Published by – DILLIP KUMAR BARIK on behalf of Dillip Tiens
Category - Religion, Ethics , Spirituality & New Age & Subcategory - Bk Murali
Summary - Satya Shree Trimurti Shiv Bhagawanubach Shrimad Bhagawat Geeta. Month -November 2017 ( Daily Murali - Brahmakumaris - Magic Flute )
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Details ( Page:- Murali 01-Nov-2017 )
HINGLISH SUMMARY - 01.11.17      Pratah Murli Om Shanti BapDada Madhuban
Mithe bacche - Shrimat par chal swachh suddh ban dharana kar fir yuktiyukt seva karni hai, ahankar me nahi aana hai, suddh ghamand me rehna hai.
Ques- Kis ek baat ke kaaran Baap ko itni badi knowledge deni padti hai?
Ans- Gita ke rachayita nirakar Parampita Parmatma ko siddh karne ke liye Baap tumhe itni badi knowledge dete hain. Sabse badi bhool yahi hai jo Gita me patit-pawan Baap ki jagah Sri Krishna ka naam dala hai, isi Baap ko siddh karna hai. Iske liye bhinn-bhinn yuktiyan rachni hai. Baap ki mahima aur Sri Krishna ki mahima alag-alag batani hai.
Dharna Ke liye mukhya Saar:-
1) Har kaam bahut yuktiyukt karna hai. Harshitmukh, achal, sthir aur gyan ki masti me rehkar Baap ka show karna hai._
2)Gyan ki nayi aur nirali baatein siddh karni hai.
Vardaan:--   Manjil ko saamne rakh Brahma Baap ko follow karte huye first number lene wale Tibra Purusharthi bhava.
Slogan:-- Jo baat avastha ko bigadne wali hai - usey soonte huye bhi nahi suno.
HINDI DETAIL MURALI

01/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

मीठे बच्चे - श्रीमत पर चल स्वच्छ शुद्ध बन धारणा कर फिर युक्तियुक्त सेवा करनी है, अहंकार में नहीं आना है, शुद्ध घमण्ड में रहना है
प्रश्नकिस एक बात के कारण बाप को इतनी बड़ी नॉलेज देनी पड़ती है?
उत्तर:
गीता के रचयिता निराकार परमपिता परमात्मा को सिद्ध करने के लिए बाप तुम्हें इतनी बड़ी नॉलेज देते हैं। सबसे बड़ी भूल यही है जो गीता में पतित-पावन बाप की जगह श्रीकृष्ण का नाम डाला है, इसी बात को सिद्ध करना है। इसके लिए भिन्न-भिन्न युक्तियां रचनी है। बाप की माहिमा और श्रीकृष्ण की महिमा अलग-अलग बतानी है।
गीत:- मरना तेरी गली में .....  ओम् शान्ति।
बच्चों ने गीत सुना, कहते हैं आये हैं तेरे दर पर जीते जी मरने के लिए। किसके दर पर? फिर भी यही बात निकलती कि अगर गीता का भगवान कृष्ण को कहें तो यह सब बातें हो सकें। वह है सतयुग का प्रिन्स। गीता कृष्ण ने नहीं सुनाई। गीता परमपिता परमात्मा ने सुनाई। सारा मदार इस बात पर है। एक बात को समझ जाएं तो भारत के जो इतने शास्त्र हैं - सब झूठे सिद्ध हो जाएं। यह हैं सब भक्तिमार्ग के, इनमें कर्मकान्ड तीर्थ यात्रा, जप-तप आदि की कहानियां लिखी हुई हैं। भक्ति मार्ग में तुम इतनी मेहनत करते आये हो, वह तो दरकार नहीं। यह तो सेकेण्ड की बात है। सिर्फ यह एक बात सिद्ध करने के लिए भी बाप को कितनी नॉलेज देनी पड़ती है। प्राचीन नॉलेज जो भगवान ने ही दी है, वही नॉलेज है। सारी बात गीता पर है। परमपिता परमात्मा ने ही आकर देवी-देवता धर्म की स्थापना अर्थ सहज राजयोग और ज्ञान सिखलाया है, जो अब प्राय:लोप है। मनुष्य समझते हैं कृष्ण फिर आकर गीता सुनायेगा। परन्तु अब तुमको यह अच्छी तरह सिद्ध करना है कि गीता परमपिता परमात्मा ने, जो ज्ञान का सागर है, उसने सुनाई है। कृष्ण की महिमा और परमपिता परमात्मा की महिमा अलग-अलग है। वह है सतयुग का प्रिन्स, जिसने सहज राजयोग से राज्य-भाग्य पाया है। पढ़ते समय नाम रूप और है फिर जब राज्य पाया है तब और है। पहले पतित है फिर पावन बना है, यह सिद्ध कर बताना है। पतित-पावन कृष्ण को कभी नहीं कहेंगे। पतित-पावन है ही एक बाप। अब वही श्रीकृष्ण की आत्मा जो काली अर्थात् श्याम बन गई है। अब फिर से पतित-पावन द्वारा राजयोग सीख भविष्य पावन दुनिया का प्रिन्स बन रही है। यह सिद्ध कर समझाने में युक्तियां चाहिए। फारेनर्स को सिद्धकर बताना है। नम्बरवन है ही गीता सर्वशास्त्रमई श्रीमत भगवत गीता माता। अब माता को जन्म किसने दिया? बाप ही माता को एडाप्ट करते हैं। ऐसे नहीं कहेंगे कि क्राइस्ट ने बाइबिल को एडाप्ट किया। क्राइस्ट ने जो शिक्षा दी उनका बाइबिल बनाकर पढ़ते रहते हैं। अब गीता की शिक्षा किसने दी जो पुस्तक बनाकर पढ़ते रहते हैं। यह किसको पता नहीं और सबके शास्त्रों का पता है। यह जो सहज राजयोग की शिक्षा है वह किसने दी, यह सिद्ध करना है। दुनिया तो दिन-प्रतिदिन तमोप्रधान होती जाती है। यह सब ख्यालात स्वच्छ बुद्धि में ही बैठ सकते हैं। जो श्रीमत पर नहीं चलते उनको धारणा भी नहीं हो सकती। श्रीमत कहेगी तुम बिल्कुल समझा नहीं सकते हो। बाबा फट से कह देंगे - मुख्य बात यह है कि गीता का भगवान परमपिता परमात्मा है। वही पतित-पावन है। मनुष्य तो सर्वव्यापी कह देते हैं वा ब्रह्म तत्च कह देते। जो आता है वह कह देते हैं - बिगर समझ। भूल सारी गीता से निकली है, जो गीता का रचयिता कृष्ण को कह दिया है। तो समझाने के लिए युक्तियां रचनी पड़े। गुप्ता जी को भी कहते थे कि बनारस में यह सिद्धकर समझाओ कि गीता का भगवान श्रीकृष्ण नहीं।
अब देहली में सम्मेलन होता है। सब रिलीज़स मनुष्यों को बुला रहे हैं क्या उपाय करें जो शान्ति हो जाए? अब शान्ति स्थापन करना इनके हाथ में तो है नहीं। कहते भी हैं पतित-पावन आओ। फिर यह पतित कैसे शान्ति स्थापन कर सकते? जबकि बुलाते रहते हैं। परन्तु पतित-पावन को जानते नहीं। कह देते हैं रघुपति राघो राजाराम। वह तो है नहीं। झूठा बुलावा करते हैं, जानते कुछ भी नहीं। अब यह कौन जाकर बताये। बड़े अच्छे बच्चे चाहिए। ऐसे बहुत हैं जो अपने को बहुत ज्ञानी समझते हैं। परन्तु है कुछ भी नहीं। मिसाल है चूहे को मिली हल्दी की गांठ.. नम्बरवार हैं। इसमें बड़ी युक्ति चाहिए, जिससे सिद्ध हो जाए - गीता भगवान ने रची है। वह कह देते कोई भी हो, हैं तो सब भगवान। बाबा कहते हैं - भगवानुवाच, मैं उस कृष्ण की आत्मा, जो 84 जन्म पूरे कर अन्तिम जन्म में है, उनको एडाप्ट कर ब्रह्मा बनाए उन द्वारा गीता ज्ञान देता हूँ। वह ब्रह्मा फिर इस सहज राजयोग से फर्स्ट प्रिन्स सतयुग का बन जाता है। यह समझानी और कोई की बुद्धि में नहीं है। तुम बच्चों में भी यथार्थ रीति अभी वह शुद्ध घमण्ड आया नहीं है। इतनी प्रदर्शनी आदि करते हैं - अजुन सिद्ध नहीं करते। पहले यह भूल सिद्धकर बतानी है कि श्रीमत भगवत गीता है सब शास्त्रों की माई बाप। उसका रचयिता कौन था? जैसे क्राइस्ट ने बाइबिल को जन्म दिया। वह है क्रिश्चियन धर्म का शास्त्र। अच्छा बाइबिल का बाप कौन? क्राइस्ट। उनको माई बाप नहीं कहेंगे। मदर की तो वहाँ बात नहीं। यह तो यहाँ माता पिता है। क्रिश्चियन ने रीस की है कृष्ण के धर्म से। वह क्राइस्ट को मानने वाले हैं। अब गीता किसने सुनाई? उससे कौन सा धर्म स्थापन हुआ? यह कोई नहीं जानते। कभी नहीं कहते कि पतित-पावन परमपिता परमात्मा ने यज्ञ रचा। गोले के चित्र से समझ सकेंगे कि बरोबर परमपिता परमात्मा ने ज्ञान दिया है। राधे कृष्ण तो सतयुग में बैठे हैं, उन्होंने अपने को ज्ञान नहीं दिया। ज्ञान देने वाला दूसरा चाहिए। कोई ने तो उसको पास कराया होगा ना। यह राजाई प्राप्त करने का ज्ञान किसने दिया? किस्मत आपेही तो नहीं बनती। किस्मत बनाने वाला बाप या टीचर होता है। गुरू तो गति देते, परन्तु गति सद्गति का भी कोई अर्थ नहीं समझते। सद्गति प्रवृत्ति मार्ग वालों की होती है। गति माना सब बाप के पास जाते हैं। यह बातें कोई समझते नहीं हैं। वह तो भक्ति के बड़े-बड़े दुकान खोल बैठे हैं। सच्चे ज्ञान का एक भी दुकान नहीं। सब हैं भक्ति के। बाप कहते हैं यह वेद शास्त्र आदि सब भक्ति मार्ग की सामग्री है। यह जप तप आदि करने से मैं नहीं मिलता हूँ। मैं तो बच्चों को ज्ञान देकर पावन बनाता हूँ। सारे सृष्टि की सद्गति करता हूँ। वाया गति में जाकर सद्गति में आना है। सब तो सतयुग में नहीं आयेंगे, यह ड्रामा बना हुआ है। जो कल्प पहले तुमको सिखाया था, जो चित्र बनाये थे, वह अब भी बनवा रहे हैं। यह जो बड़ी भूल है, वह सिद्ध हो जाए फिर युक्ति से चित्र बनायेंगे। कहते हैं 3 धर्मो की टांगों पर सृष्टि खड़ी है। एक देवता धर्म की टांग टूटी हुई है, इसलिए हिलती रहती है। पहले एक टांग पर सृष्टि बड़ी फर्स्टक्लास रहती। एक ही धर्म था, जिसको अद्वैत राज्य कहा जाता है। फिर वह एक टांग गुम हो 3 टांगे निकली हैं, जिसमें कुछ भी ताकत नहीं रहती। आपस में ही लड़ाई झगड़ा चलता रहता है। धनी को जानते ही नहीं। निधनके बन पड़े हैं। समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। प्रदर्शनी में भी मुख्य यह बात समझानी है कि गीता का भगवान श्रीकृष्ण नहीं, परमपिता परमात्मा है, जिसका बर्थ प्लेस भारत है। कृष्ण है साकार, वह है निराकार। उनकी महिमा अलग है। ऐसे युक्ति से कार्टून बनाना चाहिए जो सिद्ध हो जाए कि गीता परमात्मा ने गाई और कृष्ण को ऐसा बनाया। कहते हैं ब्रह्मा का दिन ज्ञान और ब्रह्मा की रात भक्ति। अभी है रात। सतयुग स्थापन करने वाला कौन? ब्रह्मा आया कहाँ से? सूक्ष्मवतन में भी कहाँ से आया? प्रजापिता ब्रह्मा को परमात्मा एडाप्ट करते हैं। परमपिता परमात्मा ही पहले-पहले सूक्ष्म सृष्टि रचते हैं। वहाँ ब्रह्मा दिखाते हैं। वहाँ प्रजापिता होता नहीं। प्रजापिता ब्रह्मा कहाँ से आया? यह बातें कोई समझ सकें। कृष्ण के अन्तिम जन्म में इनको परमपिता परमात्मा ने अपना रथ बनाया है। यह किसकी बुद्धि में नहीं है। यह बड़ा भारी क्लास है। टीचर जानते हैं यह स्टूडेण्ट कौन सा है? तो क्या बाप नहीं समझते होंगे? यह बेहद के बाप का बेहद का क्लास है। यहाँ की बात ही निराली है। शास्त्रों में प्रलय दिखाकर रोला कर दिया है।
तुम जानते हो कृष्ण ने गीता नहीं सुनाई। उसने तो गीता का ज्ञान सुनकर राज्य पद पाया है। तुमको सिद्ध कर बताना है - गीता का भगवान निराकार शिव है, उनके गुण यह हैं। इस भूल के कारण ही भारत कौड़ी जैसा बना है। अभी परमापिता परमात्मा ने ज्ञान का कलष माताओं पर रखा है। मातायें ही स्वर्ग का द्वार खोलती हैं। यह सब बातें नोट कर समझानी चाहिए। भक्ति वास्तव में गृहस्थियों के लिए है। ये है प्रवृत्ति मार्ग का सहज राजयोग। हम सिद्ध कर समझाने के लिए आये हैं। बच्चों को युक्तियुक्त काम करना है। बच्चों को ही बाप का शो करना है। सदैव हर्षित मुख, अचल, स्थेरियम, मस्त रहना है, आगे चलकर ऐसे बच्चे निकलते जरूर हैं। ब्रह्माकुमार कुमारी वह जो 21 जन्म के लिए बाप से वर्सा दिलाये। कुमारियों की महिमा भारी है, मुख्य मम्मा है। वह ज्ञान सूर्य है, यह है गुप्त मम्मा (ब्रह्मा) इस राज़ को मुश्किल ही कोई समझते हैं। मन्दिर भी उस मम्मा के हैं। इस गुप्त बूढ़ी मम्मा का कोई मन्दिर नहीं। यह माता-पिता कम्बाइन्ड है। कृष्ण तो सतयुग का प्रिन्स है। कृष्ण में भगवान सके। गीता के भगवान की महिमा अलग है। वह पतित-पावन, लिबरेटर, गाइड है। तो परमात्मा की महिमा बिल्कुल अलग है। एक कैसे हो सकते। मुख्य बात ही यह है कि गीता किसने सुनाई? वेद शास्त्र आदि सब गीता के बाल बच्चे हैं और सब भक्ति की सामग्री है, ज्ञान मार्ग में कुछ होता नहीं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) हर काम बहुत युक्तियुक्त करना है। हर्षितमुख, अचल, स्थिर और ज्ञान की मस्ती में रहकर बाप का शो करना है।
2) ज्ञान की नई और निराली बातें सिद्ध करनी है।
वरदान:मंजिल को सामने रख ब्रह्मा बाप को फालो करते हुए फर्स्ट नम्बर लेने वाले तीव्र पुरुषार्थी भव!
तीव्र पुरुषार्थी के सामने सदा मंजिल होती है। वे कभी यहाँ वहाँ नहीं देखते। फर्स्ट नम्बर में आने वाली आत्मायें व्यर्थ को देखते हुए भी नहीं देखती, व्यर्थ बातें सुनते हुए भी नहीं सुनती। वे मंजिल को सामने रख ब्रह्मा बाप को फालो करती हैं। जैसे ब्रह्मा बाप ने अपने को करनहार समझकर कर्म किया, कभी करावनहार नहीं समझा, इसलिए जिम्मेवारी सम्भालते भी सदा हल्के रहे। ऐसे फालो फादर करो।
स्लोगन: जो बात अवस्था को बिगाड़ने वाली है - उसे सुनते हुए भी नहीं सुनो।
 
मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

1- आत्मा परमात्मा में अन्तर, भेद:- आत्मा और परमात्मा अलग रहे बहुकाल सुन्दर मेला कर दिया जब सतगुरु मिला दलाल... जब अपन यह शब्द कहते हैं तो उसका यथार्थ अर्थ है कि आत्मा, परमात्मा से बहुतकाल से बिछुड़ गई है। बहुतकाल का अर्थ है बहुत समय से आत्मा परमात्मा से बिछुड़ गई है, तो यह शब्द साबित (सिद्ध) करते हैं कि आत्मा और परमात्मा अलग-अलग दो चीज़ हैं, दोनों में आंतरिक भेद है परन्तु दुनियावी मनुष्यों को पहचान होने के कारण वो इस शब्द का अर्थ ऐसा ही निकालते हैं कि मैं आत्मा ही परमात्मा हूँ, परन्तु आत्मा के ऊपर माया का आवरण चढ़ा हुआ होने के कारण अपने असली स्वरूप को भूल गये हैं, जब वो माया का आवरण उतर जायेगा फिर आत्मा वही परमात्मा है। तो वो आत्मा को अलग इस मतलब से कहते हैं और दूसरे लोग फिर इस मतलब से कहते हैं कि मैं आत्मा सो परमात्मा हूँ परन्तु आत्मा अपने आपको भूलने के कारण दु:खी बन पड़ी है। जब आत्मा फिर अपने आपको पहचान कर शुद्ध बनती है तो फिर आत्मा परमात्मा में मिल एक ही हो जायेंगे। तो वो आत्मा को अलग इस अर्थ से कहते हैं परन्तु अपन तो जानते हैं कि आत्मा परमात्मा दोनों अलग चीज़ है। आत्मा, परमात्मा हो सकती और आत्मा परमात्मा में मिल एक हो सकती है और फिर परमात्मा के ऊपर आवरण चढ़ सकता है।
 
2- “कर्म बन्धन टूटने से ही मन की शान्ति अर्थात् जीवनमुक्त स्थिति को पा सकते हैं
वास्तव में हरेक मनुष्य की यह चाहना अवश्य रहती है कि हमको मन की शान्ति प्राप्त हो जावे इसलिए अनेक प्रयत्न करते आये हैं मगर मन को शान्ति अब तक प्राप्त नहीं हुई, इसका यथार्थ कारण क्या है? अब पहले तो यह सोच चलना जरुरी है कि मन के अशान्ति की पहली जड़ क्या है? मन की अशान्ति का मुख्य कारण है - कर्मबन्धन में फंसना। जब तक मनुष्य इन पाँच विकारों के कर्मबन्धन से नहीं छूटे हैं तब तक मनुष्य अशान्ति से छूट नहीं सकते। जब कर्मबन्धन टूट जाता है तब मन की शान्ति अर्थात् जीवनमुक्त स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं। अब सोच करना है - यह कर्मबन्धन टूटे कैसे? और उसे छुटकारा देने वाला कौन है? यह तो हम जानते हैं कोई भी मनुष्य आत्मा किसी भी मनुष्य आत्मा को छुटकारा दे नहीं सकती। यह कर्मबन्धन का हिसाब-किताब तोड़ने वाला सिर्फ एक परमात्मा है, वही आकर इस ज्ञान योगबल से कर्मबन्धन से छुड़ाते हैं इसलिए ही परमात्मा को सुख दाता कहा जाता है। जब तक पहले यह ज्ञान नहीं है कि मैं आत्मा हूँ, असुल में मैं किसकी सन्तान हूँ, मेरा असली गुण क्या है? जब यह बुद्धि में जाए तब ही कर्मबन्धन टूटे। अब यह नॉलेज हमें परमात्मा द्वारा ही प्राप्त होती है गोया परमात्मा द्वारा ही कर्मबन्धन टूटते हैं। ओम् शान्ति।

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Details ( Page:- Murali 2nd-Nov-2017 )
HINGLISH SUMMARY  02.11.17Pratah Murli Om Shanti BapDada Madhuban
Mithe bacche - bikaro ka daan dene ke baad bhi yaad me rehne ka purusharth zaroor karna hai kyunki yaad se he aatma pawan banengi.
Q- Takhtnashin banne wa Rudra mala me pirone ki biddhi kya hai?
A- Baap samaan dukh harta sukh karta bano. Sabhi par gyan jal ki chhinte daal sital banane ki seva karo. Kisi ko bhi dukh dene ki bsstein chhod do. Koi bhi bikarm nahi karo. Acche manners dharan karo. Apna time Baap ki yaad me safal karo to Baap ke diltakhtnashin ban Rudra mala me piroh jayenge. Agar koi apna time waste karta hai to muft apna pad bhrast karta hai. Jhoot bolna, bhool karke chhipana, kisi ki dil ko dukhana - yah sab paap hain, jiski 100 gonna saza milegi.
Dharna Ke liye mukhya Saar:-
1) Pawan banne ke liye jab tak jeena hai, maya ke bighno ki parwah nahi karni hai.
2) Sabhi par gyan ki chhinte daal sital banane ki seva karni hai, kisi ki dil ko kabhi bhi dukhana nahi hai. Baap samaan dukh harta, sukh karta banna hai.
Vardaan:-- Chharo aur ki halchal ke samay avyakt sthiti wa asariri banne ki abhyas dwara Bijayi bhava.
Slogan:- Purusharth ko tibra karna hai to albele pan ke loose screw ko tight karo.
HINDI DETAIL MURALI

