Published by – Goutam Kumar Jena on behalf of GNEXT MS OFFICE
Category - Religion, Ethics , Spirituality & New Age & Subcategory - BK MURALI
Summary - Satya Shree Trimurti Shiv Bhagawanubach Shrimad Bhagawat Geeta for SEP 2017 ( Daily Murali - Brahmakumaris - Magic Flute )
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Details ( Page:- Murali Dtd 1st Sep 2017 )
01.09.17      Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche- tumhara number one dushman Ravan hai, jis par gyan aur yog bal se jeet pani hai, tamopradhan se satopradhan zaroor banna hai.
Q- Mahin se mahin aur guhya baat kaun si hai, jo tum baccho ne abhi samjhi hai?
A- Sabse mahin se mahin baat hai ki yah behad ka drama second by second shoot hota jata hai. Fir 5 hazaar varsh baad wohi repeat hoga. Jo kuch hota hai, kalp pehle bhi hua tha. Drama anusaar hota hai, isme moonjhne ki baat he nahi. Jo kuch hota hai - nothing new. Second by second drama ki reel firti rehti hai. Purana mitta jata, naya bharta jata hai. Hum part bajate jaate hain wohi fir shoot hota jata hai. Aisi guhya baatein aur koi samajh na sake.
Dharna ke liye mukhya saar
1) Sada apni dhoon me rehna hai. Apne paapo ko bhasm karne ka khayal karna hai. Dusri baaton ke prashno me nahi jaana hai. Apne sanskaro ko parivartan karne ke liye yog ki bhatti me rehna hai.
2) Deha sahit sab kuch tyag poora trusty ho shrimat par chalna hai. Baap ka poora regard rakhna hai, madadgar banna hai
Vardaan - Bindu roop me sthit rah udti kala me udne wale Double Light bhava
Slogan- Biswa parivartak wo hai jo negative ko positive me parivartan kar de.
 
HINDI COMPLETE MURALI in DETAILS

01-09-17                                        प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - तुम्हारा नम्बरवन दुश्मन रावण है, जिस पर ज्ञान और योगबल से जीत पानी है, तमोप्रधान से सतोप्रधान जरूर बनना है"
प्रश्नमहीन ते महीन और गुह्य बात कौन सी है, जो तुम बच्चों ने अभी समझी है?
उत्तर:   सबसे महीन से महीन बात है कि यह बेहद का ड्रामा सेकण्ड बाई सेकण्ड शूट होता जाता है। फिर 5 हजार वर्ष बाद वही रिपीट होगा। जो कुछ होता है, कल्प पहले भी हुआ था। ड्रामा अनुसार होता है, इसमें मूँझने की बात ही नहीं। जो कुछ होता है - नथिंगन्यु। सेकण्ड बाई सेकण्ड ड्रामा की रील फिरती रहती है। पुराना मिटता जाता, नया भरता जाता है। हम पार्ट बजाते जाते हैं वही फिर शूट होता जाता है। ऐसी गुह्य बातें और कोई समझ सके।
 
गीत:-  ओम् नमो शिवाए...                              ओम् शान्ति।
 
बच्चों ने गीत सुना कि एक ही सहारा है दु: से छूटने का। गायन है ना सबका दु: हर्ता, सुख कर्ता एक ही भगवान है। तो जरूर एक ही ने आकर सबका दु: हरा है और बच्चों को सुख-शान्ति का वर्सा दिया है इसलिए गायन है। परन्तु कल्प को बहुत लम्बा-चौड़ा बताने कारण मनुष्य कुछ भी समझ नहीं सकते। तुम जानते हो कि बाप सुखधाम का वर्सा देते हैं और रावण दु:खधाम का वर्सा देते हैं। सतयुग में है सुख, कलियुग में है दु:ख। यह किसकी बुद्धि में नहीं है कि दु: हर्ता, सुख कर्ता कौन है। समझते भी हैं कि जरूर परमपिता परमात्मा ही होगा। भारत सतयुग था। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। यह कहते हुए भी जो शास्त्रों में सुना है कि वहाँ यह कंस जरासन्धी, रावण आदि थे इसलिए कोई बात में ठहरते नहीं हैं। तुम जानते हो यह सब खेल है। तुम्हारी बुद्धि में है कि हमारा दुश्मन पहले-पहले रावण बनता है। पहले तुम राज्य करते थे फिर वाम मार्ग में जाकर राजाई गँवा दी। इन बातों को तुम ब्राह्मण बच्चे ही जानते हो। तुम्हारा और किसी दुश्मन तरफ अटेन्शन नहीं है। तुम जिसको दुश्मन समझते हो - वह किसकी बुद्धि में नहीं होगा, तुमको इस रावण दुश्मन पर जीत पानी है। यही भारत का नम्बरवन दुश्मन है। शिवबाबा जन्म भी भारत में ही लेते हैं। यह है भी बरोबर परमपिता परमात्मा की जन्म भूमि। शिव जयन्ती भी मनाते हैं। परन्तु शिव ने आकर क्या किया, वह किसको पता नहीं है। तुम जानते हो भारत ऊंच ते ऊंच खण्ड था। धनवान ते धनवान 100 परसेन्ट हेल्दी, वेल्दी और हैप्पी थे। और कोई धर्म इतने हेल्दी हो सकें।
बाप देखो किसको बैठ सुनाते हैं? अबलायें, कुब्जायें, साधारण। वह साहूकार लोग तो अपने धन की ही खुशी में हैं। तुम हो गरीब ते गरीब। नहीं तो इतनी ऊंच ते ऊंची पढ़ाई ऊंचे मनुष्यों को पढ़नी चाहिए। परन्तु नहीं। पढ़ते हैं गरीब साधारण। तुम कुछ भी शास्त्र आदि नहीं पढ़े हो तो बहुत अच्छा है। बाप कहते हैं जो कुछ सुना है अथवा पढ़ा है, वह सब भूल जाओ। हम नई बात सुनाते हैं। सबसे नम्बरवन दुश्मन भी है रावण। जिस पर तुम बच्चे ज्ञान और योगबल से जीत पाते हो। बरोबर 5 हजार वर्ष पहले भी बाप ने राजयोग सिखाया था, जिससे राजाई प्राप्त की थी। अब फिर माया पर जीत पाने के लिए बाप राजयोग सिखला रहे हैं, इनको ज्ञान और योगबल कहा जाता है। आत्माओं को कहते हैं मुझे याद करो। भगवान तो है ही निराकार। उनको राजयोग सिखाने जरूर आना पड़े। ब्रह्मा भी बूढ़ा है। बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में हैं। भारत में गीता आदि सुनाने वाले तो ढेर हैं। परन्तु यह तुमको कोई नहीं कहेंगे कि विकारों रूपी रावण पर तुम्हें जीत पानी है, मामेकम् याद करो। यह भी कोई नहीं कह सकते। यह तो बाप ही आकर आत्माओं को कहते हैं - आत्म-अभिमानी बनो। जितना बनेंगे उतना बाप को याद कर सकेंगे। उतना तमोप्रधान से सतोप्रधान बनेंगे। तुम जानते हो हम सतोप्रधान देवी-देवता थे। अब हम आसुरी बने हैं। 84 जन्म पूरे हुए हैं। अब यह है अन्तिम जन्म।
तुम बच्चे जानते हो बाप हमें समझा रहे हैं। वही ज्ञान का सागर, पवित्रता का सागर है। इस समय तुमको भी आप समान बनाते हैं। सतयुग में यह ज्ञान प्राय:लोप हो जायेगा। ऐसे भी नहीं समझेंगे कि यह राज्य हमको परमपिता परमात्मा ने दिया है। अज्ञान काल में भी मनुष्य कहते हैं सब कुछ ईश्वर ने दिया है। वहाँ ऐसे भी नहीं समझते। प्रालब्ध भोगने लग पड़ते हैं। ईश्वर का नाम याद रहे तो यह भी सिमरें कि बाबा आपने तो बहुत अच्छी बादशाही दी है। परन्तु कब दी, क्या हुआ कुछ भी बता नहीं सकते। वहाँ धन भी बहुत रहता है। ऐरोप्लेन आदि तो होते ही हैं - फुलप्रूफ।
अब तुम बच्चे किस धुन में हो? दुनिया किस धुन में है? यह भी तुम जानते हो - उन्हों का है बाहुबल, तुम्हारा है योगबल। जिससे दुश्मन पर तुम जीत पाते हो। यह राजयोग सिवाए बाप के कोई सिखला सके। बाप कहते हैं मैं बहुत जन्मों के अन्त में इनमें ही आकर प्रवेश करता हूँ, जिसमें कल्प पहले भी प्रवेश किया था, इनका नाम ब्रह्मा रखा था। तुम सब बच्चों के नाम भी आये थे ना। कितने फर्स्टक्लास नाम रखे थे। बाबा तो इतने नाम भी याद नहीं कर सकते। तो देखो दुनिया में कितना हंगामा मचाते रहते हैं। तुमको यहाँ शान्ति में बैठ बाप को याद करना है। यह है मोस्ट बिलवेड मात-पिता, जो कहते हैं बच्चे इस काम पर पहले तुम जीत पहनो, इसलिए रक्षाबंधन का त्योहार चला आता है। यह पवित्रता की राखी भी तुम बांधते हो। सतयुग त्रेता में यह त्योहार आदि नहीं मनायेंगे। फिर भक्ति मार्ग में शुरू होंगे। बाप इस समय प्रतिज्ञा कराते हैं - पवित्र दुनिया का मालिक बनना है तो पवित्र भी जरूर बनना है। मुझे याद करो तो इस योग अग्नि से पाप दग्ध होंगे। तुमको तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। कोई तो नापास भी हो जाते हैं, जिसकी निशानी भी राम को दिखाई है। बाकी कोई हिंसा आदि की बात नहीं। तुम भी क्षत्रिय हो, माया पर जीत पाने वाले, जीत पाने वाले नापास हो पड़ते। 16 कला के बदले 14 कला बन पड़ते हैं। कोई सतोप्रधान, कोई फिर रजो भी बनते हैं। वैसे फिर राजधानी में भी नम्बरवार पद होगा, जो ब्रह्माकुमार कुमारी कहलाते हैं वही वर्से के हकदार बनते हैं। फिर इसमें जो पुरूषार्थ करेंगे और करायेंगे। बहुतों को आप समान बनाने की सर्विस की है। तुमको इस अन्तिम जन्म में ही तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। यह है रूहानी भट्ठी। वह जो कराची में तुम्हारी भट्ठी बनी वह और बात थी। यह योग की भट्ठी और है। यह है योगबल की भट्ठी, जिसमें किचड़ा सब निकल जाता है। वहाँ तो तुम अपनी भट्ठी में थे, कोई से मिलना नहीं होता था। यह है योग की भट्ठी, अपने लिए मेहनत करनी होती है। आत्मा ही समझती है, आत्मा ही ज्ञान सुनती है आरगन्स द्वारा। आत्मा ही संस्कार ले जाती है। जैसे बाबा लड़ाई वालों का मिसाल देते हैं। संस्कार ले जाते हैं ना। दूसरे जन्म में फिर लड़ाई में ही चले जाते हैं। वैसे तुम बच्चे भी संस्कार ले जाते हो। वह जिस्मानी मिलेट्री में चले जाते हैं। तुम्हारे में से भी कोई शरीर छोड़ते हैं तो इस रूहानी मिलेट्री में जाते हैं। कर्मों का हिसाब-किताब बीच में चुक्तू करने जाते हैं। ऐसे बहुत होंगे। एक-एक के लिए बाप से थोड़ेही पूछना है। बाप कहेंगे इससे तुम्हारा क्या फायदा? तुम अपने धन्धे में रहो। पापों को भस्म करने का ख्याल करो। यह भोग आदि जो लगाते हैं, यह भी ड्रामा में है। जो सेकण्ड बाई सेकण्ड होता है, ड्रामा शूट होता जाता है। फिर 5 हजार वर्ष बाद वही रिपीट होगा। जो कुछ होता है, कल्प पहले भी हुआ था। ड्रामा अनुसार होता है, इसमें मूँझने की बात ही नहीं। जो कुछ होता है-नथिंगन्यु। सेकण्ड बाई सेकण्ड ड्रामा की रील फिरती रहती है। पुराना मिटता जाता, नया भरता जाता है। हम पार्ट बजाते जाते हैं वही फिर शूट होता जाता है। यह महीन बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। तुम बच्चों को पहले-पहले यह निश्चय करना है कि बाप स्वर्ग की स्थापना करने वाला है। बरोबर भारत को बाप से स्वर्ग का वर्सा मिला था फिर कैसे गॅवाया, यह समझाना पड़े। हार-जीत का खेल है। माया ते हारे हार है। मनुष्य माया धन को समझ लेते हैं। वास्तव में माया 5 विकारों को कहा जाता है। कोई के पास धन होगा तो कहेंगे इनके पास माया बहुत है। यह भी किसको पता नहीं है। अब कहाँ प्रकृति, कहाँ माया, अलग-अलग अर्थ है।
मैगजीन में भी लिख सकते हो कि भारतवासियों का नम्बरवन दुश्मन यह रावण है, जिसने दुर्गति को पहुँचाया है। रावणराज्य शुरू होने से ही भक्ति शुरू हो जाती है। ब्रह्मा की रात में, भक्ति मार्ग में धक्के ही खाने पड़ते हैं। ब्रह्मा का दिन चढ़ती कला, ब्रह्मा की रात उतरती कला। अब बाप कहते हैं - इस माया रावण पर जीत पानी है। बाप श्रीमत देते हैं श्रेष्ठ बनने लिए - लाडले बच्चे मुझ बाप को याद करो। विकर्माजीत बनने का और कोई उपाय है नहीं। तुम बच्चों को भक्तिमार्ग के धक्कों से छुड़ाते हैं। अब रात पूरी हो प्रभात होती है। दिन माना सुख, रात माना दु:ख। यह सुख दु: का खेल है। बाप यह सब राज़ बताकर तुमको त्रिकालदर्शी बनाते हैं। अब जो जितना पुरूषार्थ करे। बीज और झाड़ को जानना है। बाप कहते हैं बच्चे अब टाइम थोड़ा है। गाया भी जाता है एक घड़ी आधी घड़ी.... तुम बाप को याद करने लग जाओ और फिर चार्ट को बढ़ाते जाओ। देखना है कि हम श्रीमत पर बाबा को कितना याद करते हैं। बाप तो है सिखलाने वाला। पुरूषार्थ हमको करना है। बाप तो है पुरूषार्थ कराने वाला। बाप का तो लव है ही। बच्चे-बच्चे कहते रहते हैं। उनके तो सब आत्मायें बच्चे ही ठहरे। फिर ब्रह्माकुमार-कुमारी भाई-बहन हो गये। वर्सा तो दादे से मिलता है। ईश्वरीय औलाद फिर प्रजापिता ब्रह्मा मुख द्वारा तुम ब्राह्मण बने हो। फिर देवता वर्ण में जायेंगे। क्लीयर है ना। आत्मा समझती है शिवबाबा हमारा बाप है। मैं स्टार हूँ तो हमारा बाप भी स्टार ही होगा। आत्मा कोई छोटी-बड़ी नहीं होती है। बाबा भी स्टार है परन्तु वह सुप्रीम है, हम बच्चे उनको फादर कहते हैं। इतनी छोटी सी आत्मा में सारा ज्ञान है। बाकी ऐसे नहीं ईश्वर में कोई ऐसी शक्ति है, जो दीवार तोड़ देंगे। बाप कहते हैं मैं आता ही हूँ तुमको फिर से राजयोग सिखलाने लिए। बाप बच्चों का ओबीडियन्ट है। लौकिक में भी बाप बच्चों पर बलि चढ़ते हैं ना, तो बड़ा कौन हुआ? बाप वा बच्चे? बाप सब कुछ बच्चे को देते हैं फिर भी बच्चा छोटा है इसलिए रिगार्ड रखना होता है। यहाँ भी तुम बच्चों पर बाप बलि चढ़ते हैं, वर्सा देते हैं तो बड़ा बच्चा हुआ ना। परन्तु बाप का फिर भी रिगार्ड रखना होता है। बाप के आगे पहले बच्चों को बलि चढ़ना है तब बाप 21 बार बलि चढ़ेंगे। कुछ कुछ बलि चढ़ते हैं। भक्ति मार्ग में भी ईश्वर अर्थ कुछ कुछ देते हैं। उनकी एवज में फिर बाबा दे देते हैं। यहाँ तो है ही फिर बेहद की बात। कहते भी हैं आप जब आयेंगे तुम पर बलिहार जायेंगे। अभी वह समय गया है इसलिए बाबा यह प्रश्न पूछते हैं - तुमको कितने बच्चे हैं? फिर ख्याल में आता है तो एक शिवबाबा भी बालक है। अब बताओ तुम्हारा कल्याण कौन सा बालक करेगा? (शिवबाबा) तो उनको वारिस बनाना चाहिए ना। यह समय ऐसा रहा है जो कोई किसका क्रियाक्रम करने वाला ही नहीं रहेगा इसलिए बाप कहते हैं देह सहित सब कुछ त्याग, ट्रस्टी हो श्रीमत पर चलते जाओ। डायरेक्शन देते रहेंगे। तुम्हारी सेवा करते हैं, तुमको स्वर्ग का मालिक बनाने। हम तो निष्कामी हैं। सर्व का सद्गति दाता एक बाप ही निष्कामी है ना। वह एवर पावन है। बाप कहते हैं - बच्चे मददगार बनो। हमारा मददगार गोया अपना मददगार बनते हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
 
