Published by – Goutam Kumar Jena on behalf of GNEXT MS OFFICE
Category - Religion, Ethics , Spirituality & New Age & Subcategory - MURALI
Summary - Satya Shree Trimurti Shiv Bhagawanubach Shrimad Bhagawat Geeta for Aug 2017 ( Daily Murali - Brahmakumaris - Magic Flute )
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Details ( Page:- Murali Dtd 1st Aug 2017 )
01-08-17

 प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन

Mithe bacche - Tum ho Ishwar ke adopted bacche, tumhe pavan ban pavan duniya ka varsha lena hai, yah ant ka samay hai isiliye pavitra jaroor banna hai.
 Q- Is samay ke manushyo ko oont-pakshi(suturmurg) ka title de sakte hain kyun?

 A- Kyunki oont-pakshi jo hota usey kaho udo to kahega pankh nahi, main oont hun. Bolo accha samaan uthao to kahenge main pakshi hun. Aise he aaj ke manushyo ki haalat hai. Jab unse poocha jata tum apne ko devta ke bajaye Hindu kyun kehlate ho to kehte Devtayein to pavan hai, hum patit hain. Bolo accha ab patit se pavan bano to kehte furshat nahi. Maya ne pavitrata ke pankh he kaat diye hain isiliye jo kehte hume furshat nahi wo hai oont pakshi. Tum baccho ko oont pakshi nahi banna hai.

 Dharna ke liye mukhya saar

1) Baap ki Shrimat par chalkar sampoorn nirbikari banna hai. Padhai se Biswa ki Rajai leni hai. Aatma me jo khaad padi hai usey yog agni se nikaalna hai.
2) Aatma-abhimaani ban Baap ko yaad karna hai jitna yaad me rahenge utna Baap raksha karta rahega.
 
Vardaan - Sarv praptiyon ko saamne rakh shrest shaan me rehne wale Master Sarv Shaktimaan bhava
------Hum Sarv shrest aatmayein hain, oonche te oonche Bhagwaan ke bacche hain- yah shaan Sarv shrest shaan hai, jo is shrest shaan ki seat par rehte hain wo kabhi bhi pareshaan nahi ho sakte. Devtayein shaan se bhi ooncha ye Brahmano ka shaan hai. Sarv praptiyon ki list saamne rakho to apna shrest shaan sada smruti me rahega aur yahi geet gaate rahenge ki pana tha wo paa liya......sarv praptiyon ki smruti se Master Sarv Shaktimaan ki sthiti sahaj ban jayegi.
Slogan- Yogi aur pavitra jeevan he sarv praptiyon ka aadhar hai.
 
HINDI DETAIL MURLI - 01-08-17 प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन
 
मीठे बच्चे - तुम हो ईश्वर के एडाप्टेड बच्चे, तुम्हें पावन बन पावन दुनिया का वर्सा लेना है, यह अन्त का समय है इसलिए पवित्र जरूर बनना है
 प्रश्न:-  इस समय के मनुष्यों को ऊंट-पक्षी (शुतुरमुर्ग) का टाइटल दे सकते हैं - क्यों?

 उत्तर: -     क्योंकि ऊंट-पक्षी जो होता उसे कहो उड़ो तो कहेगा पंख नहीं, मैं ऊंट हूँ। बोलो अच्छा सामान उठाओ तो कहेगा मैं पक्षी हूँ। ऐसे ही आज के मनुष्यों की हालत है। जब उनसे पूछा जाता तुम अपने को देवता के बजाए हिन्दू क्यों कहलाते हो तो कहते देवतायें तो पावन हैं, हम पतित हैं। बोलो अच्छा अब पतित से पावन बनो तो कहते फुर्सत नहीं। माया ने पवित्रता के पंख ही काट दिये हैं इसलिए जो कहते हमें फुर्सत नहीं वह हैं ऊंटपक्षी। तुम बच्चों को ऊंटपक्षी नहीं बनना है।

 
गीत: ओम् नमो शिवाए..  
 ओम् शान्ति।
 यह किसने कहा? अपने से प्रश्न पूछना है। ओम् का अर्थ मनुष्यों ने अनेक प्रकार का बनाया है। बाबा कहने से एक सेकेण्ड में वर्से के अधिकारी बन जाते हैं। बच्चा पैदा हुआ कहेंगे वारिस पैदा हुआ। फिर सगीर से बालिग होता है। यहाँ भी ऐसे है। बाबा को जाना, पहचाना और वर्से का मालिक बनें। यहाँ तो तुम बड़े हो ही। आत्मा को बाप का परिचय मिला, सेकेण्ड में बाप का वर्सा मिला। बच्चा पैदा होने से ही समझेंगे बाप की जायदाद का वर्सा पायेंगे। यह है बेहद का बाप। कहते हैं हे बच्चे, आत्मा ने जाना बाप आया हुआ है। तुम बच्चे जानते हो हम बाप से कल्प-कल्प राजधानी लेते हैं। जैसे तुम सेकेण्ड में विश्व के मालिक बन जाते हो। ओम् माना अहम्, मैं आत्मा यह मेरा शरीर। मैं आत्मा किसका बच्चा हूँ? परमात्मा का। बाप भी कहते हैं मैं ओम् परम आत्मा हूँ। मुझे अपना शरीर नहीं है। कितनी सहज बात है। वह समझते हैं ओम् माना भगवान। तो सब भगवान हो गये। भगवान तो है ही एक। वह कहते हैं मैं तुम्हारा बाप हूँ। परम आत्मा माना परमात्मा जिसको सारी दुनिया पुकारती है हे पतित-पावन आओ। ऐसे कोई भी नहीं कहेंगे कि परमपिता परमात्मा की आत्मा मेरे द्वारा तुमको राजयोग सिखलाती है। किसको पता ही नहीं है, मालूम होने कारण कृष्ण भगवान का नाम लिख दिया है। उसने राजयोग सिखलाया वा पतित-पावन उसको कह नहीं सकते। वह तो है स्वर्ग का पहला बच्चा। जो पहले में है वह पिछाड़ी में भी होगा, इसलिए उनको श्याम-सुन्दर कहते हैं। पहले नम्बर में है कृष्ण फिर 84 जन्मों के बाद उनका नाम ब्रह्मा एडाप्ट होता है। बाप आकर बच्चों को एडाप्ट करते हैं। तुम हो एडाप्टेड बच्चे, ईश्वर के बच्चे। तुम्हारी माँ भी है, बाप भी है, प्रजापिता भी है। फिर बाप कहते हैं इनके मुख से कहता हूँ - तुम मेरे बच्चे हो। तुम कहते हो बाबा हम आपके हैं, आपसे वर्सा लेने आये हैं। बुद्धि भी कहती है बाप आता जरूर है। कब आते हैं - यह भी विचार की बात है ना। कहते हैं पतित-पावन आओ तो जरूर पतित दुनिया का अन्त हो तब तो आऊं ना। इसको कहा जाता है कल्प की आदि और अन्त का संगम। अन्त में सब पतित हैं, आदि में हैं सब पावन। अन्त में पतित दुनिया का विनाश होता है, पावन दुनिया की स्थापना होती है। फिर वृद्धि को पाते जाते हैं। गाया भी जाता है ब्रह्मा द्वारा स्थापना। यह है त्रिमूर्ति। तुम जानते हो शिवबाबा के बच्चे सब ब्रदर्स हैं। फिर जब रचना होती है तब भाई-बहिन बनते हैं। मात-पिता क्यों कहते हो? भविष्य वर्सा लेने के लिए। लौकिक वर्सा होते हुए पारलौकिक वर्सा पाने का पुरूषार्थ करते हो। यह है कलियुग मृत्युलोक। सतयुग को अमरलोक कहते हैं। यहाँ तो मनुष्य अकाले मर पड़ते हैं। सतयुग है दैवी दुनिया। आदि सनातन देवी देवता धर्म रहता है। हिन्दू धर्म तो कोई है नहीं। आदमशुमारी जब निकलती है तो पूछते हैं आप किस धर्म के हो? हम कहते हैं हम ब्राह्मण धर्म के हैं तो वो लोग हिन्दू धर्म में लगा देंगे क्योंकि वह ब्राह्मण भी हिन्दू धर्म में जाते हैं। आर्य समाजी लोग जो हैं उनको हिन्दू धर्म में लगा दिया है। वास्तव में हिन्दू धर्म तो कोई है नहीं। यूरोप में रहने वालों को यूरोप धर्म वाला थोड़ेही कहेंगे। धर्म तो क्रिश्चियन है ना। क्राइस्ट ने क्रिश्चियन धर्म स्थापना किया। अच्छा हिन्दू धर्म किसने स्थापना किया? तो बिचारे मूँझ पड़ते हैं। कह देते हैं गीता द्वारा स्थापना हुआ। तो समझाया जाता है गीता के द्वारा तो आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना हुई। तुम तो देवता धर्म के हो। तो कहते हैं देवतायें तो बहुत पवित्र थे, हम तो पतित हैं। हम अपने को देवी-देवता कैसे कहलायें। तो समझाया जाता है अच्छा पवित्र बनो। फिर से देवी-देवता धर्म में जाओ, तो कहते हैं फुर्सत कहाँ। आपकी यह तो बहुत नई बातें हैं। बरोबर हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं। पूजते भी भारतवासी देवी देवताओं को हैं। जैसे क्रिश्चियन, क्राइस्ट को पूजते हैं। परन्तु पतित होने कारण अपने को देवता कहला नहीं सकते। अच्छा आकर पावन बनो तो कहते फुर्सत नहीं। बाप कहते हैं तुम तो ऊंटपक्षी हो। पूछा जाता है तुम देवता क्यों नहीं कहलाते तो कहते हैं हम पतित हैं। अच्छा पतित से पावन बनो तो कहते फुर्सत नहीं। ऊंटपक्षी को कहो उड़ो तो कहेगा पंख नहीं, ऊंट हूँ। बोलो, अच्छा सामान उठाओ तो कहेगा हम तो प्क्षी हूँ। तो बाप कहते हैं माया तुम्हारे पवित्रता के पंख काट देती है। अब सावन के महीने में शिव की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं। तुम्हारे लिए सावन मास है ज्ञान बरसात का। तुम पवित्र बन पवित्र दुनिया का मालिक बनते हो। मनुष्य व्रत रखते हैं भोजन खाने का। बाप कहते हैं विष नहीं खाओ। इस पर भी समझाना पड़ेगा। शिव को बहुत पूजते हैं, अब शिवबाबा कहते हैं पवित्रता का व्रत रखो। मैं आया हूँ पवित्र देवी-देवता धर्म स्थापना करने। यहाँ तो पावन कोई है नहीं। पवित्र देवी-देवता होते हैं सतयुग में। वह विष से पैदा नहीं होते। नहीं तो उनको सम्पूर्ण निर्विकारी क्यों कहते? लक्ष्मी-नारायण, राधे कृष्ण आदि को कहते ही हैं सम्पूर्ण निर्विकारी। यहाँ तो सब पतित हैं, जिनमें कोई गुण नहीं है। खुद कहते हैं हम पतित नींच हैं। बाप कहते हैं मेरी मत पर चलकर तुम सम्पूर्ण निर्विकारी बनो तो तुम इन लक्ष्मी-नारायण जैसा मालिक बनेंगे। तुम्हारी पढ़ाई कितनी भारी है। मनुष्य से देवता बनने का पुरूषार्थ करो। विश्व का मालिक बनना है। सतयुग में देवी-देवताओं का राज्य था ना। अब फिर से देवी-देवता धर्म की स्थापना हो रही है। तुम पवित्र बन स्वर्ग का वर्सा लेते हो। स्व माना आत्मा। आत्मा को राजाई मिलती है। उनको स्वराज्य कहा जाता है। मनुष्य तो हैं देह-अभिमानी। देह-अभिमान से कहते हैं हमारा राज्य। यहाँ तुम कहते हो हम आत्मा हैं, इस शरीर के मालिक हैं। हम महाराजा बनेंगे। हमको सतयुग में पवित्र शरीर मिलेगा। अभी तो पतित हैं। जैसे आत्मा वैसे शरीर। आत्मा में खाद पड़ी है। आत्मा पहले सच्चा सोना थी। गोल्डन एज कहा जाता था। फिर त्रेता आया तो सिल्वर की खाद पड़ी, फिर द्वापर में गये तो तांबा पड़ा। इस समय आत्मा झूठी तो शरीर भी झूठा। इसको कहा ही जाता है झूठ खण्ड़। अभी बाप के साथ योग रखने से अलाए निकल जायेगी, इसको योग अग्नि कहा जाता है। जेवर से किचड़ा निकालने के लिए आग में डाला जाता है। यह भी योग अग्नि है, जिसमें खाद भस्म हो और हम सच्चा सोना बन बाप के साथ चले जायेंगे। बाप कहते हैं तुम मेरे साथ चल पड़ेंगे। सतयुग में सच्चा सोना मिलेगा। अब कृष्ण को सांवरा क्यों कहते हैं? कृष्ण का नाम रूप तो बदल जाता है। अब बाप समझाते हैं तुम गोरे थे, तुम्हारे में खाद पड़ी है। अभी बिल्कुल आइरन एजेड बन पड़े हो। अब मैं सोनार हूँ बच्चों को भठ्ठी में डाल देता हूँ। भंभोर को आग लगेगी। सबके शरीर खत्म हो जायेंगे। आत्मा तो अविनाशी है। एक तो योग अग्नि से पवित्र बन जायेंगे, बाकी सब सजायें खाकर हिसाब-किताब चुक्तू कर फिर जायेंगे। यह ईश्वर की भठ्ठी है - सबको पावन बनाने लिए। यह है ज्ञान का सागर, उनसे तुम ज्ञान गंगायें निकली हो। फिर मनुष्यों ने उस पानी की गंगा को समझ लिया है। वहाँ देवता की मूर्ति भी रखी हुई है। वास्तव में तुम हो भगवान के बच्चे, ज्ञान गंगायें जो फिर देवता बनते हो। जब स्वर्ग में आयेंगे तब तुमको देवता कहेंगे। वहाँ आत्मा शरीर दोनों ही पवित्र हैं। अभी तो पतित हैं। भारत गोल्डन एजेड है फिर सिल्वर, कॉपर, आइरन एजेड बने हैं फिर गोल्डन एज में बाप ले जा रहे हैं। तुम्हारी आत्मा और शरीर दोनों ही पवित्र हो जाते हैं। बाप कहते हैं मैं धोबी भी हूँ। तुम्हारी आत्मा को धोने आता हूँ। सिर्फ बाप को ही याद करना है। बस योग में रहने से तुम विश्व के मालिक बन सकते हो। बाहुबल वाले विश्व के मालिक बन सकें। हाँ, उन्हों में इतनी ताकत है, अगर क्रिश्चियन दो भाई आपस में मिल जाएं तो विश्व के मालिक बन सकते हैं। परन्तु लॉ नहीं है। कहानी भी है दो बिल्ले आपस में लड़े और माखन बन्दर खा गया। तो वह दो लड़ते हैं बीच में माखन भारत को मिल जाता है, इसमें भी नम्बरवन है श्रीकृष्ण इसलिए कृष्ण के मुख में गोला दिखाते हैं। वह मक्खन नहीं, यह स्वर्ग का राज्य भाग्य श्रीकृष्ण को मिला। बाप समझाते हैं सब विनाश हो जायेगा फिर तुम मालिक बन जायेंगे। उसके पहले बाप की श्रीमत पर जरूर चलना पड़े। श्रीमत से श्रेष्ठ, आसुरी मत से भ्रष्ट बनते हो। यह है आसुरी पतित दुनिया। एक भी पावन नहीं। पावन दुनिया में एक भी पतित नहीं होता है। अभी तो सब पतित हैं। गाते भी हैं पतित-पावन सीताराम, हम सीतायें रावण की जेल में पड़ी हैं। पुकारती हैं हे राम आकर छुड़ाओ, पावन दुनिया में ले चलो। भल गाते हैं परन्तु जानते कुछ भी नहीं। जो आता सो कहते रहते। रावण ने बिल्कुल सुला दिया है। अब बाप आकर जगाते हैं। परमपिता परमात्मा, पतित-पावन जो सृष्टि का रचयिता, उनकी बायोग्राफी को हम जानते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और लक्ष्मी-नारायण की बायोग्राफी को भी हम जानते हैं। लक्ष्मी-नारायण के 84 जन्मों को भी हम जानते हैं। तो नॉलेजफुल हो गये ना। तुम कृष्ण के मन्दिर में जायेंगे तो समझेंगे यह सतयुग का पहला प्रिन्स था। अभी अन्तिम 84 वें जन्म में ब्रह्मा हुआ है। यह भी बहुत समझने की बातें हैं। बाप बच्चों को समझाते हैं - बच्चे खबरदार रहना, कभी किसको दु: नहीं देना। बाप तो दु: हर्ता, सुख कर्ता है ना। तुम भी 5 विकारों का दान देते हो। दे दान तो छूटे ग्रहण। ग्रहण लगता है तो फकीर लोग कहते हैं दे दान। अब बाप कहते हैं मेरे लाडले बच्चे, विकारों का दान दो तो सर्वगुण सम्पन्न बन देवता बन जायेंगे। दु: का ग्रहण छूट जायेगा। तुम सुखधाम के मालिक बन जायेंगे, इसलिए 5 विकारों का दान लिया जाता है। यह तो अच्छा है ना। अभी तुम्हारे ऊपर विकारों का ग्रहण लगने से एकदम काले बन पड़े हो। हम तुम्हारे से विकार ही मांगते हैं और कुछ नहीं मांगते। बाप समझाते हैं अब तुम बच्चों को आत्म-अभिमानी बनना है। मैं आत्मा हूँ, परमात्मा को याद करना है। वर्सा उनसे लेना है, इसलिए देही- अभिमानी बनो। देवतायें आत्म-अभिमानी बने हैं। अब मुझ बाप को याद करने से ही तुम्हारे पाप भस्म होंगे। हम रक्षा करेंगे। तुम मुझे याद ही नहीं करेंगे तो रक्षा क्या करेंगे। बाप कितना समझाते हैं यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। वह है भक्ति मार्ग की सामग्री। बाप तो तुम्हें सद्गति में ले जाने के लिए पढ़ाते हैं। मैं इस शरीर द्वारा तुमको समझाता हूँ। यह मेरा शरीर नहीं है। यह तो इनकी पुरानी जुत्ती है, लोन लिया है। मैं इनमें प्रवेश करता हूँ, फिर पावन बनाता हूँ। कितना अच्छी रीति बाप समझाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 धारणा के लिए मुख्य सार: 
1) बाप की श्रीमत पर चलकर सम्पूर्ण निर्विकारी बनना है। पढ़ाई से विश्व की राजाई लेनी है। आत्मा में जो खाद पड़ी है उसे योग अग्नि से निकालना है।
 2) आत्म-अभिमानी बन बाप को याद करना है जितना याद में रहेंगे उतना बाप रक्षा करता रहेगा।