02/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे, विकारों को दान देने के बाद भी याद में रहने का पुरुषार्थ जरूर करना है क्योंकि याद से ही आत्मा पावन बनेंगी''
प्रश्न:तख्तनशीन बनने वा रूद्र माला में पिरोने की विधि क्या है?
उत्तर:
बाप समान दु: हर्ता सुख कर्ता बनो। सभी पर ज्ञान जल के छींटे डाल शीतल बनाने की सेवा करो। किसी को भी दु: देने की बातें छोड़ दो। कोई भी विकर्म नहीं करो। अच्छे मैनर्स धारण करो। अपना टाइम बाप की याद में सफल करो तो बाप के दिलतख्तनशीन बन रूद्र माला में पिरो जायेंगे। अगर कोई अपना टाइम वेस्ट करता है तो मुफ्त अपना पद भ्रष्ट करता है। झूठ बोलना, भूल करके छिपाना, किसी की दिल को दु:खाना - यह सब पाप हैं, जिसकी 100 गुणा सजा मिलेगी।
गीत:- वह हमसे जुदा होंगे...   ओम् शान्ति।
यह हैं गोपिकाओं के गीत। कौन सी गोपिकायें? यह हैं प्रजापिता ब्रह्मा मुख वंशावली। फिर इनको कहा जाता है गोपी वल्लभ अर्थात् बाप के गोप गोपियां। बाकी वह सब कहानियां हैं। यह तो समझने की बात है कि बरोबर जब तुम ईश्वर के बनते हो तो आसुरी विकारी सम्प्रदाय दुश्मन बनते हैं। हंस और बगुले इक्ट्ठे रह सकें। हंस थोड़े होते हैं। बगुले बहुत करोड़ों की अन्दाज में हैं। तुमको गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र रहना है। इसका गायन भी है। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र रहो। हाँ विघ्न बहुत पड़ेंगे। आधाकल्प के पतित हैं वह इतना जल्दी पावन नहीं बनते। विकार के लिए कितनी कशमकस चलती है, अबलाओं पर अत्याचार होते हैं, तब तो द्रोपदी ने पुकारा है। द्रोपदी एक नहीं। इस समय सब द्रोपदियां और दुशासन हैं। चीर उतारते हैं। यह है ही पतित विकारी दुनिया और सतयुग को कहा जाता है वाइसलेस दुनिया। यह है विशश दुनिया, रावण राज्य। इस दुनिया में कितना दु: है, रोना, पीटना, लड़ाई-झगड़ा क्या लगा पड़ा है। जब नई दुनिया में देवतायें राज्य करते थे तो पवित्रता सुख-शान्ति थी, अशान्ति वाले कोई धर्म नहीं थे। अभी तो अशान्ति फैलाने वाले कितने धर्म हैं। तुम फिर सिद्धकर बतलाते हो सबसे पुराना दुश्मन है रावण, जिसने भारत को कौड़ी जैसा पतित बनाया है। बाप बैठ कर्म-अकर्म-विकर्म की गति समझाते हैं। रावणराज्य में कोई कितना भी दान पुण्य करे, यज्ञ, जप-तप करे तो भी नीचे उतरना ही है। जिसको दान करते वह भी विकारी पाप आत्मा हैं। विकर्म करते करते अब सिर पर बहुत बोझा है। तुम्हारी आत्मा जो सतोप्रधान थी सो अब तमोप्रधान बन पड़ी है। यह सब बाप समझाते हैं - कल्प पहले मुआफिक बाप ही आकर कल्प-कल्प हमको देवता बनाते हैं। सहज राजयोग और ज्ञान सुनाते हैं। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। यह तो सहज है ना। सब कहते हैं कि हे भगवान आओ। हम पतितों को आकर पावन बनाओ। तो पतित-पावन बाप ही ठहरा। तुम जानते हो बाप हमको पावन बनाने का पुरुषार्थ कराते हैं। भल कोई 5 विकार दान में दे देते हैं परन्तु फिर योग भी लगाना है। जन्म-जन्मान्तर के जो सिर पर पाप हैं, जिससे तुम तमोप्रधान बने हो, वो योग के सिवाए कैसे भस्म होंगे?
तुम 5 विकारों का दान करते हो कि हम कोई पाप नहीं करेंगे। परन्तु जन्म-जन्मान्तर के जो पापों का हिसाब है, वह कैसे चुक्तू होगा? उसकी युक्ति है जहाँ तक जीना है बाप की याद में रहना है। इस याद से ही विकर्म विनाश होंगे। पतित आत्मा वहाँ जा नहीं सकती। हर एक को अपना-अपना पार्ट और अपना-अपना मर्तबा मिला हुआ है। जैसा मनुष्य का मर्तबा वैसे आत्मा का भी मर्तबा। पहले-पहले आत्मा स्वर्ग में आयेगी। पहले नम्बर में हैं लक्ष्मी-नारायण, उनका सबसे बड़ा पार्ट है। ड्रामा में देवी-देवता धर्म की आत्मायें सबसे अच्छा पार्ट बजाकर सबसे जास्ती सुख भोगती हैं। फिर सतो रजो तमो में आना है। खाद पड़ती जाती है। अब वह खाद निकले कैसे? सोने को अग्नि में डालने से खाद निकलती है। यह योग अग्नि है जिससे विकर्म विनाश होते हैं। यह कोई नहीं जानते कि योग अग्नि से विकर्म विनाश हो सकते हैं। बच्चे कहते हैं घड़ी- घड़ी योग टूट पड़ता है। हम बाप को भूल जाते हैं। यह माया के विघ्न हैं। विघ्न आयें, जल्दी योग लग जाये तो जल्दी विनाश हो जाए, परन्तु ऐसा हो नहीं सकता। टाइम लगता है। जब तक योग लगाते रहो, अन्त में कर्मातीत अवस्था होगी। फिर दुनिया भी खत्म हो जायेगी। तुम श्रीमत से रावण पर जीत पाते हो। गीता, महाभारत, रामायण सबमें भक्ति की सामग्री है। तुमने संगम पर जो कर्तव्य किया है, उसका यादगार यह मन्दिर आदि बने हैं। यादगार बनना द्वापर से शुरू होता है।
पहले परमपिता परमात्मा शिव का यादगार बनता है, जो आकर पतितों को पावन बनाते हैं। देवताओंकी महिमा गाई जाती है। लक्ष्मी-नारायण का बड़ा मन्दिर है। उन्हों की इतनी पूजा क्यों होती है? यह किसको मालूम नहीं है। पूज्य से फिर पुजारी जरूर बनना पड़े, पूज्य हैं तो प्रालब्ध भोगते हैं। जैसे बड़े राजाओं के जीवन चरित्र गाते हैं तो सतयुग के पहले नम्बर में महाराजा महारानी, लक्ष्मी-नारायण की जरूर महिमा गायेंगे। परन्तु वह कैसे बनें, यह नहीं जानते। जैसे ब्रह्मा और सरस्वती इन दोनों को सिखलाने वाला शिव है। उनका नाम शास्त्रों से गुम कर अगड़म बगड़म कर दिया है। इन बातों को सेन्सीबुल बच्चे नम्बरवार जानते हैं। यह ड्रामा चल रहा है - कल्प पहले भी तुम ऐसे बने थे जैसे अब बन रहे हो। यह झाड़ वृद्धि को पाता रहेगा। फल भी जरूर पकेगा। झाड़ को बढ़ने में टाइम लगता है। जब झाड़ तैयार हो जायेगा तो तुम देवी देवता बन जायेंगे। बाकी सबका विनाश हो जायेगा। तुम बच्चे अब पक रहे हो। कोई पूरा पकते, कोई कम, कोई को तूफान लगते हैं। कमाई में ग्रहचारी आती है। बाबा कहते हैं योग लगाते रहो ताकि तुम्हारे सब पाप दग्ध हो जाएं। कितनी भारी कमाई है, इसलिए भारत का प्राचीन योग मशहूर है। परन्तु उससे क्या होता है, यह किसको पता नहीं। अब बाप समझाते हैं - तुम्हारी आत्मा में खाद पड़ी हुई है। आपेही पूज्य और आपेही पुजारी मनुष्य की आत्मा बनती है। भगवान तो बन नहीं सकता। अगर वह भी पुजारी बने तो फिर पूज्य कौन बनावे! हमको पूज्य बनाने वाला बाप है। हम पूज्य, पावन देवता थे फिर उतरते-उतरते हम शूद्र बन गये। सतयुग के देवी-देवताओं को कहेंगे - ईश्वर की नई रचना। गाते हैं - मनुष्य को देवता किये.... बाप समझाते हैं अच्छी तरह पढ़ो। बाप, टीचर, गुरू का काम होता है - ताकीद करना (पुरुषार्थ कराना), बच्चे टाइम वेस्ट मत करो। मुफ्त पद भ्रष्ट हो जायेगा, फिर बहुत पछतायेंगे। कहेंगे कल्प-कल्प हमारी ऐसी अवस्था होगी! फिर कुछ कर नहीं सकेंगे। साक्षात्कार हो जायेगा। पक्का निश्चय हो जायेगा कि कल्प-कल्प ऐसे दुर्गति को पाऊंगा। बाप समझाते रहते हैं - यह नतीजा निकलेगा, फिर बहुत रोना पड़ेगा। जैसे क्लास ट्रांसफर होती है, नम्बरवार बैठते हैं। हम भी नई दुनिया में ट्रांसफर होते हैं। ब्रह्मणों की माला गाई हुई नहीं है, रूद्र माला ही पूजी जाती है। परन्तु यह किसको पता नहीं है कि यह माला क्या है? ऊपर में मेरू दिखाते हैं। मेरू विष्णु है। ऊपर में फूल शिवबाबा है, फिर है माला। अब तुम ब्रह्मण पुरुषार्थ कर रहे हो फिर रूद्र माला में पिरोना है इसलिए पुरुषार्थ ऐसा करो जो तख्तनशीन बनो। किसको दु: देने की बातें छोड़ दो। बाप दु: हर्ता, सुख कर्ता है। अगर बच्चे दु: देंगे तो कौन समझेंगे - यह ईश्वर के बच्चे हैं। विकर्म करना अथवा जीवघात करना, झूठ पाप नहीं करना चाहिए। हार खाते हैं तो क्षमा मांगनी पड़े, भक्ति में भी कुछ हो जाता है तो तोबां-तोबां करते हैं। यह ज्ञान मार्ग है, इसमें किसकी दिल कभी नहीं दु:खानी है। ज्ञान का छींटा तो शीतल करने वाला है, यहाँ तुम बच्चे आये हो पढ़ने के लिए। पढ़ाई में मैनर्स अच्छे रखने होते हैं। यह भी पढ़ाई है। निराकार बाप पढ़ाते हैं। वह तुम्हारे अन्दर की सब बातें जानते हैं। एक सेन्टर से समाचार आया था - एक बच्चे ने भूल की तो धर्मराज ने सटका लगाया। इस बाबा को मालूम ही नहीं था। ऐसे बहुत हैं जो विकार में जाते हैं फिर सच नहीं बताते। अपने को बचाने के लिए भूल छिपाते हैं। परन्तु शिवबाबा से तो छिप नहीं सकते। तुमको पढ़ाने वाला शिवबाबा है। उनको भी भूल जाते हैं। यह तो कमबख्ती कहेंगे। यहाँ किसका भी झूठ वा सच छिप नहीं सकता। यह बाबा कहते हैं मैं अन्तर्यामी नहीं हूँ। शिवबाबा अन्तर्यामी है। बाप खुद कहते हैं - मैं निराकार सब जानता हूँ। यह तो साकार में है। मैं पुनर्जन्म रहित, यह जन्म मरण में आने वाला, तब तो इनको कहते हैं तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो, हम तुमको सुनाते हैं। जो भी सूर्यवंशी घराने के हैं, उन सबको सुनाता हूँ। बहुत बच्चे छिपाते हैं। बाबा के आगे आते ही नहीं हैं। बाबा ने कहा है इनसे मत छिपाओ, इनको सब कुछ सुनाओ। तो माफ हो जायेगा। फिर भी मेरा बच्चा है। मैं तो सब कुछ जानता हूँ, इनको कैसे पता पड़े इसलिए सब इनको सुनाओ। आगे जन्म-जन्मान्तर का हिसाब तो मेरे पास जमा है। बाकी इस जन्म का जो है वह इनको सुनाओ तो मैं भी सुनूँगा। बाकी घर बैठे समझेंगे शिवबाबा तो सब कुछ जानते हैं। नहीं। वह तो भक्ति मार्ग में करते आये हो। अब तो मैं सम्मुख आया हूँ, तो बताना पड़े तब फिर सावधानी भी मिलेगी। बाप तो समझायेंगे काला मुँह नहीं करना। नहीं तो बहुत सजा खायेंगे। पिछाड़ी का समय बहुत नाजुक होता है। बहुत सजायें मिलती हैं। मिसाल भी तुम देखते सुनते रहते हो। पाप कभी भी सर्जन से छिपाओ मत। माफ वह करेंगे, यह नहीं। इस समय पाप करने से तो सौगुणा हो जायेगा, और फालतू झूठ भी मत बोलो। बाबा सब बच्चों को वारनिंग देते हैं। कितनी बड़ी बेहद की पाठशाला है।
तुम गोप गुप्त वेष में बहुत काम कर सकते हो। समझायेंगे तो दिल में जरूर लगेगा कि बरोबर यह भी गवर्मेन्ट है। यह ज्ञान गुप्त है। बीज, झाड़ और सृष्टि चक्र को जानना है। यह 4 युगों का चक्र है। उन्होंने फिर चर्खा रख दिया है। तुम हो बी.के. पाण्डव सेना, वह कोट आफ आर्मस ले जाना चाहिए। चर्खा चलाने से सत्यमेव जयते होगी क्या? यह तो सृष्टि चक्र की बात है। तुमको डरना नहीं चाहिए। गुप्त वेष में तुम कहाँ भी जा सकते हो। बहुरूपी के बच्चे बहुरूपी होने चाहिए। परन्तु बच्चों की बुद्धि में आता नहीं है। थोड़ी ही सर्विस में खुश हो जाते हैं। दिमाग एकदम आसमान में चढ़ जाता है। अजुन तो बहुत काम करना है। किसम-किसम से पुरुषार्थ करना है। बाबा अनेक पॉइंट्स देते हैं। यह ज्ञान यज्ञ तो चलना ही है। हर एक पंथ वाले को बुलाते रहो। राजाओं को भी बुला सकते हो। कानफ्रेंस भी कर सकते हो। जैसा आदमी वैसा-वैसा कार्ड छपाना पड़े। आकर समझो यह सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, आओ तो हम आपको परमपिता परमात्मा की और 5 हजार वर्ष की जीवन कहानी सुनायें। वन्डर है ना। अच्छा !
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) पावन बनने के लिए जब तक जीना है, माया के विघ्नों की परवाह नहीं करनी है।
2) सभी पर ज्ञान के छीटें डाल शीतल बनाने की सेवा करनी है, किसी की दिल को कभी भी दु:खाना नहीं है। बाप समान दु: हर्ता, सुख कर्ता बनना है।
वरदान:चारों ओर की हलचल के समय अव्यक्त स्थिति वा अशरीरी बनने के अभ्यास द्वारा विजयी भव!
लास्ट समय में चारों ओर व्यक्तियों का, प्रकृति का हलचल और आवाज होगा। चिल्लाने का, हिलाने का वायुमण्डल होगा। ऐसे समय पर सेकण्ड में अव्यक्त फरिश्ता सो निराकारी अशरीरी आत्मा हूँ - यह अभ्यास ही विजयी बनायेगा इसलिए बहुत समय का अभ्यास हो कि मालिक बन जब चाहें मुख द्वारा साज बजायें, चाहें तो कानों द्वारा सुनें, अगर नहीं चाहें तो सेकण्ड में स्टाप - यही अभ्यास सिमरणी अर्थात् विजय माला में ले आयेगा।
स्लोगन: पुरूषार्थ को तीव्र करना है तो अलबेलेपन के लूज स्क्रू को टाइट करो।

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Details ( Page:- Murali 03-Nov-2017 )
HINGLISH SUMMARY  03.11.17Pratah Murli Om Shanti BaaPDada Madhuban
Mithe bacche - Koi bhi dehadhari ko yaad karne se mukti-jeevanmukti nahi mil sakti, Baap he tumhe direct yah varsha dete hain.
Q- Baap ka banne ke baad bhi maya kin baccho ko apni aur ghasit leti ?
A- Jinka buddhiyog purane sambandhiyo me bhatakta hai, pura gyan nahi hai ya koi purani aadat hai, aise baccho ko maya apni aur ghasit leti hai. Bahar ka sang bhi bahut kharab hai, jo khatam kar deta hai. Sang ka ashar bahut jaldi lagta hai, isiliye Baba kehte bacche ek Baap ke saath buddhiyog rakho. Baap ko he follow karo. Koi bhi dehadhari me pyaar nahi rakho.
Dharna Ke liye mukhya Saar:-
1) Karmbandhano ke chintan me nahi rahna hai. Buddhi ko deha-dhariyon se hatana hai. Behad ka sannyas karna hai._
2) Bandhano se chhotne ke liye poora-poora nastmoha banna hai. Sachchi dil rakhni hai. Gyan me mazboot (pakka) aur himmatvan banna hai.
Vardaan:-- Mere pan ki khot ko samapt kar bharpoorta ka anubhav karne wale Sampoorn Trusty bhava.
Slogan- Baap samaan banna hai to samajhna, chahna aur karna - tino ko samaan banao.
HINDI DETAILs MURALI