1) सदा अपनी धुन में रहना है। अपने पापों को भस्म करने का ख्याल करना है। दूसरी बातों के प्रश्नों में नहीं जाना है। अपने संस्कारों को परिवर्तन करने के लिए योग की भट्ठी में रहना है।
 
2) देह सहित सब कुछ त्याग पूरा ट्रस्टी हो श्रीमत पर चलना है। बाप का पूरा रिगार्ड रखना है, मददगार बनना है।
 
वरदान:   बिन्दु रूप में स्थित रह उड़ती कला में उड़ने वाले डबल लाइट भव
सदा स्मृति में रखो कि हम बाप के नयनों के सितारे हैं, नयनों में सितारा अर्थात् बिन्दु ही समा सकता है। आंखों में देखने की विशेषता भी बिन्दु की है। तो बिन्दु रूप में रहना - यही उड़ती कला में उड़ने का साधन है। बिन्दु बन हर कर्म करो तो लाइट रहेंगे। कोई भी बोझ उठाने की आदत हो। मेरा के बजाए तेरा कहो तो डबल लाइट बन जायेंगे। स्व उन्नति वा विश्व सेवा के कार्य का भी बोझ अनुभव नहीं होगा।
 
स्लोगन: विश्व परिवर्तक वह है जो निगेटिव को पॉजिटिव में परिवर्तन कर दे।
 

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Details ( Page:- Murali Dtd 2nd Sep 2017 )
                               02.09.17                            Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban             
Mithe bacche- tum aapas me bhai-bhai ho, tumhe roohani sneh me rehna hai, sukhdayi ban sabko sukh dena hai, goon grahi banna hai.
Q- Aapas me roohani pyaar na hone ka kaaran kya hai? Roohani pyaar kaise hoga?
A- Deha-abhimaan ke kaaran jab ek do ki khamiyan dekhte hain tab roohani pyaar nahi rehta. Jab aatma-abhimaani bante hain, swayang ki khamiyan nikalne ka furna rehta hai, satopradhan banne ka lakshya rehta hai, mithe sukhdayi bante tab aapas me bahut pyaar rehta hai. Baap ki shrimat hai - bacche kisi ke bhi avgoon mat dekho. Goonvan banne aur banane ka lakshya rakho. Sabse jasti goon ek Baap me hai, Baap se goon grahan karte raho aur sab baaton ko chhod do to pyaar se rah sakenge.
Dharna Ke liye mukhya Saar:-
1) Baap se aisa love rakhna hai - jo ek Baap se he sada chitke rahe. Din raat Baap ki he mahima karni hai. Khushi me gadgad hona hai.
2) Ek Baap ki he abyavichari yaad me rah satopradhan banna hai. Kabhi bhi miya mitthu nahi banna hai. Baap ke samaan mitha banna hai.
Vardaan:-- Sadhano ke vasibhoot hone ke bajaye unhe use karne wale Master Creator bhava
Slogan:- Nirantar yogi banna hai to had ke main aur mere pan ko behad me parivartan kar do.
 
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02/09/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा"

मीठे बच्चे - तुम आपस में भाई-भाई हो, तुम्हें रूहानी स्नेह से रहना है, सुखदाई बन सबको सुख देना है, गुणग्राही बनना है
 
प्रश्न:     आपस में रूहानी प्यार होने का कारण क्या है? रूहानी प्यार कैसे होगा?
उत्तर:      देह-अभिमान के कारण जब एक दो की खामियां देखते हैं तब रूहानी प्यार नहीं रहता। जब आत्म-अभिमानी बनते हैं, स्वयं की खामियां निकालने का फुरना रहता है, सतोप्रधान बनने का लक्ष्य रहता है, मीठे सुखदाई बनते तब आपस में बहुत प्यार रहता है। बाप की श्रीमत है - बच्चे किसी के भी अवगुण मत देखो। गुणवान बनने और बनाने का लक्ष्य रखो। सबसे जास्ती गुण एक बाप में है, बाप से गुण ग्रहण करते रहो और सब बातों को छोड़ दो तो प्यार से रह सकेंगे।
ओम् शान्ति।
अभी तुम बच्चों को यह मालूम है कि बेहद का बाप हमको सतोप्रधान बना रहे हैं और मूल युक्ति बता रहे हैं। बाप बैठ बच्चों को शिक्षा देते हैं कि तुम भाई-भाई हो, आपस में तुम्हारा बहुत रूहानी प्रेम चाहिए। तुम्हारा था तो बरोबर, अब नहीं है। मूलवतन में तो प्रेम की बात ही नहीं रहती। तो बेहद का बाप बैठ शिक्षा देते हैं। बच्चे आजकल, आजकल करते-करते समय बीतता जा रहा है। दिन, मास, वर्ष बीतते जा रहे हैं। बाप ने समझाया है - तुम यह लक्ष्मी-नारायण थे। ऐसा तुमको किसने बनाया? बाप ने। फिर तुम कैसे नीचे उतरते हो। ऊपर से नीचे उतरते-उतरते समय बीतता जा रहा है। वह दिन गया, मास गया, वर्ष गया, समय गया। तुम जानते हो हम पहले सतोप्रधान थे। आपस में बहुत लव था। बाप ने भाईयों को शिक्षा दी है। तुम भाई-भाई का आपस में बहुत प्रेम होना चाहिए। मैं तुम सबका बाप हूँ। तुम्हारी एम आब्जेक्ट ही है - सतोप्रधान बनने की। तुम समझते हो जितना-जितना हम तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते जायेंगे उतना खुशी में गदगद होते रहेंगे। हम सतोप्रधान थे। भाई-भाई आपस में बहुत प्रेम से रहते थे। अभी बाप द्वारा पता चला है कि हम देवतायें आपस में बहुत प्रेम से चलते थे। हेविन के देवताओं की भी बहुत महिमा है। हम वहाँ के निवासी थे। फिर नीचे उतरते आये हैं। पहली तारीख से लेकर आज 5 हजार वर्ष से बाकी कुछ वर्ष आकर रहे हैं। शुरू से लेकर तुम कैसे पार्ट बजाते आये हो - अभी तुम्हारी बुद्धि में है कि देह-अभिमान के कारण एक दो में वह प्यार नहीं है। एक दो की खामियां ही निकालते रहते हैं। तुम आत्म-अभिमानी थे तो ऐसे किसकी खामियां नहीं निकालते थे कि फलाना ऐसा है, इनमें यह है। आपस में बहुत प्यार था। अब वही अवस्था धारण करनी है। यहाँ तो एक दो को उस दृष्टि से देखते, लड़ते झगड़ते हैं। अब वह सब बन्द कैसे हो। यह बाप बैठ समझाते हैं। बच्चे तुम सतोप्रधान पूज्य देवी-देवता थे फिर धीरे-धीरे नीचे गिरते-गिरते तुम तमोप्रधान बने हो। तुम कैसे मीठे थे, अब फिर ऐसा मीठा बनो। तुम सुखदाई थे फिर दु:खदाई बने हो। रावण राज्य में एक दो को दु: देने, काम कटारी चलाने लगे हो। सतोप्रधान थे तो काम कटारी नहीं चलाते थे। यह 5 विकार तुम्हारे कितने बड़े शत्रु हैं। यह है ही विकारी दुनिया क्योंकि रावणराज्य है ना। यह भी तुम जानते हो रामराज्य और रावणराज्य किसको कहा जाता है। आजकल करते, सतयुग पूरा हुआ। त्रेता पूरा हुआ, द्वापर पूरा हुआ और कलियुग भी पूरा हो जायेगा। अभी तुम नीचे उतरते सतोप्रधान से तमोप्रधान बन पड़े हो। तुम्हारी वह रूहानी खुशी गुम हो गई है। अब तुमको सतोप्रधान बनना है। मैं आया हूँ तो जरूर तुमको सतोप्रधान बनाऊंगा।
यह भी बाप समझाते हैं - बच्चे जब 5 हजार वर्ष बाद संगमयुग होता है तब ही मैं आता हूँ। तुमको समझाता हूँ, फिर से सतोप्रधान बनो। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। जितना याद करेंगे उतनी खामियां निकलती जायेंगी। तुम जब सतोप्रधान देवी देवता थे तब कोई खामी नहीं थी, अब यह खामियां कैसे निकलेंगी? आत्मा को ही अशान्ति होती है। अब अन्दर जांच करनी है कि हम अशान्त क्यों बने हैं। जब हम भाई-भाई थे तो आपस में बहुत प्यार था। अब फिर वही बाप आया है। कहते हैं अपने को आत्मा भाई-भाई समझो। एक दो से बहुत प्रेम रखो। देह-अभिमान में आने से ही एक दो की खामियां निकालते हो। अब बाप कहते हैं तुम ऊंच पद पाने का पुरूषार्थ करो। तुम जानते हो कि नई दुनिया में बाप ने हमको वर्सा दिया था, 21 जन्मों के लिए एकदम भरपूर कर दिया था। अब बाप फिर आया हुआ है तो क्यों हम उनकी मत पर चल फिर से पूरा वर्सा लेवें।
तुम मीठे-मीठे बच्चे कितने अडोल थे। कोई मतभेद नहीं था। किसकी निंदा आदि नहीं करते थे। अभी कुछ कुछ है। वह सब भूल जाना चाहिए। हम सब भाई-भाई हैं। एक बाप को याद करना है। बस यही ओना लगा हुआ है हम जल्दी-जल्दी सतोप्रधान बन जायें। फलाना ऐसा है, इसने यह बोला, इन सब बातों को भूल जाओ। यह सब छोड़ो। बाप कहते हैं - अपने को आत्मा समझो। सतोप्रधान बनने के लिए पुरूषार्थ करो। दूसरे का अवगुण नहीं देखो। देह-अभिमान में आने से ही अवगुण देखा जाता है। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। भाई-भाई को देखो तो गुण ही देखेंगे। अवगुण को नहीं देखना चाहिए। सबको गुणवान बनाने की कोशिश करो, तो कभी भी दु: नहीं होगा। भल कोई उल्टा-सुल्टा कुछ भी करे, समझा जाता है रजो तमोप्रधान हैं, तो जरूर उन्हों की चाल भी ऐसी ही होगी। अपने को देखना चाहिए कि हम कहाँ तक सतोप्रधान बने हैं? सबसे जास्ती गुण हैं बाप में। तो बाप से ही गुण ग्रहण करो और सब बातों को छोड़ दो। अवगुण छोड़ गुण धारण करो। बाप कितना गुणवान बनाते हैं। कहते हैं तुम बच्चों को भी मेरे समान बनना है। बाप तो सदा सुखदाई है ना। तो सदा सुख देने और सतोप्रधान बनने का फुरना रखो और कोई बात नहीं सुनो। कोई की ग्लानी आदि नहीं करो। सबमें कोई कोई खामियां हैं जरूर। खामियां भी ऐसी हैं जो फिर खुद भी समझ नहीं सकते। दूसरे समझते हैं कि इनमें यह-यह खामियां हैं। अपने को तो बहुत अच्छा समझते हैं परन्तु कहाँ कहाँ उल्टा बोल निकल ही पड़ता है। सतोप्रधान अवस्था में यह बातें होती नहीं। यहाँ खामियां हैं परन्तु समझने के कारण अपने को मिया मिट्ठू समझ लेते हैं। बाप कहते हैं - मिया मिट्ठू तो मैं ही एक हूँ। तुम सबको मिट्ठू अर्थात् मीठा बनाने आया हूँ इसलिए जो भी अवगुण आदि हैं सब छोड़ दो। अपनी नब्ज देखो हम मीठे-मीठे रूहानी बाप को कितना प्यार करता हूँ? कितना खुद समझता हूँ और दूसरों को समझाता हूँ? देह-अभिमान में गये तो कोई फायदा नहीं होगा। बाप कहते हैं तुम अनेक बार तमोप्रधान से सतोप्रधान बने हो। अब फिर बनो। श्रीमत पर चल मुझे याद करो। सिर पर पापों का बोझा बहुत है, उसे उतारने का चिंतन रहना चाहिए। देवताओं के आगे जाकर कहते भी हैं कि हम पापी हैं क्योंकि देवताओं में पवित्रता की कशिश है इसलिए उन्हों की महिमा गाते हैं। आप सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण.... हो। फिर घर में आकर भूल जाते हैं। देवताओं के आगे जाते हैं तो अपने से जैसे घृणा आती है। फिर घर में आते हैं तो कोई घृणा नहीं। जरा ख्याल भी नहीं करते कि ऐसा उन्हों को बनाने वाला कौन है!
अब बाप कहते हैं बच्चे यह पढ़ाई पढ़ो। देवता बनना है तो यह पढ़ाई पढ़ना है। श्रीमत पर चलना है। पहले-पहले बाप कहते हैं अपने को सतोप्रधान बनाना है इसलिए मामेकम् याद करो। दैवीगुण भी धारण करने हैं। भाई-भाई समझ एक बाप को याद करो। बाप से यह वर्सा लेना है। यह भी बुद्धि में है। लोग उनकी स्तुति करते फिर दूसरे तरफ उनकी ग्लानी भी करते क्योंकि जानते ही नहीं हैं। कहते हैं कुत्ते बिल्ली में है, सब परमात्मा के रूप हैं। जितना हो सके कोशिश करनी है बाप को याद करने की। भल आगे भी याद करते थे। परन्तु वह थी व्यभिचारी याद, बहुतों को याद करते थे। अब बाप कहते हैं अव्यभिचारी याद में रहो सिर्फ मामेकम् याद करो। भक्तिमार्ग में जिसको तुम याद करते आये हो - सब अभी तमोप्रधान हो गये हैं। आत्मा तमोप्रधान है तो खुद तमोप्रधान, तमोप्रधान को याद करते हैं। अब फिर सतोप्रधान बनना है। वहाँ भक्ति ही नहीं जो याद करना पड़े। बाप समझाते हैं बच्चे बस यही फुरना रखो कि हम सतोप्रधान कैसे बने?
ज्ञान तो बहुत सहज है। बैज पर भी तुम समझा सकते हो - यह बेहद का बाप है, इनसे यह वर्सा मिलता है। बाप स्वर्ग की स्थापना करते हैं। सो तो जरूर यहाँ ही होगी ना! शिव जयन्ती माना स्वर्ग जयन्ती। देवतायें कैसे बनें? इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर इस पढ़ाई से ही बने हैं। सारा मदार पढ़ाई और याद पर है। याद की यात्रा में रहने से फिर और बातें भूल जाती हैं। बाप समझाते रहते हैं बच्चे देह-अभिमान छोड़ो। कोई की खामियों को देखना नहीं हैं। फलाना ऐसा है, यह करता है, इन बातों से कोई फायदा नहीं, टाइम वेस्ट हो जाता है। तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने में बहुत मेहनत है। विघ्न भी पड़ते हैं। पढ़ाई में तूफान नहीं आते, जितना याद में आते हैं। अपने को देखना है कि हम कहाँ तक बाप की याद में रहते हैं। कहाँ तक हमारा लव है। लव ऐसा होना चाहिए - बस बाप से ही चिटके रहें। वाह बाबा आप हमको कितना समझदार बनाते हो! ऊंच ते ऊंच आप हो फिर मनुष्य सृष्टि में भी आप हमको कितना ऊंच बनाते हो। ऐसे-ऐसे अन्दर में बाप की महिमा करनी है। बाबा आप तो कमाल करते हो। खुशी में गद-गद होना चाहिए। कहते हैं ना - खुशी जैसी खुराक नहीं, तो बाप के मिलने की भी खुशी होती है। इस पढ़ाई से हम यह बनेंगे। बहुत खुशी होनी चाहिए। बेहद का बाप, सुप्रीम बाप हमको पढ़ा रहे हैं। बाबा कितना रहमदिल है। भल आगे भी भगवानुवाच अक्षर सुनते थे परन्तु झूठ होने कारण दिल से लगता नहीं था। ठिक्कर-भित्तर में भगवान है फिर वाच कैसे करेंगे। तुम्हारी बुद्धि में बहुत नई-नई बातें हैं, जो और किसकी बुद्धि में नहीं हैं। आगे चल तुम्हारा दैवी झाड बढ़ता जायेगा। बाप कहते हैं कि सबको पैगाम दो कि अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। तुम विश्व के मालिक बन जायेंगे और कोई धर्म स्थापक ऐसे कह नहीं सकता, इसलिए उनको पैगम्बर, मैसेन्जर भी कह नहीं सकते। पैगाम तो एक बाप ही देते हैं कि मामेकम् याद करो तो सतोप्रधान बन जायेंगे और सतोप्रधान दुनिया में जायेंगे। यह है बाप का पैगाम। सब जगह पैगाम लिख दो। सारा मदार इस पर है। यूरोपियन लोगों के लिए इस चक्र और झाड में सारी नॉलेज है। उन्हों को यही बताना है कि वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे रिपीट होती है तो वन्डर खायेंगे। अमरनाथ बाबा यह सच्ची अमरकथा सुना रहे हैं, अमरपुरी में ले जाने के लिए। वह है अमरलोक। यह है नीचे मृत्युलोक। सीढ़ी है ना। अभी हम ऊपर जाते हैं फिर नम्बरवार आयेंगे। हमेशा समझो कि शिवबाबा सुनाते हैं, उनको ही याद करते रहो तो भी खुशी रहेगी। शिवबाबा इनमें प्रवेश कर तुम बच्चों को पढ़ाते हैं, यह है वन्डरफुल युगल। बाबा इनको कहते हैंयू आर माई वाइफ तुम्हारे द्वारा मैं एडाप्ट करता हूँ। फिर माताओं को सम्भालने के लिए एडाप्ट किये हुए बच्चों से एक को मुकरर रखते हैं। यह ब्रह्मपुत्रा सबसे बड़ी नदी है। त्वमेव-माताश्च पिता इनको कहते हैं। बाबा खुद कहते हैं - हम चलते-फिरते बहुत खुशी से बाप को याद करता हूँ। याद में कितना भी पैदल करो, कभी थकेंगे नहीं। जितना याद करेंगे उतना चमक आती जायेगी। खुशी में तीर्थों पर कितना दौड़-दौड़ कर ऊपर जाते हैं। वह तो है सब भक्ति मार्ग के धक्के। यह भी खेल है - भक्ति है रात। अब तुम्हारे लिए दिन होता है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
 
