाहिए। कोई न कोई अन्धे को रास्ता बता आना चाहिए। फिर कोई न कोई निकल पड़ेगा। अच्छा।
 
जैसी सर्विस वैसा उजूरा बाप देते हैं। बाप बच्चों पर विश्वास रखते हैं कि बच्चे ब्राह्मण कुल का नाम बाला करेंगे। भारत को स्वर्ग बनाने में मददगार जरूर बनना है। बाप तो सबका कल्याणकारी, क्षमा का सागर है। कोई भागन्ती हो फिर आ जाते हैं तो भी बाप कहेंगे अच्छा फिर से ज्ञान उठाओ। सीढ़ी जरा लम्बी है। मार्ग सहज है परन्तु अवज्ञायें करने कारण धारणा नहीं होती। नतीजा क्या होता है? पद कम मिल जाता है। तुम ब्राह्मण बच्चों जैसा महान भाग्यशाली इस समय का पदमपति भी नहीं होगा। तुम्हारे हर कदम में पदम हैं। अच्छा।
 
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
रात्रि क्लास 17-6-68
 
मीठे-मीठे बच्चे जब यहाँ आते हैं तो समझते हैं हम बाबा के पास जाते हैं। बाबा से सुनते हैं। जब अपने अपने सेन्टर पर जाते हैं तो सामने बापदादा नहीं बैठते हैं। कहाँ-कहाँ गोप भी क्लास चलाते हैं। मुरली तो सहज है। कोई भी धारण कर क्लास करा सकते हैं। ब्राह्मणियाँ बैठी तो हैं। बाबा पूछते हैं कोई मुरली पढ़कर फिर मुरली का सार सुनाते हैं? जो मुरली हाथ में उठाकर सुनाते हैं वह हाथ उठावे। जो मुरली हाथ में नहीं लेते लेकिन मुरली का सार ऐसे ही सुनाते हैं, वह भी हाथ उठावें। मुरली हाथ में तो होनी चाहिए ना! पढ़े हुए हैं फिर सारा बैठ सुनाते हैं। कोई मुरली पढ़कर सुनाते हैं नम्बरवार तो हैं ना। महारथी, घोड़ेसवार और प्यादे। सभी तो एक्यूरेट नहीं पढ़ते हैं। कोई तो पढ़ते भी रहते हैं, एडीशन कर रहस्य भी सुनाते रहते हैं। सभी ऐसे नहीं समझा सकते। यहाँ तो बाप बैठे हैं। बाप बच्चों को कहते हैं कोई बात में संशय नहीं होना चाहिए। एक बाप ही सभी कुछ सुनाते हैं। उन स्कूलों में तो अनेक पढ़ाने वाले हैं। अलग अलग पढ़ाते। यहाँ तो एक ही पढ़ाते हैं। एक ही एम आब्जेक्ट है। इसमें प्रश्न पूछने का रहता नहीं। सुबह को यहाँ बैठ बच्चों को याद की यात्रा में मदद करता हूँ। ऐसे नहीं सिर्फ तुमको याद करता हूँ। सारे बेहद के बच्चे याद रहते हैं। तुमको इस याद से सारे विश्व को पावन बनाना है। अंगुली तुम किसमें देते हो? पवित्र तो सारी दुनिया को बनाना होता है ना। तो बाप सभी बच्चों पर नज़र रखते हैं। सभी शान्ति में चले जायें। सभी को अटेन्शन खिंचवाते हैं। जिनका योग है वह उठाते हैं। बाप तो बेहद में ही बैठेंगे। मैं आया हूँ सारी दुनिया को पावन बनाने। सारी दुनिया को करेन्ट दे रहा हूँ तो पवित्र हो जायें। जिनका योग होगा समझेंगे बाबा अभी बैठ याद की यात्रा सिखला रहे हैं जिससे विश्व में शान्ति होती है। बच्चों को भी याद किया जाता है। वह भी याद में रहते हैं तो मदद मिलती है। अच्छी रीति याद करते हैं वह थोड़े हैं। मददगार बच्चे भी चाहिए ना। खुदाई खिदमतगार। निश्चयबुद्धि से याद करेंगे ना। तुम्हारी पहली सबजेक्ट है यह पावन बनने की। गोया तुम बच्चे निमित्त बनते हो बाप के साथ। बाप को बुलाते हैं हे पतित-पावन आओ। अभी वह अकेला क्या करेगा? खिदमतगार चाहिए ना? तुम जानते हो विश्व को शान्त बनाकर उस पर राज्य करेंगे। ऐसी बुद्धि होगी तब नशा चढ़ा हुआ होगा। तुम बच्चों को भारत को हेविन बनाना है। तुम जानते हो बाप की श्रीमत से, हम अपने योगबल से अपनी राजधानी स्थापन कर रहे हैं। नशा रहना चाहिए। स्थूल जैसी बात तो नहीं है। यह है रूहानी। बच्चे समझते हैं हर कल्प बाप इस रूहानी बल से हमको विश्व का मालिक बनाते हैं। यह भी समझते हैं शिव बाबा ही आकर स्वर्ग की स्थापना करते हैं। दुनिया को यह भी पता नहीं है परमपिता परमात्मा नई दुनिया की स्थापना करते हैं; कब, कैसे, बिल्कुल ही नहीं जानते हैं। गीता में भी आटे में लून है। बाकी तो सभी झूठ ही झूठ है। बाप आकर सत्य बताते हैं। भारत का योगबल तो नामी-ग्रामी है। बहुत जाते हैं भारत का सिखलाने। बाप कहते हैं हठयोगी राजयोग सिखा न सके। परन्तु आजकल तो झूठ बहुत है ना। सच के आगे इमीटेशन बहुत होती है इसलिए सच को कोई मुश्किल जान सकते हैं। अच्छा। गुडनाईट। रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) श्रीमत को छोड़ कभी भी मनमत पर नहीं चलना है। मुख से रत्न के बजाए पत्थर नहीं निकालने हैं।
2) बाप की सर्विस का फुरना रखना है। समय निकाल ईश्वरीय सेवा जरूर करनी है। अन्धों को रास्ता बताना है। सपूत बनना है।
 
वरदान:मन को श्रेष्ठ पोजीशन में स्थित कर पोज़ बदलने के खेल को समाप्त करने वाले सहजयोगी भव!
 जैसी मन की पोजीशन होती है वह चेहरे के पोज़ से दिखाई देती है। कई बच्चे कभी-कभी बोझ उठाकर मोटे बन जाते हैं, कभी बहुत सोचने के संस्कार के कारण अन्दाज से भी लम्बे हो जाते हैं और कभी दिलशिकस्त होने के कारण अपने को बहुत छोटा देखते हैं। तो अपने ऐसे पोज़ साक्षी होकर देखो और मन की श्रेष्ठ पोज़ीशन में स्थित हो ऐसे भिन्न-भिन्न पोज़ परिवर्तन करो तब कहेंगे सहजयोगी।

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