03/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''बापदादा'' मधुबन
मीठे बच्चे - कोई भी देहधारी को याद करने से मुक्ति-जीवनमुक्ति नहीं मिल सकती, बाप ही तुम्हें डायरेक्ट यह वर्सा देते हैं
प्रश्न:बाप का बनने के बाद भी माया किन बच्चों को अपनी ओर घसीट लेती है?
उत्तर:
जिनका बुद्धियोग पुराने सम्बन्धियों में भटकता है, पूरा ज्ञान नहीं है या कोई पुरानी आदत है, ऐसे बच्चों को माया अपनी ओर घसीट लेती है। बाहर का संग भी बहुत खराब है, जो खत्म कर देता है। संग का असर बहुत जल्दी लगता है, इसलिए बाबा कहते बच्चे एक बाप के साथ बुद्धियोग रखो। बाप को ही फालो करो। कोई भी देहधारी में प्यार नहीं रखो।
गीत:- तुम्हें पाके हमने...   ओम् शान्ति।
मीठे-मीठे बच्चे जानते हैं कि अभी बेहद के बाप से हमें वर्सा मिल रहा है। यह बहुत समझने की बात है। कहावत है परमपिता परमात्मा सभी धर्म स्थापकों को भेज देते हैं - अपना-अपना धर्म स्थापन करने के लिए। तो वह आकर धर्म स्थापन करते हैं। ऐसे नहीं कि वह कोई को वर्सा देते हैं। नहीं। वर्से की बात ही नहीं निकलती। वर्सा देने वाला एक बाप है। क्राइस्ट की आत्मा कोई सभी का बाप थोड़ेही है, जो वर्सा देगी। वह तो क्रिश्चियन का भी बाप नहीं जो वर्सा देवे। भला वह कौनसा वर्सा देंगे? प्रश्न उठता है। और वर्सा किसको देंगे? वह तो धर्म स्थापन करने आते हैं। उनके पीछे दूसरे क्रिश्चियन धर्म की आत्मायें आती जाती हैं। वर्से की बात ही नहीं। बाप से वर्सा लेना होता है। समझो इब्राहम, बुद्ध, क्राइस्ट आदि आये। उन्होंने क्या किया? किसको वर्सा दिया? नहीं। वर्सा देना बाप का ही काम है। वह तो खुद आते हैं। आत्मायें आती जाती, वृद्धि को पाती रहती हैं। वर्सा हमेशा क्रियेटर से मिलता है। क्रियेटर एक है लौकिक बाप, दूसरा है पारलौकिक बाप। यह धारण करने की बातें हैं। धारणा भी उन्हों को होगी जो औरों को दान करते होंगे। अभी बेहद का बाप सब बच्चों को वर्सा देने आये हैं। बेहद का बाप ही बच्चों को बेहद का वर्सा देते हैं। क्रिश्चियन, इस्लामी, बौद्धी आदि सबका बाप एक है। सब गाड फादर कहते हैं। क्राइस्ट ने भी कहा है गाड फादर। फादर को कभी भूलते नहीं हैं। गाड फादर एक ही निराकार को कहा जाता है। सब निराकार आत्माओंका बाप एक ही है। धर्म स्थापकों का भी वह निराकार एक बाप है, उनसे ही वर्सा मिलता है। सब गाड फादर कहकर पुकारते हैं। एक भारत ही है जिसमें कहते हैं- ईश्वर सर्वव्यापी है। भारत से ही और सभी सर्वव्यापी कहना सीखे हैं। अगर ईश्वर सर्वव्यापी है फिर ईश्वर को याद क्यों करते हो? साधू लोग साधना वा प्रार्थना किसकी करते हैं? बाप तो पूछेंगे ना। क्रियेटर सबका एक है, वही पतित-पावन है। सतयुग में सभी पावन ही होते हैं, फिर पतित कैसे बनते हैं? लिखा हुआ है-देवतायें ही वाम मार्ग में जाते हैं। अब फिर पावन दुनिया बन रही है। द्वापर आदि से पतित दुनिया शुरू होती है। ईश्वरीय राज्य और आसुरी राज्य आधा-आधा है। भारत की ही बात है। रावण को भारत में ही जलाते हैं। तो बाबा ने समझाया है और धर्म स्थापक किसको भी वर्सा नहीं देते हैं। बाकी धर्म स्थापन करते हैं, इसलिए उनको याद करते हैं। बाकी क्राइस्ट को, ब्रह्मा को, विष्णु को वा शंकर को याद करने अथवा उनकी प्रार्थना करने से वह कुछ भी नहीं दे सकते। देने वाला बाप ही है। उनको सम्मुख आना पड़ता हैं। कृष्ण में परमात्मा आते हैं-ऐसा कोई भी मानते नहीं हैं।
बाप कहते हैं मैं तुम आत्माओं को वर्सा देने एक ही टाइम पर आता हूँ। वर्सा बाप बच्चों को देते हैं। बाबा दो को ही कहा जाता है-एक शरीर का बाबा, दूसरा आत्माओं का बाबा, और कोई बाबा हो नहीं सकता। तुमको इस बाबा अर्थात् प्रजापिता ब्रह्मा से वर्सा मिल नहीं सकता। वर्सा एक शिवबाबा से मिलता है, ब्रह्मा भी वर्सा उनसे लेते हैं। वह सर्व के सद्गति दाता हैं। सर्व के मुक्ति-जीवनमुक्ति दाता हैं इसलिए पहले-पहले कोई को भी बाप का परिचय देना पड़े। भल कोई बुजुर्ग को भी बाबा वा पिता जी कह देते हैं। परन्तु बाप है नहीं। बाप एक लौकिक, दूसरा पारलौकिक ही होता है। यह ब्रह्मा भी जिस्मानी बाप है। तुम बच्चों को एडाप्ट करते हैं। भल तुम ब्रह्मा को बाबा कहते हो परन्तु वर्सा तो उनसे मिलता है ना। कौन सा वर्सा? सद्गति का। दुर्गति वा जीवनबंध से तो सब छूटते हैं। इस समय भारत खास, सारी दुनिया आम रावण के बंधन में है। आत्मायें जो पहले-पहले आती हैं तो पहले जीवनमुक्त फिर जीवनबंध बनती हैं। पहले सुख फिर दु: भोगना है।
यह बुद्धि में बिठाना चाहिए। कोई भी देहधारी को याद करने से मुक्ति-जीवनमुक्ति मिल नहीं सकती। मैसेन्जर लोग भी किसको वर्सा देते नहीं हैं। मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा बाप ही आकर देते हैं। परन्तु किनको डायरेक्ट, किनको इनडायरेक्ट। तुम बच्चों के सम्मुख ही बाप होता है। दिन-प्रतिदिन तुम देखेंगे-बाबा मधुबन से बाहर कहाँ जायेंगे नहीं। इस पुरानी दुनिया में रखा ही क्या है। शिवबाबा कहते हैं हमको स्वर्ग में जाने अथवा स्वर्ग को देखने की भी खुशी नहीं है तो बाकी इस दुनिया में कहाँ जायेंगे। मेरा पार्ट ही ऐसा है, पतित दुनिया में आता हूँ। 7 वन्डर्स आफ वर्ल्ड कहते हैं, परन्तु उनमें कोई स्वर्ग बताते नहीं। स्वर्ग तो पीछे आता है। मुझे पतित दुनिया, पतित शरीर में पराये राज्य में आना पड़ता है। गाते भी हैं दूरदेश के रहने वाला... इसका अर्थ तुम बच्चे ही समझ सकते हो। अभी हम पुरूषार्थ करते हैं फिर अपने देश में आयेंगे। अच्छा द्वापर के बाद जो आत्मायें आयेंगी, वह तो पराये राज्य अर्थात् रावण राज्य में आयेंगी। पावन राज्य में तो नहीं आयेंगी। उन्हों का थोड़ा सुख, थोड़ा दु: का पार्ट है। तुम सतयुग से लेकर फुल सुख देखते हो। हर एक को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। बाप तुम बच्चों को बैठ राज समझाते हैं कि मैं कैसे देवी-देवता धर्म स्थापन करता हूँ, इसमें सुख ही सुख है और उसके लिए तुमको लायक बनाता हूँ। तुम समझते हो हम स्वर्ग के मालिक थे फिर माया ने पूरा ना लायक बनाया है। बाप कहते हैं अभी तुम कितने बेसमझ बन पड़े हो, नारद की कहानी है ना। तुम समझ सकते हो-भगत झांझ बजाने वाला लक्ष्मी को कैसे वरेगा? जब तक राजयोग सीख पवित्र बने। भल शरीर तो सबके भ्रष्टाचारी हैं क्योंकि भ्रष्टाचार से पैदा होते हैं। तुम तो मुख वंशावली हो। यह बड़ी समझने की बातें हैं। यह रचता और रचना की नालेज बाप खुद ही आकर देते हैं। सब पॉइंट्स कोई समझ भी नहीं सकेंगे। यहाँ से बाहर गये-कोई का संग मिला और खत्म। कहा भी जाता है संग तारे कुसंग बोरे... भल यहाँ भी बैठे हैं परन्तु पूरा बुद्धियोग नहीं है। ज्ञान नहीं है तो संगदोष में गिर पड़ते हैं। कोई भी किसी में आदत है तो उनका संग करने से वह असर झट पड़ जाता है। यहाँ है बाबा का संग। फिर जो बाप को फालो कर औरों का भी उद्धार करते हैं, वही ऊंच पद पाते हैं। कई नये-नये बच्चे कहते हैं बाबा हम नौकरी आदि छोड़ इस सर्विस में लग जायें? बाबा कहते हैं-आगे चल माया नाक से ऐसे पकड़ेगी जो बात मत पूछो। अनुभव कहता है-ऐसे बहुतों ने छोड़ा फिर चले गये। ईश्वरीय जन्म तो लिया फिर माया ने घसीट लिया। बड़े अच्छे-अच्छे बच्चों को माया एक घूसा लगाए बेहोश कर देती है, जिनका बुद्धियोग बाहर भटकता रहता है, पुराने सम्बन्धियों आदि में इसलिए बाबा कहते हैं देहधारियों से बुद्धियोग जास्ती मत रखो। इस बाबा से भी भल तुम्हारा कितना भी प्यार है तो भी इनसे बुद्धियोग मत लगाओ। बाप को याद नहीं करेंगे तो विकर्म विनाश नहीं होंगे। कोई भी शरीरधारी में प्यार मत रखो। सतसंगों में सब शरीरधारी ही सुनाते हैं। कोई महात्मा का नाम लेते हैं। ऐसे थोड़े ही कहते हैं कि परमपिता परमात्मा शिव हमको पढ़ाते हैं। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं-इस रचना का चैतन्य बीज मैं हूँ। मुझे सारे झाड़ की नालेज है। वह तो जड़ बीज है। चैतन्य होता तो सुनाता। मुझ बीज में जरूर झाड़ के आदि-मध्य-अन्त की नालेज होगी। यह है बेहद की बात। इस समय तमोप्रधान राज्य है, तो उसका भभका जरूर होगा। कितने बड़े-बड़े नाम रखाते हैं - ज्ञानेश्वर, गंगेश्वरानंद... लेकिन आनंद तो कोई को मिल नहीं सकता। सन्यासी खुद कहते हैं सुख काग विष्टा समान है। लेकिन स्वर्ग का नाम भूलते नहीं हैं। कहते हैं फलाना स्वर्ग पधारा फिर पित्रों को बुलाते हैं। आत्मा कोई में प्रवेश कर बोलती है। परन्तु आत्मा कैसे आती है, कोई नहीं जानते। शरीर दूसरे का है, खायेगी भी उनकी आत्मा। उनके पेट में पड़ेगा। हाँ बाकी वासना वह लेती है। शिवबाबा तो है ही अभोक्ता। कुछ खाते नहीं। मम्मा की आत्मा आती है तो खाती है। पित्र भी आते हैं तो खाते हैं, यह बातें समझने की हैं। तो सिवाए एक के किसको बाबा नहीं कहा जाता, इनसे क्या वर्सा मिल सकता? कुछ नहीं मिल सकेगा। क्राइस्ट ने वर्सा दिया है क्या? उन्होंने तो लड़ाई कर राजाई स्थापन की है। क्रिश्चियन लोगों ने लड़ाई की। जब धन की वृद्धि हो, धन इकट्ठा हो तब राजाई चल सके। ऐसे थोड़े ही है कि क्रिश्चियन ने राजाई दी। राजाई अपने पुरूषार्थ से ड्रामा प्लैन अनुसार मिलती है ऐसे कहेंगे, बाकी मनुष्य किसको कुछ दे नहीं सकते। अगर देते हैं तो अल्पकाल का सुख। अभी तो तमोप्रधान हैं। माया का बहुत जोर है, अब माया से युद्ध करना है। माया जीते जगतजीत, मनुष्य शान्ति में रहने के लिए कितना माथा मारते हैं। मन ऐसे थोड़े ही शान्त हो सकता है। यह तो कुछ सीखते हैं जो हिप्नोटाइज आदि कर अनकानसेस कर देते हैं। मेहनत लगती है, किसकी तो ब्रेन ही खराब हो जाती है। बाप कहते हैं अगर कोई कर्मबन्धन में अथवा सम्बन्धी आदि में बुद्धि जाती रहेगी तो विकर्म विनाश नहीं होंगे। देहधारी से बुद्धि को हटाना है। सबको भूल जाओ, आप मुये मर गई दुनिया। दुनिया को याद करते हो तो तुमको दण्ड पड़ता है। तुम कहते हो कि बाबा हम मर चुके हैं। हम आपके हैं तो फिर मित्र सम्बन्धी आदि तरफ बुद्धि क्यों जाती है? गोया तुम मरे नहीं हो! बाप के बने नहीं हो! बहुत हैं जिनको रात-दिन कर्मबन्धन का ही चिंतन रहता है। याद में बैठते भी वही संकल्प आते रहते हैं। यहाँ बाबा की गोद में रहते तो मर चुके ना। तो बुद्धियोग कहाँ जाना नहीं चाहिए। सन्यासी तो घरबार छोड़ते हैं, गोया मर गये। अगर याद पड़ता रहेगा तो योग में कैसे रहेंगे। कोई फिर घर में लौट भी आते हैं। कोई पक्के होते हैं, बिल्कुल याद भी नहीं करते। तुम बच्चों की भी बुद्धि अगर बाहर जाती रहती है तो ऊंच पद पा सकेंगे। बच्चे बने हो तो फालो फादर पूरा करना चाहिए। कुछ भी मोह नहीं जाना चाहिए। परन्तु तकदीर में नहीं है तो मरकर भी उस तरफ चले जाते हैं। 5 प्रतिशत बुद्धि यहाँ है, 95 प्रतिशत बुद्धि बाहर है, भटकती रहती है ना। इधर के, उधर के। बाप के बने फिर बुद्धि ही खत्म। मर गये। इस बेहद के सन्यास में विरला ही कोई सकता है। माला का दाना भी वही बन सकता है। यह तो तकदीर है। यहाँ जो आकर रहते हैं-उन्हों को मेहनत नहीं लगनी चाहिए। परन्तु देखा जाता है कि यहाँ वालों को जास्ती मेहनत लगती है। बाहर में रहने वाले बड़े तीखे चले जाते हैं। किसी में मोह नहीं जाता। समझते हैं कहाँ यह बन्धन छूटे तो सर्विस में लग जायें। वह भी देखना पड़ता है - ज्ञान में पक्के हैं? अगर कच्चे होंगे और पति मर गया तो जैसे जख्म पर नमक पड़ जाता है। जब तक अच्छी रीति नहीं मरे हैं तो जैसे जख्म पर नमक पड़ता रहता है। यहाँ तो बाबा कहा, बस। बाबा के बन गये। पुराना सम्बन्ध छूटा। वह जानें उसके कर्म जानें। हम क्या जानें। इतनी उछल होनी चाहिए। ऐसे बहुत थोड़े हैं। बाप मिला बस और किसकी परवाह नहीं, इतनी हिम्मत चाहिए। सच्ची दिल हो, श्रीमत पर चलता रहे तो कोई भी रोक नहीं सकते हैं। पवित्र बनने में कोई विघ्न डाल नहीं सकते। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) कर्मबन्धनों के चिन्तन में नहीं रहना है। बुद्धि को देह-धारियों से हटाना है। बेहद का सन्यास करना है।
2) बन्धनों से छूटने के लिए पूरा-पूरा नष्टोमोहा बनना है। सच्ची दिल रखनी है। ज्ञान में मजबूत (पक्का) और हिम्मतवान बनना है।
वरदान:मेरे पन की खोट को समाप्त कर भरपूरता का अनुभव करने वाले सम्पूर्ण ट्रस्टी भव!
यदि बाप की श्रीमत प्रमाण निमित्त बनकर रहो तो मेरी प्रवृत्ति है, मेरा सेन्टर है। प्रवृत्ति में हो तो भी ट्रस्टी हो, सेन्टर पर हो तो भी बाप के सेन्टर हैं कि मेरे इसलिए सदा शिव बाप की भण्डारी है, ब्रह्मा बाप का भण्डारा है - इस स्मृति से भरपूरता का अनुभव करेंगे। मेरा पन लाया तो भण्डारा भण्डारी में बरक्कत नहीं होगी। किसी भी कार्य में अगर कोई खोट अर्थात् कमी है तो इसका कारण बाप की बजाए मेरेपन की खोट अर्थात् अशुद्धि मिक्स है।
स्लोगनबाप समान बनना है तो समझना, चाहना और करना-तीनों को समान बनाओ।

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Details ( Page:- Murali 4th Nov 2017 )
HINGLISH SUMMARY  04.11.17Pratah Murli Om Shanti BapDada Madhuban
Mithe bacche - tumhe jitna Baba kehne se sukh feel hota hai, utna bhakto ko Bhagwan wa Ishwar kehne se nahi feel ho sakta.
Q- Lobh ke bas lokik baccho ki bhavna kya hoti jo tumhari nahi ho sakti?
A- Lokik bacche jo lobhi hote wo sochte hain ki kab Baap mare to property ke hum mallik bane. Tum bacche behad ke Baap ke prati aisa kabhi soch he nahi sakte kyunki Baap to hai he asariri. Yahan tumko abinashi Baap se abinashi varsha milta hai.
Dharna Ke liye mukhya Saar:-
 1) Savere-savere oothkar Baap ko pyaar se yaad karne ki aadat pakki daalni hai. Kam se kam 3-4 baje zaroor oothna hai.
2)Behad Baap se sachcha love rakhna hai. Shrimat par chal poora varsha lena hai.
Vardaan:-- Sarv shaktiyon se sampann ban har shakti ko karya me lagane wale Master Sarvshaktimaan bhava
Slogan:-- Praptiyon ko bhoolna he thakna hai isiliye praptiyon ko sada saamne rakho.
 