1) बाप से ऐसा लॅव रखना है - जो एक बाप से ही सदा चिटके रहें। दिन रात बाप की ही महिमा करनी है। खुशी में गदगद होना है।
 
2) एक बाप की अव्यभिचारी याद में रह सतोप्रधान बनना है। कभी भी मिया मिट्ठू नहीं बनना है। बाप के समान मीठा बनना है।
 
वरदान:साधनों के वशीभूत होने के बजाए उन्हें यूज़ करने वाले मास्टर क्रियेटर भव
 
साइन्स के साधन जो आप लोगों के काम रहे हैं, ड्रामा अनुसार उन्हें भी टच तभी हुआ है जब बाप को आवश्यकता है। लेकिन यह साधन यूज़ करते हुए उनके वश नहीं हो जाओ। कभी कोई साधन अपनी ओर खींच ले। मास्टर क्रियेटर बनकर क्रियेशन से लाभ उठाओ। अगर उनके वशीभूत हो गये तो वे दुख देंगे इसलिए साधन यूज़ करते भी साधना निरन्तर चलती रहे।
 
स्लोगन:निरन्तर योगी बनना है तो हद के मैं और मेरेपन को बेहद में परिवर्तन कर दो।

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Details ( Page:- Murali Dtd 3rd Sep 2017 )
03.09.17        Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban – AVYAKT MURALI
Headline - Sachhe Ashik ka Nisani
Vardan –  Dil ki tapashya dwara santustata ka certificate prapt karnewale sarb ki duaon ke adhikari Bhav.
Slogan – Samay ko amulya samjhkar safal karo toh samay par dhoka ni khayenge.
 

HINDI COMPLETE MURALI in DETAILS

03/09/17 मधुबन "अव्यक्त-बापदादा" ओम् शान्ति 24-10-81

 
"सच्चे आशिक की निशानी"
 