 वरदान: सर्व प्राप्तियों को सामने रख श्रेष्ठ शान में रहने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान् भव

 हम सर्व श्रेष्ठ आत्मायें हैं, ऊंचे ते ऊंचे भगवान के बच्चे हैं-यह शान सर्वश्रेष्ठ शान है, जो इस श्रेष्ठ शान की सीट पर रहते हैं वह कभी भी परेशान नहीं हो सकते। देवताई शान से भी ऊंचा ये ब्राह्मणों का शान है। सर्व प्राप्तियों की लिस्ट सामने रखो तो अपना श्रेष्ठ शान सदा स्मृति में रहेगा और यही गीत गाते रहेंगे कि पाना था वो पा लिया...सर्व प्राप्तियों की स्मृति से मास्टर सर्वशक्तिमान् की स्थिति सहज बन जायेगी।

 

स्लोगन:-   योगी और पवित्र जीवन ही सर्व प्राप्तियों का आधार है।

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Details ( Page:- Murali Dtd 2nd Aug 2017 )
02-08-17

प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन

Mithe bacche - Tumhe pavitra rehne ka brat lena hai, baki nirjal rakhne, bhuk-hadtaal adi karne ki jaroorat nahi., pavitra bano to Biswa ka mallik ban jayenge.
Q- Is samay duniya me sabse acche kaun hain aur kaise?
A- Is duniya me is samay sabse acche garib hain kyunki garibo ko he Baap aakar milte hain. Sahookar to is gyan ko sunenge he nahi. Baap hai he garib niwaz. Garibo ko he sahookar banate hain.
 
Dharna ke liye mukhya saar :-
1)     Knowledge ko dharan karne ke liye dil badi saaf rakhni hai. Sacchi dil se Baap ki seva me lagna hai. Seva me kabhi bhi thakna nahi hai.
2)      Bayeda karna hai mera to ek Shiv baba, dusra na koi. Deha sahit deha ke sab jhoote sambandh chhod ek se sarv sambandh jodne hain. Garibo ka gyan dhan ka daan dena hai.
 
Vardaan- Controlling power dwara wrong ko right me parivartan karne wale Shrest Purusharthi bhava-
Details-----Shrest Purusharthi wo hai jo second me controlling power dwara wrong ko right me parivartan kar de. Aise nahi byarth ko control to karna chahte hain, samajhte bhi hain yah wrong hai lekin adha ghante tak wohi chalta rahe. Ise kahenge thoda-thoda adhin aur thoda-thoda adhikari. Jab samajhte ho ki yah satya nahi hai, ayathart wa byarth hai, to usi samay break laga dena- yahi Shrest Purusharth hai. Controlling power ka aarth yah nahi ki break lagao yahan aur lage wahan.
 
Slogan- - Apne swabhav ko saral bana do to samay byarth nahi jayega.
 
HINDI DETAILS MURALI - 02-08-17 प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन

मीठे बच्चे - तुम्हें पवित्र रहने का व्रत लेना है, बाकी निर्जल रखने, भूख-हड़ताल आदि करने की जरूरत नहीं, पवित्र बनो तो विश्व का मालिक बन जायेंगे
प्रश्न:- इस समय दुनिया में सबसे अच्छे कौन हैं और कैसे?
उत्तर: इस दुनिया में इस समय सबसे अच्छे गरीब हैं क्योंकि गरीबों को ही बाप आकर मिलते हैं। साहूकार तो इस ज्ञान को सुनेंगे ही नहीं। बाप है ही गरीब निवाज। गरीबों को ही साहूकार बनाते हैं।
 
गीत:आज के इंसान को....  
 
ओम् शान्ति।
 
बच्चों ने गीत सुना। वह दैवी प्यार जिसको ईश्वरीय प्यार कहें। अब ईश्वर प्यार सिखलाते हैं कि कैसे एक दो को प्यार करना चाहिए। भारत में कितना सच्चा प्यार था, जब सचखण्ड था। सचखण्ड किसने बनाया था? सतगुरू, सत बाबा, सत टीचर ने। अभी तुम किसके आगे बैठे हो? सच बाबा अर्थात् जो सच्चा सुख देने वाला है, सच्चा प्यार सिखाने वाला है। सच्चा ज्ञान देते हैं, उनके सम्मुख में बैठे हैं। झूठ खण्ड में तो सब झूठ हैं। गाया भी जाता है कि सत का संग करो। सत तो एक ही है। असत्य अनेक हैं। जो बाप भारत को स्वर्ग बनाते हैं, बेहद का वर्सा देते हैं, तुम उस बेहद बाप के सम्मुख बैठे हो। जो फिर से हमको बेहद की बादशाही देने आये हैं। सत बाबा एक ही है, जिसके संग से तुम विश्व के मालिक बनते हो। भक्ति में पहले-पहले एक ही शिवबाबा की सच्ची-सच्ची भक्ति होती है। उसको ही सच्ची अव्यभिचारी भक्ति कहा जाता है। बाबा बैठ तुम बच्चों को सारे चक्र का ज्ञान सुनाते हैं। पहले-पहले एक शिवबाबा की भक्ति थी जिसको अव्यभिचारी भक्ति कहते थे फिर अभी ज्ञान भी तुमको सच्चा सुनाते हैं। झूठी भक्ति से छुड़ाते हैं। सच्चे बाबा द्वारा तुम ज्ञान सुन रहे हो। तुम जानते हो यह सत का संग हमको स्वर्ग में ले जायेगा। सच्चे ज्ञान से ही बेड़ा पार होता है और जो झूठा ज्ञान सुनाते हैं उससे बेड़ा गर्क होता है। उसको अज्ञान कहा जाता है। सच्चा ज्ञान सिर्फ बाप ही सुनाते हैं। तुम बच्चे सारे चक्र की हिस्ट्री-जॉग्राफी को समझ गये हो। तो यह सच्चा-सच्चा बाबा, सच्चा-सच्चा टीचर है। सतयुग में भी सच्चा बाप कहेंगे क्योंकि वहाँ झूठ होता ही नहीं। ईश्वर को सर्वव्यापी नहीं कहते। झूठ तो तब शुरू होता है जब झूठ बनाने वाले 5 विकार आते हैं। अभी तुम बच्चों की बुद्धि में है कि हम बेहद के निराकार बाप के सम्मुख बैठे हैं। यह बाबा भी कहते हैं कि हम उस बाबा के सम्मुख बैठे हैं। उनको याद करता हूँ। घड़ी-घड़ी याद करता हूँ। बाबा का बच्चा हूँ ना। तुमको तो इस साकार को छोड़ उनको याद करना है। हमारे लिए तो एक ही बाबा है। तुम्हारे लिए थोड़ी अटक पड़ती है, मुझे क्यों अटक पड़ेगी। तुम्हारी नजर इस पर जाती है, मेरी नजर किस पर जायेगी? मेरा तो डायरेक्ट शिवबाबा से कनेक्शन हो गया। तुमको शिवबाबा को याद करना पड़ता है। इस साकार को क्रास करना पड़ता है कि यह याद पड़े, मेरे लिए तो एक शिवबाबा ही है। तुम्हारे सामने दो बैठे हैं। हमारे सामने तो सिर्फ एक ही है। मैं उनका बच्चा हूँ। फिर भी निरन्तर याद नहीं कर सकता हूँ क्योंकि बाबा कहते हैं - तुम कर्मयोगी हो। तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र फिरता रहत् है। सतयुग त्रेता में इतने जन्म पास किये फिर इतने जन्म लेते-लेते 84 जन्मों का चक्र पूरा किया। हिसाब है ना। अब कलियुग का अन्त गया फिर आगे नया चक्र फिरेगा। हिस्ट्री-जॉग्राफी फिर से रिपीट होती है। सतयुग में कौन थे, कहाँ पर राज्य करते थे। यह भी तुम जानते हो कि सारी विश्व पर देवतायें ही राज्य करते थे। अभी तो कहेंगे तुम हमारी हद में नहीं आओ, हमारा पानी लो। बाबा तो बेहद का मालिक है। बाबा कहते हैं मुझे याद करो। यह बाबा नहीं कहते। इन द्वारा निराकार बाबा तुम आत्माओं को कहते हैं मुझे याद करो तो तुम कभी रोगी वा बीमार नहीं होंगे। यहाँ तो बाप बच्चों को पैदा कर बड़ा करते हैं फिर अचानक अगर वह मर जाते हैं (शरीर छोड़ देते हैं) तो सब कितने दु:खी हो पड़ते हैं। फिर तो शरीर निर्वाह अर्थ खुद ही सर्विस करनी पड़े। यह तो है ही दु:खधाम। बाप तो तुम्हें कोई तकलीफ नहीं देते हैं। सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश हो जायेंगे। बाप और वर्से को याद करो। बच्चा जानता है कि बाप से हमको वर्सा मिलना है तो भी अपना धन्धाधोरी जरूर सीखते हैं। वर्से के लिए बैठ तो नहीं जायेंगे। बाकी सिर्फ जो राजाई में जन्म लेते हैं वह वर्से के लिए बैठते हैं। बहुत दान-पुण्य करने से राजाई घर में जन्म मिलता है। राजाई ही सम्भालनी पड़े। वह राजायें तो पतित हैं। अब तुम्हें पावन राजाओं के पास जन्म लेना है। लक्ष्मी-नारायण के घर में वा सूर्यवंशी की राजाई में जन्म लेना है, वहाँ कोई प्रकार का दु: होता नहीं। सभी दु:खों से छूट जाते हो। बाबा आकर धीरज देते हैं। अभी यह अन्तिम जन्म है। तुम्हारी तो जन्मजन्मान्तर से यह हालत होती आई है। बच्चे गिरते ही आये हैं दु:खधाम में, सुखधाम कहाँ से आये। यहाँ तो दु: बहुत है, सुख अल्पकाल का है। भल बड़े बड़े आदमी हैं, उन्हों को भी दु: ही दु: है। इस समय जो गरीब हैं वह सबसे अच्छे हैं। बाबा आये ही हैं गरीबों को साहूकार बनाने। दान भी गरीबों को करना होता है। सब साधारण हैं ना। बाकी जो लखपति हैं, जिनके पास करोड़ों रूपया है, कितना भी उन्हें समझाओ फिर भी अपने धन की कितनी मगरूरी रहती है। बाबा कहते हैं ऐसे को क्या धन देना है। मैं तो हूँ ही गरीब निवाज। ऐसी कन्यायें मातायें ही ज्ञान लेती हैं। कन्या का कितना मान है, सब उसे पूजते हैं फिर शादी करने से पुजारी बन जाती है। हम आधाकल्प पूज्य फिर आधाकल्प पुजारी बने हैं। कन्या तो इस जन्म में ही पुजारी बन जाती है। कितना पावन है, शादी करने से ही पुजारी पतित बन जाती है। पति को परमेश्वर समझ माथा टेकती रहती है। उनके आगे दासी बनकर रहती है। तो बाबा आकर दासीपने से छुड़ाते हैं। बच्चे वृद्धि को पाते जाते हैं। तुम समझा सकते हो हम प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे शिवबाबा के पोत्रे हैं। उनकी मिलकियत पर हमारा हक लगता है। उनकी मिलकियत है बेहद की। विश्व का मालिक बनाते हैं। उनका फरमान है बच्चे मामेकम् याद करो तो मैं सत्य कहता हूँ तुम नारी से लक्ष्मी बन जायेंगी। इसमें कोई व्रत नेम करना, भूखा रहना नहीं है। आगे तुम बहुत व्रत-नेम रखते थे। 7 रोज खाना नहीं खाते थे। समझते हैं व्रत नेम रखने से कृष्णपुरी में चले जायेंगे। वास्तव में सच्चा व्रत है पवित्र रहने का। वह तो हठ से भूखे रहते हैं। तुम बच्चों को कुछ भी भूख हड़ताल आदि नहीं करना है। हाँ, तुमको पावन बनने की ही हड़ताल करनी है। हम सबको पावन बनायेंगे। तुम्हारा धन्धा ही यह है। बाकी निर्जल रहना, खाना नहीं खाना इससे कुछ होता नहीं है। तुम सिर्फ पवित्रता की प्रतिज्ञा करो। माताओं को पति के मरने से बहुत दु: होता है। उन्हों को जाकर समझाना चाहिए कि अब पतियों का पति आया हुआ है। वह कहते हैं सिर्फ मुझे याद करो तो स्वर्ग के मालिक बनेंगे। यह तो पतियों का पति, बापों का बाप है। पति मर जाए तो स्त्री को ज्ञान समझाए शिवबाबा से सगाई करानी चाहिए। समझाना है कि तुम रोती क्यों हो, सतयुग में कोई रोते नहीं हैं। यहाँ देखो सब रोते रहते हैं। भारत में सच्चा-सच्चा देवताओं का राज्य था। आज तो एक दो को मारते कूटते रहते हैं। आसुरी राज्य है ना। लक्ष्मी-नारायण का चित्र बहुत अच्छा है। इसमें सारा सेट है। त्रिमूर्ति, लक्ष्मी-नारायण, राधे कृष्ण भी हैं, यह चित्र भी अगर कोई रोज देखता रहे तो याद रहे कि शिवबाबा हमको ब्रह्मा द्वारा यह बना रहे हैं। घर में भी छोटे-छोटे बोर्ड बनाकर लिख दो। बेहद के बाप को जानने से तुम 21 जन्मों के लिए स्वराज्य पद पा सकते हो। धीरे-धीरे बहुत मनुष्य बोर्ड देखकर तुम्हारे पास आयेंगे। तुम रूहानी अविनाशी सर्जन हो। रूहानी सर्जरी का कोर्स पास कर रहे हो, बोर्ड लगाना पड़ेगा। बोलो, इस बाप को याद करने से तुमको बेहद की बादशाही मिलेगी। बाबा ने प्रश्न बहुत अच्छे लिखे हैं। बाबा के कितने रूहानी बच्चे हैं? बालब चड़े वाला है ना। इसमें भाई-बहन दोनों जाते हैं। बाबा के पास आते हैं तो समझाता हूँ - कितने बी.के. हैं। कितना बचड़े वाला हूँ। बच्चे वृद्धि को पाते जाते हैं। तुम समझा सकते हो हम भाई-बहन हैं - विकार की दृष्टि जा नहीं सकती है। बाप कहते हैं देह सहित देह का झूठा सम्बन्ध छोड़ मुझे याद करो तो तुम पावन बन जायेंगे। तुम अंजाम भी करते आये हो मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा कोई। बुढि़याँ भी यह दो अक्षर याद कर लें तो बहुत कल्याण हो सकता है। हमने 84 जन्म लिये हैं। अभी हम ब्राह्मण बने हैं फिर देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनेंगे। ब्राह्मण जरूर बनना है और बनेंगे भी जरूर कल्प पहले मुआिफक। ढेर के ढेर बनेंगे। अभी ब्राह्मण बच्चे जो विलायत आदि तरफ हैं, वह भी निकल आयेंगे। याद तो करते रहते हैं। बाबा कहते हैं - अपने कुटुम्ब परिवार में रहते अपने को आत्मा समझो। शिवबाबा का पोत्रा अपने को समझो। हम ब्राह्मण सो देवता बनेंगे। कलियुग में मनुष्य हैं, सतयुग में बनेंगे देवतायें। कलियुग में सब आसुरी मनुष्य हैं। अभी तुम दैवी सम्प्रदाय के बन रहे हो। यह बाप ही बतलाते हैं, दूसरा कोई बतला सके। इन वर्णों को कोई जानते ही नहीं है। तुम ब्राह्मण ही नॉलेज समझा सकते हो। जब तक कोई तुम बी.के. द्वारा ज्ञान लेवे तब तक समझ नहीं सकते। तुम ही दे सकते हो, इसमें दिल बड़ी साफ चाहिए, दिल साफ मुराद हांसिल। कोई-कोई की दिल साफ नहीं होती है, सच्ची दिल से सच्चे बाप की सेवा में लग जाना चाहिए। हॉबी होनी चाहिए। हमारा काम है समझाना। यह भी जानते हो 108 से माथा मारेंगे तो कहीं एक की बुद्धि में बैठेगा। एक दो निकल आयेंगे, जो कल्प पहले निकले होंगे। बी.के. बना होगा वही आयेगा। थकना नहीं है। तुम मेहनत करते रहो। कोई कोई निकल ही पड़ेगा। कहाँ भी जाओ मित्र-सम्बन्धी के पास जाओ, शादी-मुरादी में जाओ - हर एक के कर्मों अनुसार राय दी जाती है। मुख्य है पवित्र रहने की बात। कहाँ बाहर खाना भी पड़ता है। अच्छा बच्चे, शिवबाबा की याद में रहेंगे तो माया का असर नहीं होगा। बाबा सबको छुटटी नहीं देते हैं। लाचारी हालत में देखा जाता है। नहीं तो नौकरी छूट जायेगी। हर एक को अलग-अलग राय दी जाती है। दुनिया बहुत खराब है। कइयों के साथ रहना होता है। एक कहानी भी है। गुरू ने चेले को कहा शेर की गुफा में रहो। वेश्या के पास रहो... परीक्षा लेने भेजा। वास्तव में वह कोई परीक्षा नहीं। यह तुम बच्चों के लिए है। तुमको शेर के पास तो नहीं भेजेंगे। बाप तो समझाते हैं कोई भी हो उन्हों को बाप का परिचय दो। दिन-प्रतिदिन बुद्धि का ताला खुलता जायेगा। झाड़ बढ़ना तो है ना, तब तो विनाश भी शुरू हो इनसे पहले विनाश तो हो सके। यहाँ तो राजधानी स्थापना हो रही है। बाप तो कहते हैं सिर्फ मुझे याद करो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार1) नॉलेज को धारण करने के लिए दिल बड़ी साफ रखनी है। सच्ची दिल से बाप की सेवा में लगना है। सेवा में कभी भी थकना नहीं है।
2) वायदा करना है मेरा तो एक शिवबाबा, दूसरा कोई। देह सहित देह के सब झूठे सम्बन्ध छोड़ एक से सर्व सम्बन्ध जोड़ने हैं। गरीबों को ज्ञान धन का दान देना है।
 
