Published by – Goutam Kumar Jena on behalf of GNEXT MS OFFICE
Category - Religion, Ethics , Spirituality & New Age & Subcategory - Original History & Science
Summary - Brahmakumaris 7Days Course , Original History , Geography of INDIA & World
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1 Image Introduction 28429 2017-09-18 11:11:22
2 Image First Day Lesson -WHAT IS SOUL & MIND 35669 2017-09-18 11:11:22
3 Image LESSON - 2- Day - 2 - THREE WORLD & INCORPOREAL GOD SHIVA 57459 2017-09-18 11:11:22
4 Image Lesson - 3 - Day 3 - Supreme Soul 162142 2017-09-18 11:11:22
5 Image Lesson - 4 - Day 4 - World Drama Wheel & Kalpa Tree 175719 2017-09-18 11:11:22
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Details ( Page:- Introduction )

The study or recitation of sacred texts for one week continuously is considered in India to be of special sanctity and of great spiritual merit. Here, it is customary for the religious-minded people to arrange for one-week recitation of a scripture, styling it as ‘Shrimad Bhagwat Week’ or ‘The Gita Week’. It would be worth-while to know how and when this practice or tradition of holding seven-day religious congregations for reading out the legends or scriptures started. Commonsense and experience explain that in the beginning when God, the Knowledgeful, delivered Holy Knowledge to the mankind through the corporeal medium of Prajãpita Brahmã, also known as ‘Adam’ in other principal religions, the Brahmins (spiritual progeny of Brahma or Adam) took about a week to impart the essence of that divine knowledge to others by word of mouth. Much later, when that ancient knowledge was put to writing in the form of voluminous scriptures or legends, the orthodox people took to the practice of week-long recitation of those books by dividing the whole mass of written material of a particular scripture into seven parts. As time passed, people of other faiths, also adopted this old tradition of weeklong reading-aloud of their own sacred books.

Now, the time has reached its tail-end of Kaliyuga and ‘Shiva’, the Knowledgeful Incorporeal God, has been revealing again, since the past several years, that original, primeval, real knowledge or divine wisdom. That very Holy Knowledge is discoursed in brief by the Brahmins now regenerated through the mouth of Prajãpita Brahmã, to those who seek it. That Godly Knowledge, based on practical experience, and being discoursed orally by Brahmakuris World Spritual Organisation head quartered at Mount Abu, Rajasthan .

It is hoped that the seekers-after-truth would study it with their mind set on attainment of virtue and truth and would derive the maximum benefit by studying it over again and would further think of learning the practice of Yoga and the valuable hints for being able to score a victory over the vices and would set to sincere endeavours for a life of complete purity and firm Yoga.
 It is sincerely hoped that by hearing, reading, recapitulating and practising this Knowledge and Yoga in perfect way , man would attain purity, peace and bliss and would feel himself a highly blessed and lucky person.

Please Contact nearest Brahmakumaris center/Ashram/Gitapathsalas/Branch/sub-branch for further enlightment and deep understanding of the course described in subsequent pages.


[left]मनुष्य अपने जीवन में कई पहेलियाँ हल करते है और उसके फलस्वरूप इनाम पाते है | परन्तु इस छोटी-सी पहेली का हल कोई नहीं जानता कि – “मैं कौन हूँ?” यों तो हर-एक मनुष्य सारा दिनमैंमैं …” कहता ही रहता है, परन्तु यदि उससे पूछा जाय किमैंकहने वाला कौन है? तो वह कहेगा कि— “मैं कृष्णचन्द हूँयामैं लालचन्द हूँ” | परन्तु सोचा जाय तो वास्तव में यह तो शरीर का नाम है, शरीर तोमेराहै, ‘मैंतो शरीर से अलग हूँ | बस, इस छोटी-सी पहेली का प्रेक्टिकल हल जानने के कारण, अर्थात स्वयं को जानने के कारण, आज सभी मनुष्य देह-अभिमानी है और सभी काम, क्रोधादि विकारों के वश है तथा दुखी है |अब परमपिता परमात्मा कहते है कि—“आज मनुष्य में घमण्ड तो इतना है कि वह समझता है कि—“मैं सेठ हूँ, स्वामी हूँ, अफसर हूँ….,” परन्तु उस में अज्ञान इतना है कि वह स्वयं को भी नहीं जानता | “मैं कौन हूँ, यह सृष्टि रूपी खेल आदि से अन्त तक कैसे बना हुआ है, मैं इस में कहाँ से आया, कब आया, कैसे आया, कैसे सुख- शान्ति का राज्य गंवाया तथा परमप्रिय परमपिता परमात्मा (इस सृष्टि के रचयिता) कौन है?” इन रहस्यों को कोई भी नहीं जानता | अब जीवन कि इस पहेली  को फिर से जानकर मनुष्य देही-अभिमानी बन सकता है और फिर उसके फलस्वरूप नर को श्री नारायण और नारी को श्री लक्ष्मी पद की प्राप्ति होती है और मनुष्य को मुक्ति तथा जीवनमुक्ति मिल जाती है | वह सम्पूर्ण पवित्रता, सुख एवं शान्ति को पा लेता है |
जब कोई मनुष्य दुखी और अशान्त होता है तो वह प्रभु ही से पुकार कर सकता है- “हे दुःख हर्ता, सुख-कर्ता, शान्ति-दाता प्रभु, मुझे शान्ति दो |” विकारों के वशीभूत हुआ-हुआ मुशी पवित्रता के लिए भी परमात्मा की ही आरती करते हुए कहता है- “विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा !” अथवाहे प्रभु जी, हम सब को शुद्धताई दीजिए, दूर करके हर बुराई को भलाई दीजिए |” परन्तु परमपिता परमात्मा विकारों तथा बुराइयों को दूर करने के लिए जो ईश्वरीय ज्ञान देते है तथा जो सहज राजयोग सिखाते है, प्राय: मनुष्य उससे अपरिचित है और वे इनको व्यवहारिक रूप में धारण भी नहीं करते | परमपिता परमात्मा तो हमारा पथ-प्रदर्शन करते है और हमे सहायता भी देते है परन्तु पुरुषार्थ तो हमे स्वत: ही करना होगा, तभी तो हम जीवन में सच्चा सुख तथा सच्ची शान्ति प्राप्त करेंगे और श्रेष्ठाचारी बनेगे |
आगे परमपिता परमात्मा द्वारा उद्घाटित ज्ञान एवं सहज राजयोग पथ प्रशस्त किया गया है इसे चित्र में भी अंकित क्या गया है तथा साथ-साथ हर चित्र की लिखित व्याख्या भी दी गयी है ताकि ये रहस्य बुद्धिमय हो जायें | इन्हें पढ़ने से आपको बहुत-से नये ज्ञान-रत्न मिलेंगे | अब प्रैक्टिकल रीति से राजयोग का अभ्यास सीखने तथा जीवन दिव्य बनाने के लिए आप इस प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व-विधालय के किसी भी सेवा-केन्द्र पर पधार कर नि:शुल्क ही लाभ उठावें |[/left]