आज बाप कहाँ आये हैं और किन्हों से मिलने आये हैं, जानते हो? किस रूप से विशेष मिलने आये हैं? जैसे बाप का रूप वैसे बच्चों का रूप। तो आज किस रूप से बाप मिलने आये हैं, जानते हो? लोगों ने यह जो गलती कर दी है कि परमात्मा के अनेक रूप हैं, यह गलती है वा राइट है? इस समय बाप अनेक सम्बन्धों के अनेक रूपों से मिलते हैं। तो एक के अनेक रूप, सम्बन्ध के आधार से वा कर्तव्य के आधार से प्रैक्टिकल में हैं ना। तो भक्त भी राइट हैं ना। आज किस रूप में बाप मिलने आये हैं और कहाँ मिल रहे हैं? आज की मुरली में (सवेरे) वह सम्बन्ध सुना है। तो बाप कौन हुआ और आप कौन हुए? आज रूहानी माशूक रूहानी आशिकों से मिलन मनाने आये हैं। कहाँ मिलने आये हैं? सबसे ज्यादा मिलने का प्रिय स्थान कौन-सा है? रूहानी माशूक आप आशिकों को आदि के समय में कहाँ पर ले जाते थे, याद है ना? (सागर पर) तो आज भी सर्व खजानों और गुणों से सम्पन्न, सागर के कण्ठे पर, साथ में ऊंची स्थिति की पहाड़ी पर, शीतलता की चांदनी में रूहानी माशूक, रूहानी आशिकों से मिल रहे हैं। सागर है सम्पन्नता का और पहाड़ी है ऊंची स्थिति की। सदा शीतल स्वरूप है चांदनी। तीनों ही साथ में हैं। आज रूहानी आशिकों को देख रूहानी माशूक हर्षित हो रहे हैं और कौन-सा गीत गाते हैं? (हरेक अपना-अपना गीत सुना रहे हैं) वैसे तो एक ही गीत सुन सकते हैं लेकिन बाप सभी का गीत सुन सकते हैं। आशिक अपना गीत गा रहे हैं और माशूक गीत का रेसपान्ड कर रहे हैं। जो भी गीत गाओ सब ठीक है। हर एक के स्नेह के बोल बाप स्नेह से ही सुनते हैं। आशिकों को माशूक को याद करना सहज है ना? सहज और निरन्तर याद का सम्बन्ध और स्वरूप यह रूहानी आशिक और माशूक का है। याद करना नहीं पड़ता लेकिन याद भुलाते भी भूल नहीं सकती।
आज हर एक आशिक के स्नेह को देख क्या देखा? आशिक अनेक और माशूक एक। लेकिन अनेक अनुभव यही कहते हैं कि मेरा माशूक क्योंकि स्नेह का सागर रूहानी माशूक है! तो सागर बेहद है इसलिए जितने भी, जितना भी स्नेह लें फिर भी सागर अखुट और सम्पन्न है इसलिए मुझे कम, तुम्हें ज्यादा यह बातें नहीं। लेने वाले जितना लें। स्नेह के भण्डार भरपूर हैं। लेने वाले लेने में नम्बरवार हो जाते हैं लेकिन देने वाला सबको नम्बरवन देता है। लेने वाले समाने में नम्बरवार हो जाते हैं। प्यार करना सबको आता है लेकिन तोड़ निभाने में नम्बर हो जाते हैं।मेरा माशूकसब कहते हैं लेकिन मेरा कहते भी क्या करते हैं? जानते हो क्या करते हैं? आज तो रूहरिहान करने आये हैं, मुरली चलाने नहीं आये हैं। तो बताओ क्या करते हैं? मेरा भी कहते लेकिन कभी-कभी कहाँ फेरा भी लगाकर आते हैं। फिर फेरा लगाने के बाद जब थक जाते हैं तब फिर कहते हैंमेरा माशूक और कई आशिक नाज़ भी बहुत करते हैं। क्या नाज़ करते हैं? (दीदी - दादी को) नाज़-नखरे तो साकार में आपके आगे ही बहुत दिखाते हैं ना। इतना नाज़ दिखाते हैं - हम तो ऐसे करेंगे, हम तो ऐसे चलेंगे, आपका काम है हमें बदलना। हम तो ऐसे ही हैं। बाप की बातें बाप को सुनाने का नाज़ रखते हैं। एक बोल तो अच्छी तरह से याद करते हैं - “जैसी भी हूँ, कैसी भी हूँ लेकिन आपकी हूँमाशूक भी कहते - हो तो हमारी लेकिन जोड़ी तो ठीक बनो ना! अगर समान जोड़ी नहीं होगी तो दृश्य देखने वाले क्या कहेंगे? माशूक सजा-सजाया और आशिक बिना श्रृंगारी हुई, शोभेगी? तो आप स्वयं ही सोचो - वह चमकीली ड्रेस वाले और आशिक काली ड्रेस वाली वा दागों वाली ड्रेस पहने हुए, तो अच्छा लगेगा? क्या समझते हो? फिर कहते क्या हैं? हमारे दागों को मिटाना तो आपका काम है। लेकिन जब माशूक ड्रेस ही परिवर्तन कर देते हैं, तो वह क्यों नहीं पहनते! दाग मिटाने में भी समय क्यों गंवायें! माशूक का बनना अर्थात् सबका परिवर्तन होना। तो पुरानी काली, अनेक दागों वाली ड्रेस की स्मृति क्यों लाते हो अर्थात् बार-बार धारण क्यों करते हो? चमकीली ड्रेस वाले चमकते हुए श्रृंगारधारी बन माशूक के साथ चमकीली दुनिया में क्यों नहीं रहते! वहाँ कोई दाग लग ही नहीं सकता।
तो हे आशिकों, सदा माशूक समान सम्पन्न और सदा चमकीले स्वरूप में अर्थात् सम्पूर्ण स्वरूप में स्थित रहो। माशूक को और भी एक बात की मेहनत करनी पड़ती है। जानते हो किस बात की मेहनत करनी पड़ती है? वह भी रमणीक बात है। जो वायदा किया है माशूक ने आशिकों के साथ, किसाथ ले जायेंगे तो क्या करते हैं? माशूक है बहुत हल्का और आशिक इतने भारी बन जाते, जो माशूक को ले जाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। तो यह भी जोड़ी अच्छी लगेगी? माशूक कहते हैं हल्के बन जाओ। तो क्या करते हैं? हल्के होने का साधन जो एक्सरसाइज है, वह करते नहीं। तो हल्के कैसे बनें? रूहानी एक्सरसाइज तो जानते हो ना! अभी-अभी निराकारी, अभी-अभी अव्यक्त फरिश्ता, अभी-अभी साकारी कर्मयोगी। अभी-अभी विश्व सेवाधारी। सेकेण्ड में स्वरूप बन जाना - यह है रूहानी एक्सरसाइज। और कौन-सा बोझ अपने ऊपर रखते हैं? वेस्ट की वेट बहुत है इसलिए हल्के नहीं हो सकते। कोई समय के वेस्ट के वेट में हैं, कोई संकल्पों के और कोई शक्तियों को वेस्ट करते हैं। कोई सम्बन्ध और सम्पर्क वेस्ट अर्थात् व्यर्थ बना लेते हैं। ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार के वेट बढ़ने के कारण माशूक समान डबल लाइट बन नहीं सकते। सच्चे आशिक की निशानी है - “माशूक के समानअर्थात् माशूक जो है, जैसा है वैसे समान बनना। तो सभी कौन हो? आशिक तो हो ही लेकिन माशूक समान आशिक हो? समानता ही समीपता लाती है! समानता नही तो समीप भी नहीं हो सकते। गायन भी करते हैं 16 हजार पटरानियां थीं। 16 हजार में भी नम्बर तो होंगे ना! एक माशूक के इतने आशिक दिखाये तो हैं लेकिन अर्थ नहीं समझते हैं। रूहानियत को भूल गये हैं। तो आज रूहानी माशूक, आशिकों को कहते हैं- “समान बनोअर्थात् समीप बनो। अच्छा।
चांदनी में बैठे हो ना? शीतल स्वरूप में रहना अर्थात् चांदनी में बैठना। सदा ही चांदनी रात में रहो। चांदनी रात में ड्रेस भी स्वत: चमकीली हो जायेगी। जहाँ देखेंगे वहाँ चमकते हुए दिखाई देंगे। और सदा सागर के कण्ठे पर रहो अर्थात् सदा सागर समान सम्पन्न स्थिति में रहो। समझा कहाँ रहना है? माशूक को यही किनारा प्रिय है। अच्छा।
सदा माशूक समान, साथ से साथ, हाथ में हाथ अर्थात स्नेही और सहयोगी, साथ अर्थात् स्नेह, हाथ अर्थात् सहयोग, ऐसे मेरा तो एक माशूक दूसरा कोई, ऐसी स्थिति में सदा सहज रहने वाले, ऐसे सच्चे आशिकों को रूहानी माशूक का याद-प्यार और नमस्ते।
आज देहली और गुजरात आया है। दिल्ली वाले यह तो नहीं समझते हैं कि हमारे यहाँ जमुना का किनारा है, सागर तो है नहीं। संगम पर सागर है और भविष्य में नदी का किनारा है। संगम में खेला भी सागर के किनारे पर है ना। तो संगम पर है सागर का किनारा और भविष्य की बातें हैं जमुना का किनारा। तो देहली और गुजरात का क्या सम्बन्ध है? देहली है जमुना का किनारा और गुजरात है गरबा करने वाले। तो किनारे पर रास मशहूर है ना, जमुना किनारे पर। इसीलिए दिल्ली और गुजरात दोनों गये हैं। अच्छा - विदेश भी आया है। विदेश वाले जैसे अभी निमंत्रण देते हैं ना, आओ चक्कर लगाने आओ। दीदी आवे, दादी आवे, फलाने आवें, तो जैसे अभी चक्कर लगाने जाते हो - थोड़े टाइम के लिए, ऐसे ही भविष्य में भी चक्कर लगाने जायेंगे। सेकेण्ड में पहुँचेंगे। देरी नहीं लगेगी क्योंकि एक्सीडेंट तो होगा नहीं इसलिए स्पीड की कोई लिमिट की आवश्यकता नहीं। एक ही दिन में सारा चक्कर लगा सकते हो। सारा वर्ल्ड एक दिन में घूम सकते हो। यह एटम एनर्जी आपके काम में आनी है। रिफाइन करने में लगे हुए हैं ना। यह आप लोगों को कोई दु: नहीं देगी। सबसे ज्यादा सेवा कौन-सा तत्व करेगा? सूर्य। सूर्य की किरणें भिन्न-भिन्न प्रकार की कमाल दिखायेंगी। यह सब आपके लिए तैयारियां हो रही हैं। गैस जलाने की, कोयले जलाने की, लकड़ी जलाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। सबसे छूट जायेंगे। अच्छा - बहुत रंगत देखते जायेंगे। वह मेहनत करेंगे और आप फल खायेंगे। फिर यह वायर्स (तारें) वगैरा लगाने की भी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। बिना मेहनत के नैचुरल नेचर द्वारा नैचुरल प्राप्ति हो जायेगी। लेकिन इसके लिए, नेचर के सुख लेने के लिए भी अपनी आरिज्नल नेचर को बनाओ, तब नेचर द्वारा सर्व सुखों को प्राप्त कर सकेंगे। नैचुरल नेचर अर्थात् अनदि संस्कार। सुनते हुए भी अच्छा लगता है तो जब प्रालब्ध में होंगे तो कितना अच्छा लगेगा! जैसे यहाँ पंछी उड़ते हैं, वैसे वहाँ विमान उड़ेंगे। कितने होंगे? जैसे यहाँ पंछियों का संगठन लाइन में जाता है, वैसे विमानों के संगठन जायेंगे। ऐसे नहीं एक जायेगा तो दूसरा नहीं जा सकेगा। ऐसे भिन्न-भिन्न डिज़ाइन में जायेंगे। राज्य फैमिली अपनी डिज़ाइन में जायेगी, साहूकार अपनी डिज़ाइन में जायेंगे। जहाँ चाहो वहाँ उतार लो। अभी प्रकृतिजीत बनो तो प्रकृति दासी बनेगी। अभी प्रकृतिजीत कम तो प्रकृति दासी भी कम होगी! समझा - अच्छा।
मधुबन निवासियों से:-
मधुबन निवासी कौन हैं? मधुबन निवासियों को कौन सा टाइटल देंगे? नया कोई टाइटल सुनाओ? इस समय कौन सी चीज़ मधुबन में लगाई है? फोटोस्टेट मशीन लगाई है ना। तो मधुबन निवासी फोटो स्टेट कापी है। जैसे बाप वैसे बच्चे। उस मशीन में हूबहू होता है ना। मशीन की यही विशेषता है ना, जो ज़रा भी फर्क नहीं आता। तो मधुबन निवासी फोटो कापी हो। मधुबन है मशीन और मधुबन निवासी हैं फोटो। तो आपके हर कर्म विधाता की कर्म रेखायें बतायें। कर्म द्वारा ही भाग्य की लकीर खींचते हो तो आप सबका हर कर्म श्रेष्ठ भाग्य की कर्म की लकीर खींचने वाला हो। जैसे बापदादा का हर कर्म स्व के प्रति और अनेकों के प्रति भाग्य की लकीर खीचने वाला रहा, ऐसे ही बाप समान। मधुबन में इतने साधन, इतना सहयोग, इतना श्रेष्ठ संग प्राप्त है, अप्राप्त नहीं कोई वस्तु... मधुबन के भण्डारे में, तो सर्व प्राप्तिवान क्या हो गये? सम्पूर्ण हो गये ना। किस बात की कमी है? अगर कमी है तो स्व के धारणा की। मधुबन वालों का सदा एक निज़ी संस्कार इमर्ज रूप में होना चाहिए। वह कौन सा, कर्म में सफलता पाने के लिए ब्रह्मा बाप का निज़ी संस्कार कौन सा था, जो आप सबका भी वही संस्कार हो? हाँ जी के साथ-साथपहले आप”, “पहले मैंनहीं, पहले आप। जैसे ब्रह्मा बाप ने पहले जगत-अम्बा को किया ना। कोई भी स्थान में पहले बच्चे, हर बात में बच्चों को अपने से आगे रखा। जगत-अम्बा को अपने आगे रखा।पहले आपवाला हीहाँ जीकर सकता है इसलिए मुख्य बात हैपहले आपलेकिन शुभ भावना से। कहने मात्र नहीं, लेकिन शुभचिन्तक की भावना से। शुभ भावना और श्रेष्ठ कामना के आधार सेपहले आप' करने वाला स्वयं ही पहले हो जाता है। पहले आप कहना ही पहला नम्बर होना है। जैसे बाप ने जगदम्बा को पहले किया, बच्चों को पहले किया लेकिन फिर भी नम्बरवन गया ना। इसमें कोई स्वार्थ नहीं रखा, नि:स्वार्थपहले आपकहा, करके दिखाया। ऐसे ही पहले आप का पाठ पक्का हो। इसने किया अर्थात् मैंने किया। इसने क्यों किया, मैं ही करूँ, मैं क्यों नहीं करूँ, मैं नहीं कर सकता हूँ क्या! यह भाव नहीं। उसने किया तो भी बाप की सेवा, मैंने किया तो भी बाप की सेवा। यहाँ कोई को अपना-अपना धन्धा तो नहीं है ना। एक ही बाप का धंधा है। ईश्वरीय सेवा पर हो। लिखते भी हो गाडली सर्विस, मेरी सर्विस तो नहीं लिखते हो ना। जैसे बाप एक है, सेवा भी एक है, ऐसे ही इसने किया, मैंने किया वह भी एक। जो जितना करता, उसे और आगे बढ़ाओ। मैं आगे बढ़ूं, नहीं। दूसरों को आगे बढ़ाकर आगे बढ़ो। सबको साथ लेकर जाना है ना। बाप के साथ सब जायेंगे अर्थात् आपस में भी तो साथ-साथ होंगे ना। जब यही भावना हरेक में जायेगी तो ब्रह्मा बाप की फोटो स्टेट कापी हो जायेंगे।
मधुबन निवासियों को देखा अर्थात् ब्रह्मा को देखा क्योंकि कापी तो वही है ना। फिर ऐसा कोई नहीं कहेगा कि हमने तो ब्रह्मा बाप को देखा ही नहीं। आपके कर्म, आपकी स्थिति ब्रह्मा बाप को स्पष्ट दिखायें। यह है मधुबन निवासियों की विशेषता क्योंकि मधुबन निवासियों को सब फालो करते हैं। तो मधुबन वाले एक-एक मास्टर ब्रह्मा हो। अभी देखो ब्रह्मा बाप का फोटो किसी को भी दो तो प्यार से सम्भाल लेते हैं, सबसे बढ़िया सौगात इसी को मानते हैं तो आप सब भी ब्रह्मा बाप की फोटो हो जाओ। ब्रह्मा बाप समान हो जाओ तो आप भी अमूल्य सौगात हो जायेंगे। अच्छा।
 
वरदान:दिल की तपस्या द्वारा सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट प्राप्त करने वाले सर्व की दुआओं के अधिकारी भव
 
तपस्या के चार्ट में अपने को सर्टीफिकेट देने वाले तो बहुत हैं लेकिन सर्व की सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट तभी प्राप्त होता है जब दिल की तपस्या हो, सर्व के प्रति दिल का प्यार हो, निमित्त भाव और शुभ भाव हो। ऐसे बच्चे सर्व की दुआओं के अधिकारी बन जाते हैं। कम से कम 95 परसेन्ट आत्मायें सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट दें, सबके मुख से निकले कि हाँ यह नम्बरवन है, ऐसा सबके दिल से दुआओं का सर्टीफिकेट प्राप्त करने वाले ही बाप समान बनते हैं।
 
स्लोगन:समय को अमूल्य समझकर सफल करो तो समय पर धोखा नहीं खायेंगे।
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Details ( Page:- Murali Dtd 4th Sep 2017 )
04.09.17        Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban

Mithe bacche - yah Ravan ki Shokvatika hai, jisme sab dukhi hain, abhi tum Ravan ko bhaga rahe ho fir jay-jaykar ho jayegi, sab Ashokvatika me chale jayenge.
Q- Praja me bhi oonch pad kis aadhar par prapt ho sakta hai, uska mishal kaun sa hai?
A- Praja me bhi oonch pad paane ke liye jo bhi chawal mutthi tumhare paas hai wo sab Sudame mishal Baap hawale karo. Dikhate hain na - Sudama ne chawal mutthi di to Mahal mil gaye. Baki Rajai pad ke liye to achchi riti padhna hai, poora pavitra banna hai. Apna sab kuch insure kar dena hai.
Dharna Ke liye mukhya Saar:-
 1) Rajai pad lene ke liye poora Shrimat par chalna hai. Kisi bhi chiz me mamatva nahi rakhna hai. Mera to ek Baap....yahi paath pakka karna hai.
2) Hear no evil, see no evil.....talk no evil..... Baap ke is direction par chal mandir layak banna hai.
Vardaan:-- Bhinn-bhinn sthitiyon ke ashan par ekagra ho baithne wale Rajyogi, Swarajya adhikari bhava.
 Slogan:- Bafadar wo hai jise sankalp me bhi koi dehadhari akarshit na kare.
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04/09/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा"

मीठे बच्चे - यह रावण की शोकवाटिका है, जिसमें सब दु:खी हैं, अभी तुम रावण को भगा रहे हो फिर जय-जयकार हो जायेगी, सब अशोकवाटिका में चले जायेंगे
 
प्रश्न:     प्रजा में भी ऊंच पद किस आधार पर प्राप्त हो सकता है, उसका मिसाल कौन सा है?
 