वरदानकन्ट्रोलिंग पावर द्वारा रांग को राइट में परिवर्तन करने वाले श्रेष्ठ पुरुषार्थी भव
श्रेष्ठ पुरुषार्थी वह हैं जो सेकण्ड में कन्ट्रोंलिंग पावर द्वारा रांग को राइट में परिवर्तन कर दे। ऐसे नहीं व्यर्थ को कन्ट्रोल तो करना चाहते हैं, समझते भी हैं यह रांग हैं लेकिन आधा घण्टे तक वही चलता रहे। इसे कहेंगे थोड़ा-थोड़ा अधीन और थोड़ा-थोड़ा अधिकारी। जब समझते हो कि यह सत्य नहीं है, अयथार्थ वा व्यर्थ है, तो उसी समय ब्रेक लगा देना-यही श्रेष्ठ पुरूषार्थ है। कन्ट्रोलिंग पावर का अर्थ यह नहीं कि ब्रेक लगाओ यहाँ और लगे वहाँ।

स्लोगन:अपने स्वभाव को सरल बना दो तो समय व्यर्थ नहीं जायेगा।

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Details ( Page:- Murali Dtd 3rd Aug 2017 )
03-08-17

प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन

Mithe bacche - Tumhe ab light house banna hai, tumhari ek aankh me Muktidham, dusri aankh me jeevan Muktidham hai, tum sabko raasta batate raho.
Q- Abinashi pad ka khaata jama hota rahe, uski biddhi kya hai?
Ans- Sada buddhi me Swadarshan chakra firta rahe. Chalte- firte apna Shantidham aur Sukhdham yaad rahe to ek taraf bikarm binash honge dusre taraf abinashi pad ka khaata bhi jama hota jayega. Baap kehte hain tumhe light house banna hai ek aankh me Shantidham, dusri aankh me Sukhdham rahe.
 Dharna ke liye mukhya saar
 1)      Baap ka wa padhai ka kadar rakhna hai. Samay prati samay swayang ko refresh karne ki yuktiyan nikaalni hai. Bahuto ke kalyan ke nimitt banna hai.

2)      Aapas me gyan ki he baatein karni hai. Krodh ka aansh bhi nikaal dena hai. Koi kadwa sabd bole to suna na suna kar dena hai.
 
Vardaan Apne chehre aur chalan se roohani royalty ka anubhav karane wale Sampoorn Pavitra bhava
Details------Roohani royalty ka foundation Sampoorn Pavitrata hai. Sampoorn purity he royalty hai. Is roohani royalty ki jhalak pavitra aatma ke swaroop me dikhayi degi. Yah chamak kabhi chhip nahi sakti. Koi kitna bhi swayang ko gupt rakhe lekin unke bol, unka samband-sampark, roohani byabahar ka prabhav unko pratyaksh karega. To har ek knowledge ke darpan me dekho ki mere chehre par, chalan me wo royalty dikhayi deti hai wa sadharan chehra, sadharan chalan hai?
Slogan:-- Sada Parmatm palana ke andar rehna he bhagyavan banna hai.
 
मीठे बच्चे - तुम्हें अब लाइट हाउस बनना है, तुम्हारी एक आंख में मुक्तिधाम, दूसरी आंख में जीवन मुक्तिधाम है, तुम सबको रास्ता बताते रहो
 
प्रश्न:अविनाशी पद का खाता जमा होता रहे, उसकी विधि क्या है?
उत्तर:सदा बुद्धि में स्वदर्शन चक्र फिरता रहे। चलते-फिरते अपना शान्तिधाम और सुखधाम याद रहे तो एक तरफ विकर्म विनाश होंगे दूसरे तरफ अविनाशी पद का खाता भी जमा होता जायेगा। बाप कहते हैं तुमको लाइट हाउस बनना है एक आंख में शान्तिधाम, दूसरी आंख में सुखधाम रहे।
 
गीत:जाग सजनियां जाग...  
 