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04/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''बापदादा'' मधुबन
मीठे मीठे बच्चे - तुम्हें जितना बाबा कहने से सुख फील होता है, उतना भक्तों को भगवान वा ईश्वर कहने से नहीं फील हो सकता।
प्रश्न: लोभ के वश लौकिक बच्चों की भावना क्या होती जो तुम्हारी नहीं हो सकती?
उत्तर:
लौकिक बच्चे जो लोभी होते वह सोचते हैं कि कब बाप मरे तो प्रापर्टी के हम मालिक बनें। तुम बच्चे बेहद के बाप के प्रति ऐसा कभी सोच ही नहीं सकते क्योंकि बाप तो है ही अशरीरी। यहाँ तुमको अविनाशी बाप से अविनाशी वर्सा मिलता है।
गीत:- मुखड़ा देख ले प्राणी.....    ओम् शान्ति।
ओम् शान्ति। जब दो बारी कहें तो एक बाबा कहते हैं, एक दादा कहते हैं। एक को आत्मा, दूसरे को परम आत्मा कहा जाता है अर्थात् परमधाम में निवास करने वाले हैं इसलिए उनको परम आत्मा (परमात्मा) कहा जाता है। अब आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध क्या है? एक बाप और अनेक बच्चे हैं। मनुष्य जब पुकारते हैं तो अंग्रेजी में भी कहते हैं गॉड फादर। तो पिता हुआ ना। सिर्फ परमात्मा वा प्रभु, ईश्वर आदि कहने से इतना मज़ा नहीं आता। बाप कहने से सुख मिलता है। पारलौकिक बाप है ही सुख देने वाला तब तो भक्ति मार्ग में इतना याद करते हैं। गॉड फादर अर्थात् वह हमारा पिता है। यह भी कहते हैं हम सब ब्रदर्स हैं। ब्रदरहुड कहते हैं। यह भारतवासी जब कहते हैं हम सब भाई-भाई हैं तो आत्मा की तरफ ध्यान नहीं जाता। देह-अभिमान में चले जाते हैं। यह समझते नहीं कि हम आत्मायें आपस में भाई-भाई हैं। हम सबका बाप एक है। अगर परमात्मा सर्वव्यापी होता तो भाई-भाई नहीं कहते। आत्मा ही समझकर भाई-भाई कहते हैं। अभी तुम बच्चे बाप के सम्मुख बैठे हो और बाप तुमको पढ़ाते हैं। अब आत्मा कहती है हमको बाप मिला है। बाप मिला गोया सब कुछ मिला। बाप द्वारा वर्सा मिलता है। बच्चा पैदा हुआ और समझते हैं वारिस आया। बाबा कहने से ही बच्चे का वारिसपना सिद्ध हो जाता है। अक्सर करके बच्चियां माँ, माँ कहती हैं। माँ तरफ जास्ती लव रहता है। बच्चा होगा तो बा,बा कहता रहेगा। बच्चे का बाप की तरफ लव जाता है, माँ से वर्सा नहीं मिल सकता। बाप से वर्सा मिलता है। अब यहाँ तो तुम सब आत्मायें भाई-भाई हो। तुम हर एक बाप से वर्सा ले रहे हो। बाप की श्रीमत है हर एक अपने को बाप का बच्चा समझ और सबको बाप का परिचय देते रहें और सृष्टि चक्र का राज़ भी समझायें। बाप से ही स्वर्ग का वर्सा मिलता है। बेहद का बाप कहते हैं तुम स्वर्गवासी थे फिर तुम नर्कवासी कैसे बनें, 84 जन्मों का चक्र कैसे लगाया - यह है डिटेल की बातें। बाकी बाप ने पहचान तो दी है और बाप से जरूर सतयुग का वर्सा मिलेगा। अच्छा किसको मिला हुआ है? यह लक्ष्मी-नारायण के चित्र खड़े हैं। इन्हों को बाप का वर्सा मिला था फिर कहाँ गया? यह है चक्र की बात। तुमको अभी सतयुग का वर्सा मिलता है फिर पुनर्जन्म लेते-लेते 84 जन्म तो भोगने ही हैं। अब तुमको नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार 84 का चक्र बुद्धि में है और यह भी निश्चय है कि हमारा अन्तिम जन्म है। 84 जन्मों का चक्र लगाकर पूरा किया है। अब तुम जायेंगे तो तुम्हारे पीछे सब चले जायेंगे। तुम बच्चे तो बाप से अपना वर्सा पा चुके हो, राजयोग सीख चुके हो। तो तुम जानते हो हम फिर नई दुनिया में राज्य करने आयेंगे। फिर यह सब इतने धर्म वहाँ होंगे नहीं, सब वापिस चले जायेंगे। फिर पहले-पहले हमको यानी डिटीज्म को आना है। हम शूद्र कुल के थे, अब ब्रह्मण कुल के बने हैं। फिर सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी कुल के बनेंगे। हम ब्रह्मण कुल, सूर्यवंशी कुल और चन्द्रवंशी कुल के तीनों वर्से एक ही बाप से ले रहे हैं। सतयुग त्रेता में कोई धर्म स्थापन करने आता ही नहीं है। भारत का एक ही धर्म रहता है। पीछे बाहर वाले इस्लामी, बौद्धी आदि आते हैं। भारत बहुत प्राचीन देश है। पहले देवी-देवता ही थे, अभी और धर्मो में कनवर्ट हो गये हैं। कितनी भिन्न भिन्न भाषायें हैं। जैसे यूरोपियन हैं तो अमेरिका की भाषा अलग, फ्रांस की अलग। हैं तो सब क्रिश्चियन लोग। वैसे चीन की देखो। एक ही बौद्ध धर्म के हैं, परन्तु चीन की भाषा और, जापान की भाषा और। हैं तो सब बौद्ध परन्तु वृद्धि हो जाने से अलग-अलग हो जाते है। आपस में दुश्मन भी बन जाते हैं, भारत का दुश्मन कोई नहीं है। यह तो दूसरे धर्म वाले आकर लड़ते हैं। आपस में फूट डाल भारत को भी लड़ा देते हैं, नहीं तो भारतवासियों की आपस में लड़ाई ऐसे कभी हुई नहीं है। दूसरों ने लड़ाया, लोभ के कारण। यह भी खेल है। भारतवासी यह भी भूल गये हैं कि हम ही विश्व के मालिक थे। हमको बाप ने राज्य दिया था। सतयुग में यह नौलेज़ रहती नहीं कि यह राज्य हमने कैसे पाया। अभी तुम जानते हो हम यह राज्य कैसे पा रहे हैं। यह बाप बैठ समझाते हैं। है भी बहुत सहज। परन्तु मनुष्यों की बुद्धि को ऐसा ताला लगा हुआ है जो यह नहीं जानते कि इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य किसने और कब दिया? इन्हों के बच्चे कितने हुए, कुछ नहीं जानते। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। सतयुग की आयु कितनी है? कह देते लाखों वर्ष फिर लाखों वर्ष में गद्दियां कितनी हुई? वृद्धि कितनी हुई होगी? कितने महाराजा महारानी होंगे। लाखों वर्ष में तो अनगिनत हो जाएं। लाखों वर्ष सतयुग के, फिर त्रेता के लाखों वर्ष, कलियुग के भी अभी 40 हजार वर्ष और कह देते हैं। इन बातों में किसकी बुद्धि नहीं चलती। इतनी लम्बी आयु दे दी है। क्रियेटर, डायरेक्टर, समय आदि सबका मालूम होना चाहिए। परन्तु किसको भी पता नहीं है। कहते हैं क्राइस्ट से 5 हजार वर्ष पहले भारत स्वर्ग था। गॉड गाडेज का राज्य था। कितना वर्ष चला, कैसे चला? यह कुछ भी जानते नहीं। अगर राधे-कृष्ण सतयुग के प्रिन्स प्रिन्सेज हैं तो उन्होंने भी कोई द्वारा पद पाया होगा? अगर कृष्ण ने गीता सुनाई तो कब? यह सब बातें बाप ही समझाते हैं। स्कूल में पहले अल्फ बे पढ़ाया जाता है। फिर धीरे-धीरे बड़ा इम्तहान पास करते हैं। तो अल्फ बे की पढ़ाई और पिछाड़ी की पढ़ाई में कितना फर्क होगा। यहाँ भी ऐसे है। जितना पहले समझाते थे, उससे सहज अभी समझाते हैं, उससे जास्ती आगे समझायेंगे। कोई नया आता है तो पहले उनसे फार्म भराया जाता है, फिर समझाते हैं। परमपिता परमात्मा के साथ आपका क्या सम्बन्ध है? जरूर सबका बाप हुआ ना। इन बातों को समझने वाले ही समझते हैं। जब तक हड्डी निश्चय हो कि बेहद के बाप से वर्सा लेना है। बाप स्वर्ग रचते हैं तो जरूर स्वर्ग का वर्सा देंगे। यह उन्हों की बुद्धि में बैठेगा - जिन्होंने कल्प पहले निश्चय किया होगा।
तुम देखते हो कई बच्चे सवेरे उठ नहीं सकते। 10-15 वर्ष मेहनत करते आये हैं तो भी समय पर उठ नहीं सकते। कम से कम 3-4 बजे उठो। भक्त लोग भी सवेरे उठकर ध्यान करते हैं। जाप करते हैं हनुमान का, शिव का। परन्तु उनसे कोई फायदा नहीं। भल करके कोई के लक्षण अच्छे होते हैं परन्तु उनसे कोई को मुक्ति-जीवनमुक्ति नहीं मिल सकती है। उतरती कला होती है। लक्ष्मी-नारायण जो सतयुग में राज्य करते थे। वह भी दूसरे तीसरे जन्म में नीचे आते जाते हैं, उतरती कला होती जाती है। आधाकल्प पूरा होगा तो वाम मार्ग में चले जायेंगे। फिर भक्तिमार्ग शुरू होगा, कितने ढेर मन्दिर बनते हैं। अभी भी कितने मन्दिर हैं। कोई टूट भी गये हैं। वाम मार्ग में जाने के चित्र भी हैं। ड्रेस देवताओं की पड़ी है। वास्तव में ड्रेस उन्हों की अलग थी। पीछे बदलती आई है। कोई की पाग कैसी, कोई की कैसी, कोई का ताज कैसा, अलग-अलग ताज पहनने का भी अलग-अलग नमूना होता है। सूर्यवंशी राजायें जो हैं उनकी पहरवाइस अपनी-अपनी होती है। यह फलाने की पगड़ी है। बाबा ने साक्षात्कार भी किया है। द्वारिकाधीश की टेढ़ी पगड़ी थी। यह सब ड्रामा आदि से अन्त तक जो कुछ हो रहा है, वह फिर भी ऐसे ही होगा। फिर वाम मार्ग में जायेंगे, सबका मतभेद हो जायेगा। रसमरिवाज अलग हो जायेगा। सूर्यवंशी अलग, चन्द्रवंशियों का अलग.... यह बना बनाया खेल है जो फिर रिपीट होना है।
तुम जानते हो हम भी बेहद के बाप से फिर से गति सद्गति को पाते हैं। पुरानी दुनिया का विनाश होना है। बेहद का बाप राजयोग सिखला रहे हैं। यह दुनिया नहीं जानती कि राजयोग सिखाते हैं। तुम बच्चे अच्छी रीति जानते हो और तुम्हारा बाप से लव है। सबका एक जैसा तो हो नहीं सकता। अज्ञान में भी सबका एक जैसा लव नहीं होता। कोई लोभ वश कहते हैं बाप मरे तो प्रापर्टी मिले.. यहाँ शिवबाबा का शरीर तो है नहीं। बाबा तो अविनाशी है। यह शरीर लोन पर लिया है। तुम जानते हो हमने पूरे 84 जन्म लिए हैं। बाबा तो पुनर्जन्म नहीं लेते, इस शरीर में प्रवेश कर आते हैं। नहीं तो क्या लक्ष्मीनारायण के तन में आये? वह तो हैं ही पावन दुनिया के मालिक। यह तो है ही पतित दुनिया, पतित शरीर क्योंकि विष से पैदा होते हैं। बाबा कल्प पहले मुआफिक कहते हैं मैं साधारण तन में प्रवेश करता हूँ। मुझे जरूर अनुभवी रथ चाहिए। कोई अच्छे एक्टर होते हैं तो उनको अच्छा इनाम मिलता है। यह भी बाबा का रथ गाया हुआ है। ब्रह्मा द्वारा स्थापना, ब्रह्मा को बूढ़ा भी दिखाते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा, विष्णु और शंकर का रूप ही अलग है। ब्रह्मा का रूप बिल्कुल ठीक है। बाप ने ही इनका नाम रखा है प्रजापिता ब्रह्मा, इसने पूरे 84 जन्म लिए हैं। तुम भी कहेंगे हम सबने पूरे 84 जन्म लिए हैं तब पहले पहले बाप से मिले हैं हमारी राजाई फिर से स्थापन हो रही है। समझाना भी पड़ता है हे परमपिता परमात्मा, हे भगवान। तो भगवान जरूर बाप को समझना चाहिए। परन्तु मनुष्यों की समझ में नहीं आता है कि सभी आत्माओं का बाप निराकार है। पिता है तब तो भक्ति मार्ग में सब याद करते हैं। आत्माओं को सुख मिला था तब दु: में याद करते हैं। तुम भी आधाकल्प बाप को याद करते आये हो। शुरू-शुरू में ही सोमनाथ का मन्दिर बनता है। तो जरूर बाप को ही याद करेंगे। जानते हैं यह बाप का मन्दिर है। बाप ने ही वर्सा दिया है। तो पहले-पहले मन्दिर भी बाप का बना है। तुम अभी बाप के वारिस बने हो। बाप विश्व का रचयिता है। उनसे ही वर्सा मिलता है। बाकी जो भी हैं उन्होंने क्या किया? हम उनकी पूजा क्यों करते हैं? 84 जन्म वह लेते हैं। परन्तु भक्ति भी व्यभिचारी होनी ही है। आधाकल्प के लिए सामग्री चाहिए। सतयुग त्रेता में सामग्री की दरकार नहीं होती। यह सब बुद्धि में धारण करना है। वास्तव में कुछ भी लिखने की दरकार नहीं है। अगर सालवेंट बुद्धि हैं तो झट धारणा हो जाती है। बाकी किसको सुनाने लिए नोट्स लेते हैं। किताबें आदि रखने की जरूरत नहीं। हमारे किताब पिछाड़ी में कौन पढ़ेगा? औरों के शास्त्र तो पिछाड़ी में चले आते हैं। पढ़ने वाले हैं। तुमको तो पढ़ना ही नहीं है, प्रालब्ध मिल गई। आधाकल्प तो शास्त्र आदि की कोई बात नहीं। यह ज्ञान प्राय:लोप हो जाता है। शास्त्र सब खत्म हो जाते हैं। पहले सबको यह समझाओ कि तुमको दो बाप हैं। जिस्मानी बाप तो है, वह भी उस बाप को याद करते हैं। गाया जाता है - दु: में सिमरण सब करें... यह भारत की बात है। बाप भी भारत में आते हैं। शिव जयन्ती आती है। तुम कहेंगे हम अपने बाप का फलाना जन्म मना रहे हैं। भल पूछें ब्रह्माकुमार कुमारियां हैं तो जरूर बाप आया होगा। यह है शिव का ज्ञान यज्ञ। तो ब्रह्मण जरूर चाहिए। ब्रह्मा कहाँ से आया? ब्रह्मा को एडोप्ट किया फिर बच्चे पैदा होते हैं तो भी इनके मुख कमल से रचते हैं। पहले सबको बाप का परिचय देना है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) सवेरे-सवेरे उठकर बाप को प्यार से याद करने की आदत पक्की डालनी है। कम से कम -4 बजे जरूर उठना है।
2) बेहद बाप से सच्चा लव रखना है। श्रीमत पर चल पूरा वर्सा लेना है।
वरदान:सर्व शक्तियों से सम्पन्न बन हर शक्ति को कार्य में लगाने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान् भव!
जो बच्चे सर्व शक्तियों से सदा सम्पन्न हैं वही मास्टर सर्वशक्तिमान् हैं। कोई भी शक्ति अगर समय पर काम नहीं आती तो मास्टर सर्वशक्तिमान् नहीं कह सकते। एक भी शक्ति कम होगी तो समय पर धोखा दे देगी, फेल हो जायेंगे। ऐसे नहीं सोचना कि हमारे पास सर्व शक्तियां तो हैं, एक कम हुई तो क्या हर्जा है! एक में ही हर्जा है, एक ही फेल कर देगी इसलिए एक भी शक्ति कम हो और समय पर वह शक्ति काम में आये तब कहेंगे मास्टर सर्वशक्तिमान्।
स्लोगन: प्राप्तियों को भूलना ही थकना है इसलिए प्राप्तियों को सदा सामने रखो।
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Details ( Page:- Murali 5th Nov 2017 )
HINGLISH SUMMARY 
05.11.17Pratah Murli Om Shanti AVYAKT BapDada Madhuban
Headline 1 ( revise – 24/02/83 ) – Dilaram baap ka dilruba bachhon se milan.
Headline 2 ( revise – 27/02/83 ) – sangam yug par srungara hua madhur aloukik mela
Vardan – Parmatam pyar ki Shakti se asambhav ko sambhav karnewale padmapadam bhagyawan bhav.
Slogan – Apne sresth karm wa sresth challan dwara duayen jama karlo toh pahad jese baat rui ke saman anubhav hogi.
 