उत्तर:     प्रजा में ऊंच पद पाने के लिए जो भी चावल मुट्ठी तुम्हारे पास हैं वह सब सुदामे मिसल बाप हवाले करो। दिखाते हैं ना - सुदामा ने चावल मुट्ठी दी तो महल मिल गये। बाकी राजाई पद के लिए तो अच्छी रीति पढ़ना है, पूरा पवित्र बनना है। अपना सब कुछ इनश्योर कर देना है।
 
गीत:-  आखिर वह दिन आया आज....                                    ओम् शान्ति।
 
परमपिता परमात्मा को खिवैया भी कहते हैं। खिवैया बोटमेन को कहा जाता है। जो बोट (नांव) में बिठाए उस पार ले जाये। तो बाप खिवैया है, उस पार ले जाने वाला। झूठ खण्ड में है झूठी कमाई। सचखण्ड के लिए तो यह सच्ची कमाई है, वह है झूठी कमाई। अभी भारत पतित है। भारत भी कितना बड़ा है। दुनिया भी कितनी बड़ी है। बच्चों की बुद्धि में रहता है - पुरानी दुनिया में पुराना भारत है। कल का भारत अथवा कल की दुनिया क्या होगी! तुम जानते हो अभी कितने मनुष्य हैं। कितने खण्ड हैं, कल जरूर भारत ही होगा। दैवी राज्य होगा। सोने की द्वारिका होगी। गोया भारत में कृष्णपुरी होगी। लंका नहीं होगी। सारी लंका सोने की नहीं बनती है। भारत सोने का बन जाता है। लंका अर्थात् रावणराज्य खत्म हो जाता है। भारत द्वारिका बन जाता है जिसको कृष्णपुरी कहते हैं। द्वारिका होती है भारत में। भारत सोने का हो जाता है। द्वारिका भी एक राजधानी हो जाती है। कहते हैं - जमुना नदी पर देहली परिस्तान था, श्री लक्ष्मी-नारायण जहाँ रहते थे। द्वारिका में फिर दूसरी राजधानी होती है। द्वारिका में जब राज्य होता है तब लक्ष्मी-नारायण नहीं होते। वहाँ फिर दूसरे का राज्य होता है। कैपीटल जमुना का किनारा है। वहाँ फिर दूसरी राजाई नहीं रहती।
अभी तुम जानते हो यह सारी पुरानी दुनिया भारत सहित जो भी है, यह सब स्वाहा हो जाता है - इस ज्ञान यज्ञ में। यह बड़ा बेहद का यज्ञ हुआ ना, इनमें पुरानी दुनिया सारी स्वाहा होनी है। यह बच्चों की दिल में रहना चाहिए। यह रावण की कितनी बड़ी दुनिया है। राम की इतनी बड़ी थोड़ेही होगी। वहाँ तो भारत ही स्वर्ग होगा, दूसरे खण्डों का नाम-निशान नहीं होगा। यह समझ की बात है, जो बुद्धि में धारण करनी है। आज पुरानी दुनिया है - कल नई दुनिया बनेंगी। तुम ब्राह्मण डिनायस्टी ही दैवी डिनायस्टी बनेंगे। यह ब्राह्मण ही पढ़कर नम्बरवार डिनायस्टी बनेंगे। अभी शूद्र डिनायस्टी है। आखिर बाप को आना ही पड़ता है - यह दुनिया नहीं जानती।
बाबा ने प्रश्नावली के पोस्टर बहुत अच्छे बनवाये थे, जिससे मनुष्यों को बाप का परिचय मिल जाए। परन्तु सम्मुख समझाने के बिगर कोई समझ नहीं सकेंगे। तुमको ही बाप कहते हैं हियर नो ईविल, सी नो ईविल..... ऐसा खिलौना बन्दर का बनाया है। तुम भी बन्दर मिसल थे। अभी तुम्हारी सूरत बदली है। जिनमें 5 विकार हैं उनको ही कहेंगे बन्दर। जैसे नारद की सूरत दिखाई है, उसने कहा कि हम लक्ष्मी को वरें - तो कहा कि आइने में अपना मुँह तो देखो। यह तो एक कथा बना दी है। बातें सारी यहाँ की हैं। कोई पूछते हैं हम लक्ष्मी को वर सकते हैं? बाबा कहते हाँ पहले बन्दरपना तो छोड़ो तो क्यों नहीं वर सकते हो।
बाबा ने तुमको समझदार बनाया है फिर तुम्हारे द्वारा सभी आत्माओं को रावण की जंजीरों से छुड़ाए शिवालय में ले जाते हैं अथवा अशोकवाटिका में ले जाते हैं। इस समय सब शोकवाटिका में हैं। अभी तुम रावण को भगा रहे हो फिर जय-जयकार हो जायेगी। सब भक्तियां, सीतायें हैं। एक राम ही भगवान है। पुकारते भी हैं हे राम। वास्तव में राम शिवबाबा को कहा जाता है। बाबा ने आकर समझाया है, राम ही आकर सबकी सद्गति करते हैं। स्वर्ग में ले जाते हैं, जिसको रामराज्य कहा जाता है। बाबा ने पोस्टर बहुत अच्छे बनवाये थे। तुम बच्चों को गीता पाठशालाओं में जाकर समझाना है। हम लिखते भी हैं परमपिता, फिर पूछते हैं कि परमपिता परमात्मा के साथ आपका क्या सम्बन्ध है? जरूर कहेंगे वह सबका बाप है। अच्छा जब हम उनके बच्चे हैं, वह तो बेहद का बाप नई दुनिया रचने वाला है फिर तो हमको जरूर स्वर्ग में होना चाहिए। यहाँ नर्क पतित दुनिया में क्यों पड़े हो? लक्ष्मी-नारायण का राज्य क्यों नहीं है? भारत को स्वर्ग का स्वराज्य था ना। अब कलियुग में रावणराज्य है। तुम स्वर्ग के मालिक थे ना और कोई धर्म नहीं था - आज से 5 हजार वर्ष पहले लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। राजायें भी डबल सिरताज थे। पवित्रता का भी ताज था और रतन जड़ित ताज भी था। रामराज्य तो पीछे होता है, तो बुद्धि में आना चाहिए कि भारत में बरोबर इन्हों का राज्य था। यह लक्ष्मी-नारायण ही पहले-पहले नम्बर के हैं। सतयुग में दैवी गुणों वाले मनुष्य थे फिर 84 जन्म भी इन्हों को ही लेने पड़ते हैं। अब वह लक्ष्मी-नारायण कहाँ हैं? सब पतित दुनिया में हैं ना। फिर उन्हों को बाप बैठ राजयोग सिखलाते हैं, जिन्होंने अपना राज्य गॅवाया है, वही फिर राजधानी प्राप्त करने के लिए फिर से राजयोग सीख रहे हैं। तुमको याद है कि हम हर 5000 वर्ष बाद राज्य लेने बाप द्वारा राजयोग सीखते हैं। आधाकल्प सुख का राज्य करते हैं फिर आधाकल्प रावणराज्य में दु: का राज्य होता है। अभी हम फिर पढ़ रहे हैं। हर 5 हजार वर्ष बाद भगवान बाप आकर पढ़ाते हैं। भगवानुवाच - कौन सा भगवान? वह तो कृष्ण के लिए कह देते हैं। तुम तो कहते हो एक ही निराकार शिव भगवान है। श्रीकृष्ण तो देवता है, फिर पूछा जाता है प्रजापिता ब्रह्मा से क्या सम्बन्ध है? वह तो पिता ठहरा ना। एक दादा एक बाबा। इस समय तुमको दो बाप हैं। तीसरा है लौकिक शरीर देने वाला बाप। यह दो हैं प्रजापिता ब्रह्मा और शिवबाबा। लौकिक बाप से तुम हद का वर्सा लेते हो, अब पारलौकिक बाप कहते हैं मेरे से बेहद का वर्सा लो। परमपिता परमात्मा आकर पतितों को पावन बनाते हैं और राज्य करने लायक बनाते हैं। तीसरा प्रश्न फिर पूछा जाता है कि गीता का भगवान कौन? मनुष्य तो कह देते हैं श्रीकृष्ण। तुम कहते हो कृष्ण गीता का भगवान है नहीं। प्रजापिता ब्रह्मा को भी भगवान नहीं कहा जाता है। शिव को ही भगवान कहेंगे क्योंकि वह है निराकार और यह प्रजापिता ब्रह्मा है साकार। तो भगवान एक शिव ही ठहरा। यह भी बाबा ने समझाया है तुम शिव शक्तियां हो, सेना भी हो। तुम विकारों को छोड़, निर्विकारी पावन बन अपना राज्य लेती हो। फिर यह रावणराज्य खत्म हो जायेगा। अभी तुम अपनी राजधानी स्थापन कर रहे हो, कल इनके मालिक बनेंगे। लक्ष्मी-नारायण को राज्य किसने दिया? हम कहेंगे इन्हों को राज्य देने वाला परमपिता परमात्मा शिव है। जो अब दे रहे हैं। शिवबाबा कहते हैं आगे भी हमने तुमको राज्य दिया था, अब फिर सिखला रहा हूँ। यह सब खत्म हो जायेगा। पावन दुनिया स्थापन हो जायेगी फिर तुम वहाँ सोने हीरों के महल बनायेंगे। राज्य करेंगे। तुम्हारी एम आब्जेक्ट ही यह है। सो हम लक्ष्मी-नारायण बन रहे हैं। यह है ऊंच ते ऊंच पद। इन्हों को किसने पढ़ाया? जरूर ऊंच ते ऊंच बाप ने ही पढ़ाया है। अब फिर से राजयोग सीखते हैं जो फिर भविष्य में यह पद पायेंगे। ततत्वम्। इतने में सब धर्म खत्म हो जायेंगे। ब्रह्मा द्वारा दैवी धर्म की स्थापना, शंकर द्वारा पुरानी दुनिया का विनाश, फिर विष्णु द्वारा पालना। लक्ष्मी-नारायण फिर पालना करेंगे। यह समझने की बातें हैं।
तुम्हारी जो जीवन है इनको अमूल्य कहा जाता है। शिवबाबा द्वारा तुम्हें यह लाटरी मिलती है। रेस में जो पहला नम्बर आता है उनको बड़ा इनाम मिलता है। तो यह लक्ष्मी-नारायण पहले नम्बर में हैं। इन्हों की दौड़ी तुमसे जास्ती है। पहले नम्बर में है ब्रह्मा फिर सरस्वती, इनको योगबल की दौड़ी कहा जाता है। बाबा ने समझाया है सतयुग में पहले लक्ष्मी फिर नारायण कहेंगे। यहाँ तो सरस्वती ब्रह्मा की बेटी है इसलिए सरस्वती ब्रह्मा नहीं कहेंगे। पहले ब्रह्मा फिर उनकी बेटी सरस्वती। जगतपिता और जगत माता कहेंगे। यह स्त्री पुरूष तो हो सकें। यह फिर जब सतयुग में जायेंगे तब नाम बदल जायेगा। पहले लक्ष्मी फिर नारायण यहाँ पहले ब्रह्मा फिर सरस्वती है क्योंकि बेटी है ना। अभी तुम जानते हो हम मनुष्य से देवता बनते हैं, जितना जास्ती पुरूषार्थ करेंगे उतना ऊंच पद मिलेगा। तुम जैसे बेगर टू प्रिन्स बन रहे हो। अच्छी रीति पढ़ाई पढ़ेंगे तो राजा बनेंगे। अच्छी रीति नहीं पढ़ेंगे, पवित्र नहीं रहेंगे तो राजाई भी नहीं पायेंगे। शिवबाबा तो राजाई का वर्सा देते हैं। अगर कोई राजाई नहीं लेते हैं, पवित्र नहीं बनते हैं तो प्रजा में चले जाते हैं। अच्छा प्रजा में भी नम्बरवार हैं। कोई पूछते हैं प्रजा में हम ऊंच पद कैसे पायें? फिर मिसाल समझाया जाता है सुदामा का। चावल-मुट्ठी दी तो महल मिल गये। यहाँ जो चावल-मुट्ठी देते हैं तो 21 जन्म लिए महल मिल जाते हैं। यह है इन्श्योरेन्स। हर एक अपने को इनश्योर करते हैं - भगवान के पास। ईश्वर अर्थ गरीबों को देते हैं। कोई अन्न देते, कोई धन देते हैं, कोई फिर मकान बनाकर देते हैं। धर्माऊ जरूर कुछ कुछ निकालते रहते हैं क्योंकि पाप बहुत करते हैं इसलिए दान पुण्य करते हैं तो गोया इनश्योर किया ना। दान पुण्य अनुसार दूसरे जन्म में अच्छे घर में जन्म मिलता है। समझो किसने हॉस्पिटल बनाई होगी तो दूसरे जन्म में रोगी कम होगा। कोई ने युनिवर्सिटी बनाई होगी तो दूसरे जन्म में उनका फल मिलेगा। पढ़ेगा बहुत अच्छा। वह हुआ इनडायरेक्ट दान-पुण्य करना। अभी तो बाप डायरेक्ट कहते हैं कि जितना इनश्योर करेंगे - 21 जन्मों के लिए तुमको भविष्य में मिलेगा। फिर जितना करो। बाप तो दाता है। शिवबाबा तुम्हारा क्या करेगा। वह तो कहते हैं सब कुछ बच्चों के लिए ही है। मनुष्य दान गरीबों को करते हैं तो ईश्वर द्वारा उनको फल मिलता है। यहाँ भी शिवबाबा कहते हैं - तुम मुट्ठी देते हो तो नई दुनिया में तुम्हें 21 जन्मों के लिए फल मिलेगा। चाहे सूर्यवंशी राजाई, चाहे चन्द्रवंशी राजाई लो। चाहे साहूकार प्रजा बनो, चाहे गरीब प्रजा बनो। श्रीमत तुमको मिलती रहती है। जिससे तुम श्रेष्ठ राजा रानी बनेंगे या तो प्रजा। सो तो साक्षी होकर देखते रहते हो। बाप कहते हैं - तुमको जो चाहे सो लो। इनको इनश्योर मैगनेट कहा जाता है। यह है गुप्त।
अभी तुम जानते हो बाबा सम्मुख आया हुआ है - हमको 21 जन्मों का वर्सा देते हैं। जितना इनश्योर करेंगे, बाबा कहते हैं हमारा बनेंगे तो तुम्हारा हक है राजाई लेना। बाप का कैसे बनते हैं? कहते हैं बाबा हमारे पास यह-यह है। बाप कहते हैं तुम तो कहते हो ना - यह सब ईश्वर ने दिया है। बस ऐसा नहीं समझो यह मेरा है। अपना ममत्व नहीं रखो। ममत्व रखेंगे तो राजाई नहीं मिलेगी। गृहस्थ व्यवहार में रहते श्रीमत पर चलो तो ममत्व नहीं रहेगा। तुम्हारी तो गैरन्टी थी ना - बाबा आप आयेंगे - तो हम आपके बन जायेंगे। मेरे तो एक आप ही हो। अब बाप के पास जाते हैं। बाबा फिर स्वर्ग में भेज देंगे। बाबा रोज़-रोज़ सुनाते रहते। सुनाते सुनाते कितने वर्ष हो गये। अब बाकी थोड़ा समय है। यह बाबा का लांग बूट है ना। बाबा ने पुरानी जुत्ती में प्रवेश किया है। कहते हैं बच्चों को सृष्टि के आदि मध्य अन्त का समाचार सुनाता हूँ। मैं नॉलेजफुल, ब्लिसफुल, लिबरेटर हूँ। सुख कर्ता, दु: हर्ता हूँ। जितना तुम बाप को याद करते जायेंगे तो पाप कटते जायेंगे। अच्छा!
मीठे मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
 
1) राजाई पद लेने के लिए पूरा श्रीमत पर चलना है। किसी भी चीज़ में ममत्व नहीं रखना है। मेरा तो एक बाप... यही पाठ पक्का करना है।
2) हियर नो ईविल, सी नो ईविल... टाक नो ईविल... बाप के इस डायरेक्शन पर चल मन्दिर लायक बनना है।
 
वरदान: भिन्न-भिन्न स्थितियों के आसन पर एकाग्र हो बैठने वाले राजयोगी, स्वराज्य अधिकारी भव
 
राजयोगी बच्चों के लिए भिन्न-भिन्न स्थितियां ही आसन हैं, कभी स्वमान की स्थिति में स्थित हो जाओ तो कभी फरिश्ते स्थिति में, कभी लाइट हाउस, माइट हाउस स्थिति में, कभी प्यार स्वरूप लवलीन स्थिति में। जैसे आसन पर एकाग्र होकर बैठते हैं ऐसे आप भी भिन्न-भिन्न स्थिति के आसन पर स्थित हो वैराइटी स्थितियों का अनुभव करो। जब चाहो तब मन-बुद्धि को आर्डर करो और संकल्प करते ही उस स्थिति में स्थित हो जाओ तब कहेंगे राजयोगी स्वराज्य अधिकारी।
 
स्लोगन: वफादार वह है जिसे संकल्प में भी कोई देहधारी आकर्षित करे।
 
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Details ( Page:- Murali Dtd 5th Sep 2017 )
05.09.17                 Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche - Is dukh ke ghaat par baith Shantidham aur Sukhdham ko yaad karo, is Dukhdham ko bhool jao, yahan buddhi bhatakni nahi chahiye.
Q- Tumhara purusharth ka aadhar kya hai?
A- Nischay. Tumhe nischay hai-Baap nayi duniya ki sougaat laye hain, is poorani duniya ka binash hona he hai. Is nischay se tum purusharth karte ho. Agar nischay nahi hai to sudhrenge nahi. Agey chal akhbaro dwara tumhara message sabko milega, awaaz niklega. Tumhara nischay bhi pakka hota jayega.
Dharna Ke liye mukhya Saar:-
1) Padhai ko achchi tarah padhkar oonch pad pana hai. Afate ane ke pehle nayi duniya ke liye taiyyar hona hai.
2) Apne ko sudharne ke liye nischay buddhi banna hai. Vani se pare vanaprasth me jaana hai isiliye is Dukhdham ko bhool Shantidham aur Sukhdham ko yaad karna hai.
Vardaan:-Knowledgeful ban har karm ke parinam ko jaan karm karne wale Master Trikaldarshi bhava
Slogan:- Ek do ko copy karne ke bajaye Baap ko copy karo to Shrest aatma ban jayenge.
 