ओम् शान्ति।
 मीठे-मीठे बच्चों ने मीठा-मीठा गीत सुना! अब जो गाने वाले हैं वह तो जरूर कोई फिल्म के होंगे। ज्ञान के बारे में, देवताओं के बारे में वा परमात्मा के बारे में जो कुछ भी गाते हैं वह उल्टा ही गाते हैं। इसको कहा ही जाता है उल्टी दुनिया। अल्लाह बैठ समझाते हैं तुम तो माया की फाँसी पर लटके हुए थे। माया ने सब बच्चों को उल्लू बना दिया है। उनको उल्टा लटका दिया है। बाप आकर बच्चों को सुल्टा बनाते हैं। गीत कितना अच्छा है। यह कौन कहते हैं जाग सजनियां..... और तो कोई कह सके - सारी दुनिया की सजनियों के लिए, जाग सजनियां अब नवयुग आया। दुनिया में कोई ऐसा मनुष्य नहीं होगा जो यह जानता हो। माया ऐसी है जो कितना भी समझाओ तो भी समझते नहीं हैं। तुम बच्चे जानते हो अब नया युग, नये देवताओं की बादशाही स्थापना हो रही है। यह भी समझते हो कलियुग के बाद जरूर सतयुग आना है। तो इससे सिद्ध होता है कि भगवान को भक्तों के पास आना ही है। भगत चाहते भी हैं भगवान से मिलें। तो समझना चाहिए कि भगवान बरोबर आयेगा। आधाकल्प भगत तड़फते हैं तो कुछ तो देंगे ना। भगत जानते हैं भगवान जीवनमुक्ति देते हैं। वह पतित-पावन ही सबको पावन बनायेंगे। तुम बच्चे जान गये हो सब आत्मायें पावन कब बनती हैं। सतयुग में तुम पावन रहते हो। बाकी सब आत्मायें निर्वाणधाम में रहती हैं। तुम पावन युग में आते हो, निर्वाणधाम को युग नहीं कहेंगे। वह तो इन युगों से पार है। ऐसी-ऐसी बातें तुम बच्चों की बुद्धि में हैं। बरोबर हम परमधाम में रहते हैं। युग यहाँ होते हैं सतयुग त्रेता... यह नाम ही यहाँ के हैं। विनाश भी गाया हुआ है। त्रिमूर्ति भी दिखाते हैं। वो लोग त्रिमूर्ति के नीचे लिखते हैं - सत्य मेव जयते... यह रूहानी गवर्मेन्ट है ना। नान-वायोलेन्स शक्ति सेना भी गाया हुआ है। परन्तु सिर्फ नाम मात्र। तो तुम्हारा भी कोट आफ आर्मस होना चाहिए। तुम ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के नीचे लिख सकते हो सत्य मेव जयते। बच्चों की बुद्धि में आना चाहिए कि हम पाण्डव गवर्मेन्ट के बच्चे हैं। प्रजा अपने को बच्चा ही समझती है। तो यह बुद्धि में आना चाहिए कि कैसे कोट आफ आर्मस बनायें। यह है ही ब्लाइन्ड फेथ की दुनिया, जो देखते रहेंगे, सबको भगवान कहते रहेंगे। तो अन्धश्रद्धा हुई ना। कण कण में भगवान कह देते हैं। वास्तव में जो भी मनुष्य मात्र हैं सबका पार्ट अलग- अलग है। आत्मा शरीर धारण कर पार्ट बजाती है। ऐसे थोड़ेही कह देंगे कि सब भगवान ही भगवान हैं। तो क्या भगवान ही लड़ते झगड़ते रहते हैं। यह तो है 100 परसेन्ट अन्धश्रद्धा। नया मकान बनता है तो कहेंगे 100 परसेन्ट नया। पुराने को कहेंगे 100 परसेन्ट पुराना। नया भी भारत था, अब तो पुरानी दुनिया है। कितने अनेक धर्म हैं। रात-दिन का फर्क है ना। जरूर सतयुग में सुख ही सुख था, देवतायें राज्य करते थे। अभी तो इस पुरानी दुनिया में दु: ही दु: है। अभी कितना दु: होता है सो तुम आगे चल देखेंगे। गाया हुआ है मिरूआ मौत मलूका... उन्हों ने सिर्फ लिख दिया है - समझते कुछ भी नहीं। मनुष्यों को मारने में किसको तरस थोड़ेही आता है। ऐसे ही कोई कुछ कर दे तो पुलिस केस कर दे। यह देखो कितने बाम्ब्स आदि बनाकर एक दो को मारते रहते हैं, रोज लिखते रहते हैं फलाने-फलाने स्थान पर इतने मरे। उन्हों पर केस करें, यह किसकी बुद्धि में भी नहीं है। अभी तुम जानते हो, यह है पुरानी पाप की दुनिया। सतयुग है नई दुनिया। सतयुग त्रेता में कोई किसको दु: नहीं देते। नाम ही है स्वर्ग, हेविन, बहिश्त... हिस्ट्री में भी पढ़ते हैं। वहाँ तो अथाह धन था - जो मन्दिरों से भी लूटकर ले गये हैं। तो जिन्होंने मन्दिर बनाये होंगे वह कितने धनवान होंगे। सोने की द्वारिका दिखाते हैं ना। कहते हैं समुद्र के नीचे चली गई। यह तो तुम समझते हो - ड्रामा का चक्र कैसे फिरता है। सतयुग नीचे हो कलियुग ऊपर जाता है। यह चक्र फिरता है। चक्र का ज्ञान भी तुमको है। चक्र भी बहुत लोग बनाते हैं। परन्तु आयु का किसको पता नहीं है। रीयल चक्र तो कोई बता सके। तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र है इसलिए कहा जाता है - स्वदर्शन चक्र फिराते रहो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। यह है ज्ञान की बात। तुम जानते हो हम स्वदर्शन चक्र फिराते रहते हैं, इससे हमारे विकर्म विनाश होते जायेंगे और दूसरे तरफ अविनाशी पद का खाता जमा होता जायेगा। फिर भी कहते हैं कि हम स्वदर्शन चक्र घुमाना भूल जाते हैं। बाप कहते हैं तुमको लाइट हाउस बनना है, लाइट हाउस रास्ता दिखाते हैं ना। तुम्हारी एक आंख में शान्तिधाम और एक आंख में सुखधाम है। दु:खधाम में तो बैठे हो। तुम लाइट हाउस हो ना। तुम्हारा मन्त्र ही है मनमनाभव, मध्याजी भव, शान्तिधाम और सुखधाम। औरों को भी रास्ता बताते हो। यह चक्र फिराते रहते हो। चलते-फिरते यही बुद्धि में रहे - शान्तिधाम और सुखधाम। ऐसी अवस्था में बैठे-बैठे किसको साक्षात्कार हो सकता है। कोई सामने आते ही साक्षात्कार कर सकते हैं। हमारा काम ही है यहाँ। वहाँ तो कुछ है नहीं। तो तुम बच्चों को अब यह प्रैक्टिस करनी है, हम रास्ता बताने वाले लाइट हाउस हैं और अभी खड़े हैं दु:खधाम में। यह तो सहज है ना। लाइट हाउस वा स्वदर्शन चक्र बात तो एक ही है। परन्तु इसमें (चक्र में) डिटेल आता है। उसमें सिर्फ दो बातें हैं सुखधाम और शान्तिधाम। अल्फ - मुक्तिधाम। बे - जीवनमुक्तिधाम। कितना सहज है। जहाँ से हम आत्मायें आती हैं वह है शान्तिधाम। साइंस को जानने वाले या नेचर को मानने वाले इन बातों को नहीं समझेंगे। बाकी देवताओं को मानने वाले समझेंगे। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जाना तो बहुत अच्छा है। देखो, यह सुखधाम सतयुग के मालिक थे ना। अभी तो है कलियुग। थे तो वह भी मनुष्य। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था ना। कब गीता सुनी है? लक्ष्मी-नारायण के वा राधे कृष्ण के मन्दिर में जो आते हैं, वह गीता भी सुनते होंगे। जिनका कृष्ण में प्यार होगा उनका गीता में भी प्यार होगा। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जाने वाले होंगे तो उन्हों को गीता इतनी ख्याल में नहीं आयेगी। लक्ष्मी-नारायण के लिए समझते हैं वह तो वैकुण्ठ में थे। अभी तो नर्क है। बाप आते ही हैं नर्क में, आकर स्वर्ग की स्थापना करते हैं। बाप कहते हैं मुझे याद करो और सुखधाम-शान्तिधाम को याद व्रो तो बेड़ा पार हो जायेगा। पहले तो जरूर घर जाना है। अच्छा कोई श्रीकृष्ण को मानने वाला है, बोलो कृष्ण तो सतयुग में था ना। नई दुनिया को याद करो। इस पुरानी दुनिया से नाता तोड़ो। पवित्र भी जरूर बनना है। वहाँ कोई अपवित्र होता नहीं। किसी भी प्रकार की युक्तियां रचनी चाहिए। बच्चे लिखते हैं सर्विस कम है, ठण्डाई है। बाप कहते हैं ठण्डाई बच्चों की है, सेवा तो बहुत हो सकती है। मन्दिर कितने ढेर हैं। बाप कहते हैं मेरे भक्तों को ज्ञान दो। तुम भी भगत थे ना। अब श्रीकृष्णपुरी का मालिक बनते हो। कृष्णपुरी वैकुण्ठ को याद करेंगे, वैकुण्ठ रामराज्य को नहीं कहेंगे। लक्ष्मी-नारायण के राज्य को ही वैकुण्ठ कहेंगे। तुम जब समझायेंगे तो कहेंगे बात तो ठीक है। तुम्हारे इन चित्रों में बड़ा ज्ञान भरा हुआ है। जो ध्यान से इन चित्रों को देखेगा तो झट नमस्कार करेगा। तुमको नहीं करेगा। वास्तव में नमस्कार करना चाहिए तुमको क्योंकि तुम ही ऐसा बनने वाले हो इसलिए ब्राह्मण कुल उत्तम है। तुम मेहनत कर ऐसा देवता बनते हो। पहले हैं ईश्वरीय सन्तान। गायन भी इस समय का है। मनुष्य अक्लमंद होते तो लक्ष्मी-नारायण का बर्थ डे मनाते। उन्हों को पता ही नहीं है, सिर्फ लक्ष्मी से जाकर धन मांगते हैं। अरे उन्हों की जन्मपत्री को तो जानो। वह कब आये थे, उनको यह भी पता नहीं। विष्णु को 4 भुजा दिखाते हैं अर्थात् लक्ष्मी-नारायण का कम्बाइन्ड रूप है। लक्ष्मी-नारायण की पूजा करते हैं परन्तु उनकी जीवन कहानी को तो जानते नहीं। वह कहाँ के मालिक हैं। सूक्ष्मवतन के मालिक तो नहीं हैं, उनको विष्णुपुरी नहीं कहा जायेगा। सूक्ष्मवतन में पुरी है नहीं। लक्ष्मीनारा यण के राज्य को पुरी कहेंगे फिर राम सीता की पुरी, बाकी राधे कृष्ण का कुछ दिखाते नहीं हैं। द्वापर में तो इस्लामी, बौद्धी आदि आते हैं। तो तुम बच्चों को डीटेल में समझाना पड़े। स्वर्ग को भी याद करते हैं। कोई बड़ा आदमी मरता है तो कहेंगे वैकुण्ठ गया। तो जरूर नर्क में था तब तो स्वर्ग में गया। इस समय सब नर्कवासी पतित हैं। नशा कितना रहता है! दिखाते हैं हम करोड़पति हैं। परन्तु हैं तो सब नर्कवासी। नर्कवासी, स्वर्गवासियों को माथा टेकते हैं। तुम बच्चे ही यथार्थ समझा सकते हो। तुम भी जानी-जाननहार के बच्चे हो। तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र डिटेल में फिरता रहता है। घर में जाने से, सम्बन्धियों का मुँह देखने से सब कुछ भूल जाता है, इसलिए कॉलेज के साथ-साथ हॉस्टल रहती है। तुम्हारा यहाँ हॉस्टल भी है। यहाँ तुम पढ़ाई में रहते हो, बुद्धि और गोरखधन्धे में जायेगी नहीं। स्टूडेन्ट के साथ ज्ञान की बातें होती हैं। हॉस्टल में रहने से बहुत फर्क रहता है। बाप के पास तो जल्दी-जल्दी रिफ्रेश होने के लिए आने चाहिए। ऐसे मत समझो दक्षिणा देनी पड़ेगी। ऐसे को हम मूर्ख समझते हैं। बाबा तो दाता है। देने का ख्याल कभी नहीं करना है। यहाँ सर्विसएबुल बच्चों को ही रिफ्रेश होना है। तुम बच्चे आते हो बाबा के पास। ऐसे नहीं, कोई साधू महात्मा के पास आते हो, दक्षिणा देनी है, कभी ऐसे ख्याल नहीं करना। बच्चियां आती हैं उन्हों के पास पैसे हैं क्या? उनको सब कुछ सर्विस स्थान से मिलता है। जिनको अपना भाग्य बनाना होता है वह अपना पुरूषार्थ करते हैं। बाकी तो सब हैं बहाने, नौकरी है, यह है, छुट्टी मिल सकती है। कोई भी कारण बताए छुट्टी ले सकते हैं। यह कोई झूठ थोड़ेही है। इन जैसा सच तो कोई है नहीं। परन्तु बाप का इतना कदर नहीं हैं। कितना भारी खजाना मिलता है। बाबा तो कोई दूर नहीं है। कहाँ भी रहते हो, अपनी उन्नति के लिए रिफ्रेश होने जाना है। रिफ्रेश होने से बहुतों का कल्याण कर सकते हो। तुमको तो सर्विस करनी है। यह है बुद्धियोग बल। वह है बाहुबल। यहाँ हथियार आदि कुछ नहीं हैं। किसी को दु: नहीं देना है। सबको सुख का रास्ता दिखाना है। सतयुग और कलियुग में रात-दिन का फर्क है। आधाकल्प लग जाता है रावण राज्य को। तुम बच्चे सुखधाम की स्थापना करने वाले हो। कभी कोई कडुवा शब्द नहीं बोलना चाहिए। सुना सुना कर देना चाहिए। सुनते हैं तो फिर बोलने भी लग पड़ते हैं। क्रोध का अंश भी बहुत नुकसान कर देता है। किसको क्रोध करना यह भी दु: देना है। बाप कहते हैं दु: देंगे तो दु:खी होकर मरेंगे, बहुत सजायें खानी पड़ेंगी। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार1) बाप का पढ़ाई का कदर रखना है। समय प्रति समय स्वयं को रिफ्रेश करने की युक्तियां निकालनी है। बहुतों के कल्याण के निमित्त बनना है।
2) आपस में ज्ञान की ही बातें करनी हैं। क्रोध का अंश भी निकाल देना है। कोई कडुवा शब्द बोले तो सुना सुना कर देना है।
 
वरदान: अपने चेहरे और चलन से रूहानी रॉयल्टी का अनुभव कराने वाले सम्पूर्ण पवित्र भव
रूहानी रॉयल्टी का फाउण्डेशन सम्पूर्ण पवित्रता है। सम्पूर्ण प्योरिटी ही रॉयल्टी है। इस रूहानी रॉयल्टी की झलक पवित्र आत्मा के स्वरूप से दिखाई देगी। यह चमक कभी छिप नहीं सकती। कोई कितना भी स्वयं को गुप्त रखे लेकिन उनके बोल, उनका संबंध-सम्पर्क, रूहानी व्यवहार का प्रभाव उनको प्रत्यक्ष करेगा। तो हर एक नॉलेज के दर्पण में देखा कि मेरे चेहरे पर, चलन में वह रॉयल्टी दिखाई देती है वा साधारण चेहरा, साधारण चलन है?

स्लोगन: सदा परमात्म पालना के अन्दर रहना ही भाग्यवान बनना है।

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Details ( Page:- Murali Dtd 4th Aug 2017 )
04-08-17

प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन

 
Mithe bacche - Tum is behad leela roopi natak ko jaante ho, tum ho hero part dhari tumhe Baap ne aakar abhi jagrut kiya hai.
Q- Baap ka farmaan kaun sa hai? Jise palan karne se bikaro ki pidha se bach sakte hain?
Ans- Baap ka farmaan hai - pehle 7 roz bhatti me baitho. Tum baccho ke paas jab koi aatma 5 bikaro se pidhit aati hai to usey bolo ki 7 roz ka time chahiye. Kam se kam 7 roz do to tumhe hum samjayen ki 5 bikaro ki bimari kaise door ho sakti hai. Jasti prashna-uttar karne walo ko tum bol sakte ho ki pehle 7 roz ka course karo.
Dharna ke liye mukhya saar:=
1) Kisi bhi baat me sansay nahi uthana hai. Drama ko sakshi ho dekhna hai. Kabhi bhi apna register kharab nahi karna hai.
2) Karmathit abastha tak pahunchne ke liye yaad me rehne ka poora purusharth karna hai. Sachche dil se Baap ko yaad karna hai. Apni sthiti ka temperature apne ap dekhna hai.
 
Vardaan- Sampannta ke aadhar par santoosta ka anubhav karne wale sada Trupt Aatma bhava
Details--Jo sada bharpoor wa sampann rehte hain, way Trupt hote hain. Chahe koi kitna bhi asantoost karne ki paristhitiyan unke agey laaye lekin sampann, Trupt Aatma asantoost karne wale ko bhi santoost ka goon sahayog ke roop me degi. Aisi Aatma he rahamdil ban subh bhavana aur subh kamana dwara unko bhi parivartan karne ka prayatna karegi. Roohani royal aatma ka yahi shrest karm hai.
Slogan- Yaad aur seva ka double lock lagao to maya aa nahi sakti.
 