 
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05/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त बापदादा'' रिवाइज-24/02/83
"दिलाराम बाप का दिलरूबा बच्चों से मिलन"
आज विशेष मिलन मनाने के लिए सदा उमंग-उल्लास में रहने वाले बच्चों से मिलने के लिए आये हैं। दिन रात यही संकल्प रहता है कि मिलन मनाना है। आकार रूप में भी मिलन मनाते फिर भी साकार रूप द्वारा मिलने की शुभ आशा सदा ही रहती है, सब दिन गिनती करते रहते कि आज हमको मिलना है, यह संकल्प हर बच्चे का बापदादा के पास पहुँचता रहता है और बापदादा भी यही रेसपान्ड देने के लिए हर बच्चे को याद करते रहते हैं इसलिए आज मुरली चलाने नहीं लेकिन मिलने का सकंल्प पूरा करने आये हैं। कोई-कोई बच्चे दिल ही दिल में मीठे-मीठे उल्हनें भी देते हैं कि हमें तो बोल द्वारा मुलाकात नहीं कराई। बापदादा भी हरेक बच्चे से दिल भर-भर के मिलने चाहते हैं। लेकिन समय और माध्यम को देखना पड़ता है। आकारी रूप से एक ही समय पर जितने चाहें जितना समय चाहें उतना समय और उतने सब मिल सकते हैं उसके लिए टर्न आने की बात नहीं है। लेकिन जब साकार सृष्टि में, साकार तन द्वारा मिलन होता है तो साकारी दुनिया और साकार शरीर के हिसाब को देखना पड़ता है। आकारी वतन मे कभी दिन मुकरर होता है क्या कि फलाना ग्रुप फलाने दिन मिलेगा वा एक घण्टे के बाद, आधा घण्टे के बाद मिलने के लिए आना। यह बन्धन आपके वा बाप के सूक्ष्मवतन में सूक्ष्म शरीर में नहीं है। आकारी रूप से मिलन मनाने के अनुभवी हो ना। वहाँ तो भल सारा दिन बैठ जाओ, कोई उठायेगा नहीं यहाँ तो कहेंगे अभी पीछे जाओ, अभी आगे जाओ। फिर भी दोनों मिलना मीठा है। आप डबल विदेशी बच्चे वा देश में रहने वाले बच्चे जो साकार रूप में ड्रामा अनुसार पालना वा प्रैक्टिकल स्वरूप नहीं देख पाये हैं। ऐसे बहुत समय से ढूंढने पर फिर से आकर मिले हुए बच्चों को ब्रह्मा बाप बहुत याद करते हैं। ब्रह्मा बाप ऐसे सिकीलधे बच्चों का विशेष गुणगान करते हैं कि आये भल पीछे हैं लेकिन आकार रूप द्वारा भी अनुभव साकार रूप का करते हैं, ऐसे अनुभव के आधार से बोलते हैं कि हमें ऐसा नहीं लगता कि साकार को हमने नहीं देखा। साकार में पालना ली है और अब भी ले रहे हैं। तो आकार रूप में साकार का अनुभव करना यह बुद्धि की लगन का, स्नेह का प्रत्यक्ष स्वरूप है। ऐसे लगता है आकार में भी साकार को देख रहे हैं। ऐसे अनुभव करते हो ना। तो यह बच्चों की बुद्धि के चमत्कार का सबूत है। और दिलाराम बाप के समीप दिलाराम के दिलरूबा बच्चे हैं, यह सबूत है। दिलरूबा बच्चे हो ना। दिल रूबा पर सदा क्या गीत बजता है? वाह बाबा, वाह मेरा बाबा।
 
बापदादा हर बच्चे को याद करते हैं। ऐसे नहीं समझना इनको याद किया, मेरे को पता नहीं याद किया वा नहीं। इनसे ज्यादा प्यार है मेरे से कम प्यार है, नहीं। आप सोचो 5 हजार वर्ष के बाद बापदादा को बिछड़े हुए बच्चे मिले हैं तो 5 हजार वर्ष का इकट्ठा प्यार हर बच्चे को मिलेगा ना। तो 5 हजार वर्ष का प्यार 5-6 वर्ष में या 10-12 वर्ष में देना तो कितना स्टाक थोड़े समय में देंगे। ज्यादा से ज्यादा दें तब तो पूरा हो। इतना प्यार का स्टाक हरेक बच्चे के लिए बाप के पास है। प्यार कम हो नहीं सकता। दूसरी बात कि बापदादा सदा बच्चों की विशेषता देखता। चाहे कोई समय बच्चे माया के प्रभाव कारण थोड़ा डगमग होने का खेल भी करते हैं। फिर भी बापदादा उस समय भी उसी नजर से देखते कि यह बच्चा आया हुआ विघ्न लगन से पार कर फिर भी विशेष आत्मा बन विशेष कार्य करने वाला है। विघ्न में भी लगन रूप को ही देखते हैं तो प्यार कम कैसे होगा! हरेक बच्चे से ज्यादा से ज्यादा सदा प्यार है और हर बच्चा सदा ही श्रेष्ठ है। समझा।
 
पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात
न्यूयार्क:- बाप का बनना अर्थात् विशेष आत्मा बनना। जब से बाप के बने उस घड़ी से विश्व के अन्दर सर्व से श्रेष्ठ गायन योग्य और पूज्यनीय आत्मा बने। अपनी मान्यता, अपना पूजन फिर से चैतन्य रूप में देख भी रहे हो और सुन भी रहे हो। ऐसे अनुभव करते हो? कहाँ भारत और कहाँ अमेरिका लेकिन बाप ने कोने से चुनकर एक ही बगीचे में लाया। अभी सब कौन हो? अल्लाह के बगीचे के रूहे गुलाब। यह तो नाम लेना पड़ता है फलाना देश, फलाना देश, वैसे एक ही बगीचे के, एक ही बाप की पालना में आने वाले, रूहे गुलाब हो। अभी ऐसे महसूस होता है ना हम सब एक के हैं। और हम सब एक रास्ते पर एक मंजिल पर जाने वाले हैं। बाप भी हरेक को देख हर्षित होते हैं। सबकी शुभ भावना, सबके सेवा की अथक लगन ने दृढ़ संकल्प ने प्रत्यक्ष सबूत दिया। चारों ओर के उमंग-उत्साह के सहयोग ने रिजल्ट अच्छी दिखाई है। बाहर का आवाज भारत वालों को जगायेगा, इसलिए बापदादा मुबारक देते हैं।
 
2) बारबेडोज:- बापदादा सदा बच्चों को नम्बरवन बनने का साधन बताते हैं। चाहे कितना भी कोई पीछे आये लेकिन आगे जाकर नम्बरवन ले सकता है। ऐसे तो नहीं सोचते हो पता नहीं हमारा ऊंचा पार्ट होगा या नहीं, हम आगे कैसे जायेंगे। बापदादा के पास चाहे पीछे आने वाले हों, चाहे किस भी देश के हों, चाहे किस भी धर्म के हों, किस भी मान्यता के हो लेकिन सबके लिए एक ही फुल अधिकार है। बाप एक है तो हक भी एक जैसा है। सिर्फ हिम्मत और लगन की बात है। कभी भी हिम्मतहीन नहीं बनना। चाहे कोई कितना भी दिलशिकस्त बनाए, कहे पता नहीं आपको क्या हुआ है, कहाँ चले गये हो लेकिन आप उनकी बातों में नहीं आना। पक्का जान पहचान कर सौदा किया है ना! हम बाप के, बाप हमारा। बाप हर बच्चे को अधिकारी आत्मा समझते हैं। जितना जो ले उसके लिए कोई रूकावट नहीं। अभी कोई सीट्स बुक नहीं हुई हैं। अभी सब सीट खाली हैं। सीटी बजी ही नहीं है इसलिए हिम्मत रखते रहेंगे तो बाप भी पदमगुणा मदद देते रहेंगे।
 
3) कैनाडा - सदा उड़ती कला में जाने का आधार क्या है? डबल लाइट। तो सदा उड़ते पंछी हो ना। उड़ता पंछी कभी किसके बन्धन में नहीं आता। नीचे आयेंगे तो बन्धन में बधेंगे इसलिए सदा ऊपर उड़ते रहो। उड़ते पंछी अर्थात् सर्व बन्धनों से मुक्त, जीवन मुक्त। कैनाडा में साइन्स भी उड़ने की कला सिखाती है ना। तो कैनाडा निवासी सदा ही उड़ते पंछी हैं।
 
4) सैनफ़्रानसिसको - सभी अपने को विश्व के अन्दर विशेष पार्ट बजाने वाले हीरो एक्टर समझकर पार्ट बजाते हो? (कभी-कभी) बापदादा को बच्चों का कभी-कभी शब्द सुनकर आश्चर्य लगता है। जब सदा बाप का साथ है तो सदा उसकी ही याद होगी ना। बाप के सिवाए और कौन है जिसको याद करते हो। औरों को याद करते-करते क्या पाया और कहाँ पहुँचे, इसका भी अनुभव है। जब यह भी अनुभव कर चुके तो अब बाप के सिवाए और याद ही क्या सकता! सर्व सम्बन्ध एक बाप से अनुभव किया है या कोई रह गया है? जब एक द्वारा सर्व सम्बन्ध का अनुभव कर सकते हो तो अनेक तरफ जाने की आवश्यकता ही नहीं। इसको ही कहा जाता है एक बल एक भरोसा। अच्छा।
 
सभी ने अच्छी मेहनत कर विशेष आत्माओं को सम्पर्क में लाया, जिन्होंने भी सेवा में सहयोग दिया उस सहयोग का रिर्टन अनेक जन्मों तक सहयोग प्राप्त होता रहेगा। एक जन्म की मेहनत और अनेक जन्म मेहनत से छूट गये। सतयुग में मेहनत थोड़े ही करेंगे। बापदादा बच्चों की हिम्मत और निमित्त बनने का भाव देखकर खुश होते हैं। अगर निमित्त भाव से नहीं करते तो रिजल्ट भी नहीं निकलती। अच्छा।
 
05/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त बापदादा'' रिवाइज-27/02/83 मधुबन
 
"संगमयुग पर श्रृंगारा हुआ मधुर अलौकिक मेला"
 
आज बाप और बच्चे मिलन मेला मना रहे हैं। मेले में बहुत ही वैरायटी और सुन्दर-सुन्दर वस्तु बहुत सुन्दर सजावट और एक दो में मिलना होता है। बापदादा इस मधुर मेले में क्या देख रहे हैं, ऐसा अलौकिक श्रृंगारा हुआ मेला सिवाय संगमयुग के कोई मना नहीं सकता। हरेक, एक दो से विशेष श्रृंगारे हुए अमूल्य रत्न हैं। अपने श्रृंगार को जानते हो ना। सभी के सिर पर कितना सुन्दर लाइट का ताज चमक रहा है। इसी लाइट के क्राउन के बीच आत्मा की निशानी कितनी चमकती हुई मणि मुआफिक चमक रही है। अपना ताजधारी स्वरूप देख रहे हो? हरेक दिव्य गुणों के श्रृंगार से कितने सुन्दर सजी-सजाई मूर्त हो। ऐसा सुन्दर श्रृंगार, जिससे विश्व की सर्व आत्मायें आपके तरफ चाहते हुए भी स्वत: ही आकर्षित होती हैं। ऐसा श्रेष्ठ अविनाशी श्रृंगार किया है? जो इस समय के श्रृंगार के यादगार आपके जड़ चित्रों को भी सदा ही भक्त लोग सुन्दर से सुन्दर सजाते रहेंगे। अभी का श्रृंगार आधा कल्प चैतन्य देव-आत्मा के रूप में श्रृंगारे जायेंगे और आधाकल्प जड़ चित्रों के रूप में श्रृंगारे जायेंगे। ऐसा अविनाशी श्रृंगार बापदादा द्वारा सर्व बच्चों का अभी हो गया है। बापदादा आज हर बच्चे के तीनों ही स्वरूप वर्तमान और अपने राज्य का देव आत्मा का और फिर भक्ति मार्ग में यादगार चित्र, तीनों ही स्वरूप हरेक बच्चे के देख हर्षित हो रहे हैं। आप सब भी अपने तीनों रूपों को जान गये हो ना। तीनों ही अपने रूप नालेज के नेत्र द्वारा देखे हैं ना!
 