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05/09/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा"

मीठे बच्चे - इस दु: के घाट पर बैठ शान्तिधाम और सुखधाम को याद करो, इस दु:खधाम को भूल जाओ, यहाँ बुद्धि भटकनी नहीं चाहिए
प्रश्न:      तुम्हारे पुरूषार्थ का आधार क्या है?
उत्तर:      निश्चय। तुम्हें निश्चय है - बाप नई दुनिया की सौगात लाये हैं, इस पुरानी दुनिया का विनाश होना ही है। इस निश्चय से तुम पुरूषार्थ करते हो। अगर निश्चय नहीं है तो सुधरेंगे नहीं। आगे चल अखबारों द्वारा तुम्हारा मैसेज सबको मिलेगा, आवाज निकलेगा। तुम्हारा निश्चय भी पक्का होता जायेगा।
ओम् शान्ति।
टॉवर आफ साइलेन्स और टॉवर आफ सुख। तुम बच्चे यहाँ बैठे हो तो तुम्हारी बुद्धि घर में जानी चाहिए। वह है शान्ति का टॉवर। ऊंच ते ऊंच को टॉवर कहा जाता है। तुम शान्ति के टॉवर हो। घर में जाने के लिए तुम पुरुषार्थ कर रहे हो। कैसे जाते हो? जो टॉवर में रहने वाला बाप है, वह शिक्षा देते हैं कि मुझे याद करो तो शान्ति के टॉवर में जायेंगे। उसको घर भी कहा जाता है, शान्तिधाम भी कहा जाता है। यह बातें समझाई जाती हैं। अपने शान्तिधाम, सुखधाम की याद में रहो। नहीं रह सकते हो तो गोया जंगल के कांटे हो, इसलिए दु: भासता है। अपने को शान्तिधाम के निवासी समझो। अपने घर को याद करना है ना। भूलना नहीं है। घर है ही बाप का। यह है ही दु: का घाट। यहाँ बैठे भी जिनको बाहर की बातें याद आती हैं तो ऐसे नहीं कहेंगे कि इनको अपना घर याद है इसलिए बाप रोज़ शिक्षा देते रहते हैं - घड़ी-घड़ी शान्तिधाम, सुखधाम को याद करो। गीता में भी बाप के महावाक्य हैं कि मुझे याद करो। भगवान क्या बनायेंगे? स्वर्ग का मालिक बनायेंगे और क्या! जब स्वर्ग का मालिक बनने बैठे हो तो घर के लिए, स्वर्ग के लिए जो बाप श्रीमत देते हैं - उस पर पूरा-पूरा चलना है। दुनिया में कितने ढेर के ढेर गुरू हैं। बाप ने समझाया है कि कोई भी धर्म स्थापक को गुरू नहीं कहा जाता है। वह तो सिर्फ धर्म स्थापन के लिए आते हैं। वापिस ले जाने थोड़ेही आते हैं। गुरू अर्थात् जो वापिस निर्वाणधाम, वानप्रस्थ में ले जाये। परन्तु एक भी गुरू वापिस ले जाने वाला है नहीं। एक भी निर्वाणधाम में जाते नहीं। वाणी से परे अर्थात् घर। वानप्रस्थ का अर्थ गुरू लोग जानते, फालोअर्स ही जानते। तो बच्चों को कितना समझाया जाता है। यह चित्र हैं सतयुग के और वह चित्र हैं त्रेता के। उन्हों को भगवान नहीं कहा जाता है। लक्ष्मी-नारायण को भी भगवान-भगवती नहीं कहा जाता। आदि सनातन है देवी-देवता धर्म। सिवाए देवी-देवताओं के कोई भी स्थाई पवित्र होते नहीं। 21 जन्म पवित्र सिर्फ एक ही धर्म रहता है। फिर धीरे-धीरे अवस्था कम होती जाती है। त्रेता में दो कला कम तो सुख भी कम हो जाता है। उसको कहा जाता है त्रेतायुग 14 कला। अभी तुमको बाप का परिचय है और सृष्टि चक्र का ज्ञान है। उसको ही तुम याद करते हो, परन्तु कइयों की बुद्धि कहाँ कहाँ भटकती रहती है, याद नहीं करते हैं। अच्छा और कुछ भी समझ सको तो आस्तिक बनकर बाप को तो बुद्धि में याद रखो। बाप और रचना के आदि-मध्य-अन्त को तो जानते हो ना। उस झाड़ का आदि-मध्य-अन्त नहीं कहा जाता है। इस झाड़ का आदि-मध्य-अन्त है क्योंकि मध्य में रावण राज्य शुरू हो जाता है। कांटा बनना शुरू होता है। बगीचा, जंगल बनना शुरू होता है। इस समय सारे झाड़ की जड़जड़ीभूत अवस्था हो गई है। सारा झाड़ सूखकर तमोप्रधान हो गया है। सारा सूखा हुआ झाड़ है, फिर कलम लगाना पड़े। इसका कलम लगता है, कलम लगे तो प्रलय हो जाए। प्रलय अर्थात् सारी जलमई नहीं होती है। भारत रह जाता है - परन्तु जलमई नाम तो है ना।
मीठे-मीठे बच्चे जानते हैं कि चारों ओर ही जलमई हो जाती है। भारत ही सिर्फ रहता है। जैसे बाढ़ आती है फिर उतरती भी है ना। कहते भी हैं बी.के. सारा दिन मौत ही मौत कहते रहते। बस मौत आने वाला है। तो समझते हैं कि यह तो अशुभ बोलते हैं। बोलो नहीं। हम कोई विनाश थोड़ेही कहते हैं। हम तो कहते हैं पवित्रता, सुख, शान्ति का धर्म स्थापन हो रहा है। विनाश हो तो शान्ति कैसे हो - गुप्त वेष में शान्तिधाम, सुखधाम की स्थापना हो रही है। यह तो हम शुभ बोलते हैं। तुम भी कहते हो ना - हे पतित-पावन आओ, हमको पावन बनाकर ले चलो। तुम खुद कहते हो ना कि हमको ले चलो। हम भी शुभ बोलते हैं, तुम भी शुभ बोलते हो। तुम कहते हो हमको पावन बनाकर इस दु:खधाम की दुनिया से ले चलो शान्तिधाम में। यह तो शुभ बोलते हो ना। कहते हो आओ माना पतितों का विनाश करो, पावन की स्थापना करो। मांगते हो ना कि आकर विश्व में शान्ति स्थापन करो, शान्ति तो सतयुग में ही होती है। सो तो गुप्त वेष में विश्व में शान्ति स्थापन हो रही है। जब तक अर्थ नहीं समझाओ तब तक समझ सकें। सिवाए बाप के मौत तो कोई दे सके। बाप को कालों का काल कहा जाता है, सबको मौत देते हैं। कितने ढेर के ढेर को मौत देते हैं। सतयुग में कितने थोड़े मनुष्य हैं। बाकी सबको मौत मिल जाता है। बुलाते ही हो कि पावन दुनिया में ले चलो। तो पावन दुनिया जरूर नई ही होगी। यह थोड़ेही होगी। पुरानी दुनिया का भी अर्थ नहीं समझते। पावन दुनिया में बहुत थोड़े मनुष्य रहते हैं। शान्ति रहती है। यह बातें समझने और समझाने में कितना सहज है। परन्तु बुद्धि में बैठता ही नहीं क्योंकि समय ही नहीं है, बुद्धि में बैठने का। कहा भी जाता है ना कुम्भकरण की नींद में सब सोये पड़े हैं। यह नहीं जागेंगे। यह ड्रामा बड़ा विचित्र है। तो यह सारा चक्र बुद्धि में फिरना चाहिए। बाप आकर सारा ज्ञान देते हैं। उनको कहते ही हैं - नॉलेजफुल, ज्ञान का सागर। ज्ञान का सागर एक बाप ही है। तुम जानते हो पानी के सागर कितने हैं। जितने नाम हैं उतने सागर हैं वा सागर एक ही है, यह तो अलग-अलग पार्टीशन कर नाम रख दिये हैं। बाहर सागर तो एक ही है ना। वास्कोडिगामा भी सारा चक्र लगाए फिर वहाँ ही आकर खड़ा हो गया। तो सागर एक ही है। बीच-बीच में टुकड़ा-टुकड़ा कर अलग-अलग बना दिया है। धरनी भी सारी एक ही है। परन्तु टुकड़ा-टुकड़ा हुई पड़ी है। तुम्हारा राज्य होता है तो धरनी भी एक ही होती है। राज्य भी एक होता है, नो टुकड़ा-टुकड़ा। बाप आकर राज्य देते हैं। सारे सागर पर, सारी धरनी पर, सारे आसमान पर तुम्हारा राज्य होता है। मुक्ति में तो सब जायेंगे, बाकी जीवनमुक्ति में जाना कोई मासी का घर थोड़ेही है। मुक्ति में जाना तो कॉमन है, सब वापिस लौटेंगे। जहाँ से आये हैं फिर वहाँ जायेंगे जरूर। बाकी नई दुनिया में सब थोड़ेही आयेंगे। तुम्हारा ही राज्य है। कोई-कोई तो इतना देरी से आते हैं जो पुरानी दुनिया शुरू होने से थोड़ा ही पहले यानी 2-4 सौ वर्ष पहले आते हैं। वह क्या हुआ? जो अच्छी रीति नहीं पढ़ेंगे तो त्रेता में भी पिछाड़ी का थोड़ा समय रहेंगे। 16 कला तो कभी बन सकें। 14 कला के भी पिछाड़ी में आयेंगे। उनको सामने दु: की दुनिया देखने में आयेगी। काँटों की दुनिया के नजदीक जायेंगे, वहाँ कोई यह मालूम नहीं पड़ता है। सारी नॉलेज अभी है, जो बुद्धि में धारण करनी होती है। इस समय मनुष्यों के पास पैसे देखो कितने होंगे। कितने महल बनते रहते हैं। कितनी ऊंची-ऊंची माड़ियाँ बनाते रहते, समझते हैं सतयुग से भी भारत अभी ऊंच है। अभी ही 18-20 मंजिल बनाते रहते हैं, तो अन्त में कितनी मंजिल वाले बनायेंगे। दिन प्रतिदिन माड़ियाँ चढ़ाते रहते हैं। सतयुग त्रेता में तो यह माड़ियाँ होती नहीं। द्वापर में भी नहीं होती। यह तो कलियुग में जब आकर बहुत मनुष्य हो जाते हैं तो 2 मंजिल, 10 मंजिल बढ़ाते जाते हैं क्योंकि मनुष्य बढ़ते जाते हैं तो वह जायें कहाँ, धन्धाधोरी बहुत है। तो बड़े-बड़े मकान भी बनाते रहते हैं - शोभा के लिए। जंगल से मंगल होता जाता है। कितने अच्छे-अच्छ मकान बनते रहते, जमीन लेते रहते हैं ना। बाम्बे पहले क्या थी, 80-90 वर्ष में देखो क्या हो गई है। पहले तो कितने थोड़े मनुष्य थे, अभी तो देखो कितने मनुष्य हो गये हैं। समुद्र को सुखाया है। अभी भी देखो समुद्र को कितना सुखाया है। पानी जैसे कमती होता जाता है। मनुष्य वृद्धि का पाते जाते तो पानी कहाँ से आयेगा। पानी कम होता जाता, समुद्र हटता जाता। धरती छोड़ता है तो मकान बना देते हैं, फिर पानी चढ़ जायेगा तो कराची वा बाम्बे का बहुत सा हिस्सा पानी में चला जायेगा।
तुम जानते हो और सब खण्ड खत्म हो जायेंगे, आफतें आने वाली हैं इसलिए बाप कहते हैं, जल्दी-जल्दी तैयार होते रहो। जैसे शमशान में जब आग जलकर खत्म होती है तब लौटते हैं। बाप भी विनाश के लिए आये है, तो आधे पर थोड़ेही जायेंगे। आग लगकर जब पूरी होगी तब चले जायेंगे, फिर बैठकर क्या करेंगे। आग बुझेगी नहीं, सब चले जायेंगे। सबको साथ ले जायेंगे, होना तो जरूर है। समझते तो सब हैं लेकिन समय का गपोड़ा बहुत बड़ा लगा दिया है। बच्चों को समझाना भी गीता पर है। गीता एपीसोड है ना, जिसमें देवी-देवता धर्म की स्थापना हो रही है। वहाँ एक ही धर्म होगा, बाकी सब धर्म विनाश हो जाते हैं। सिर्फ यह गीता ही है जो भगवान ने गाई है। मनुष्यों ने भक्ति मार्ग के लिए बैठ शास्त्र बनाये हैं। ऐसी-ऐसी प्वाइंट्स धारण कर फिर सुनानी चाहिए। कहते हैं बाबा भूल जाते हैं, धारणा नहीं होती है। बाबा कहते फिर क्या करें! राजधानी स्थापन होती है, इसमें नम्बरवार तो सब चाहिए। सबके ऊपर कृपा करने की ताकत हो तो बाप स्वर्ग का मालिक सबको बना दे, लेकिन नहीं। यह तो बनने ही हैं - नम्बरवार। यह कोई भी समझ सकते हैं कि भगवान आया हुआ है। भगवान जरूर स्वर्ग की सौगात ले आयेंगे। नई दुनिया स्थापन करने आते हैं तो जरूर संगम पर ही आयेंगे, नई दुनिया स्थापन करने। तुम सुनते हो और निश्चय से पुरूषार्थ करते हो, जिनको निश्चय ही नहीं वह कब सुधरेंगे ही नहीं। भल कितना भी माथा मारो। तो बाबा के अवतरण का पैगाम सबको देना है। मैसेज देना है। आगे चल अखबारों में पड़ ही जायेगा। जैसे तुम्हारा नाम बदनाम भी अखबारों द्वारा हुआ फिर नाम बाला भी अखबारों द्वारा ही होगा। दुनिया तो बहुत बड़ी है - सब जगह तो तुम बच्चियाँ जा नहीं सकेंगी। कितने शहर हैं, कितनी ढेर भाषायें हैं। अखबारों द्वारा सब जगह आवाज पहुँच जाता है। कोई भी आयेगा, कहेगा - हाँ, अखबारों द्वारा आवाज सुना है। तो तुम्हारा नाम अखबारों द्वारा ही होगा। ऐसा नहीं समझो कि सब तरफ तुमको जाना पड़ेगा। फिर तो पता नहीं कितना समय लग जाये। अखबारों द्वारा ही एक्यूरेट सुनेंगे। तुम कहते भी हो कि बाप को याद करो तो पाप कट जायेंगे। अखबारों में तो पड़ना ही है। अब तुम्हारा नाम बाला होगा तो फिर बढ़ता जायेगा। जैसे कल्प पहले पता पड़ा होगा, वैसे ही समय पर पड़ेगा। सबको मैसेज मिलेगा। युक्तियाँ चल रही हैं। बहुत अखबार वाले डालेंगे। किसको बुद्धि में बैठा और डाल देंगे। सब धर्म वालों को मालूम पड़ जायेगा, तब तो कहेंगे अहो प्रभू तेरी लीला। पिछाड़ी में बाप की याद सबको आयेगी परन्तु कुछ भी कर नहीं सकेंगे। यह खेल है ना। खेल को जान जायेंगे। 84 चक्र का खेल सब अखबारों में पड़ जायेगा। जहाँ भी जाओ - अखबार जरूर निकलते हैं। अखबार द्वारा सबको आवाज तो पहुँचता है ना। तुम्हारी बातें तो सबसे ऊंच है ना। विनाश का समय भी तो जरूर आना ही है ड्रामा प्लैन अनुसार। जैसे कल्प पहले मालूम पड़ा होगा, अभी भी पड़ेगा। धीरे-धीरे स्थापना होती है ना। संगमयुग याद पड़े तो स्वर्ग भी याद पड़े। स्वर्ग को याद करो और मनमनाभव, बाप को भी याद करो तो बेड़ा पार हो। जब तक विनाश हो, शान्ति कहाँ से आये। विनाश का नाम ही कड़ा है। मनुष्य सुनकर बहुत डरते हैं। यह तो राइट बात है ना। पतित दुनिया में अनेक दु: हैं, पावन दुनिया में अनेक सुख हैं। बाप देखो सौगात कैसी लाते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) पढ़ाई को अच्छी तरह पढ़कर ऊंच पद पाना है। आफतें आने के पहले नई दुनिया के लिए तैयार होना है।
2) अपने को सुधारने के लिए निश्चयबुद्धि बनना है। वाणी से परे वानप्रस्थ में जाना है इसलिए इस दु:खधाम को भूल शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है।
 