HINDI MURALI DETAILS - 04-08-17 प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन
मीठे बच्चे - तुम इस बेहद लीला रूपी नाटक को जानते हो, तुम हो हीरो पार्टधारी तुम्हें बाप ने आकर अभी जागृत किया है
प्रश्न:बाप का फरमान कौन सा है? जिसे पालन करने से विकारों की पीड़ा से बच सकते हैं?
उत्तर:बाप का फरमान है - पहले 7 रोज भठ्ठी में बैठो। तुम बच्चों के पास जब कोई आत्मा 5 विकारों से पीडित आती है तो उसे बोलो कि 7 रोज का टाइम चाहिए। कम से कम 7 रोज दो तो तुम्हें हम समझायें कि 5 विकारों की बीमारी कैसे दूर हो सकती है। जास्ती प्रश्न-उत्तर करने वालों को तुम बोल सकते हो कि पहले 7 रोज का कोर्स करो।
गीत:ओम् नमो शिवाए....  
ओम् शान्ति।
बच्चों ने बाप की महिमा सुनी। यह जो बेहद की लीला रूपी नाटक है, उनकी लीला के आदि मध्य अन्त को तुम बच्चे जानते हो। वो लोग समझते हैं कि ईश्वर की माया अपरमअपार है। अब तुम्हारी बुद्धि में जागृति आई है और तुम सारी बेहद की लीला को जान चुके हो। परन्तु यथार्थ रीति जैसे बाप समझा रहे हैं ऐसे बच्चे नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार ही समझा सकते हैं। मनुष्य उन एक्टर्स को देखने के लिए उनके पिछाड़ी भागते हैं। तुम समझते हो यह बेहद का ड्रामा है, जो दुनिया के मनुष्य नहीं जानते। गाया जाता है मनुष्य कुम्भकरण की आसुरी नींद में सोये पड़े हैं। अब रोशनी मिली है तब तुम जागे हो। यह भी कहेंगे हम तुम सब सोये पड़े थे। अभी तुमको पुरूषार्थ करना है। वह तो कह देते हैं ईश्वर सर्वव्यापी है। वह अपने से ऐसी-ऐसी बातें कर सकें। अपने से तुमको बातें करनी हैं। हम आत्मायें बाप से मिली हैं, बाप ने कितना जागृत किया है। यह बेहद की लीला है। उसमें मुख्य एक्टर्स, डायरेक्टर, क्रियेटर कौन हैं, वह जानते हैं इसलिए तुम पूछते हो इस नाटक में कौन-कौन मुख्य एक्टर हैं। शास्त्रों में लिख दिया है कौरव सेना में कौन बड़े हैं, पाण्डव सेना में कौन बड़े हैं। यहाँ फिर है बेहद की बात। मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन के आदि मध्य अन्त को जानना है। ब्रह्मा और विष्णु का पार्ट यहाँ चलता है। विष्णु का रूप है एम-आब्जेक्ट। यह पद पाना है। गाते भी हैं ब्रह्मा देवता नम:... फिर कहते हैं शिव परमात्माए नम:, उनको निराकार ही कहते हैं। परमपिता परमात्मा कहते हैं तो बाप हुआ ना! सिर्फ परमात्मा कह देने से पिता अक्षर नहीं आता तो सर्वव्यापी कह देते हैं इसलिए मनुष्यों को कुछ समझ में नहीं आता, जैसे तुम भी नहीं समझते थे। बाप आकर पतितों को पावन बनाते हैं, यह किसको पता नहीं है। तुम बच्चे अभी कितने समझदार बन गये हो। आदि से लेकर अन्त तक तुम सब कुछ जान गये हो। ड्रामा देखने जो पहले जायेंगे तो जरूर आदि मध्य अन्त सारा देखेंगे और बुद्धि में रहेगा हमने यह-यह देखा है। फिर भी चाहना हो देखने की तो देख सकते हैं। वह तो हुआ हद का नाटक। तुम तो बेहद के नाटक को जान गये हो। सतयुग में प्रालब्ध जाकर पायेंगे। फिर यह नाटक भूल जायेगा। फिर समय पर यह ज्ञान मिलेगा। तो यह भी समझने की बातें हैं। कोई भी बात में प्रश्न-उत्तर करने की दरकार नहीं रहती। 7 रोज भठ्ठी के लिए कहा जाता है। परन्तु 7 रोज बैठना भी बड़ा मुश्किल है। सुनने से ही घबरा जाते हैं। समझाया जाता है - यह क्यों कहा जाता है? क्योंकि आधाकल्प से तुम रोगी बने हो। 5 विकारों रूपी भूत लगे हुए हैं, अब उनसे तुम पीडित हो। तुमको युक्ति बतलायेंगे कि कैसे इस पीड़ा से छूट सकते हो। बाप को याद करना है, जिससे तुम्हारी पीड़ा हमेशा के लिए खत्म हो जायेगी। बाप का फरमान है कि 7 रोज भठ्ठी में बैठना है। गीता भागवत का पाठ रखते हैं तो भी 7 रोज बिठाते हैं। यह भठ्ठी है। सब तो नहीं बैठ सकते। कोई कहाँ, कोई कहाँ हैं। आगे चलकर बहुत वृद्धि को पायेंगे। यह सब है रूद्र ज्ञान यज्ञ की शाखायें। जैसे बाप के बहुत नाम रखे हैं, वैसे इस रूद्र ज्ञान यज्ञ के भी बहुत नाम रख दिये हैं। रूद्र कहा जाता है परमपिता परमात्मा को, सो तुम जानते हो। राजस्व अश्वमेध अर्थात् यह रथ इस यज्ञ में स्वाहा करना है। बाकी जाकर आत्मायें रहती हैं। सबके शरीर स्वाहा होने हैं। होलिका होती है ना। विनाश के समय सबके शरीर इस यज्ञ में स्वाहा होंगे। सबके शरीरों की आहुति पड़नी है। परन्तु तुम बाप से पहले वर्सा लेते हो। जाना तो सभी को है। रावण का बहुत बड़ा परिवार है। तुम्हारा है सिर्फ दैवी परिवार छोटा। आसुरी परिवार तो कितना बड़ा है। वह कोई देवता बनने वाले नहीं हैं। जो और धर्मों में कनवर्ट हो गये हैं वह निकल आयेंगे। परमपिता परमात्मा ब्रह्मा मुख द्वारा मुख वंशावली रचते हैं। बाबा ने समझाया है पहले हमेशा स्त्री को एडाप्ट करते हैं, फिर रचना रचते हैं। वह तो है - कुख वंशावली। यह सारी रचना है मुख वंशावली। तुम उत्तम ठहरे क्योंकि तुम श्रेष्ठाचारी बनते हो। तुमको सिर्फ बाप को ही याद करना है क्योंकि ब्राह्मणों को बाप के पास ही जाना है। तुम जानते हो वापिस घर जाकर फिर सतयुग में आकर पार्ट बजाना है सुख का। बहुत लोग समझते भी हैं फिर भी 7 रोज देते नहीं हैं। तो समझा जाता है यह अपने घराने का अनन्य नहीं है। अनन्य होंगे तो उनको बड़ा अच्छा लगेगा। कई 5-8- 15 दिन भी रह जाते हैं। फिर संग मिलने कारण गुम हो जाते हैं। विनाश नजदीक आयेगा तो सबको यहाँ आना ही है। राजधानी स्थापना होनी ही है। नम्बरवार जैसे कल्प पहले पुरूषार्थ किया है वह अभी भी करेंगे। तुम्हारी बुद्धि में है हम बाप से वर्सा ले रहे हैं पुरूषार्थ अनुसार। जितना हम याद करेंगे कर्मातीत बनेंगे, उतना ऊंच पद पायेंगे। पहले-पहले सृष्टि सतोप्रधान थी। अब तो तमोप्रधान है। भारत को ही प्राचीन कहते हैं। तुम जानते हो हम सो देवता थे फिर 84 जन्म पास किये। अब फिर बाप के पास आये हैं वर्सा लेने। बाप आये हैं पावन बनाने। पतित बनाता है रावण। हम बेहद के मुख्य आलराउन्ड पार्टधारी हैं। सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी... चक्र लगाकर अब सूर्यवंशी से फिर ब्राह्मण वर्ण में आये हैं। ब्राह्मण तो जरूर चाहिए ना। ब्राह्मण हैं चोटी। ब्राह्मण चोटी रखवाते हैं। देवता धर्म भी बड़ा है। यह तो बुद्धि में है ना। हम बेहद ड्रामा में आलराउन्ड पार्ट बजाने वाले हैं। यह वर्ण भारत के लिए ही गाये गये हैं। अक्सर करके विष्णु को ही दिखाते हैं। उसमें शिवबाबा और ब्राह्मणों की चोटी उड़ा दी है। वह दिखाते नहीं हैं। अभी तुम्हारी बुद्धि में 84 जन्मों का राज बैठा हुआ है। तुम कितने जन्म लेते हो, दूसरे धर्म वाले कितने जन्म लेते हैं। एक जैसे जन्म तो नहीं ले सकते। पीछे आने वालों के जन्म कम हो जायेंगे। पहले-पहले आने वालों के ही 84 जन्म कहेंगे। सब थोड़ेही सूर्यवंशी में आयेंगे। यह भी हिसाब है, इनको डिटेल कहा जाता है। बहुत बच्चे भूल जाते हैं। स्कूल में भी फर्स्ट, सेकेण्ड ग्रेड तो रहती है ना। पहली-पहली नजर टीचर की फर्स्ट ग्रेड वालों की तरफ ही जायेगी। तो तुम्हारी बुद्धि में सारी रोशनी है। बाकी एक-एक की डिटेल में तो जा नहीं सकते। मुख्य धर्मों का समझाया जाता है। सारे ड्रामा की लीला को बुद्धि में रखते हुए फिर भी तुम समझते हो कि हमको अब वापिस लौटना है। जब हम कर्मातीत अवस्था को पायेंगे तब ही गोल्डन एज के लायक बनेंगे। बाप को याद करने से हमारी आत्मा पवित्र बन जायेगी, फिर चोला भी पवित्र मिलेगा। बाप को याद करते-करते हम गोल्डन एज में चले जायेंगे। अपना टैम्प्रेचर देखना होता है, जितना ऊंच जायेंगे उतना खुशी का पारा चढ़ेगा। नीचे उतरने से खुशी का पारा भी नीचे उतर जाता है। सतोप्रधान से नीचे उतरते-उतरते अब बिल्कुल ही तमोप्रधान बन पड़े हो। अब बाप समझा रहे हैं फिर भी माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। यह है माया से युद्ध। माया के वश बहुत हो जाते हैं। बाप कहते हैं सच्ची दिल पर साहेब राजी होगा। कितनी अबलायें बाप की याद में सच्ची दिल से रहती हैं। प्रतिज्ञा की हुई है कि हम विकार में कभी नहीं जायेंगे। विघ्न तो बहुत पड़ते हैं। प्रदर्शनी आदि में कितना विघ्न डालते हैं। बड़े फखुर से आते हैं, इसलिए सम्भाल भी बहुत करनी है। मनुष्यों की वृत्ति बहुत खराब रहती है। पंचायती राज्य है ना। फिर सतयुग में होते हैं 100 परसेन्ट रिलीजस, राइटियस, लॉ फुल, सालवेंट, डीटी गवर्मेन्ट। तो तुम बच्चों को बड़ी मेहनत करनी है, चित्र भी बहुत बनते रहते हैं। इतना बड़ा चित्र हो जो मनुष्य दूर से ही पढ़ सकें। यह बहुत समझने और समझाने की बात है, जिससे मनुष्य समझें कि बरोबर हम स्वर्गवासी थे, अब नर्कवासी बने हैं, फिर पावन बनना है। ड्रामा का राज भी समझाना है। यह चक्र कैसे फिरता है, कितना समय लगता है। हम ही विश्व के मालिक थे, आज तो एकदम कंगाल बन पड़े हैं। रात-दिन का फर्क है। यह भी अपने विकर्मों का फल है जो भोगना पड़ता है। अब बाप कर्मातीत अवस्था बनाने आये हैं। भारत क्या था, अब क्या है। अब इस युद्ध में सारी दुनिया स्वाहा होनी है। यह भी तुम बच्चे जानते हो। बाप कहते हैं खूब पुरूषार्थ कर महाराजा महारानी बनकर दिखाओ। चित्रों पर बहुत अच्छी रीति समझाना है। बुद्धि में यही याद रहे कि हम कितना ऊंच थे फिर कितना नीचे गिरे हैं। गिरे हुए तो बहुत तुम्हारे पास आयेंगे। गणिकाओं, अहिल्याओं को भी उठाना है। उन्हों को जब तुम उठाओ तब ही तुम्हारा नाम बाला होगा। अब तक किसकी बुद्धि में बैठता नहीं है। देहली से आवाज निकलना चाहिए, वहाँ झट नाम होगा। परन्तु अजुन देरी दिखाई देती है। अबलाओं, गणिकाओं को बाप कितना ऊंच आकर उठाते हैं। तुम ऐसे-ऐसे का जब उद्धार करेंगे तब नाम बाला होगा। बाबा कहते हैं ना - अभी तक आत्मा अजुन रजो तक आई है, अभी सतो तक आना है। बाबा तो कहते हैं कुछ करके दिखाओ। तुम बच्चों को तो बहुत सर्विस करनी है। परन्तु चलते-चलते कोई कोई ग्रहचारी बैठ जाती है। कमाई में ग्रहचारी होती है ना। माया बिल्ली बेहोश कर देती है। गुलबकावली का खेल है ना। बच्चे तो खुद समझ सकते हैं कि बापदादा के दिल पर कौन चढ़ सकते हैं। संशय की कोई बात नहीं। कई प्रश्न पूछते हैं - यह कैसे हो सकता है? अरे तुम साक्षी होकर देखो। ड्रामा में जो नूँध है सो पार्ट चलना है। ड्रामा के पट्टे से गिर पड़ते हैं। जिनको समझ में आता है वह नहीं गिरते हैं। तुम क्यों गिरते हो, ड्रामा में जो नूँध है वही होता है ना। भारत में हजारों को साक्षात्कार होता है। यह क्या है? इतनी आत्मायें निकलकर आती हैं क्या? यह सब ड्रामा का खेल समझने का है, इसमें संशय की बात नहीं हो सकती। कितने संशय में आकर पढ़ाई छोड़ देते हैं। अपना ही खाना खराब करते हैं। कोई भी हालत में संशयबुद्धि नहीं बनना है। बाप को पहचाना फिर बाप में संशय सकता है क्या? बच्चे जानते हैं हम पतित-पावन बाप के पास जाते हैं, पावन बनकर। तो गाया हुआ है - पतित-पावन को आना है और पतितों को पावन बनाना है। जो बनेंगे वही पवित्र दुनिया में चलेंगे और अमर बनेंगे। बाकी जो पवित्र नहीं बनेंगे वह अमर नहीं होंगे। तुम अमर दुनिया के मालिक बनते हो। बाप कितना ऊंच वर्सा देते हैं। पवित्र ऐसा बनते हैं जो फिर 21 जन्म पवित्र रहते हैं। सन्यासी तो फिर भी विकार से जन्म लेते हैं। अमरपुरी के लायक नहीं बनते हैं। अमरपुरी का लायक बाबा बनाते हैं। यह अमरकथा पार्वतियों को अमरनाथ बाबा शिव ही सुना रहे हैं। बच्चे आये हैं बेहद बाबा के पास, वर्सा तो लेना ही है ना। यहाँ सागर के पास आते ही हो रिफ्रेश होने के लिए। फिर जाकर आप समान बनाना है। तो बच्चों का भी यही धन्धा हुआ। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमर्निङ। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) किसी भी बात में संशय नहीं उठाना है। ड्रामा को साक्षी हो देखना है। कभी भी अपना रजिस्टर खराब नहीं करना है।
2) कर्मातीत अवस्था तक पहुँचने के लिए याद में रहने का पूरा पुरूषार्थ करना है। सच्चे दिल से बाप को याद करना है। अपनी स्थिति का टैम्प्रेचर अपने आप देखना है।
 
वरदान: सम्पन्नता के आधार पर सन्तुष्टता का अनुभव करने वाले सदा तृप्त आत्मा भव
जो सदा भरपूर वा सम्पन्न रहते हैं, वे तृप्त होते हैं। चाहे कोई कितना भी असन्तुष्ट करने की परिस्थितियां उनके आगे लाये लेकिन सम्पन्न, तृप्त आत्मा असन्तुष्ट करने वाले को भी सन्तुष्टता का गुण सहयोग के रूप में देगी। ऐसी आत्मा ही रहमदिल बन शुभ भावना और शुभ कामना द्वारा उनको भी परिवर्तन करने का प्रयत्न करेगी। रूहानी रॉयल आत्मा का यही श्रेष्ठ कर्म है।
स्लोगन:याद और सेवा का डबल लॉक लगाओ तो माया नहीं सकती।

OM SHNATI

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Details ( Page:- Murali Dtd 5th Aug 2017 )
05-08-17

 प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन

Mithe bacche - Baap tumhe behad ka samachar sunate hain, tum abhi Swadarshan Chakradhari bane ho, tumhe 84 janmo ki smruti me rehna hai aur sabko yah smruti dilani hai.
Q- Shiv baba ka pehla baccha Brahma ko kahenge, Vishnu ko nahi - kyun?
A- Kyunki Shiv baba Brahma dwara Brahman sampradaye rachte hain. Agar Vishnu ko baccha kahe to unse bhi sampradaye paida honi chahiye. Parantu unse koi sampradaye hoti nahi. Vishnu ko koi Mamma Baba bhi nahi kahenge. Wo jab Lakshmi-Narayan ke roop me Maharaja Maharani hai, to unko apna baccha he Mamma Baba kehte. Brahma se to Brahman sampradaye paida hote hain.
Dharna le kiye mukhya saar-
1) Oonchi kamayi karne ke liye buddhi ka yog aur sabse tod ek Baap se jodna hai. Sachche Baap ko yaad kar Sachkhand ka mallik banna hai.
2) Jaise Brahma Baap gyan ko dharan kar sampoorn bante hain aise he Baap samaan sampoorn banna hai.
Vardaan- Roohaniyat dwara briti, dhristi, bol aur karm ko royal banane wale Brahma baap samaan bhava.
Details---Brahma baap ke bol, chal, chehre aur chalan me jo royalty dekhi - usme follow karo. Jaise Brahma baap ne kabhi chotti chotti baaton me apni buddhi wa samay nahi diya. Unke mukh se kabhi sadharan bol nahi nikle, har bol yuktiyukt arthat byarth bhav se pare avyakt bhav aur bhavana wale rahe. Unki briti har aatma prati sada subh bhavana, subh kamana wali rahi, dhristi se sabko farishte roop me dekha. Karm se sada sukh diya aur sukh liya. Aise follow karo tab kahenge Brahma baap samaan.
slogan- Mehnat ke bajaye mohabbat ke jhoole me jhoolne he shrest bhagyavan ki nishaani hai.
 