आज तो बापदादा मिलने का उल्हना पूरा करने आये हैं। कमाल तो बच्चों की है जो निरबन्धन को भी बन्धन में बाँध देते हैं। बापदादा को भी हिसाब सिखा देते कि इस हिसाब से मिलो। तो जादूगर कौन हुए - बच्चे वा बाप? ऐसा स्नेह का जादू बच्चे बाप को लगाते हैं जो बाप को सिवाए बच्चों के और कुछ सूझता ही नहीं। निरन्तर बच्चों को याद करते हैं। तुम सब खाते हो तो भी एक का आह्वान करते हो। तो कितने बच्चों के साथ खाना पड़े! कितने बारी तो भोजन पर बुलाते हो। खाते हैं, चलते हैं, चलते हुए भी हाथ में हाथ देकर चलते, सोते भी साथ में हैं। तो जब इतने अनेक बच्चों साथ खाते, सोते, चलते तो और क्या फुर्सत होगी! कोई कर्म करते तो भी यही कहते कि काम आपका है, निमित्त हम हैं। करो कराओ आप, निमित्त हाथ हम चलाते हैं। तो वह भी करना पड़े ना। और फिर जिस समय थोड़ा बहुत तूफान आता तो भी कहते आप जानो। तूफानों को मिटाने का कार्य भी बाप को देते। कर्म का बोझ भी बाप को दे देते। साथ भी सदा रखते, तो बड़े जादूगर कौन हुए? भुजाओं के सहयोग बिना तो कुछ हो नहीं सकता इसलिए ही तो माला जपते हैं ना। अच्छा।
 
आस्ट्रेलिया निवासी बच्चों ने बहुत अच्छा त्याग किया है और हर बार त्याग करते हैं। सदा ही लास्ट सो फास्ट जाते और फर्स्ट आते हैं। जितना ही वह त्याग करते हैं, औरों को आगे करते हैं उतना ही जितने भी मिलते रहते उन सबका थोड़ा-थोड़ा शेयर आस्ट्रेलिया वालों को भी मिल जाता है। तो त्याग किया या भाग्य लिया! और फिर साथ-साथ यू.के. का भी बड़ा ग्रुप है। यह दोनों ही पहले-पहले के निमित्त बने हुए सेन्टर्स हैं और विशाल सेन्टर्स हैं। एक से अनेक स्थानों पर बाप को प्रत्यक्ष करने वाले बच्चे हैं इसलिए दोनों ही (आस्ट्रेलिया और यू.के.) बड़ों को, औरों को आगे रखना पड़ेगा। दूसरों की खुशी में आप सब खुश हो ना। जहाँ तक देखा गया है दोनों ही स्थान के सेवाधारी, सहयोगी, स्नेही बच्चे सब बातों में फराखदिल हैं। इस बात में भी सहयोगी बनने में महादानी बच्चे हैं। बापदादा को सब बच्चे याद हैं। सबसे मिल लेंगे, बापदादा को तो खुशी होती है कि कितना दूर-दूर से बच्चे मिलने के उमंग से अपने स्वीट होम में पहुँच जाते हैं। उड़ते-उड़ते पहुँच जाते हो। भले स्थूल में किसी भी देश के हैं लेकिन हैं तो सब एक देशी। सब ही एक हैं। एक बाप, एक देश, एक मत और एकरस स्थिति में स्थित रहने वाले। यह तो निमित्त मात्र देश का नाम लेकर थोड़ा समय मिलने के लिए कहा जाता है। हो सब एक देशी। साकार के हिसाब में भी इस समय तो सब मधुबन निवासी हैं। मधुबन निवासी अपने को समझना अच्छा लगता है ना।
 नये स्थान पर सेवा की सफलता का आधार:-
जब भी किसी नये स्थान पर सेवा शुरू करते हो तो एक ही समय पर सर्व प्रकार की सेवा करो। मन्सा में शुभ भावना, वाणी में बाप से सम्बन्ध जुड़वाने और शुभ कामना के श्रेष्ठ बोल और सम्बन्ध सम्पर्क में आने से स्नेह और शान्ति के स्वरूप से आकर्षित करो। ऐसे सर्व प्रकार की सेवा से सफलता को पायेंगे। सिर्फ वाणी से नहीं लेकिन एक ही समय साथ-साथ सेवा हो। ऐसा प्लैन बनाओ, क्योंकि किसी की भी सर्विस करने के लिए विशेष स्वयं को स्टेज पर स्थित करना पड़ता है। सेवा में रिजल्ट कुछ भी हो लेकिन सेवा के हर कदम में कल्याण भरा हुआ है, एक भी यहाँ तक पहुँच जाए यह भी सफलता तो समाई हुई है ही। अनेक आत्माओं के भाग्य की लकीर खींचने के निमित्त हैं। ऐसी विशेष आत्मा समझकर सेवा करते चलो। अच्छा - ओम् शान्ति।
वरदान:परमात्म प्यार की शक्ति से असम्भव को सम्भव करने वाले पदमापदम भाग्यवान भव!
पदमापदम भाग्यवान बच्चे सदा परमात्म प्यार में लवलीन रहते हैं। परमात्म प्यार की शक्ति किसी भी परिस्थिति को श्रेष्ठ स्थिति में बदल देती है। असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। मुश्किल सहज हो जाता है क्योंकि बापदादा का वायदा है कि हर समस्या को पार करने में प्रीति की रीति निभाते रहेंगे। लेकिन कभी-कभी प्रीत करने वाले नहीं बनना। सदा प्रीत निभाने वाले बनना।

स्लोगन:अपने श्रेष्ठ कर्म वा श्रेष्ठ चलन द्वारा दुआयें जमा कर लो तो पहाड़ जैसी बात भी रुई के समान अनुभव होगी।

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Details ( Page:- Murali 6th Nov 2017 )
HINGLISH SUMMARY 
06.11.17Pratah Murli Om Shanti  BapDada Madhuban
 Mithe bacche - tumne jeete ji behad ke Baap ki goud li hai, unki santan bane ho to Shrimat par zaroor chalna hai, har direction amal me lana hai.
Q- Shristi ki banaprasth avastha kab se suru hoti hai aur kyun?
A- Jab Shiv Baba is Brahma tan me prabesh karte hain tab se saari shristi ki banaprasth avastha suru hoti hai kyunki Baap sab ko wapis le jane ke liye aaye hain. Is samay choote bade sabki banaprasth avastha hai. Sabko mithe ghar Muktidham wapas jana hai fir jeevanmukti me aana hai. Waise bhi Baap jab is Brahma tan me prabesh karte hain to inki aayu 60 varsh ki hoti hai. Inki bhi banaprasth avastha hoti hai.
Dharna Ke liye mukhya Saar:
1)     Yah dharmau yug hai. Is samay dharmatma banna hai. Sabka kalyan karna hai. Mukti aur jeevanmukti me chalne ka raasta batana hai._
2)      Humari yah Godly student life hai. Behad ka Baap humko padha raha hai. Is khushi me rehna hai.
Vardaan:- Shikshak banne ke saath rahemdil ki bhavna dwara kshama karne wale Master Merciful bhava
Slogan:- Jinki jholi Parmatm duwaon se bharpoor hai unke paas maya aa nahi sakti.
 