वरदाननॉलेजफुल बन हर कर्म के परिणाम को जान कर्म करने वाले मास्टर त्रिकालदर्शी भव
 
त्रिकालदर्शी बच्चे हर कर्म के परिणाम को जानकर फिर कर्म करते हैं। वे कभी ऐसे नहीं कहते कि होना तो नहीं चाहिए था, लेकिन हो गया, बोलना नहीं चाहिए था, लेकिन बोल लिया। इससे सिद्ध है कि कर्म के परिणाम को जान भोलेपन में कर्म कर लेते हो। भोला बनना अच्छा है लेकिन दिल से भोले बनो, बातों में और कर्म में भोले नहीं बनो। उसमें त्रिकालदर्शी बनकर हर बात सुनो और बोलो तब कहेंगे सेंट अर्थात् महान आत्मा।
 
स्लोगन:एक दो को कॉपी करने के बजाए बाप को कॉपी करो तो श्रेष्ठ आत्मा बन जायेंगे।
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Details ( Page:- Murali Dtd 6th Sep 2017 )
06.09.17          Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche - Yah pujya aur pujari, gyan aur bhakti ka wonderful khel hai, tumhe ab fir se satopradhan pujya banna hai, patitpane ki nishaani bhi samapt karni hai.
Q- Baap jab aate hain to kaun sa ek taraju baccho ko dikhate hain?
A- Gyan aur bhakti ka taraju. Jisme ek poor(palda) hai gyan ka dusra hai bhakti ka. Abhi gyan ka poora halka hai, bhakti ka bhaari hai. Dhire-dhire gyan ka poor bhaari hota jayega fir Satyug me keval ek he poor hoga. Wahan is taraju ki darkar he nahi hai
Dharna Ke liye mukhya Saar:
1) Yah jeevan Baap ki seva me lagani hai. Bahut-bahut sukhdayi banna hai. Koi oolta-soolta bole to shant rehna hai. Baap samaan sabke dukh door karne hain.
2) Apne register ki jaanch karni hai. Devi goon dharan kar charitravan banna hai. Avgoon nikaal dene hain.
Vardaan:-- Satyata ke saath sabhyata purbak bol aur chalan se aagey badhne wale Safaltamurt bhava.
Slogan:-Samabandh-sampark aur sthiti me light raho - dincharya me nahi.
 
HINDI COMPLETE MURALI in DETAILS

06/09/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा"

मीठे बच्चे - यह पूज्य और पुजारी, ज्ञान और भक्ति का वन्डरफुल खेल है, तुम्हें अब फिर से सतोप्रधान पूज्य बनना है, पतितपने की निशानी भी समाप्त करनी है
 
प्रश्न: बाप जब आते हैं तो कौन सा एक तराजू बच्चों को दिखाते हैं?
उत्तर:ज्ञान और भक्ति का तराजू। जिसमें एक पुर (पलड़ा) है ज्ञान का, दूसरा है भक्ति का। अभी ज्ञान का पुर हल्का है, भक्ति का भारी है। धीरे-धीरे ज्ञान का पुर भारी होता जायेगा फिर सतयुग में केवल एक ही पुर होगा। वहाँ इस तराजू की दरकार ही नहीं है।
 