HINDI MURALI DETAILS 05-08-17 प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन

मीठे बच्चे - बाप तुम्हें बेहद का समाचार सुनाते हैं, तुम अभी स्वदर्शन चक्रधारी बने हो, तुम्हें 84 जन्मों की स्मृति में रहना है और सबको यह स्मृति दिलानी है
 
प्रश्न:शिवबाबा का पहला बच्चा ब्रह्मा को कहेंगे, विष्णु को नहीं - क्यों?
उत्तर:क्योंकि शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण सम्प्रदाय रचते हैं। अगर विष्णु को बच्चा कहें तो उनसे भी सम्प्रदाय पैदा होनी चाहिए। परन्तु उनसे कोई सम्प्रदाय होती नहीं। विष्णु को कोई मम्मा बाबा भी नहीं कहेंगे। वह जब लक्ष्मी-नारायण के रूप में महाराजा महारानी हैं, तो उनको अपना बच्चा ही मम्मा बाबा कहते। ब्रह्मा से तो ब्राह्मण सम्प्रदाय पैदा होते हैं।
 
गीत:तुम्हीं हो माता पिता...  
ओम् शान्ति।
 
बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं कि कोई गुरू गोसाई ऐसे नहीं कह सकते कि बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। बाप बच्चों को क्या समझायेंगे? कौनसा बाप है? यह तो सिर्फ तुम जानते हो और कोई सतसंग में ऐसे कह नहीं सकते। भल बाबा सांई, मेहर बाबा कहते हैं परन्तु वो लोग तो कुछ भी समझते नहीं, जो बोलें। तुम जानते हो यह बेहद का बाप है, बेहद का समाचार सुनाते हैं। एक होता है हद का समाचार, दूसरा होता है बेहद का समाचार। इस दुनिया में कोई जानते ही नहीं। बाप कहते हैं तुमको बेहद का समाचार सुनाते हैं तो तुमको सृष्टि के आदि मध्य अन्त का ज्ञान बुद्धि में जाता है। तुम जानते हो बरोबर बाप ने अपना परिचय दिया है और सृष्टि चक्र कैसे फिरता है वह भी यथार्थ रीति समझाया है। उसे समझकर हम औरों को समझाते हैं। बीज को परमपिता परमात्मा वा बाप कहते हैं, हम हैं उनके बच्चे आत्मायें। तुम बच्चों की बुद्धि में है कि हम आत्मायें परमात्मा की सन्तान हैं। परमपिता परमात्मा परमधाम में रहने वाले हैं। उन्होंने मूलवतन का समाचार समझाया है। कैसे यह सारी माला बनती है। पहले-पहले बाप समझाते हैं मैं तुम्हारा बाप हूँ और मैं परमधाम में रहता हूँ। मुझे ही नॉलेजफुल, ब्लिसफुल कहते हैं। मैं आकर तुम आत्माओं को पवित्रता सुख शान्ति का वर्सा देता हूँ। बच्चों की बुद्धि में यह फिरता रहता है। हम असुल में कहाँ के रहने वाले हैं। हम सभी आत्माओं को भी पार्ट बजाना है। पार्ट का राज कोई भी समझ नहीं सकते हैं, सिर्फ कहते रहते हैं। पुनर्जन्म लेंगे। आत्मा इतने जन्म लेती है। कोई 84 लाख जन्म कहते। कोई को समझाओ तो समझ जाते हैं कि 84 जन्म ठीक हैं। 84 जन्म कैसे लेते हैं - यह बुद्धि में होना चाहिए। बरोबर हम सतोप्रधान थे फिर सतो, रजो, तमो में आये हैं। अब फिर संगम पर हम सतोप्रधान बन रहे हैं। यह जरूर तुम बच्चों की बुद्धि में होगा तब तो तुमको स्वदर्शन चक्रधारी कहा जाता है। यह बातें तो बड़ी सहज हैं जो बुढि़या भी समझा सकती हैं कि बरोबर हमने 84 जन्म लिए हैं और कोई धर्म वाले मनुष्य नहीं लेते। यह भी समझाना होता है - अभी हम ब्राह्मण हैं फिर देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र बनते हैं। ऊंच ते ऊंच है शिवबाबा। यह अभी तुम्हारी बुद्धि में है। ऐसे हम पुनर्जन्म लेते हैं। पुर्नजन्म को तो जरूर मानना पड़े। अब तुमको अपने 84 जन्मों के पार्ट की स्मृति आई है। बुढि़यों के लिए भी य्ह समझानी बहुत सहज है। तुमको कोई किताब आदि पढ़ने की दरकार नहीं रहती। बाप ने समझाया है कि तुम 84 जन्म कैसे लेते हो। तुम ही देवी-देवता थे फिर 8 जन्म सतयुग में, 12 जन्म त्रेता में, 63 जन्म द्वापर-कलियुग में लिए और यह एक जन्म है सबसे ऊंच। तो सहज समझते हो ना। कुरूक्षेत्र की बुढ़ी मातायें भी समझती हो ना! कुरूक्षेत्र का नाम मशहूर है। वास्तव में यह सारा कर्मक्षेत्र है। वह कुरूक्षेत्र तो एक गांव है, यह सारा कर्म करने का क्षेत्र है, इसमें अभी लड़ाई आदि लगी नहीं है। तुम इस सारे कुरूक्षेत्र को जानते हो। बैठना तो एक जगह होता है। बाबा ने बतलाया है-इस सारे कर्मक्षेत्र पर रावण का राज्य है। रावण को जलाते भी यहाँ हैं। रावण का जन्म भी यहाँ होता है। यहाँ ही शिवबाबा का जन्म होता है। यहाँ ही देवी देवतायें थे। फिर वही पहले-पहले वाम मार्ग में जाते हैं। बाबा भी यहाँ भारत में ही आते हैं। भारत की बड़ी महिमा है। बाप भी भारत में ही बैठ समझाते हैं। बच्चे तुम 5 हजार वर्ष पहले आदि सनातन देवी देवता धर्म के थे, राज्य करते थे। उनमें पहले नम्बर लक्ष्मी-नारायण विश्व पर राज्य करते थे। उसको 5 हजार वर्ष हुए। उनको विश्व महाराजन, विश्व महारानी कहा जाता था। वहाँ कोई दूसरा धर्म तो है नहीं। तो जो भी राजायें होंगे वो विश्व के महाराजन ही कहलायेंगे फिर यह फलाने गांव का, यह फलाने गांव का.. कहा जाता है। तुम जानते हो हम विश्व का राज्य लेते हैं। बाप ने समझाया है - तुम जमुना के किनारे राज्य करते हो। तो बुद्धि में यह याद रखना है कि 4 युग और 4 वर्ण हैं। पांचवा यह लीप युग है, जिसको कोई जानते नहीं। मुख्य है ब्राह्मण धर्म। ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण। ब्रह्मा कब आया? जरूर जब बाप सृष्टि रचेंगे तो पहले ब्राह्मण चाहिए। यह है डायरेक्ट ब्रह्मा की मुख वंशावली। ब्रह्मा है शिवबाबा का पहला बच्चा। क्या विष्णु को भी बच्चा कहेंगे? नहीं। अगर बच्चा हो तो उनसे भी सम्प्रदाय पैदा हो। परन्तु उनसे तो सम्प्रदाय पैदा होती ही नहीं। उनको मम्मा बाबा कहेंगे। वह तो महाराजा महारानी को अपना ही एक बच्चा होता है। यह कर्मभूमि है। परमपिता परमात्मा को भी आकर कर्म करना पड़ता है, नहीं तो क्या आकर करते, जो इतनी महिमा होती है। तुम देखते हो शिव जयन्ती भी गाई हुई है। भल शिव पुराण लिखा है परन्तु उसमें कोई बात समझ में नहीं आती। मुख्य है ही गीता। तुम अच्छी रीति समझ गये हो कि कैसे शिवबाबा आते हैं। ब्रह्मा भी जरूर चाहिए। अब ब्रह्मा कहाँ से आया? सूक्ष्मवतन में तो सम्पूर्ण ब्रह्मा है। इस बात में ही लोग अटकते हैं। ब्रह्मा का कर्तव्य क्या है? सूक्ष्मवतन में रह क्या करते होंगे? बाप समझाते हैं जब यह व्यक्त रूप में हैं तो इन द्वारा ज्ञान देता हूँ। फिर यही ज्ञान लेते-लेते फरिश्ता बन जाते हैं। वह है सम्पूर्ण रूप। वैसे मम्मा का भी है, तुम्हारा भी ऐसे ही सम्पूर्ण रूप बन जाता है। बूढ़ी-बूढ़ी मातायें सिर्फ इतना धारण करें कि हम 84 जन्म कैसे लेते हैं, यह भी समझाया जाता है कि बाबा कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजाने भेज देते हैं। मुख से कुछ बोलते नहीं हैं। यह भी ड्रामा बना हुआ है। ड्रामा अनुसार हर एक को अपने-अपने समय पर आना है। तो बाप बैठ समझाते हैं कि सृष्टि के आदि में पहले-पहले कौन थे फिर अन्त में कौन थे। अन्त में सारी सम्प्रदाय जड़जड़ी भूत अवस्था को पाई हुई है। बाकी ऐसे नहीं कि प्रलय हो जाती है फिर श्रीकृष्ण अंगूठा चूसता हुआ आता है। बाप ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते हैं नई सम्प्रदाय की। परमपिता परमात्मा इस दैवी सृष्टि की रचना कैसे करते हैं यह तो तुम जानते हो। वह तो कृष्ण को समझ बैठे हैं। तुम जानते हो बाप ही पतित-पावन है। अन्त में ही आयेंगे पावन बनाने। जो कल्प पहले पावन बने थे, वही आयेंगे। आकर ब्रह्मा के मुख वंशावली बनेंगे और पुरूषार्थ कर शिवबाबा से अपना वर्सा लेंगे। रचयिता नॉलेजफुल वह है ना! वर्सा बाप से ही मिल सकता है। दादा को भी उनसे मिलता है। उनकी ही महिमा गाई जाती है। त्वमेव माताश्च पिता... बरोबर सच्चा सुख देने वाला वह है। यह भी तुम जानते हो। दुनिया नहीं जानती। जब रावण राज्य शुरू होता है तब ही दु: शुरू होता है। रावण बेसमझ बना देते हैं। बालक में जब तक विकारों की प्रवेशता नहीं है तो उनको महात्मा समान कहते हैं। जब बालिग होता है तब लौकिक सम्बन्धी उनको दु: का रास्ता बतलाते हैं। पहला रास्ता बतलाते हैं कि तुमको शादी करनी है। लक्ष्मी-नारायण और राम सीता ने क्या शादी नहीं की है? परन्तु उन्हों को पता ही नहीं कि उन्हों का पवित्र प्रवृत्ति मार्ग था। यह अपवित्र प्रवृत्ति मार्ग है। वह तो पवित्र स्वर्ग के मालिक थे। हम तो पतित नर्क के मालिक हैं। यह ख्याल बुद्धि में आता नहीं है। तुम भारत की महिमा सुनाते हो - क्या यह भूल गये हो भारत स्वर्ग था, आदि सनातन देवी-देवता धर्म था, पवित्र थे। तब तो अपवित्र उनके आगे जाकर माथा टेकते हैं। पतित-पावन बाप ही पावन दुनिया की स्थापना करते हैं। बरोबर पावन भारत था अभी तो मुख से कहते हैं हम पतित हैं। कोई लड़ाई आदि होगी तो यज्ञ रचेंगे शान्ति के लिए। मन्त्र भी ऐसे जपते हैं। परन्तु शान्ति का अर्थ समझते नहीं हैं। है भी बड़ा सहज। गॉड फादर कहते हैं तो बच्चे ठहरे ना। वह हम सबका बाप है तो ब्रदर्स ठहरे ना! बरोबर हम प्रजापिता ब्रह्मा के मुख वंशावली बहन भाइर् ठहरे। सतयुग में तो मुख वंशावली होती नहीं। सिर्फ संगम पर ही मुख वंशावली होने से बहन-भाई कहलाते हो। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुग पर साधारण वृद्ध तन में प्रवेश करता हूँ जिसका नाम फिर ब्रह्मा रखता हूँ। जो फिर ज्ञान को धारण करके अव्यक्त सम्पूर्ण ब्रह्मा बनते हैं। है वही, दूसरी बात नहीं है। ब्राह्मण फिर वही देवता बनते हैं, चक्र लगाकर अन्त में आकर शूद्र बनते हैं फिर ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण रचते हैं। बुढि़यों के ऊपर भी ब्राह्मणियों को मेहनत करनी है। हमने 84 जन्म पूरे किये हैं, यह तो समझ सकते हैं ना। बाबा कहते हैं मुझे याद करो। इस योग अग्नि से ही विकर्म विनाश होंगे। सभी आत्माओं को कहते हैं मामेकम् याद करो। शिवबाबा कहते हैं लक्की सितारों! हे सालिग्रामों! तुम आत्माओं की बुद्धि में यह ज्ञान डालते हैं। आत्मा सुनती है, परमात्मा बाप सुनाते हैं ब्रह्मा मुख द्वारा। ब्रह्मा द्वारा स्थापना, तो जरूर मनुष्य ही होगा और बूढ़ा भी होगा। ब्रह्मा को भी हमेशा बूढ़ा दिखाते हैं। कृष्ण को छोटा समझते हैं, ब्रह्मा को कभी छोटा बच्चा नहीं कहेंगे। उनका छोटा रूप बनाते नहीं हैं। जैसे लक्ष्मी-नारायण का छोटा रूप नहीं दिखाते, वैसे ब्रह्मा का भी नहीं दिखाते हैं। बाप खुद कहते हैं मैं वृद्ध तन में आता हूँ। तो तुम बच्चों को भी यही मन्त्र सुनाते रहना है। शिवबाबा कहते हैं मामेकम् याद करो। शिव को, ब्रह्मा को बाबा कहते हैं, शंकर को कभी बाबा नहीं कहते। वह तो शिव-शंकर को मिला देते हैं। तो यह भी बुद्धि में बिठाना है। आत्माओं का बाप अब परमपिता परमात्मा आये हैं। तो ऐसी-ऐसी सहज बातें बुढि़यों को समझानी चाहिए। बाबा प्रश्न पूछते हैं कि आगे तुमको क्या बनाया था, तो इतना तो कहें कि स्वदर्शन चक्रधारी बने थे। बाप को और चक्र को याद करने से तुम रूहानी विलायत में चले जायेंगे। वह फॉरेन तो दूरदेश है ना। हम आत्मायें सब दूरदेश में रहने वाली हैं। हमारा घर देखो कहाँ है, सूर्य चांद से भी पार। जहाँ कोई गम नहीं है। अभी तुम आत्माओं को घर की याद आई है। हम वहाँ अशरीरी रहते थे, शरीर नहीं था। यह खुशी होनी चाहिए। अभी हम अपने घर जाते हैं। बाप का घर सो अपना घर। बाबा ने कहा है - मुझे याद करो और अपने मुक्तिधाम को याद करो। साइंस घमण्डी तो परमात्मा को बिल्कुल नहीं जानते हैं। बाप को तरस पड़ता है कि उन्हों के कानों में भी कुछ पड़ता रहे तो शिवबाबा को याद करें। देह-अभिमान टूट जाए, नर से नारायण बनने की यह सत्य कथा है। सच्चे बाप को याद करो तो सचखण्ड के मालिक बन जायेंगे। सच्चा बाबा ही स्वर्ग स्थापना करते हैं। कहते हैं और संग बुद्धियोग तोड़ो। सरकारी नौकरी 8 घण्टा करते हो उनसे भी यह बहुत ऊंची कमाई है। कहाँ भी जाओ, बुद्धि से यह याद करते रहना है। तुम कर्मयोगी हो। कितना सहज समझाते हैं। बुढि़यों को देखकर मैं बहुत खुश होता हूँ क्योंकि फिर भी हमारी हमजिन्स हैं। मैं मालिक बनूँ, हमजिन्स बनें तो यह भी ठीक नहीं। बाप है अविनाशी ज्ञान सर्जन। ज्ञान इन्जेक्शन सतगुरू दिया अज्ञान अन्धेर विनाश। तुम्हारा अज्ञान दूर हो गया है। बुद्धि में ज्ञान गया है। सब कुछ जान गये हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
 