 
HINDI DETAILs MURALI
06/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति '' बापदादा'' मधुबन
"मीठे बच्चे - तुमने जीते जी बेहद के बाप की गोद ली है, उनकी सन्तान बने हो तो श्रीमत पर जरूर चलना है, हर डायरेक्शन अमल में लाना है"
प्रश्न: सृष्टि की वानप्रस्थ अवस्था कब से शुरू होती है और क्यों?
उत्तर:
जब शिवबाबा इस ब्रह्मा तन में प्रवेश करते हैं तब से सारी सृष्टि की वानप्रस्थ अवस्था शुरू होती है क्योंकि बाप सबको वापिस ले जाने के लिए आये हैं। इस समय छोटे बड़े सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। सबको मीठे घर मुक्तिधाम वापस जाना है फिर जीवनमुक्ति में आना है। वैसे भी बाप जब इस ब्रह्मा तन में प्रवेश करते हैं तो इनकी आयु 60 वर्ष की होती है। इनकी भी वानप्रस्थ अवस्था होती है।
गीत:-मरना तेरी गली में    ओम् शान्ति।
यह किसकी गली में आकर मरना होता है? मनुष्य चाहते हैं कि हम मुक्तिधाम में जायें। परमपिता परमात्मा, शिवबाबा की विजय माला में पिरो जाएं। बच्चे जानते हैं जो भी मनुष्य मात्र की आत्मायें हैं वह बाप के गले का हार जरूर हैं। जैसे लौकिक बाप की रचना, लौकिक बाप के गले का हार है। बच्चे बाप को, बाप बच्चे को याद करते हैं। वैसे वास्तव में जो भी आत्मायें हैं वह सब याद करती हैं परमपिता परमात्मा बाप को। वह है हद का बाप, यह है बेहद का बाप। हर एक मनुष्य चाहते हैं - हम मुक्ति प्राप्त करें क्योंकि निराकार के गले का हार अर्थात् मुक्ति और विष्णु के गले का हार अर्थात् जीवनमुक्ति। बाप मुक्ति और जीवनमुक्ति देते हैं। बेहद के बाप के बच्चे बनेंगे तो उनके गले का हार होंगे। लौकिक माँ बाप के गले का हार हैं बच्चे। वह खुद माँ बाप भी किसी के बच्चे होते हैं। गाते हैं तुम मात-पिता.. जब हम तुम्हारे गले का हार बनेंगे तब हम सदा सुखी होंगे। बेहद के बाप को याद करते हैं परन्तु उनके गले का हार कैसे बनेंगे, वह आश रहती है। सो तो जब त्रिमूर्ति शिवबाबा आये, आकर तीनों को रचे - ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को, तब ब्रह्मा द्वारा बेहद बाप के गले का हार बन सकें। पहले लौकिक माँ बाप के गले का हार हैं। उनसे जीते जी मरकर पारलौकिक बाप का बनें तब वर्सा मिले। जैसे कोई साहूकार, गरीब के बच्चे को एडाप्ट करते हैं तो आकर साहूकार की गोद लेते हैं - जीते जी। वह गरीब भी जीते तो हैं ना। दोनों याद रहते हैं। तुमको भी लौकिक और पारलौकिक दोनों सम्बन्ध याद हैं। दोनों से मिलन होता है। तुमने पारलौकिक माँ बाप की गोद ली है, उनसे सुख घनेरे लेने लिए। वह हुई हद की गोद, यह है बेहद की गोद। जीते जी गोद ली है। जानते हो इनकी गोद लेने से हम देवी-देवता कुल में सुख घनेरे पायेंगे। तो जिस मात-पिता की सन्तान बने हो उनको जरूर याद करना पड़े। श्रीमत तो गाई हुई है ना। अब तुम प्रैक्टिकल उनकी मत पर चल रहे हो। ऐसे भी नहीं झट से सब एडाप्ट हो जाते हैं। नहीं। आहिस्ते-आहिस्ते बनते हैं। अब देवी-देवता धर्म की स्थापना हो रही है। झाड़ धीरे-धीरे वृद्धि को पाता है। क्रिश्चियन का भी पहले क्राइस्ट आता है। फिर 10-20-50 बढ़ते जाते हैं। यह झाड़ यहाँ सामने बढ़ता है। क्राइस्ट चला जाता है फिर भी आकर अन्त में शामिल होता है। यह तो बेहद का बाप है। बहुतों को शिवबाबा के गले का हार बनना पड़ेगा तब फिर विष्णु के गले का हार बनेंगे। शिवबाबा तो है निराकार। ब्रह्मा द्वारा मुख वंशावली रचते हैं। त्रिमूर्ति शिव का भी अर्थ है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा का अर्थ नहीं निकलता। बाबा करेक्शन भी करते रहते हैं। गोले के नीचे लिखना है स्वदर्शन चक्र ( कि चर्खा) उस गवर्मेन्ट का चर्खा लगा हुआ है। यहाँ स्वदर्शन चक्र है। दिन-प्रतिदिन करेक्शन होती रहती है।
बाबा ने समझाया है - हमेशा त्रिमूर्ति शिव जयन्ती कहना है। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा वर्सा देते हैं। शिव बाबा है तो वर्सा भी साथ में जरूर चाहिए। तो यह विष्णु है वर्सा। फिर शंकर द्वारा विनाश गाया हुआ है, इसलिए त्रिमूर्ति का चित्र है मुख्य। त्रिमूर्ति चित्र चला आया है। वहाँ भी तुम राज्य करते हो तो तख्त के पिछाड़ी विष्णु का चित्र रहता है। यह जैसे कोट आफ् आर्मस है। इसका अर्थ मनुष्य नहीं जानते। बाप ने तुम बच्चों को समझाया है, यह ज्ञान अभी तुमको मिला है, देवताओं के पास यह ज्ञान नहीं रहता। तीसरा नेत्र तुम ब्राह्मणों का खुलता है। बाप कितना सहज समझाते हैं, मनमनाभव। बाप और वर्से को याद करो। ब्रह्मा मुख वंशावली हो ना। तुम ज्ञान गंगायें भी ठहरे। तुम हो ज्ञान सागर द्वारा ब्रह्मा मुख कॅवल से निकली हुई मुख वंशावली, ज्ञान कुमार, कुमारियां। तो तुम हो ज्ञान सागर के बच्चे।
वास्तव में सच्चा-सच्चा तीर्थ तो यह है। आत्माओं और परमात्मा का यह है सच्चा संगम। ज्ञान सागर और ज्ञान गंगायें। यह बड़ी गुप्त समझने की बातें हैं। मोटी बुद्धि वाले यह नहीं समझ सकेंगे। उन्हों के लिए फिर सहज युक्ति है - शिवबाबा और वर्से को याद करो - इन द्वारा। यह बुद्धि में होने से खुशी का पारा चढ़ेगा। गॉडली स्टूडेन्ट लाइफ है ना। बेहद का बाप हमको पढ़ा रहे हैं। कृष्ण मनुष्य नहीं पढ़ाते। ज्ञान सागर कृष्ण को नहीं कहा जाता। कृष्ण त्रिकालदर्शी नहीं था। राजयोग का ज्ञान तुम्हारी बुद्धि में है, जिससे तुम प्रालब्ध पाते हो। वहाँ इस नॉलेज की दरकार नहीं। दरकार यहाँ है। बाप कहते हैं कल्प-कल्प मैं आकर राजयोग सिखलाता हूँ। रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाता हूँ कि यह चक्र कैसे फिरता है। महिमा सारी संगम की है, जबकि पतित-पावन बाप आकर पुरानी दुनिया से नई दुनिया में ले जाते हैं। पुरानी दुनिया के विनाश के लिए तैयारियां हो रही हैं। देखते हो आजकल दुनिया में क्या हो रहा है। आज बादशाह है कल मिलेट्री बिगड़ती तो बादशाह को भी कैदी बना देते हैं। कोई को भी मार डालते हैं। ऐसे बहुत केस होते रहते हैं। आजकल कोई बात पर भरोसा नहीं। दु: ही दु: है। आज किसको बच्चा हुआ, खुशी होगी। कल मर गया तो दु:ख। है ही दु: की दुनिया। अब बाप नई सुख की दुनिया का लायक बना रहे हैं। बाप खुद कहते हैं। तुम कितने नालायक अर्थात् लायक बने हो। अब तुम लायक बन स्वर्ग के मालिक बन सकते हो। तुम सो देवी-देवता थे, अभी असुर बन पड़े हो। कल देवताओं की महिमा गाते थे, अपने को पापी नीच कहते थे। कहते हैं हम निर्गुण हारे में... तो जरूर कोई पर तरस किया होगा। इन देवताओं को किसने गुणवान बनाया, यह अभी तुम जानते हो। परमपिता परमात्मा बिगर कोई देवता बना सके। मनुष्य बिल्कुल विकारी पतित बन पड़े हैं। बूढ़े हो जाते हैं तो भी विकार नहीं छोड़ते। नहीं तो कायदा है 60 वर्ष के बाद वानप्रस्थ लेना चाहिए। पहले ऐसे करते थे। 60 वर्ष के अन्दर अपना बोझा उतारकर बच्चों को दे देते थे। अब 60 वर्ष की आयु में भी बच्चे पैदा करते रहते हैं। बाप कहते हैं इनकी 60 वर्ष की आयु में बहुत जन्मों के अन्त के अन्त में, जब इनकी वानप्रस्थ अवस्था हुई तब मैंने प्रवेश किया, तब इसने भी सब कुछ छोड़ा। बाप के आने से सारी दुनिया के लिए वानप्रस्थ अवस्था हो जाती है क्योंकि सबको जाना है वापिस इसलिए बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। छोटा वा बड़ा कोई भी रहेगा नहीं।
बाप आकर सबको मीठा बनाते हैं। मुक्ति-जीवनमुक्ति दोनों मीठे धाम हैं। विनाश सबका होना है। हिसाब-किताब चुक्तू भी सबका होता है। सज़ा खाने में देरी नहीं लगती। जैसे काशी कलवट खाते हैं तो पापों से मुक्त हो जाते हैं। फिर नयेसिर हिसाब शुरू हो जाता है। बाकी मुक्ति में एक भी नहीं जाते। वह समझते हैं शिव पर कुर्बान हो निर्वाणधाम चले जायेंगे। बाप कहते हैं वापिस कोई जा नहीं सकते। पुनर्जन्म तो सबको लेना है। यह पहला नम्बर ही पूरे पुनर्जन्म लेते हैं। तो जरूर पीछे वाले भी लेंगे। तुमने 84 जन्म लिए हैं। शुरू से ही तुम्हारा पार्ट चलता है। तुम्हारा यह है कल्याणकारी लीप जन्म। इस जन्म में अथवा इस धर्माऊ युग में तुम धर्मात्मा बनते हो। वह सब हैं हद की बातें। वह है धर्माऊ मास, धर्माऊ वर्ष, यह है धर्माऊ युग। यह लीप जन्म ब्राह्मणों का एक ही है। ब्राह्मण हैं चोटी फिर तुम देवता बनेंगे। अब तुम जानते हो बाबा हमको गले का हार बनाते हैं। हम आत्मायें निराकारी दुनिया में रहती हैं। बाप खुद कहते हैं तुम जब अशरीरी थे तो मेरे पास रहते थे। अभी तुम समझ गये हो - हम पहले-पहले सतयुग में आयेंगे। वहाँ है देवी-देवता धर्म। वहाँ पुरुषार्थ करने की जरूरत नहीं। पुरुषार्थ संगम पर ही किया जाता है। संगमयुग यह है और जो संगम होते हैं, उनकी आयु नहीं गिनी जाती। इस संगम की आयु है। बहुत छोटा सा युग है। इस संगमयुग में ही बाप आकर इनको बदली करते हैं। बाकी उन युगों का कुछ नहीं है। दो कला कम होने से राज्य बदली होता है। यह तुमको साक्षात्कार होता है, कैसे राज्य देते हैं? संगमयुग में बाप आकर पतितों को पावन बनाते हैं इसलिए इस युग की आयु - जब से बाप आया है तब से गिनेंगे। तो जरूर वह आया हुआ है, वही ज्ञान का सागर है। उनकी मुख वंशावली, ज्ञान नदियां यह ब्रहमाकुमार, कुमारियां हैं, इनसे ही ज्ञान पाना है। बाबा ने कहा है कोई ऐसी नई चीज़ बनाओ जो समझाना सहज हो। उसमें त्रिमूर्ति शिव जयन्ती लिखो। बाबा डायरेक्शन देते हैं परन्तु बनाने वाला होशियार चाहिए। इस ज्ञान यज्ञ में विघ्न भी किसम-किसम के पड़ते हैं, फिर सर्विस ढीली हो जाती है। शिवजयन्ती आई कि आई। बड़े धूमधाम से मनानी है। देहली में तो बहुत धूमधाम हो सकती है। दोनों के कोट आफ आर्मस दिखायेंगे। हम अपनी ईश्वरीय बात करते हैं। बाप है ही कल्याणकारी। बच्चे भी औरों का कल्याण करते रहते हैं। तो बाप देखकर खुश होता है। कहा जाता है चैरिटी बिगन्स एट होम। मित्र सम्बन्धियों को भी समझाना है। नहीं तो उल्हना देंगे। प्वाइंट्स बहुत अच्छी मिलती हैं। चित्र भी अच्छे हैं। माला भी कितनी अच्छी है। रुद्र माला बन फिर विष्णु की माला बनती है।
तुम ब्राह्मण हो सच्ची-सच्ची गीता सुनाने वाले। सच्ची-सच्ची यात्रा का राज़ तुम समझाते हो। यहाँ बैठे तुम याद की यात्रा में रहो तो पाप भस्म हो जायेंगे। तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने का और कोई उपाय नहीं। योग की बहुत महिमा है। मेहनत भी इसमें है। बहुत तूफान आते हैं। सहज भी है तो मुश्किल भी है। तुम्हारी योग तपस्या के भी चित्र हैं। राजाई का भी चित्र है। राजयोग से तुम देवता बनते हो। तुम राजऋषि हो, वह हठयोग ऋषि हैं। तुमको नेचरल जटायें हैं। अभी हम सब बाबा के गले का हार हैं, सब भाई-भाई हैं। बाप से वर्सा भी मिलता होगा। प्रजापिता ब्रह्मा भी गाया हुआ है। वह निराकार पिता यह साकार पिता। शंकर के लिए दिखाते हैं ऑख खोली विनाश हुआ। शंकर को पार्वती, गणेश आदि दिखलाकर गृहस्थी बना दिया है। अन्धश्रधा बहुत है। बाप कहते हैं मैंने तुमको साहूकार बनाया था। तुमने मन्दिर बनाकर, शास्त्र बनाकर, दान कर फालतू खर्चा करते-करते दुर्गति को पा लिया। यह भी ड्रामा में नूँध थी तब तो बाप बैठ समझाते हैं। बाबा तुमको त्रिकालदर्शी बनाते हैं। तीनों कालों का ज्ञान तुम्हारी बुद्धि में है। अच्छा !
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) यह धर्माऊ युग है। इस समय धर्मात्मा बनना है। सबका कल्याण करना है। मुक्ति और जीवनमुक्ति में चलने का रास्ता बताना है।
2) हमारी यह गॉडली स्टूडेन्ट लाइफ है। बेहद का बाप हमको पढ़ा रहा है। इस खुशी में रहना है।
वरदान:शिक्षक बनने के साथ रहमदिल की भावना द्वारा क्षमा करने वाले मास्टर मर्सीफुल भव!
सर्व की दुआये लेनी हैं तो शिक्षक बनने के साथ-साथ मास्टर मर्सीफुल बनो। रहमदिल बन क्षमा करो तो यह क्षमा करना ही शिक्षा देना हो जायेगा। सिर्फ शिक्षक नहीं बनना है, क्षमा करना है - इन संस्कारों से ही सबको दुआयें दे सकेंगे। अभी से दुआयें देने के संस्कार पक्के करो तो आपके जड़ चित्रों से भी दुआयें लेते रहेंगे, इसके लिए हर कदम श्रीमत प्रमाण चलते हुए दुआओं का खजाना भरपूर करो।
स्लोगन:जिनकी झोली परमात्म दुआओं से भरपूर है उनके पास माया नहीं सकती।
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Details ( Page:- Murali 7th-Nov-2017 )
HINGLISH SUMMARY - 07.11.17      Pratah Murli Om Shanti BapDada Madhuban
Mithe bacche - patit-pawan Baap aaye hain pawan banakar pawan duniya ka varsha dene, pawan banne walo ko he sadgati prapt hogi.
Q- Bhogi jeevan, yogi jeevan me parivartan hone ka mukhya aadhar kya hai?
A- Nischay. Jab tak nischay nahi ki humko padhane wala swayang behad ka Baap hai tab tak na yog lagega, na padhai he padh sakenge. Bhogi ke bhogi he rah jayenge. Kayi bacche class me aate hain lekin padhane wale me nischay nahi. Samajhte hain han koi shakti hai lekin nirakar Shiv Baba padhate hain - yah kaise ho sakta? Yah to nayi baat hai. Aise patthar buddhi bacche parivartan nahi ho sakte.
 
Dharna Ke liye mukhya Saar:-
1) Kisi bhi dehadhari ke naam roop me atakna nahi hai. Apni deha me bhi nahi fanshna hai, isme bahut khabardari rakhni hai.
2) Gyan marg me nastmoha zaroor banna hai. Pavitrata ki agyan manni hai aur dusro ko bhi pavitra banane ki yukti rachni hai.
Vardaan:-- Swa parivartan dwara biswa parivartan ke nimitt banne wale Sarv khazano ke Mallik bhava
Slogan:-- Sarv shaktiyon ki light sada saath rahe to maya door se he bhaag jayegi.
HINDI DETAIL MURALI

07/11/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - पतित-पावन बाप आये हैं पावन बनाकर पावन दुनिया का वर्सा देने, पावन बनने वालों को ही सद्गति प्राप्त होगी''
प्रश्न: भोगी जीवन, योगी जीवन में परिवर्तन होने का मुख्य आधार क्या है?
उत्तर:
निश्चय। जब तक निश्चय नहीं कि हमको पढ़ाने वाला स्वयं बेहद का बाप है तब तक योग लगेगा, पढ़ाई ही पढ़ सकेंगे। भोगी के भोगी ही रह जायेंगे। कई बच्चे क्लास में आते हैं लेकिन पढ़ाने वाले में निश्चय नहीं। समझते हैं हाँ कोई शक्ति है लेकिन निराकार शिवबाबा पढ़ाते हैं - यह कैसे हो सकता? यह तो नई बात है। ऐसे पत्थरबुद्धि बच्चे परिवर्तन नहीं हो सकते।
गीत:-   ओम् नमो शिवाए   ओम् शान्ति।
बच्चे यह तो समझ गये हैं कि शिवबाबा हमको समझाते हैं। घड़ी-घड़ी तो नहीं कहेंगे भगवानुवाच। यह तो कायदा नहीं कि घड़ी-घड़ी अपनी महिमा करनी है। शिवबाबा जो सबका बाप है, वह हम बच्चों को बैठ समझाते हैं। भविष्य 21 जन्मों के लिए अटल अखण्ड दैवी स्वराज्य प्राप्त कराते हैं। जैसे स्कूल अथवा कॉलेज में बच्चे जानते हैं कि टीचर हमें आप समान बैरिस्टर बना रहे हैं, एम आब्जेक्ट है। बाकी सतसंगों में जो जाते हैं वेद शास्त्र आदि सुनने के लिए, उससे तो कुछ मिलता नहीं है इसलिए टीचर फिर भी अच्छे होते हैं जो शरीर निर्वाह अर्थ कोई जिस्मानी विद्या सिखलाते हैं, जिससे आजीविका होती है। बाकी सब दुर्गति ही करते हैं, बच्चे शादी करना चाहें तो बाप कहेगा कि वर्सा भी नहीं मिलेगा। जहाँ चाहे वहाँ चले जाओ। यहाँ तो बाप अमृत भी पिलाते हैं और वर्सा भी देते हैं कहते हैं कि पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। कितना फ़र्क है - हद के बाप में और बेहद के बाप में। वह रात में ले जाते हैं, यह दिन में ले जाते हैं। यह है ही पतित-पावन। कहते भी हैं कि सद्गति दाता एक है - जो आकर सबकी सद्गति करते हैं, फिर दुर्गति किसने की? यह नहीं जानते। बाप समझाते हैं - सब आसुरी मत वाले हैं। यहाँ आते हैं असुरों से देवता बनने। यह इन्द्रप्रस्थ है। कई असुर भी छिपकर आए बैठते हैं। सब सेन्टर्स पर ऐसे छिपे असुर (विकारी) बहुत आते हैं, फिर घर में जाकर विष पीते हैं। दो काम तो चल सकें। वह पत्थरबुद्धि बन पड़ते हैं। बाप को पहचानते ही नहीं। निश्चय बिल्कुल ही नहीं कि हमको बेहद का बाप पढ़ाते हैं। ऐसे ही आकर बैठ जाते हैं। तो योग लगेगा, पढ़ाई ही पढ़ सकते। भोगी के भोगी ही होंगे। बहुत समझते हैं कि कोई शक्ति है बस। निराकार शिवबाबा कैसे सकता! कोई शास्त्र में भी लिखा हुआ नहीं है। यह हैं नई बातें। गाते भी हैं शिव जयन्ति.. परन्तु पत्थरबुद्धि होने के कारण समझते नहीं हैं। शिव है तब तो सब भक्त याद करते हैं। कहते भी हैं शिवाए नम:, समझते हैं वह परमधाम में रहते हैं। हमारा बाप भी है परमपिता, तो वह सबका फादर हो गया ना। भारत में ऐसे भी हैं जो फादर को नही मानते। मनुष्यों को समझाना बहुत मुश्किल है। मनुष्य तो यह भी नहीं समझते कि अभी