ओम् शान्ति।
 
रूहानी बाप मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को ज्ञान और भक्ति का राज़ समझा रहे हैं। यह तो अभी बच्चे जानते हैं कि बरोबर बाप आये हुए हैं और हमको फिर से पूज्य देवी-देवता बना रहे हैं। जो आसुरी सम्प्रदाय बन गये हैं, वह अब फिर से दैवी सम्प्रदाय बन रहे हैं अर्थात् अब भक्ति का चक्र पूरा हो गया। यह भी अब मालूम हुआ है कि भक्ति कब से शुरू हुई है! रावण राज्य कब से शुरू हुआ है! कब पूरा होता है! फिर रामराज्य कब से शुरू होता है! तुम बच्चों की बुद्धि में वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी है। बरोबर 4 युग हैं। अभी संगमयुग का चक्र वा ड्रामा चल रहा है। यह हम सब बच्चों की बुद्धि में बैठा। किसकी बुद्धि में बैठा? हम प्रजापिता ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मणों की बुद्धि में बैठा। किसका नाम तो कहेंगे ना। सिवाए ब्राह्मणों के और कोई नाम नहीं निकाल सकते। यह खेल ही ऐसा बना हुआ है - ब्राह्मण फिर देवता, क्षत्रिय... ऐसे यह चक्र फिरता रहता है। तुम बच्चे अब याद की यात्रा सीख रहे हो अथवा पतित से पावन बन रहे हो। समझाना भी ऐसे होता है - अभी हम रामराज्य की स्थापना कर रहे हैं तो जरूर पहले रावण राज्य है। यह भी सिद्ध होता है अभी रावणराज्य है तो झाड़ बहुत बड़ा है। अभी हम पूज्य देवी-देवता धर्म की स्थापना कर रहे हैं तो पुराना झाड़ खलास हो नये झाड़ की स्थापना हो रही है। यह भी हिसाब-किताब बच्चे समझते हैं। हम स्वयं पूज्य सतोप्रधान थे फिर 84 जन्म बाद तमोप्रधान बनें। पूज्य से पुजारी बने हैं फिर से रिपीट करना पड़ेगा। यह तो सहज समझने का है कि चक्र कैसे फिरता आया है। जैसे एक्टर्स शुरू से लेकर पिछाड़ी तक पार्ट बजाते हैं ना। तो यह है बेहद का राज़, ज्ञान और भक्ति का राज़ बुद्धि में अच्छी रीति जम गया है। हम ही पूज्य सतयुगी देवता थे फिर हम ही सीढ़ी उतरते पुजारी बनें। रावणराज्य कब से शुरू हुआ। पूरी तिथि तारीख तुम जानते हो। हमने ऐसे-ऐसे पुनर्जन्म लिया। पहले हम सूर्यवंशी देवी-देवता थे, फिर चन्द्रवंशी बनें ..... अब फिर ब्राह्मणवंशी बनकर फिर हम देवता बनते हैं। अभी तुम ब्राह्मणवंशी वा ईश्वरीय वंशी हो। तुम सब जानते हो कि हम सब ईश्वर की सन्तान हैं इसलिए ब्रदर्स कहते हैं। वास्तव में तो ब्रदर्स होते हैं मूलवतन में, फिर पार्ट बजाने लिए नीचे आना पड़ता है। यह तो बच्चे जानते हैं - हम ही शूद्र से ब्राह्मण बन पढ़कर वह संस्कार ले जाते हैं। सो हम देवी-देवता बनते हैं। कल हम शूद्र थे - आज हम ब्राह्मण हैं फिर कल हम देवता बनेंगे। यह राज़ समझाना भी होता है बच्चों को। सभी को सुजाग करना है। यह तुम किसको भी समझा सकते हो कि नई दुनिया सतयुग, यह पुरानी दुनिया कलियुग है। इसमें कोई सुख नहीं। बच्चे समझते हैं जब यह नया झाड़ था तो हम ही देवी-देवता थे, बहुत सुख था फिर चक्र लगाते-लगाते दुनिया पुरानी हो गई है। मनुष्य भी बहुत हो गये हैं तो दु: भी बहुत हो गया है। बाप समझाते हैं सतयुग में तुम कितने सुखी थे। सदा सुखी तो कोई रहते नहीं। पुनर्जन्म लेने का भी कायदा है। पुनर्जन्म लेते-लेते उतरते-उतरते 84 जन्म पूरे हुए हैं। फिर नये सिर चक्र फिरना है। ज्ञान और भक्ति। आधाकल्प है दिन नई दुनिया फिर आधाकल्प है रात पुरानी दुनिया। यह पढ़ाई याद करनी होती है। शिवबाबा को भी याद करना होता है। टीचर को भी सारा याद है ना। तुम कहेंगे बाबा को इस सारे सृष्टि की नॉलेज है। तुम भी समझते हो कि हम जो पावन पूज्य देवता थे सो अब पुजारी पतित बने हैं। सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो यह हिस्ट्री-जॉग्राफी तुम ड्रामा की समझते हो। यह पूज्य और पुजारी का खेल बना हुआ है। ऐसी-ऐसी अपने साथ बातें करो। सतोप्रधान बनने के लिए मुख्य है - ज्ञान और योग। ज्ञान है सृष्टि चक्र का और योग से हम पावन बनते हैं। कितना सहज है। किसको भी समझा सकते हैं। जैसे बाबा भी समझाते हैं ना। सिर्फ बाबा बाहर नहीं जाते हैं, क्योंकि बाप इनके साथ है ना। कोई भी मनुष्य सद्गति को तो जानते ही नहीं। सद्गति की बातें तो तब समझें, जब सद्गति दाता को पहचानें। तुम्हारे में भी नम्बरवार जानते हैं। तुम समझते हो और समझाते भी हो। मूल बात है ही पतित से पावन बनने की। याद से ही तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते जायेंगे। यहाँ के बच्चे वा बाहर के बच्चे कहते हैं कि योग कैसे लगावें? पतित से पावन बनने की युक्ति क्या है? क्योंकि इसमें ही मूँझे हैं। तो समझाना चाहिए कि यह खेल ही हार और जीत का बना हुआ है। भारत ही पतित से पावन और पावन से पतित बनता है। आधाकल्प है ज्ञान अर्थात् पावन, आधाकल्प है भक्ति अर्थात् पतित। अब फिर से पतित से पावन बनना है। यह याद की यात्रा प्राचीन बहुत नामीग्रामी है। वह तो जिस्मानी यात्रायें जन्म-जन्मान्तर करते, नीचे गिरते गये हैं। ऐसे नहीं कि उनसे पावन बने हैं। पावन बनाने वाला है ही एक बाप। वह एक ही बार आते हैं। शिवबाबा का पुनर्जन्म नहीं कहेंगे। मनुष्य को ही 84 जन्म के चक्र में आना है।
बाबा कहते हैं यह कहानी बहुत ही सहज है। सिर्फ कैरेक्टर जरूर बदलना चाहिए। जब तुम देवतायें थे तो तुम्हारा फर्स्टक्लास कैरेक्टर था। फिर धीरे-धीरे तुम्हारा कैरेक्टर बिगड़ता गया। रावणराज्य में तो अभी बिल्कुल बिगड़ गया है। आधाकल्प भक्ति मार्ग में पतित बनने से हाहाकार मच गया। पावन शिवालय से फिर पतित वेश्यालय बन जाता है। रावण ने जीत पा ली। कोई कोशिश ही नहीं करते कि रामराज्य कैसे बनें। बाप को ही आना पड़ता है। यह भी ड्रामा बना हुआ है। रावण राज्य में हम गिरते आये हैं, अब फिर चढ़ना है। बाप आकर जगाते हैं क्योंकि सब भक्ति में सोये पड़े हैं। बाप आये हैं तो भी सोये पड़े हैं। बाप आते ही हैं पिछाड़ी में जबकि सब अज्ञान नींद में सोये हैं। जैसे बाप ज्ञान का सागर है, सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को जानते हैं, तुम भी जानते हो। इतने सब बच्चे बाप से सीखते हैं ना। एक बाप से सीखकर फिर वृद्धि को पाते हैं। कल्प पहले भी तुमको मनुष्य से देवता बनाया था। अभी भी तुमको जरूर बनना है। फिर कोई हल्का पुरूषार्थ करते, कोई फिर तीखा करते हैं। नम्बरवार तो हैं ना। कोई की डल बुद्धि है। उस स्कूल में भी नम्बरवार तो होते हैं ना। उस पढ़ाई में तो बी.., एम.. आदि की कितनी क्लास होती हैं। कितने मनुष्य पढ़ते हैं। सारी दुनिया में कितने एम.. पढ़ते होंगे। जो भी भारतवासी हैं, कितने समय से पढ़ते हैं। कोई टीचर बनते, कोई क्या बनते। आजीविका करते रहते हैं। अच्छा मर गया फिर नयेसिर से जन्म ले पढ़ना पड़े। वहाँ सतयुग में एम.. आदि की पढ़ाई नहीं है। यह ड्रामा में अभी की नूँध है जो पढ़ते हैं, फिर कल्प बाद पढ़ेंगे। वहाँ यह किताब आदि कुछ भी नहीं होती। जो भक्ति मार्ग में होता है वह ज्ञान मार्ग में नहीं होता। भक्ति मार्ग में वह पढ़ाते आये हैं जो पास्ट हुआ। बाप ने बताया है - कब से रामराज्य, कब से रावणराज्य होता है, फिर हम कैसे नीचे उतरते गये। तुम्हारी बुद्धि में यह सब राज़ अच्छी तरह बैठ गया है।
तुम्हें अब पुरूषार्थ करना है ऊंच ते ऊंच बनने का। परन्तु राजाई में सब एक जैसे बन नहीं सकते। कोई तो अच्छी रीति पुरूषार्थ करते हैं, पावन बनने के लिए दैवीगुण धारण करते हैं। तुम्हारा ईश्वरीय रजिस्टर भी है। अपनी जाँच करनी है कि हमारे में कोई अवगुण तो नहीं हैं? गाते हैं हम निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। सब समझते हैं हमारे में अवगुण हैं, जब हमारे में सब गुण थे तो हम सर्वगुण सम्पन्न 16 कला सम्पूर्ण थे, उन्हों का राज्य था। चित्र भी हैं। वहाँ यह मन्दिर आदि नहीं होंगे। वहाँ भक्ति मार्ग का चिन्ह भी नहीं होगा। भक्ति मार्ग में फिर ज्ञान का रिंचक मात्र चिन्ह नहीं है। यह भी तुम नम्बरवार जानते हो। जो अच्छी रीति पढ़कर धारण करते हैं तो क्वालिफिकेशन भी आती रहती हैं। दिल में आता है कि बाप जिससे हम विश्व की बादशाही लेते हैं, उनका कितना मददगार बनना चाहिए। हम हैं ईश्वरीय सन्तान। बाप आये ही हैं सबको सुखदाई बनाने। कभी कोई को दु: नहीं देते। बच्चों को इतना ऊंच बनना है। बाबा बार-बार समझाते हैं अपने पास नोट रखो, किसको दु: तो नहीं दिया? बाप सबको सुख देते हैं। हम भी सुख देवें। यह जीवन ही बाबा की सर्विस में लगाई है ना। बहुत मीठा बनने की कोशिश करनी है। कोई उल्टा-सुल्टा बोले भी तो तुम शान्त कर दो। सबको सुख दो। सबको सुख का रास्ता बताना है, तो शान्तिधाम, सुखधाम के मालिक बनें। सुखदाई बनना है क्योंकि बाप सदा सुखदाता है ना। सबके दु: दूर कर लेते हैं। बुद्धि में आता है हम बहुत सुख देने वाले थे। हम जब सुख में थे तो विकार का नामनिशान नहीं था, काम कटारी नहीं चलाते थे। सतयुग में कोई दु:खी नहीं बनाते। बाप फिर भी बच्चों को कहते हैं, अपने को आत्मा समझो। आत्मा को ही पावन बनना है। आत्मा में कोई पतितपने की निशानी रहे। दिन-प्रतिदिन तुम उन्नति को पाते रहेंगे। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार राजाई पाई थी। वही फिर पाने का पुरूषार्थ कर रहे हो। देखते रहते हो कि कौन-कौन कितना पुरूषार्थ करते हैं? कितने को हम सुख देते हैं? बच्चे जानते हैं कि सतयुग में हम कोई को दु: नहीं देंगे। कम पुरूषार्थ करेंगे तो सजायें खाकर कम पद पायेंगे। बेइज्जती होती है ना। कोई बच्चे तो बहुत सर्विस करते हैं। म्युज़ियम, प्रदर्शनी में कितनी मेहनत करते हैं। यह प्रदर्शनियाँ, म्युजियम आदि भी वृद्धि को पायेंगे। तराजू में यह ज्ञान का तरफ भारी होता जायेगा। एक तरफ है ज्ञान, दूसरे तरफ है भक्ति। इस समय भक्ति का पुर (पलड़ा) बहुत भारी है। एकदम नीचे पट पड़ जाता है। बहुत वज़न भारी होकर एकदम तले में चले जायेंगे। उसमें जैसे 10 शेर और उसमें ज्ञान का एक पाव पड़ा है। फिर ज्ञान का एक तरफ भारी हो जायेगा, सतयुग में एक ही पुर होता है फिर कलियुग में भी एक ही पुर होता है। संगम पर दो पुर हो जाते हैं। ज्ञान के पुर में कितने थोड़े हैं। कितना हल्का है फिर वहाँ से ट्रांसफर हो इस तरफ भरते जायेंगे तब भक्ति खत्म हो जायेगी। फिर एक ज्ञान का पुर रह जायेगा। दो पुर होंगे ही नहीं। बाप आकर तराजू में दिखाते हैं। कम जास्ती भी होता रहता है। कब उस तरफ, कब इस तरफ भरतू हो जाते। ज्ञान में आकर फिर भक्ति के पुर में भरतू हो जाते। जो पक्के हैं वह तो जानते हैं स्थापना जरूर होनी है। जब हमारा राज्य होगा तब हम ही होंगे। फिर मूलवतन का पुर जास्ती हो जायेगा। वहाँ बहुत आत्मायें रहेंगी। तो वह पुर जास्ती हो जायेगा। फिर आधाकल्प बाद द्वापर से आते रहेंगे। इस रीति सृष्टि का चक्र फिरता रहता है। जब पतित हैं तब तराजू की दरकार ही नहीं। तराजू की दरकार ही तब होती जब बाप आते हैं। बाप तराजू ले आते हैं। झाड़ का ज्ञान भी तुम्हारी बुद्धि में है। पहले कितना छोटा झाड़ फिर वृद्धि को पाता रहता है। सब पत्ते सूखकर खत्म हो जाते फिर रिपीट होता। पानी मिलने से फिर छोटे-छोटे पत्ते वृद्धि को पाते हैं। फल देते हैं। हर वर्ष झाड़ खाली होगा। सब कुछ नया होगा। अभी देवी-देवता धर्म वाला एक भी नहीं है। थे जरूर। उन्हों का राज्य था - परन्तु कब? यह भूल गये हैं। तुम ब्राह्मणों का कुल भी दिन प्रतिदिन वृद्धि को पाता जाता है। तो ऐसे-ऐसे इस ज्ञान को मंथन करके धारण करते रहो और समझाते रहो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) यह जीवन बाप की सेवा में लगानी है। बहुत-बहुत सुखदाई बनना है। कोई उल्टा-सुल्टा बोले तो शान्त रहना है। बाप समान सबके दु: दूर करने हैं।
2) अपने रजिस्टर की जाँच करनी है। दैवीगुण धारण कर चरित्रवान बनना है। अवगुण निकाल देने हैं।
 वरदान:सत्यता के साथ सभ्यता पूर्वक बोल और चलन से आगे बढ़ने वाले सफलतामूर्त भव
 सदैव याद रहे कि सत्यता की निशानी है सभ्यता। यदि आप में सत्यता की शक्ति है तो सभ्यता को कभी नहीं छोड़ो। सत्यता को सिद्ध करो लेकिन सभ्यतापूर्वक। सभ्यता की निशानी है निर्माण और असभ्यता की निशानी है जिद। तो जब सभ्यता पूर्वक बोल और चलन हो तब सफलता मिलेगी। यही आगे बढ़ने का साधन है। अगर सत्यता है और सभ्यता नहीं तो सफलता मिल नहीं सकती।

 स्लोगन:सम्बन्ध-सम्पर्क और स्थिति में लाइट रहो - दिनचर्या में नहीं।
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Details ( Page:- Murali Dtd 7th Sep 2017 )
07.09.17                Pratah Murli Om Shanti Babdada Madhuban
Mithe bacche - Tumhari yah life most valuable hai, tumhe is janm me kodii se heere jaisa banna hai, isiliye jitna ho sake Baap ko yaad karo.
Q- Kis ek baat me khabardar na rehne se sara register kharab ho jata hai?
A- Agar kisi ko bhi dukh diya to dukh dene se register kharab ho jata hai. Is baat me badi khabardari chahiye. Dusre ko bhi dukh dena mana swayang ko dukhi karna. Jab Baap kabhi kisi ko dukh nahi dete to baccho ko Baap samaan banna hai. 21 janmo ka Rajya bhagya lene ke liye ek to pavitra bano, dusra, mansa-vacha-karmana kisi ko bhi dukh na do.Grihast byavahar me bahut mitha byavahar karo.
Dharna Ke liye mukhya Saar:-
1) Sachcha pyaar ek Baap se rakhna hai. Baki sabse nastmoha banna hai. Mukh se wa karmendriyon se koi bhi paap karm nahi karna hai. Register sad thik rakhna hai.
2) Service me kabhi thakna nahi hai. Apna time waste nahi karna hai. Ghar-ghar me roohani hospital khol sabko yaad ki dabayi deni hai.
 
Vardaan:- Apni sukshma checking dwara paapo ke bojh ko samapt karne wale samaan wa sampann bhava.
Slogan:-- Bahanebaji ko merge kar do to behad ki bairagya briti emerge ho jayegi.
HINDI COMPLETE MURALI in DETAILS

07/09/17 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

''मीठे बच्चे - तुम्हारी यह लाइफ मोस्ट वैल्युबुल है, तुम्हें इस जन्म में कौड़ी से हीरे जैसा बनना है, इसलिए जितना हो सके बाप को याद करो''
 
प्रश्न:    किस एक बात में खबरदार रहने से सारा रजिस्टर खराब हो जाता है?
उत्तर:   अगर किसी को भी दु: दिया तो दु: देने से रजिस्टर खराब हो जाता है। इस बात में बड़ी खबरदारी चाहिए। दूसरे को भी दु: देना माना स्वयं को दु:खी करना। जब बाप कभी किसी को दु: नहीं देते तो बच्चों को बाप समान बनना है। 21 जन्मों का राज्य भाग्य लेने के लिए एक तो पवित्र बनो, दूसरा, मन्सा-वाचा-कर्मणा किसी को भी दु: दो। गृहस्थ व्यवहार में बहुत मीठा व्यवहार करो।।
 
गीत:-   तकदीर जगाकर आई हूँ...     ओम् शान्ति।
 
तुम जानते हो कि हम आत्मायें अपनी क्या तकदीर बनाकर आये हैं। अभी फिर नई दुनिया के लिए हम तकदीर बना रहे हैं। यह भी जानते हो वह हैं जिस्मानी लड़ाई पर, तुम ब्राह्मण हो रूहानी लड़ाई पर। नई दुनिया का मालिक बनने के लिए, रावण पर विजय पाने के लिए तुम लड़ाई पर हो, बाप इस समय सम्मुख बैठकर समझाते हैं तो ठीक लगता है, बाहर निकलने से कितनी अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स भूल जाते हैं। तुम मुरझा जाते हो। बाप है श्रीमत देने वाला। नई दुनिया का स्वराज्य देने वाला। स्व अर्थात् आत्मा कहती है पहले मुझे गदाई थी, अब राजाई मिलती है। उनको गदाई क्यों कहते हैं? गधे का मिसाल देते हैं क्योंकि गधे को श्रृंगार कर धोबी लोग कपड़े की गठरी रखते हैं, गधे ने मिट्टी देखी तो मिट्टी में लथेड़ी लगाने लगते हैं, (लेट जाते हैं) तो यहाँ भी बाप आये हैं, बच्चों को स्वराज्य देने। श्रृंगार करते हैं। चलते-चलते बच्चे फिर माया की धूल में पड़कर श्रृंगार सारा खलास कर देते हैं। बच्चे खुद भी समझते हैं कि बाबा हमको श्रृंगारते बहुत अच्छा हैं। फिर माया ऐसी प्रबल है जो हम लथेड़ कर श्रृंगार खराब कर देते हैं। सबसे बड़ी धूल है विकार की। तुम्हारी लड़ाई है ही खास विकारों से। बाप कहते हैं काम विकार महाशत्रु है। कैसे शत्रु बना, यह कोई भी नहीं जानता। बाप ने हमको स्वराज्य दिया था, अब गंवाया है। फिर बाप आकर विकारों पर जीत पाने की युक्तियाँ बताते हैं। वास्तव में तुम्हारी लड़ाई काम महाशत्रु से है। अब बाप कहते हैं कि कामी से निष्कामी बनो। निष्कामी अर्थात् कोई भी कामना नहीं, जिसमें कोई विकार नहीं उसको निष्कामी कहेंगे। बाप काम पर जीत पहनाते हैं। कोई को पता नहीं कि रावण राज्य कब से शुरू हुआ। जगन्नाथ के मन्दिर में देवताओं के बड़े गन्दे चित्र लगे हैं, इससे सिद्ध होता है देवताओं के वाम मार्ग में जाने से मनुष्य कामी बन जाते हैं। अभी तुम कामी मनुष्य से निष्कामी देवता बन रहे हो। तुम्हारी युद्ध न्यारी है। बाबा छी-छी दुनिया से वैराग्य दिलाते हैं। यह है विषय वैतरणी नदी।
 
 
 
तुम्हारी यह लाइफ मोस्ट वैल्युबुल है, इसमें कौड़ी से हीरे जैसा बनना है। है सारी बुद्धि की बात। तुम्हें बाबा की याद में रहना है। आजकल तो मौत के लिए अनेक बाम्ब्स बनाये हैं। मनुष्यों ने तो कोई गुनाह नहीं किया है। आगे तो लड़ाई हमेशा शहर से बाहर मैदान में होती थी फिर विजय पाकर शहर के अन्दर आते थे। आजकल तो जहाँ देखो वहाँ बाम्ब्स