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) ऊंची कमाई करने के लिए बुद्धि का योग और सबसे तोड़ एक बाप से जोड़ना है। सच्चे बाप को याद कर सचखण्ड का मालिक बनना है।
2) जैसे ब्रह्मा बाप ज्ञान को धारण कर सम्पूर्ण बनते हैं ऐसे ही बाप समान सम्पूर्ण बनना है।
 
वरदान:रूहानियत द्वारा वृत्ति, दृष्टि, बोल और कर्म को रॉयल बनाने वाले ब्रह्मा बाप समान भव
ब्रह्मा बाप के बोल, चाल, चेहरे और चलन में जो रायल्टी देखी - उसमें फालो करो। जैसे ब्रह्मा बाप ने कभी छोटी-छोटी बातों में अपनी बुद्धि वा समय नहीं दिया। उनके मुख से कभी साधारण बोल नहीं निकले, हर बोल युक्तियुक्त अर्थात् व्यर्थ भाव से परे अव्यक्त भाव और भावना वाले रहे। उनकी वृत्ति हर आत्मा प्रति सदा शुभ भावना, शुभ कामना वाली रही, दृष्टि से सबको फरिश्ते रूप में देखा। कर्म से सदा सुख दिया और सुख लिया। ऐसे फालो करो तब कहेंगे ब्रह्मा बाप समान।

स्लोगन:मेहनत के बजाए मुहब्बत के झूले में झूलना ही श्रेष्ठ भाग्यवान की निशानी है।

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Details ( Page:- Murali Dtd 6th Aug 2017 )
06-08-17

प्रात:मुरली ओम् शान्तिअव्यक्त-बापदादारिवाइज:02-05-82 मधुबन

"The basis of creating a special life story is to have a constantly flying stage."
Vishesh Jeevan kahani banana ka adhar – sada chadhti kala.
VARDAN – Poorani sansar aur sanskar ki akarshan se jeeteji marnewale yatharth marjeeva bhav.
Slogan – Sabse Lucky who hai jo yaad aur seva mei sada busy rahe.
 
HINDI DETAILS  MURALI - 06-08-17 प्रात:मुरली ओम् शान्तिअव्यक्त-बापदादारिवाइज:02-05-82 मधुबन

विशेष जीवन कहानी बनाने का आधार - सदा चढ़ती कला
बापदादा हरेक बच्चे की जीवन कहानी देख रहे हैं। हरेक की जीवन कहानी में क्या-क्या तकदीर की रेखायें रही हैं। सदा एकरस उन्नति की ओर जाते रहे हैं वा उतराई और चढ़ाई में चल रहे हैं! ऐसे दोनों प्रकार की लकीर अर्थात् जीवन की लीला दिखाई दी। जब चढ़ाई के बाद किसी भी कारणवश चढ़ती कला के बजाए उतरती कला में आते हैं तो उतरने का प्रभाव भी अपनी तरफ खींचता है। जैसे बहुतकाल की चढ़ती कला का प्रभाव बहुतकाल की प्राप्ति कराता है। सहज योगी जीवन वाले, सदा बाप के समीप और साथ की अनुभूति करते हैं। सदा स्वयं को सर्व शक्तियों में मास्टर समझने से सहज स्मृति स्वरूप हो जाते हैं। कोई भी परिस्थितयाँ वा परीक्षायें आते हुए सदा अपने को विघ्न-विनाशक अनुभव करते हैं। तो जैसे बहुतकाल की चढ़ती कला का, बहुतकाल ऐसी शक्तिशाली स्थिति का अनुभव करते हैं ऐसे चढ़ती कला के बाद फिर उतरती कला होने से स्वत: और सहज यह अनुभव नहीं होते। लेकिन विशेष अटेन्शन, विशेष मेहनत करने के बाद यह सब अनुभव करते हैं। सदा चढ़ती कला अर्थात् सदा सर्व प्राप्ति को पाई हुई मूर्ति। और चढ़ने के बाद उतरने और फिर चढ़ने वाले गँवाई हुई वस्तु को फिर पाने वाले, ऐसे उतरने-चढ़ने वाली आत्मायें अनुभव करती हैं कि पाया था लेकिन खो गया। और पाने के अनुभवी होने के कारण फिर से उसी अवस्था को पाने के बिना रह भी नहीं सकते, इसलिए विशेष अटेन्शन देने से फिर से अनुभव को पा लेते हैं लेकिन सदाकाल और सहज की लिस्ट के बजाए दूसरे नम्बर की लिस्ट में जाते हैं। पास विद आनर नहीं लेकिन पास होने वालों की लिस्ट में जाते हैं। तीसरे नम्बर की तो बात स्वयं ही सोच सकते हो कि उसकी जीवन कहानी क्या होगी। तीसरा नम्बर तो बनना ही नहीं है ना? अपनी जीवन कहानी को सदा उन्नति की ओर बढ़ने वाली सर्व विशेषताओं सम्पन्न, सदा प्राप्ति स्वरूप ऐसा श्रेष्ठ बनाओ। अभी-अभी ऊपर, अभी-अभी नीचे वा कुछ समय ऊपर कुछ समय नीचे ऐसे उतरने-चढ़ने के खेल में सदा का अधिकार छोड़ नहीं देना। आज बापदादा सभी की जीवन कहानी देख रहे थे। तो सदा चढ़ती कला वाले कितने होंगे और कौन होंगे? अपने को तो जान सकते हो ना कि मैं किस लिस्ट में हूँ! उतरने की परिस्थितियाँ, परीक्षायें तो सबके सामने आती हैं, बिना परीक्षा के तो कोई भी पास नहीं हो सकता लेकिन 1. परीक्षा में साक्षी और साथीपन के स्मृति स्वरूप द्वारा फुल पास होना वा पास होना वा मजबूरी से पास होना इसमें अन्तर हो जाता है। 2. बड़ी परीक्षा को छोटा समझना वा छोटी-सी बात को बड़ा समझना इसमें अन्तर हो जाता है। 3. कोई छोटी-सी बात को ज्यादा सिमरण, वर्णन और वातावरण में फैलाए इससे भी छोटे को बड़ा कर देते हैं। और कोई फिर बड़ी को भी चेक किया तो साथ-साथ चेन्ज किया और सदा के लिए कमजोर बात को फुल स्टाप लगा देते हैं! फुल स्टाप लगाना अर्थात् फिर से भविष्य के लिए फुल स्टाक जमा करना। आगे के लिए फुल पास के अधिकारी बनना। तो ऐसे बहुतकाल की चढ़ती कला के तकदीरवान बन जाते हैं। तो समझा जीवन कहानी की विशेषता क्या रखनी है! इससे सदा आपकी विशेष जीवन कहानी हो जायेगी! जैसे कोई की जीवन कहानी विशेष प्रेरणा दिलाती है, उत्साह बढ़ाती है, हिम्मत बढ़ाती है, जीवन के रास्ते को स्पष्ट अनुभव कराती है, ऐसे आप हर विशेष आत्मा की जीवन कहानी अर्थात् जीवन का हर कर्म अनेक आत्माओं को ऐसे अनुभव करावे। सबके मुख से, मन से यही आवाज निकले कि जब निमित्त आत्मा यह कर सकती है तो हम भी करें। हम भी आगे बढ़ेंगे। हम भी सभी को आगे बढ़ायेंगे, ऐसी प्रेरणा योग्य विशेष जीवन कहानी सदा बनाओ। समझा - क्या करना है? अच्छा। आज तो डबल विदेशियों के मिलने का दिन है। एक तरफ है विदेशियों का और दूसरे तरफ है फिर बहुत नजदीक वालों (मधुबन निवासियों) का। दोनों का विशेष मिलन है। बाकी तो सब गैलरी में देखने के लिए आये हैं इसलिए बापदादा ने आये हुए सब बच्चों का रिगार्ड रख मुरली भी चलाई। अच्छा। सदा मिलन-जीवन के सार को जीवन में लाने वाले, विशेष इशारों को अपने जीवन का सदाकाल का वरदान समझ, वरदानी मूर्त बनने वाले, सुनना अर्थात् बनना, मिलना अर्थात् समान बनना - इसी स्लोगन को सदा स्मृति स्वरूप में लाने वाले, स्नेह का रिटर्न सदा निर्विघ्न बनाने का सहयोग देने वाले, सदा अनुभवी मूर्त बन सर्व में अनुभवों की विशेषता भरने वाले, ऐसे सदा बाप समान सम्पन्न, श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते। दीदी जी के साथ: सभी बाप की निमित्त बनी हुई भुजायें अपना-अपना कार्य यथार्थ रूप में कर रहीं हैं? यह सभी भुजायें हैं ना? तो सभी राइटहैण्ड हैं वा कोई लेफ्ट हैण्ड भी हैं? जो स्वयं को ब्राह्मण कहलाते हैं, ऐसे ब्राह्मण कहलाने वाले सब राइट हैण्ड हैं या ब्राह्मणों में ही कोई लेफ्ट हैण्ड हैं, कोई राइट हैण्ड हैं? (ब्राह्मण कभी राइट हैण्ड बन जाते कभी लेफ्ट हैण्ड) तो भुजायें भी बदली होती हैं क्या। वैसे तो रावण के शीश दिखाते हैं - अभी-अभी उड़ा, अभी-अभी गया। लेकिन ब्राह्मणों में भी ब्रह्मा की भुजायें बदली होती रहती हैं क्या? ऐसे तो फिर रोज भुजायें बदलती होंगी? वास्तव में ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी कहलाते तो सब हैं लेकिन अन्दर में वह स्वयं महसूस करते हैं कि हम प्रत्यक्षफल खाने वाले नहीं हैं, मेहनत का फल खाने वाले हैं। यह भी अन्तर है ना। कोई प्रत्यक्षफल खाने वाले हैं और कोई मेहनत का फल खाने वाले हैं। बहुत मेहनत की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ दृढ़ संकल्प और श्रीमत - इसी आधार पर हर संकल्प और कर्म करते चलो तो मेहनत की कोई बात ही नहीं। इन दोनों ही आधार पर चलने के कारण जैसे गाड़ी पटरी से उतर जाती है फिर बहुत मुश्किल होता है। अगर गाड़ी पटरी पर चल रही है तो कोई मेहनत नहीं, इंजन चला रहा है, वह चल रही है। तो इन दोनों आधार में से, चाहे दृढ़ संकल्प, चाहे श्रीमत पर चलें, बहुत अटेन्शन रखें लेकिन दृढ़ संकल्प की कमजोरी हो तो इसकी रिजल्ट क्या होगी? मेहनत का फल खायेंगे। ऐसे मेहनत का फल खाने वाले भी क्षत्रिय की लाइन में गये। जब भी उनसे कोई बात पूछो तो मेहनत या मुश्किल की बात ही सुनायेंगे। जैसे सुनाया था एक बात को निकालते तो दूसरी जाती, चूहे को निकालो तो बिल्ली जाती, बिल्ली को निकालते तो कुत्ता आता.... ऐसे निकालने में ही लगे रहते हैं। तीन धर्म साथ-साथ स्थापना हो रहे हैं ना, ब्राह्मण, देवता और क्षत्रिय। तो तीनों ही प्रकार के दिखाई देंगे ना। कईयों का तो जन्म ही बहुत मेहनत से हुआ है। और कइयों ने बचपन से ही मेहनत करना आरम्भ किया है। यह भी भिन्न-भिन्न प्रकार तकदीर की लकीरें हैं। कोई से पूछेंगे तो कहेंगे हमने शुरू से कोई मेहनत नहीं की। श्रीमत पर चलना है, योगी बनना है यह स्वत: लक्ष्य स्वरूप हो गया। ऐसे नहीं अलबेले होंगे लेकिन स्वत: स्वरूप बन करके चलते हैं। अलबेले भी मेहनत नहीं महसूस करते हैं लेकिन वह है उल्टी बात। उसका फिर भविष्य नहीं बनता है। बाप समान प्राप्ति का अनुभव नहीं करते हैं। बाकी जन्म से अलबेले बस खाया, पिया और अपनी पवित्र जीवन बिताई, नियम-प्रमाण चलने वाले लेकिन धारणा को जीवन में लाने वाले नहीं। उनका भी यहाँ नेमीनाथ के रूप में गायन होता है। तो कई सिर्फ नेमीनाथ भी हैं। योग में, क्लास में आयेंगे सबसे पहले। लेकिन पाया क्या? कहेंगे हाँ सुन लिया। आगे बढ़ना-बढ़ाना वह लक्ष्य नहीं होगा। सुन लिया मजा गया, ठीक है। आया, गया, चला, खाया - ऐसे को कहेंगे नेमीनाथ। फिर भी ऐसों की भी पूजा होती है। इतना तो करते हैं कि नियम प्रमाण चल रहे हैं। उसका भी फल पूज्य बन जाते हैं। बरसात में अनन्य नहीं आयेंगे लेकिन वह जरूर आयेंगे। फिर भी पवित्र रहते हैं इसलिए पूज्य जरूर बन जाते हैं। ऐसे भी तो चाहिए ना। दस वर्ष भी हो जायेंगे - तो भी अगर उनसे कोई बात पूछो तो पहले दिन का जो उत्तर होगा वही 10 वर्ष के बाद भी देंगे। अच्छा। अभी बापदादा वतन में बहुत चिटचैट करते हैं। दोनों स्वतंत्र आत्मायें हैं। सेवा तो सेकण्ड में किया, सर्व को अनुभव कराया फिर आपस में क्या करेंगे? रूहरिहान करते रहते हैं। ब्रह्मा बाप की यही जन्म के पहले दिन की आशा थी। कौनसी? सदा यह फखुर और नशा रहा कि मैं भी बाप समान जरूर बनूँगा। आदि के ब्रह्मा के बोल याद हैं? रहा हूँ, समा रहा हूँ, यही सदा नशे के बोल जन्म के संकल्प और वाणी में रहे। तो यही आदि के बोल अब कार्य समाप्त कर जो लक्ष्य रखा है उसी लक्ष्य रूप में समा गये। पहले अर्थ मालूम नहीं था लेकिन बनी हुई भावी पहले से बोल रही थी। और लास्ट में क्या देखा? बाप समान व्यक्त के बन्धन को कैसे छोड़ा! सांप के समान पुरानी खाल छोड़ दी ना! और कितने में खेल हुआ? घडियों का ही खेल हुआ ना। इसको कहा जाता है बाप समान व्यक्त भाव को भी सहज छोड़ नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप। यह संकल्प भी उठा - मैं जा रहा हूँ, क्या हो रहा है! बच्चे सामने हैं लेकिन देखते भी नहीं देखा। सिर्फ लाइट माइट, समानता की दृष्टि देते उड़ता पंछी उड़ गया। ऐसे ही अनुभव किया ना! कितनी सहज उड़ान हुई, जो देखने वाले देखते रहे और उड़ने वाला उड़ गया। इसको कहा जाता है आदि में यही बोल और अन्त में वह स्वरूप हो गया। ऐसे ही फालो फादर। अच्छा। डबल विदेशियों के साथ: सभी स्नेही और सहयोगी आत्मायें हो ना! स्नेह के कारण बाप को पहचाना और सहयोगी आत्मा हो गये। तो स्नेही और सहयोगी हो, सेवा का उमंग-उत्साह सदा रहता है लेकिन बाकी क्या रह गया? स्नेही-सहयोगी के साथ सदा शक्ति स्वरूप। शक्तिशाली आत्मा सदा विघ्न-विनाशक होगी और जो विघ्न-विनाशक होंगे वह स्वत: ही बाप के दिलतख्तनशीन होंगे। तख्त से नीचे लाने वाला है ही माया का कोई--कोई विघ्न। तो जब माया ही नहीं आयेगी तो फिर सदा तख्तनशीन रहेंगे। उसके लिए सदा अपने को कम्बाइन्ड समझो। हर कर्म में भिन्न-भिन्न सम्बन्ध से साथ का अनुभव करो। तो सदा साथ में रहेंगे, सदा शक्तिशाली भी रहेंगे और सदा अपने को रमणीक भी अनुभव करेंगे। किसी भी प्रकार का अकेलापन नहीं महसूस करेंगे क्योंकि भिन्न-भिन्न सम्बन्ध में साथ रहने वाले सदा रमणीक और खुशी का अनुभव करते हैं। वैसे भी जब सदा एक ही बात होती है, एक ही बात रोज-रोज सुनो वा करो तो दिल उदास हो जाती है। तो यहाँ भी बाप के साथ भिन्न-भिन्न सम्बन्धों का अनुभव करने से सदा उमंग-उत्साह बना रहेगा। सिर्फ बाप है, मैं बच्चा हूँ - यह नहीं, भिन्न-भिन्न सम्बन्ध का अनुभव करो। तो जैसे मधुबन में आने से ही अपने को मनोरंजन में अनुभव करते हो और साथ का अनुभव करते हो, ऐसे ही अनुभव करेंगे कि पता नहीं दिन से रात, रात से दिन कैसे हुआ। वैसे भी विदेशी लोग चेन्ज पसन्द करते हैं। तो यहाँ भी एक द्वारा भिन्न-भिन्न अनुभव करने का बहुत अच्छा चांस है।
(पार्टियों से) महावीर की विशेषता - सदा एक बाप दूसरा कोई सदा अपने को महावीर समझते हो? महावीर की विशेषता - एक राम के सिवाए और कोई याद नहीं! तो स्दा एक बाप दूसरा कोई, ऐसी स्मृति में रहने वाले सदा महावीर। सदा विजय का तिलक लगा हुआ हो। जब एक बाप दूसरा कोई तो अविनाशी तिलक रहेगा। संसार ही बाप बन गया। संसार में व्यक्ति और वस्तु ही होती, तो सर्व सम्बन्ध बाप से, तो व्यक्ति गये और वस्तु, वह भी सर्व प्राप्ति बाप से हो गई। सुख-शान्ति-ज्ञान-आनन्द-प्रेम.. सर्व प्राप्तियाँ हो गई। जब कुछ रहा ही नहीं तो बुद्धि और कहाँ जायेगी, कैसे? अच्छा।
 
वरदान:पुराने संसार और संस्कारों की आकर्षण से जीते जी मरने वाले यथार्थ मरजीवा भव
यथार्थ जीते जी मरना अर्थात् सदा के लिए पुराने संसार वा पुराने संस्कारों से संकल्प और स्वप्न में भी मरना। मरना माना परिवर्तन होना। उन्हें कोई भी आकर्षण अपनी ओर आकर्षित कर नहीं सकती। वह कभी नहीं कह सकते कि क्या करें, चाहते नहीं थे लेकिन हो गया... कई बच्चे जीते जी मरकर फिर जिंदा हो जाते हैं। रावण का एक सिर खत्म करते तो दूसरा जाता, लेकिन फाउन्डेशन को ही खत्म कर दो तो रूप बदल करके माया वार नहीं करेगी।

स्लोगन:सबसे लकी वो हैं जो याद और सेवा में सदा बिजी रहते हैं।

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Details ( Page:- Murali Dtd 7th Aug 2017 )
07-08-17

प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन

Mithe bacche - ghadi-ghadi dehi-abhimaani banne ki practice karo - main aatma hun, ek sarir chhod dusra leti hun, ab mujhe ghar jana hai.
Q- Sabse mukhya tyohar kaun sa hai aur kyun?
A- Sabse mukhya tyohar hai raksha bandhan kyunki Baap jab pavitrata ki rakhi bandhte hain to Bharat swarg ban jata hai. Raksha bandhan par tum bacche sabko samjha sakte ho ki yah tyohar manana kab se suru hua aur kyun? Satyug me is bandhan ki darkaar he nahi. Lekin wo kehe dete hain yah raksha bandhan to parampara se chalta aaya hai.
Dharna ke liye mukhya saar
1)     Authority ke saath-saath bahut respect se baat karni hai. Sabko patit se pawan banane ki yukti batani hai.
2)     Ek abyavichari yaad me rehna hai, kisi bhi deha dhari ke name roop ko yaad nahi karna hai. Pawan banne ki he pratigyan Baap se karni hai.
Vardaan :- Busy rehne ke sahaj purusharth dwara Nirantar yogi, Nirantar sevadhari bhava
Details----Brahman janm hai he sada seva ke liye. Jitna seva me busy rahenge utna sahaj he mayajeet banenge isiliye zara bhi buddhi ko furshat mile to seva ne joot jao. Seva ke sivaye samay nahi gawaon. Chahe sankalp se seva karo, chahe vani se, chahe karm se. Apne sampark aur chalan dwara bhi seva kar sakte ho. Seva me busy rehna he sahaj purusharth hai. Busy rahenge to yudh se choot Nirantar yogi Nirantar sevadhari ban jayenge.
Slogan- Aatma ko sada tandroost rakhna hai to khushi ki khurak khaate raho.
 
HINDI DETAILS MURALI - 07-08-17 प्रात:मुरली ओम् शान्तिबापदादामधुबन

 “मीठे बच्चे - घड़ी-घड़ी देही-अभिमानी बनने की प्रैक्टिस करो - मैं आत्मा हूँ, एक शरीर छोड़ दूसरा लेती हूँ, अब मुझे घर जाना है
प्रश्न:सबसे मुख्य त्योहार कौन सा है और क्यों?
उत्तर:सबसे मुख्य त्योहार है रक्षाबंधन क्योंकि बाप जब पवित्रता की राखी बांधते हैं तो भारत स्वर्ग बन जाता है। रक्षाबंधन पर तुम बच्चे सबको समझा सकते हो कि यह त्योहार मनाना कब से शुरू हुआ और क्यों? सतयुग में इस बन्धन की दरकार ही नहीं। लेकिन वह कह देते हैं यह रक्षाबन्धन तो परम्परा से चलता आया है।
गीत: जय जय अम्बे माँ...
ओम् शान्ति।
यह भी भक्ति मार्ग का गीत है। भक्तिमार्ग में अनेक प्रकार का गायन होता है। गायन निराकार, आकार और साकार तीनों का होता है। अब बाप बच्चों को समझाते हैं, बच्चे तो समझ गये कि हम आत्मा हैं। हमको समझाने वाला है परमपिता परमात्मा। सर्व मनुष्य मात्र को सद्गति देने वाला एक ही है। फिर उनके साथ जो सर्विस करने वाले हैं, उन्हों की भी महिमा गाते हैं। बाप तो कहते हैं मामेकम् याद करो। आत्मा समझती है अभी परमपिता परमात्मा हमको सम्मुख नॉलेज देते हैं। उस बाप की ही अव्यभिचारी याद रहनी चाहिए और कोई नाम रूप की याद नहीं आनी चाहिए। आत्मा तो सब हैं। बाकी शरीर मिलने से शरीर के नाम बदलते जाते हैं। आत्मा पर कोई नाम नहीं। शरीर पर ही नाम पड़ता है। बाप कहते हैं मैं भी आत्मा हूँ। परन्तु परम आत्मा यानी परमात्मा हूँ। मेरा नाम तो है ना। मैं हूँ आत्मा। मैं शरीर कभी धारण करता नहीं हूँ, इसलिए मेरा नाम रखा गया है शिव और सभी के शरीर के नाम पड़ते हैं, मेरा तो शरीर नहीं है। नाम तो चाहिए ना। नहीं तो मैं भी आत्मा तो फिर परमात्मा कौन है। मैं हूँ परम आत्मा, मेरा नाम है शिव। जो भी पूजा करते हैं, लिंग की करते हैं। लिंग पत्थर को ही परमात्मा कहते रहते। फिर जैसी भाषा वैसा नाम। परन्तु चीज एक ही है। जैसे तुम्हारी आत्मा, वैसे मेरी है। तुम भी बिन्दी, मैं भी बिन्दी हूँ। मुझ बिन्दी का नाम है शिव। पहचान के लिए नाम तो चाहिए ना। इस समय ब्रह्मा सरस्वती जो बड़े ते बड़े हैं उनको भी सद्गति मिल रही है। सद्गति तो सभी आत्माओं को मिलनी है। सभी आत्मायें परमधाम में रहती हैं, फिर भी परमात्मा को तो अलग रखेंगे ना। सबको अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। सारी रूद्र माला का बीजरूप बाप है ना। सभी उनको याद करते हैं गॉड फादर। सभी जगह फादर को याद करते हैं, मदर को नहीं। यहाँ भारत में ही आकर पतितों को पावन बनाते हैं। मदर भी एडाप्टेड है। सरस्वती को भी परमपिता परमात्मा ने ब्रह्मा द्वारा एडाप्ट किया और फिर इसमें प्रवेश किया है। यह एडाप्शन और प्रकार की है, थ्रू तो कोई चाहिए ना। कहते हैं इन द्वारा मैं नॉलेज सुनाता हूँ, इन द्वारा बच्चे एडाप्ट करता हूँ। तो यह माता भी सिद्ध होती है। प्रवृत्ति मार्ग है ना। परन्तु है तो मेल इसलिए मुख्य सरस्वती को माता के पद पर रखा जाता है। यह बड़े गुह्य राज समझने के हैं। प्रजापिता है ना, प्रजा को रचने वाला। इन द्वारा वह रचते हैं, ऐसे नहीं कि सरस्वती द्वारा कोई एडाप्ट करते हैं, नहीं। यह तो बड़ी समझ की बात है। पहले-पहले बाप का परिचय देना होता है। गाते भी हैं पतित-पावन आओ। यह किसने कहा? आत्मा ने क्योंकि आत्मा और शरीर दोनों ही पतित हैं। पहले तो अपने को आत्मा समझना है। आत्मा ही कहती है मैं शरीर लेता हूँ, छोड़ता हूँ। एक-एक बात निश्चय में बिठानी होती है क्योंकि नई बात है ना। और जो सुनाते हैं वह हैं मनुष्य। भगवान तो नहीं। जब कोई आते हैं तो पहले-पहले यह समझाओ कि आत्मा और शरीर दो चीजें हैं। आत्मा अविनाशी है। पहले अपने को आत्मा समझो। मैं मजिस्ट्रेट हूँ, यह किसने कहा? आत्मा इन आरगन्स से कहती है। आत्मा जानती है - मेरे शरीर का नाम भी है और पद भी है मजिस्ट्रेट का। यह शरीर छोड़ने से मजिस्ट्रेट पद और शरीर का नाम रूप सब बदल जायेगा। पद भी दूसरा हो जायेगा। तो पहले-पहले आत्म-अभिमानी बनना है। मनुष्यों को तो आत्मा का ज्ञान भी नहीं है। पहले आत्मा का ज्ञान देकर फिर समझाओ आत्मा का बाप तो परमात्मा है। आत्मा दु:खी होती है तो पुकारती है गॉड फादर। वही पतित-पावन है। आत्मायें सभी पतित हो गई हैं। तो जरूर परमपिता परमात्मा को आना पड़े। पतित दुनिया और पतित शरीर में। बाप खुद कहते हैं मुझ दूरदेश के रहने वाले को बुलाते हैं, क्योंकि तुम पतित हो मैं एवर पावन हूँ। भारत पावन था, अभी पतित है। पतित-पावन बाप आकर आत्माओं से बात करते हैं। ब्रह्मा तन में आकर समझाते हैं, इसलिए इनका नाम है प्रजापिता। ब्रह्मा द्वारा प्रजा रचते हैं। कौन सी? जरूर नई प्रजा रचेंगे। आत्मा जो अपवित्र है उनको पवित्र बनाते हैं। आत्मा पुकारती है हमको दु: से छुड़ाओ, लिबरेट करो। सबको लिबरेट करते हैं। माया ने सबको दु:खी किया है। सीताओं ने पुकारा है ना। एक तो सीता नहीं। सब रावण की जेल में विकारी, भ्रष्टाचारी बन गये हैं। है ही रावण राज्य। राम तो है ही निराकार। राम राम कहते हैं ना। एक को ही जपते हैं। गॉड फादर शिव निराकार तो उनको आरगन्स चाहिए ना। तो शिवबाबा इन द्वारा बैठ समझाते हैं। तुम आत्मा भी पतित हो तो शरीर भी पतित है। अभी तुम श्याम हो फिर सुन्दर बनते हो। बाबा ज्ञान का सागर, ज्ञान की वर्षा करते हैं। जिससे तुम गोरे बन जाते हो। भारतवासी गोरे थे फिर काम चिता पर चढ़ सांवरे वैश्य, शूद्र वंशी बन पड़े हैं। चढ़ती कला बाप करते हैं फिर रावण आता है तो सबकी उतरती कला हो जाती है। भारत में पहले देवताओं का राज्य था। अभी नहीं है। परमात्म